अक्टूबर 31, 2014

POST : 460 क्या सच में कुछ बदल रहा है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

   क्या सच में कुछ बदल रहा है ( आलेख ) डा लोक सेतिया

        कई दिन के बाद लिखने को आया हूं ब्लॉग पर। सच कहूं तो खुद निजि बातों में खोया रहा कुछ दिन से और हर दिन लिखना छूट सा गया। हर लेखक के जीवन में ऐसा होता है कभी जब उसका ध्यान लिखने में नहीं रहता है। शायद एक महीना मैंने लिखने को लेकर सोचा ही नहीं। सत्ता बदली देश में भी राज्य में भी , समझ रहा था क्या जो बदलता हुआ लग रहा है वो वास्तव में बदल भी रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमेशा की तरह नाम ही बदलें बाकी सब वही चलता रहे। कुछ बातें नज़र आईं हैं जिनसे थोड़ा भरोसा हुआ है जनता को कि शायद अब सच में सब बदलने वाला है। डर लगता है कहीं फिर देश की उम्मीदें टूट न जायें , सत्ता ही बदले व्यवस्था जस की तस बनी रहे। कम से कम कुछ बातें तो हैं जिनको फिर से दोहराया जाने लगा है , आडंबर जो कोई और करता था किसी और रूप में वो कोई दूसरा नये ढंग से करता लग रहा है। कहां से शुरू की जाये बात , चलो आज के दिन से करते हैं।

          सरदार पटेल के नाम पर मैराथन दौड़ क्या है , कुछ सुविधा संम्पन लोगों का मात्र दिखावा नहीं क्या। क्या देश की जनता का इस से कुछ भला होने वाला है , क्या आम लोग शामिल होंगे ऐसे खेल में। कब तक आखिर कब तब यूं ही देश का धन फज़ूल दिखावों पर बर्बाद किया जाता रहेगा। महाराष्ट्र में शपथ ग्रहण समारोह पर ऐसा महंगा आयोजन किसलिये , समझना होगा भाजपा को उसको शासन का अधिकार मिला है या देश जनता की सेवा का। अंतर इतना सा ही है , सब मांगे देश और जनता की सेवा का अवसर हैं , मगर जब कुर्सी मिलती है तब शासक बन जाते हैं। बहुत अचरज हुआ जब जो कांग्रेस किया करती थी अपने सांसदों को बुला छप्पन प्रकार के व्यंजन परोसना वही मोदी जी ने भी किया। अगर सत्ताधारी ऐसे ही राजसी शान से रहते रहेंगे तब गरीब भूखा ही रहेगा , भाषण से पेट नहीं भरता।

            मैं कभी आगरा नहीं गया , ताजमहल मुझे हमेशा लगता किसी शासक ने जनता के खून पसीने की कमाई से अपना खज़ाना भर उसको अपनी ख़ुशी पर बर्बाद किया। शायद उस धन से लोगों को कितनी सुविधायें दी जा सकती थी। ये जो बुत , समाधियां बनाने का चलन है मैं इसको लोकतांत्रिक नहीं मानता , अभी भी सत्ताधारी खुद को देश का मालिक ही समझने लगते हैं। अन्यथा जिस देश की आधी जनता को दो वक़्त रोटी नहीं नसीब होती हो उस देश में मरने के बाद नेताओं की समाधियों पर धन कभी खर्च नहीं किया जाता। सोचो अगर वो नेता वास्तव में देश के और जनता के सेवक थे तो क्या उनको ऐसा किया जाना पसंद होता। काले धन की बात हो रही है , काला धन विदेशी बैंकों में ही नहीं है , नब्बे प्रतिशत देश में ही है ,उसको ढूंढने में उसपर अंकुश लगाने में कोई संधि बाधा नहीं है। क्या चाहती है सरकार रोक लगाना काले धन पर , मुश्किल नहीं है , एक कानून होना चाहिये हर नागरिक को बताना पड़े उसके पास क्या क्या है , घर ज़मीन , नकद , गहने या जो भी , और बिना घोषित कुछ भी हो उस को देश की संम्पति घोषित किया जाये। किसी को भी जितने भी चाहे घर खरीदने का अधिकार नहीं होना चाहिये ताकि जो बेघर हैं वही खरीद सकें। जो व्योपारी हैं उनको खेती की ज़मीन खरीदने का अधिकार किसलिये , काला धन सफ़ेद करने को। जब तक राजनेता खुद सादगी से नहीं रहते उनको गांधी का आलाप लगाने का कोई हक नहीं है। खुद को देश को जनता को धोखा देते रहे हैं नेता हमेशा , लेकिन कब तक। अभी भी भाजपा हो चाहे कोई दल सबका एक मात्र ध्येय सत्ता पाना ही है , और उसके लिये जो भी करना हो करते हैं। कुछ उसी तरह जैसे हम मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे बनाते जा रहे और जो वास्तविक धर्म है उसको समझना ही नहीं चाहते। लिखा बहुत जा सकता है मगर यहीं अंत करता हूं इस लेख का दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के कुछ शेरों से।

  हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
  इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

  सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
  मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

  मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
  हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए। 

 

अक्टूबर 16, 2014

POST : 459 ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है
उठा कर हाथ अपने , चांद -तारे तोड़ लाना है ।

कभी महलों की चाहत में , भटकती भी रही हूं मैं
नहीं पर चैन महलों में , वो कैसा आशियाना है ।

मुझे मालूम है , तुम , क्यों बड़ी तारीफ़ करते हो
नहीं कुछ मुझको देना , और सब मुझसे चुराना है ।

इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती
भुला कर दर्द सब , बस अब ख़ुशी के गीत गाना है ।

मुझे लड़ना पड़ेगा , इन हवाओं से ज़माने की
बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है ।

नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो
ज़माना क्या कहेगा , सोचना , अब भूल जाना है ।

नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई
लिखो "तनहा" नया कोई हुआ किस्सा पुराना है । 



अक्टूबर 10, 2014

POST : 458 सच हुए सपने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सच हुए सपने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सपने तो सपने होते हैं
देखते हैं सभी सपने
मैंने भी देखे थे कुछ
प्यार वाले सपने ।

कोई अपना हो
हमराज़ भी हो
हमसफ़र भी हो
हमज़ुबां भी हो
चाहे पास हो
चाहे कहीं दूर हो
हो मगर दिल के
बहत ही करीब
जिसको पाकर
संवर जाये मेरा
बिगड़ा हुआ नसीब ।

सब दुनिया वाले
यही कहते थे
किस दुनिया में
रहता हूं मैं अब तक
और किस दुनिया को
ढूंढता फिरता हूं
ऐसी दुनिया जहां
कोई स्वार्थ न हो
कोई बंधन न हो
और हो सच्चा प्यार
अपनापन  भरोसा
अटूट विश्वास इक दूजे पर ।

मगर मेरा विश्वास
मेरा सपना सच किया है
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम
जी उठा हूं जैसे फिर से
निकल कर जीवन की निराशाओं से
तैर रहा आशाओं के समंदर में ।

तुम्हारा हाथ थाम कर
मिलेगी अब ज़रूर
उस पार मेरी मंज़िल
इक सपनों का होगा
महल वहीं कहीं
जहां होगा अपना हर कोई
मुहब्बत वाला इक घर
जिसकी खिड़की दरवाज़े
दीवारें और छत भी
बने होंगे प्यार से
स्वर्ग सा सुंदर होगा
अपना छोटा सा आशियाना । 
 

 

अक्टूबर 06, 2014

POST : 457 रसीली ( कहानी , इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग दो )

      रसीली ( कहानी , इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग दो )

                        ( अब आगे कहानी का दूसरा और अंतिम भाग )

