Saturday, 12 October 2013

रास्ते का दर्द ( कहानी ) डा लोक सेतिया

अनिल का स्टोर मुख्य सड़क पर है। सड़क की दूसरी तरफ पार्क है बहुत बड़ा। पार्क के पीछे का वह मकान काफी दूर है और इतनी दूरी से किसी को ठीक से पहचाना नहीं जा सकता। मगर उस घर की बालकनी पर जब से अनिल ने उस लड़की को देखा है तब से उसका ध्यान उसी तरफ रहने लगा है। क्या ये वही है ,अनिल सोचता रहता है , क्यों उसे देख कर वो बेचैन हो जाता है , क्यों उसके दिल की धडकनें बड़ जाती हैं। दूर उस बालकनी से वो एकदम उसी जैसी नज़र आती है , बस उसका पहनावा बदला हुआ है और नई नवेली दुल्हन सा लगता है। क्या उसने विवाह कर लिया है , वह भी उसके स्टोर के ठीक सामने वाले घर में। नहीं वो मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती , अनिल सोचने लगता है। हो सकता है ये कोई और हो जो दूर से उस के जैसी लगती है या फिर ये उसका प्यार है जो दूसरों में अपनी प्रेमिका की छवि देख रहा है। वो इतने दिनों से स्टोर पर क्यों नहीं आ रही है। मगर उन दोनों में कभी प्यार के वादों -कसमों जैसी कोई बातें भी तो कभी हुई नहीं , फिर क्यों उसको विश्वास है की वह भी चाहती है मुझे। हो सकता है ये उसका एकतरफा प्यार ही हो। क्यों रोज़ सुबह स्टोर पर आते ही उसकी नज़र सामने के मकान की बालकनी में उसे तलाश करने लग जाती है। अगर ये वही है तो किसी न किसी दिन वो कभी तो फिर से आएगी स्टोर पर। अपने मन में इक उम्मीद जगाता है अनिल। लेकिन अब क्या हासिल हो सकता है जब उसने चुपचाप किसी दूसरे से शादी रचा ली है। ऐसे में तो मेरा उसके बारे सोचना भी अनुचित बात है , अनिल एक अपराधबोध से ग्रस्त हो जाता है। काश ये वो न होकर उसके साथ मिलती जुलती कोई अन्य ही हो। उदास और परेशान रहने लगा है अनिल , काम में आजकल मन ही नहीं लगता उसका। कभी कभी सोचता है कि कुछ ही दूर उस मकान के करीब जा कर उसको ठीक से देख कर पहचान ले , बात करे उसके साथ जाकर। मगर ये छोटा सा रास्ता वह तय नहीं कर पा रहा , लगता है ये कुछ कदम की दूरी इतनी अधिक है जिसको अनिल तमाम उम्र में तय नहीं कर सकेगा।
        वह बेहद खूबसूरत है , उसकी आवाज़ में मधुरता है बातों में भोलापन। हर दिन आया करती है अनिल के स्टोर पर , कभी खरीद कर कुछ ले जाती है तो कभी फिर से वापस करने आ जाती है। अक्सर इधर उधर की बातें कर समय बिताने लगती है। अनिल को ऐसा लगता है कि वो मुझसे मिलने ही आती है। वो उम्मीद करता है कि इक दिन वो खुद अनिल से अपने प्यार का इज़हार भी करेगी। कितनी बार चाहा है अनिल ने अपने मन की बात उसको कह दे , मगर वो अपनी बातों में इस कद्र उलझाये रहती है कि अनिल कभी कुछ कह ही नहीं पाता। जिस दिन वो नहीं आती स्टोर पर ,अनिल को सब सूना सूना सा लगता है। तब सोचता है कि उससे उसका नाम पता तो पूछ लिया होता , या उसका कोई फोन नम्बर होता तो उसके न आने और ठीक ठाक होने की जानकारी तो ले पाता। लेकिन उससे कभी ये हो नहीं सका। किसी ग्राहक का नाम पता पूछना , विशेषकर लड़की का , जाने उसको असभ्यता ही लगे और वो स्टोर पर आना ही छोड़ दे , जो अनिल कभी नहीं चाहेगा। एक दो बार अनिल ने अपने दिल की बात पत्र में लिख कर रख ली थी , सोचा था दे देगा उसको ,मगर जब वो आई तो पत्र देने का सहस नहीं जुटा पाया था। लेकिन जिस तरह वो खुल कर उसके साथ दोस्ती की बात कहती है , उससे कोई भी समझेगा कि उनमें गहरी जानपहचान और आपसी समझ है , जो दो प्यार करने वालों में होनी चाहिए। इतने दिनों से परिचित हैं लेकिन अनिल को उसका नाम तक मालूम नहीं , शायद वो भी उसे उसके नाम से अधिक स्टोर के नाम से ही पहचानती हो।
