Monday, 7 October 2013

कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कला निकली जब भी बिकने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेला सजाया गया था रात
सज कर आई थी उसकी बरात
झूम झूम कर कला खुद नाची
फूलों की हो रही थी वो बरसात।

सुबह था बदला सा नज़ारा
जो भी सजाया बिखरा था सारा
कला का ज़ख़्मी था पूरा बदन
बन कर अपने सब ने ही मारा।

जाने था कैसा ये उसका सम्मान
जो बन गया जैसे हो कोई अपमान
फिर से वही तलवे चाटना सबके
बस दो पल की थी झूठी शान।

किस बात पे थी यूं इतना इतराई
क्या नया थी तू ले कर आई
तेरा मोल लगाने लगे लोग
रो रो कह रही थी शहनाई।

कल तक जिनको बुरा थी कहती
नहीं कभी जिनके घर में रहती
उनको ही अपना खुदा बनाया
हमने भी देखी उलटी गंगा बहती।


खुद को किया है जिनके हवाले
करते निसदिन वो हैं घोटाले
उनको नज़र आता जिस्म नग्न
नहीं देखते पांव के कभी छाले।

कला नहीं बाज़ार में कभी जाना
चाहे रूखी सूखी ही खाना
छूना मत गंदगी को भूले से
इन धोकों से खुद को है बचाना।

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