         वो रसीली ही थी , प्यार के रस से लबालब भरी हुई।  अपना नाम सार्थक करती थी , हमेशा हर किसी से मीठी मीठी बातें करना हंसना खिलखिलाना बचपन से सवभाव था उसका। घर का छोटा बड़ा सदस्य हो , आस पास का कोई चाहे राह से गुज़रता कोई अनजान अजनबी सब से बिना झिझक बात करना हसी मज़ाक करना आदत थी रसीली की। सब का मन मोह लिया करती अपने भोले चेहरे निश्छल व्यवहार और सब के काम में साथ देने से। उसको नहीं पता चला कि कब उसने बचपन से किशोर अवस्था में और फिर जवानी में कदम रखा था। वो अभी भी वैसी ही थी , झूम कर किसी को गले लगा लेना , घुल मिल जाना सभी से बचपन जैसा ही था। घर के लोग चाहते थे उसको समझाना कि वो बच्ची नहीं रही अब और उसको अपने बराबर के युवा लड़कों से थोड़ा दूरी रखनी चाहिये। रसीली नहीं समझ पाई थी कि अपने बचपन के दोस्तों से प्यार से मिलने , बात करने में बुराई क्या है। कोई उसको बिंदास कहता कोई नासमझ कोई बदचलन , मगर रसीली को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वो मानती थी कि जब वो कुछ भी गलत नहीं करती तो कोई क्या सोचता है इससे क्या मतलब। रसीली की सहेलियां भी कहती थी उसको , तुझे लड़कों के साथ अकेले कहीं भी आने जाने में क्या डर नहीं लगता है। वो कहती मेरे अपने दोस्त ही तो हैं भला उनसे किस बात का डर। और तब उस अल्हड़पन की बाली उम्र में ही रसीली कब अपना दिल कमाल को दे बैठी उसको भी पता नहीं चला। एक हरदम खामोश रहने वाला अपने में मस्त खोया रहने वाला कमाल उसके दिल और दिमाग पर छा गया कुछ ही दिन की मुलाकातों में जाने कैसे। कुछ दिन छुट्टियां बिताने आया था पास किसी रिश्तेदार के घर में। जब कमाल को वापस जाना था अपने शहर को तब वो नई दोस्त बनी रसीली को मिलने आया था , बहुत उदास था। रसीली ने कहा था फिर कब आओगे कमाल यहां। वो बेहद निराशा भरे स्वर में बोला था , उसको नहीं मालूम कि अब कभी आ सकेगा भी या नहीं। उसकी इस बात से रसीली को जाने ऐसा क्या हुआ था जो उसने कह दिया था कमाल अगर तुम नहीं आओगे तो मैं जी नहीं सकूंगी तुम्हारे बिना अधिक दिनों तक , मर ही जाऊंगी। और फिर जो कुछ घटा वो कोई सपना ही था , कमाल का रसीली से शादी करने का वादा और रसीली का घर को छोड़ कमाल के साथ जाना उसके शहर में उसके घर।