      और एक दिन वो फिर से अनिल के स्टोर पर आ ही गई थी , नई नवेली दुल्हन जैसी गहनों से सजी हुई। अनिल को समझ नहीं आ रहा था कि उसको देख कर , उसके स्टोर पर आने पर खुश हो या उसे विवाहित देख कर उदास। मगर अनिल को अच्छा लगा था आना उसका , कितने दिनों से इस पल का इंतजार कर रहा था। बहुत दिन बाद आई हैं स्टोर पर , पूछ ही लिया था अनिल ने। हाँ मेरी शादी तय हो गई थी , इतने दिन उसी में ही व्यस्त रही हूं। मगर आया करूंगी रोज़ अब , आपके स्टोर के सामने वो पार्क के पीछे जो गुलाबी रंग का घर है , वही तो मेरी ससुराल है , अब वही मेरा घर है आपके सामने ही। कितने दिनों से आपके स्टोर पर आने की बात दिल में थी ,अपने पति महोदय से भी कहा कि चलकर आपका धन्यवाद तो कर आयें। मेरा धन्यवाद किसलिए , हैरानी से पूछा था अनिल ने। वह कहने लगी क्योंकि इतने दिनों तक आपका ये स्टोर ही तो हमारे प्यार की मंजिल का रास्ता रहा है। रोज़ मुलाकात करने के लिए हम दोनों ने आपके स्टोर का उपयोग किया है। मैं रोज़ यहाँ उनका इंतज़ार किया करती थी और जब वो सामने अपने घर से बाईक पर बाहर निकलते तब मैं बाहर चली जाया करती सड़क पर और वे मुझे ले जाया करते अपने साथ। आप क्या जानते नहीं , मैं इसीलिए ही तो आया करती थी आपके स्टोर पर। उसकी बात सुन अनिल को झटका सा लगा था , वो सोचता रहा कि उसको मिलने आया करती है हर दिन जब कि उसे तो इसका इस्तेमाल करना था अपने प्रेमी से मिलने के लिए। ये जानकर अनिल को अच्छा नहीं लगा था , खुद पर गुस्सा आ रहा था , कितना मूर्ख हूं जो इतने दिन ऎसी गलत फ़हमी दिल में पाले रहा , क्या क्या सपने देखता रहा। अनिल को खामोश देख कर वो बोली थी , क्या सोचने लगे , मुझे शादी की मुबारिकबाद भी नहीं दोगे। शायद आप नाराज़ हैं क्योंकि हम दोनों आपको अपनी शादी में बुलाना ही भूल गये थे। नहीं ऎसी कोई बात नहीं आपको बहुत बहुत बधाई हो विवाह की ,मेरी शुभकामनायें आप दोनों पति पत्नी के लिए हमेशा रहेंगी। वैसे आपके पति महोदय का नाम क्या है ,मिलवाना किसी दिन मुझसे उन्हें। हैरानी की बात है हम इतने दिनों से इक दूजे को जानते हैं मगर मुझे आज तक आपका नाम भी मालूम नहीं है , कभी न मैंने ही पूछा न ही आपने बताया कभी। मेरा नाम है अलका और मेरे पति का नाम कमल है , वो बोली थी। आपका नाम क्या है मैंने भी नहीं पूछा कभी आपसे ,बस अनिल स्टोर के नाम से जानती हूं आपको , हंसकर कहा था उसने। मेरा नाम अनिल ही है अपने नाम पर ही रखा है स्टोर का नाम मैंने। अच्छा चलती हूं ,अब तो मिलते ही रहेंगे , जाते जाते उसने कहा था , मेरा नाम याद रखियेगा , अलका कमल। कभी शाम को हमारे घर आना , आपकी मुलाकात हो जायेगी कमल से भी।
      अनिल समझना  चाहता है कि वो क्या है एक चलता फिरता हुआ इन्सान जिसमें दिल है भावनाएं हैं या कोई स्टोर है कारोबार का जहाँ कोई किसी काम से ही नहीं बिना काम अपने किसी मतलब से भी आ जा सकता है। उसको लगता था अलका की चाहत है वो , मंजिल है अलका की ,लेकिन अलका के लिए वो सिर्फ एक स्टोर था , एक रास्ता था उसका अपने प्यार की मंजिल को पाने के लिए। और ये सच है कि मंजिल से सभी प्यार किया करते हैं , कोई भी रास्तों से प्यार नहीं किया करता कभी। हर कोई रास्ते को जल्द से जल्द तय कर लेना चाहता है ताकि मंजिल को पा सके। यही है रास्तों का मुकद्दर। काश कि वो किसी का रास्ता नहीं उसकी मंजिल होता। रास्ते का दर्द कभी नहीं समझा है किसी भी मुसाफिर ने आज तक।

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