Monday, 7 October 2013

गाता फिरे गली गली यही फ़कीर ( कविता ) 103 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

प्रति दिन युद्ध होता  है ,
दिल की चाह में  ,
और ईमान की राह में ,
हर दिन बुरे कर्म ,
करने के बाद ,
आदमी को याद दिलाता ,
है उसका ज़मीर ,
अभी कल ही तो ,
किया था मुझसे वादा ,
छोड़ देने का ,
सभी अपने बुरे कर्म ,
भूल कर क्यों आज फिर  ,
चले आये हो उसी मार्ग पर।
कितनी बार पछतावा ,
होता है दिल को ,
हर शाम पीने के बाद ,
लगता है पीने वाले को ,
बड़ी ही नामुराद चीज़ है ,
मय भी मयखाना भी ,
सब लुटा है न कुछ भी ,
कभी भी मिल सका ,
छोड़ ही दे है कहता ,
ईमान इस महफ़िल को।
तेरी गली को ,
कितनी बार अलविदा कहा ,
क्या क्या नहीं उम्र भर ,
सितम भी सहा ,
जनता हूं बेवफा ,
नाम है तेरा ही लेकिन ,
तेरे हुस्न के जादू का ,
हुआ ऐसा मुझपे असर ,
हार के सभी अपना ,
खेलता हूं फिर फिर जुआ।
कितनी दौलत ,
पाप वाली जमा कर ली  ,
अपनी झोली पापों से ,
मैंने क्योंकर भर ली ,
हर सुबह जाकर ,
मांगता हूं खुदा से ,
मैं गिर रहा तूं ही ,
बचा ले आकर मुझको ,
शाम होते नहीं ,
कुछ भी याद रखता हूं ,
दिल है जो कहता ,
वही तो करता मैं हूं।
अपने ईमान की ,
सुनता कब हूं मैं भला ,
रात दिन दिल के हूं ,
कहने पर बस  चला ,
अच्छी लगती हैं ,
राहें बुरी मेरे दिल को ,
खुद भंवर चुनता हूं  ,
छोड़ कर उस साहिल को ,
दिल के हाथों है  लुटता  ,
दुनिया का हर अमीर ,
गाता  रात दिन भजन ,
गली गली है इक फ़कीर।

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