                                    रसीली को अपने साथ लेकर जब कमाल अपने घर पहुंचा तब वहां हंगामा खड़ा हो गया , जैसे कोई भूचाल आ गया हो। एक चुपचाप हर बात पर जी हां कहने वाले बेटे से ऐसी अपेक्षा नहीं थी परिवार वालों को सपने में भी। कमाल को आदेश दिया गया कि रसीली को लेजाकर उसके घर छोड़ आये। लेकिन कमाल ने अपना घर ही छोड़ दिया था और रसीली का हाथ थाम इक कसम खाई थी कि अब चाहे सारा ज़माना सारी खुदाई भी उन दोनों के खिलाफ हो जाये वो हमेशा इक साथ ही रहेंगे। उन्होंने तय कर लिया था कि अब प्यार ही उनके लिए सब कुछ है , प्यार में जीना प्यार में मरना भी मंज़ूर है। बेशक लोग उनसे नफरत करें वो सब को प्यार का ही सबक सिखायेंगे उम्र भर। शायद किताबों कहानियों की तरह लोग भी बदल जायेंगे और उनसे प्यार करने लगेंगे। मगर किताबों और कहानियों केकिरदार  बदल जाते हैं वास्तविक जीवन में अक्सर ऐसा नहीं होता है। उन दोनों के लिये और विशेषकर रसीली के लिये अपनों की नफरत उसकी मौत भी कम नहीं कर सकी। रसीली को जब कमाल के घर में जगह नहीं मिली तब उसने प्रयास किया था अपने घर वालों से सहारा मिल जाये। रसीली ने अपनी इक सहेली को फोन किया था ताकि वो उसके परिवार वालों से पूछ सके कि अगर वो कमाल को लेकर आये वहां तो क्या उनको सवीकार करेंगे पति पत्नी के रूप में। शाम को सहेली ने बताया था कि जब वो रसीली के घर गई थी तब वो बातें कर रहे थे उन दोनों को तलाश करने और जान से मरने की। इसलिये उसने उनको ये पूछना ही उचित नहीं समझा और यही बताया कि वह तो रसीली से मिलने को आई थी और उसको रसीली की कोई जानकारी नहीं है। सहेली ने समझाया था तुम दोनों कहीं दूर चले जाओ और अपनी दुनिया वहां बसा लो जहां ये ज़ालिम नफरत करने वाले नहीं हों। रसीली और कमाल जैसे सपनों के आकाश से गिर कर दुनिया की पत्थरीली ज़मीन पर आ गये थे और उनको समझ नहीं आ रहा था प्यार करके ऐसा क्या गुनाह किया है उन लोगों ने। पूरा का पूरा समाज ही उनका दुश्मन क्यों बन गया है , क्या कोई जगह नहीं जहां प्यार करने वालों को शरण मिल सके। भटकते रहे बहुत दिन तक इधर उधर मगर नहीं मिली कोई भी जगह उनको रहने को। प्यार करने वाले दिल ज़िंदगी की जंग लड़ते रहे और दो वक़्त पेट भरना भी कठिन हो गया। न रहने को ठिकाना न पास कुछ भी पैसे , उस पर जहां किसी से सहायता मांगते , काम मांगते और कोई ठिकाना , हर जगह शिकारी वहशी दरिंदे ही मिलते। ये देख बहुत घबरा गये दोनों प्रेमी , मगर इक ज़िद ने ज़िंदा रखा कि अपने लिये नहीं अब साथी के लिये जीना है। ज़िंदगी की कशमकश में वे इक दूजे को प्यार करना तो भूल ही गये थे और बात बात पर आपस में उलझने लगे थे। ऐसे में हवस के भूखे भेड़ियों ने उनकी मज़बूरियों का फायदा उठा कर उनको अपनी राह पर चलने को विवश कर दिया था। बहुत जल्द इक प्रेम कहानी पाप कथा बन गई थी। समाज के एक शरीफ कहलाने वाले धनवान व्यक्ति  ने उनको दया करने का झांसा देकर ऐसा फंसाया कि उनको ऐसी बदनाम गलियों में पहुंचा दिया जहां से निकलने की कोई राह ही नहीं होती है। हर दिन पल पल ज़िंदगी की लड़ाई लड़ते लड़ते दोनों तंग आ गये थे और हार मान ली थी , अपने हालत को नियति स्वीकार कर लिया था। और ऐसे में वो दोनों नशे का शिकार हो गये थे। इक समाजसेवक ने शरण देकर उनका शोषण किया बहुत दिन तक , कमाल को कहीं अन्य जगह भेज काम से रसीली के साथ वो खुद और उसके साथी मिल कई दिन तक अनाचार करते रहे , जब ये सब कमाल ने देखा और विरोध किया तो उसको सज़ा दी गई अपाहिज बनाने की , उसको नपुंसक बना दिया गया। ऐसे इक प्रेमी अपनी ही प्रेमिका का सौदा करने वाला इक दलाल बना दिया गया। उनको इक बदनाम बस्ती में पहुंचा दिया कुछ शरीफ कहलाने वाले लोगों ने।

                          रसीली कभी भी बस्ती की बाकी औरतों जैसी नहीं बन पाई , उसका सवभाव तब भी सनेहपूर्ण ही रहा अपने पास आने वालों से प्रेम और अपनेपन से बातें करते उसके पास अपनी हवस मिटाने आये ग्राहक भी उसको चाहने लगते थे। उनको रसीली का जिस्म ही नहीं मिलता था और भी बहुत कुछ मिलता था जो बस्ती की दूसरी किसी औरत से नहीं मिलता था। एक पूरी तहर खुद को समर्पित करने वाली औरत जो उनसे उनके दुःख और परेशानियां भी जानना चाहती थी दोस्त  बन कर और उनसे सहानुभूति भी रखती थी। ऐसे में वो लोग भी रसीली के पास आकर रहने लगे जिनके पास उसको देने को पैसे नहीं भी होते थे। जीवन से निराश लोगों को अपनाना रसीली और कमाल की आदत बन गई थी , खाली पेट आते कई लोग तब उनको रसीली खुद खाना बना कर खिलाती थी और उनकी प्यास भी बुझाती थी , जिस बस्ती में सब कुछ पैसा हो वहां रसीली यूं रहती थी जैसे पैसे की कोई अहमियत ही नहीं हो। पैसा न होने से किसी को ठुकराया नहीं कभी रसीली ने , रसीली से सब को प्यार ही नहीं मीठे बोल भी मिलते थे और खाने को रोटी के साथ देसी शराब भी। जाने कितने लोग जिनको अपनों ने ठुकरा दिया था उनको रसीली की हमदर्दी ने फिर से जीना सीखा दिया था। प्यार रसीली के अंग अंग में उसके रोम रोम में बेशुमार भरा हुआ था।  हालात ने उसको वैश्या का नाम भले दे दिया था तब भी जिस्म बेचने वाली औरतों की तरह उसने पैसे को अपना सब कुछ नहीं समझा था। सब के प्यार की प्यास मिटा कर अपने और अपने साथी कमाल की पेट की भूख और बाकी ज़रूरतें पूरी करने का काम रसीली ने ऐसे किया उम्र भर जैसे कोई पूजा करता है , इबादत करता हो। वासना का कारोबार नहीं सीखा कभी भी रसीली ने , कमाल और रसीली ने कभी दुनिया वालों से कोई शिकायत नहीं की थी। मगर जब दोनों अकेले होते अपने घर में तब पूछा करते भगवान से ये सवाल कि उनको प्यार करने की ऐसी सज़ा क्यों मिली है। क्यों खुदा अपनी दुनिया में प्यार करने वालों की भी इक दुनिया बनाना भूल गया था।

      पिछले दो दिन से बस्ती गुमसुम सी है , सन्नाटा सा छाया हुआ है बस्ती में। जो बस्ती की औरतें ईर्ष्या किया करती थी रसीली से उनकी भी आंखे नम हैं चेहरे उदास हैं और घर में ग़म की गहरी छाया है। शायद उनको भी ख्याल आ रहा है कि किसी दिन उनका भी यही अंत होना है। पुलिस वाले चाहते थे किसी तरह कोई रसीली की लाश उनसे ले ले अंतिम संस्कार करने के लिये ताकि उनको रसीली का ये घर सील बंद नहीं करना पड़े और वे इसका कब्ज़ा किसी और जिस्म बेचने वाली औरत को देकर कुछ कमाई कर सकें। लगता है पापियों की बात भगवान भी जल्दी सुन लेता है , तभी तो पुलिस वाले अपनी गाड़ी में रसीली की लाश ले जाते उस से पहले ही इक अनजान व्यक्ति रसीली के घर के दरवाज़े पर आकर रुका था रिक्शा से उतरा था। जब उसको मालूम हुआ कि रसीली की मौत हो चुकी है तब वो फफक फफक कर रोने लगा था , पुलिस वालों को उसने बताया था कि जब भी इस शहर में आता है वो तब रसीली के घर ही मेहमान बन कर रुकता है। पिछली कई बार उसने रसीली को एक भी पैसा नहीं दिया था किसी काम के लिये भी , क्योंकि उसके पास थे ही नहीं तब देने को पैसे। आज ढेर सारे पैसे साथ लाया था ये सोचकर कि उसका सारा क़र्ज़ उतार देगा। जब पुलिस वालों ने बताया कि रसीली की देह को लेने को कोई उसका अपना तैयार नहीं है और अब उसका दाह संस्कार लावारिस घोषित कर उनको ही करना है तब उसने पुलिस वालों से पूछा था कि क्या वो उसका अपना बन उसकी लाश को ले जा सकता है ताकि रसीली का अंतिम संस्कार कर सके। पुलिस वाले कब से यही चाहते ही थे , उस व्यक्ति से कुछ कागज़ों पर लिखवा लिया है कि वो रसीली का अपना  है और उसकी लाश ले जाकर क्रियाकर्म करना चाहता है। शमशान भूमि का वाहन आ गया है और वो अकेला रसीली का शव लेकर जा रहा है , बस्ती वालों के साथ पुलिस वालों की भी आँखे नम हैं ये देख कर कि कोई है जो रसीली के प्यार की कीमत समझता है और उसका क़र्ज़ चुकाने आया है , चाहे रसीली की मौत के बाद ही।


   ( रसीली की ये कहानी यहां समाप्त होती है , मगर शायद मैं रसीली की सही छवि अभी भी नहीं बना पाया हूँ। तभी ये वास्तविक कहानी किसी पत्र पत्रिका ने छापना स्वीकार नहीं किया। यहां मुझे इक इंग्लैंड के मनोचिक्सक की याद आती है , उसने ये प्रचार कर रखा था कि जो भी कोई ख़ुदकुशी करना चाहता हो वो मरने से पहले एक बार उसको ज़रूर आकर मिले। लोग आते हर दिन और वो सब को ये मनाने को सफल हो जाता कि उनके पास अभी जीने की वजह है। मगर इक दिन वो ऐसा नहीं कर पाया और उसने इक व्यक्ति को ये कह दिया कि मैं भी आपको नहीं समझा सकता कि आपको क्यों जीना चाहिये। अब उस को मरना ही था ये सोच कर निकला तो उन मनोचिकित्स्क की सहायक जो केबिन के बाहर बैठी ये सब सुन रही थी , ने उसको रोक कर पूछा आप क्या करने जा रहे हो , जब उसने ख़ुदकुशी करने की बात कही तब उस सहायक ने पूछा था क्या आप मेरे साथ चल कर एक कप कॉफी पी सकते हैं मरने से पहले , वो मान गया था। तब थोड़ी ही देर में उसको अपना मित्र बना उस सहायक ने उसका ख़ुदकुशी का इरादा बदलवा दिया था। आज भी उस सहायक के नाम इक संस्था है जो निराश लोगों में जीवन की आशा जगाती है। दिल्ली में भी उसकी एक शाखा है सफदरजंग हवाई अड्डे के पास , बहुत साल पहले उसके लिये काम किया है मैंने। रसीली ने शायद कुछ ऐसा ही किया था उम्र भर। हो सके तो आप भी उसको समझना। )

अक्टूबर 03, 2014

POST : 456 कब होंगे सब लोग समान , मोदी जी ? ( आलेख ) डा लोक सेतिया

 कब होंगे सब लोग समान , मोदी जी ? ( आलेख ) डा लोक सेतिया

              आज बहुत दिन बाद कुछ कहने लगा हूं जो शायद कितनी बार दोहरा चुका हूं। ठीक वैसे जैसे कल गांधी जी के जन्म दिवस पर जो हुआ वो जाने कितनी बार पहले भी हुआ है , होता रहेगा। ये इक तमाशा सा लगता है , बहुत सारे साफ सुथरे लोग , शानदार झाड़ू , बैनर , मीडिया का जमावड़ा , लाइव टेलीकास्ट , भाषण। कितना पैसा बर्बाद किया गया आडंबर पर इस गरीब देश का। बहुत पहले किसी विदेशी अर्थशास्त्री ने लिखा था इंडियन एक्सप्रेस में कि भारत देश तब तक गरीबी से मुक्त नहीं हो सकता जब तक दिखावे पर झूठी शानो शौकत पर धन खर्च करना बंद नहीं किया जाता। यकीनन सफाई ऐसे नहीं की जा सकती , कितनी हैरानी की बात है कि मुझे इन सब बातों पर लिखते उम्र बीत गई है और वही लोग कल हाथ में झाड़ू पकड़ फोटो करवा रहे थे जो कहते हैं मुझे कोई दूसरा काम नहीं जो रोज़ आस पास सफाई के बारे पत्र लिखता रहता हूं। अगर मुझ सा आम आदमी कहे तो पागलपन और कोई ओहदे पर बैठा व्यक्ति वही कहे तो बहुत महान बात। मोबाईल पर संदेश मिला सफाई अभियान का भी उसी तरह जैसे मोदी जी की आवाज़ में वोट की अपील का। सत्ताशास्त्र व्यंग्य याद आ गया , इक तरफा संवाद करते हैं शासक। इन राजनैतिक दल वालों को कभी समझ नहीं आया कि मैं किस तरफ हूं। पत्रकार मित्र भी पूछते हैं , मैंने इक बार इक सांध्य दैनिक के ऑफिस के महूर्त पर यही कहा था , आप या तो जनता की तरफ हो सकते हैं या नेता अफसर और शासन की तरफ। ये सच कोई माने या नहीं माने मगर वास्तविकता यही है कि देश में चालीस सालों में पत्रकारिता का पतन हद से अधिक हुआ है , और ये पथ से भटके ही नहीं ये तो विपरीत दिशा को भाग रहे हैं। विज्ञापन प्रसार संख्या की दौड़ में अंधे हो चुके हैं। जनता हूं आज देश विदेश में प्रधान मंत्री मोदी जी की धूम है , और मेरी आदत है मैं किसी की इबादत नहीं करता चाहे कोई आदमी कितना ही बड़ा क्यों नहीं हो। इक बार महेश भट्ट जी का साक्षात्कार देखा था टीवी पर , उन्होंने इक बात कही थी कि हम गुलामी की मानसिकता वाले लोग हैं , हमें चाहिये कोई न कोई परस्तिश को। कभी अमिताभ कभी सचिन कभी कोई और। मगर बार बार ये भरम टूटता है , किसी शायर का इक शेर है :-

       "तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला"।

                          इसलिये कहना चाहता हूँ कि चाहे कोई भी हो अंध भक्ति नहीं करना  , खुद भगवान से भी सवाल पूछना कभी मिल सके कहीं गर। भारतीय जनता पार्टी क्या कहती है , मोदी जी क्या कहते हैं , इतना काफी नहीं है। वो क्या करते हैं ये देखना ज़रूरी है। आज जिनको टिकट देकर खड़ा किया है भाजपा ने कौन हैं वो , कल तक उसी दल में तो नहीं थे जिनको गुंडा राज का दोष दे रहे या जिन पर घोटालों पर घोटालों के आरोप हैं जब सत्ता में था उनका दल। दलबदलू नैया पर नहीं किया करते बीच मझधार डुबोते हैं। गटर का पानी मिलता रहेगा तो गंगा को गटर ही बना लोगे। बहुत वादे किये हैं , मुश्किल काम है देश से भूख गरीबी और छोटे बड़े का अंतर मिटाना जो कैसे होगा शायद मोदी जी भी नहीं जानते। चलो आखिर में अपनी पहली कविता सुनाता हूं , जो कल भी सच थी , आज भी सच है।

पढ़ कर रोज़ खबर कोई ,

मन फिर हो जाता है उदास।

कब अन्याय का होगा अंत ,

न्याय की होगी पूरी आस।

कब ये थामेंगी गर्म हवायें ,

आयेगा जाने कब मधुमास।

कब होंगे सब लोग समान ,

आम हैं कुछ तो कुछ हैं ख़ास।

जिन को चुनकर ऊपर भेजा ,

फिर वो न आये हमारे पास।

सरकारों को बदल देखा ,

हमको न कोई आई रास।

बन गये चोरों और ठगों के ,

सत्ता के गलियारे दास।

कैसी आई ये आज़ादी ,

जनता काट रही बनवास।


 

अक्टूबर 01, 2014

POST : 455 अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब यही ज़िंदगी अब यही बंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब यही ज़िंदगी , अब यही बंदगी
प्यार की जब हमें भा गई बेखुदी ।

आपके वास्ते ग़ज़ल कहने लगे
थी हमारी मगर हो गई आपकी ।

इश्क़ करना नहीं जानते हम अभी
खुद सिखा दो तुम्हीं कुछ हमें आशिक़ी ।

पास आओ करें बात भी प्यार की
छांव कर दो ज़रा खोल दो ज़ुल्फ़ भी ।

वक़्त मिलने का तुम भूल जाना नहीं
रोज़ मिलते वही याद रखना घड़ी ।

किस तरह हम कहें बात दिल की तुम्हें
आप सुनते कहां बात पूरी कभी ।

जब से "तनहा" दिवाना हुआ आपका
भूल जाती उसे बात बाकी सभी । 
 

 

सितंबर 26, 2014

POST : 454 एक नीति कथा ( न्याय ) डॉ लोक सेतिया

          एक नीति कथा ( न्याय ) डॉ लोक सेतिया

कोई राजा था जिसका न्याय बिलकुल सही माना जाता था। एक बार एक साथ तीन लोग एक ही अपराध करते हुए पकड़े गये और राजा की कचहरी में पेश किये गये। राजा ने तीनों को अलग अलग सज़ा दी , ये देख इक मंत्री को अचरज हुआ।  तब मंत्री की दुविधा को समझ राजा ने उसको अपने तीन आदमी उन तीनों के पीछे भेजने को आदेश दिया ताकि समझ सके कि किस पर उसको दी गई सज़ा का क्या असर होता है।

       तीनों का पीछा करने वालों ने वापस आकर बताया जो उनको नज़र आया था। पहले एक व्यक्ति को राजा ने केवल इतना ही कहा था "आपने भी ऐसा अपराध किया " और कोतवाल को उसको छोड़ने का आदेश दे दिया था। उसका पीछा करने वाले ने आकर बताया था कि उसने घर जाते ही खुद को फांसी पर लटका ख़ुदकुशी कर ली थी।

                 दूसरे व्यक्ति को राजा ने ये सज़ा सुनाई थी कि वो भरी सभा में खुद अपनी पगड़ी उतार घर जा सकता है। उसका पीछा करने वाले ने बताया था की वो शहर को छोड़ कहीं और चला गया है , खुद को अपमानित महसूस कर के।

                        तीसरे को सज़ा सुनाई गई थी कि कोतवाल उसका मुंह काला कर नगर में सात चक्कर लगवाये। उसका पीछा करने वाले ने बताया था कि जब उसको नगर में घुमाया जा रहा था तब नगर के लोगों में उसकी अपनी पत्नी भी तमाशा देखने में शामिल थी अपने घर के बाहर खड़ी होकर। जब उसका पांचवा चक्कर लगवा रहे थे तब उस व्यक्ति ने अपने घर के पास से गुज़रते हुए अपनी पत्नी से कहा था कि क्या यहां खड़ी तमाशा देख रही हो , बस दो चक्कर बाकी हैं पूरे करते घर आता हूं तुम जाकर मेरे लिये स्नान का पानी गर्म करो।

                          मंत्री समझ गया था राजा ने उचित निर्णय किया था।

          ( नीति कथाओं के लेखक कौन थे ये नहीं पता चलता क्योंकि ये सदियों से                                      इक दूजे की ज़ुबानी सुनी और सुनाई जाती हैं शिक्षा देने को ) 

 

सितंबर 21, 2014

POST : 453 रसीली ( कहानी इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग एक )

   रसीली ( कहानी इक वेश्या की ) डा लोक सेतिया ( भाग एक )

           रसीली मर गई भूख से , जाने कितने दिन से भूखी थी रसीली। कोई नहीं जान सका कि वो किस तरह तड़प तड़प कर अपने छोटे से घर में मरी होगी अकेली। उसके मरने के बाद बस्ती के लोगों , कॉलोनी के धनवान लोगों , जो खुद को बड़ा दयालू समझते हैं , और पुलिस वालों ने देखा कि रसीली के घर अनाज का एक दाना तक नहीं था। उसके पर्स में इक पैसा तक नहीं मिला , खाली था। बस्ती वालों ने बताया कई दिन से उसके घर का चूल्हा जलता बहुत कम ही दिखाई दिया था। जब से उसके साथी कमाल , जो हमेशा उसके साथ रहा , का निधन हुआ , तब से रसीली के पास  उसके खरीदार कम ही नज़र आने लगे थे। रसीली की वो खनकती आवाज़ और कहकहों वाली हंसी सुनाई दी ही नहीं कमाल की मौत के बाद।  जाने ये कैसा रिश्ता था उनके बीच , कोई नाम नहीं था उनके नाते का। सारी रौनकें खत्म हो गई थी कमाल के जाने से और एक ख़ामोशी सी छा गई थी रसीली के घर में। रसीली हरदम गुमसुम सी रहने लगी थी , कहीं भी आती जाती नहीं थी , गली से गुज़रती तो लगता कोई लाश चली जा रही है। जाने कैसे अपने ही ख्यालों में खोई रहती थी , मगर तब भी उसकी आंखों में वही चमक थी , कुछ कहना चाहती थी दुनिया से रसीली की नज़रें। अब समझ सकता हूं  उन आँखों में कैसा दर्द था क्या संदेश था , वो बताना ज़रूरी हो गया है मेरे लिये। रसीली भले जिस्म फरोश थी , मगर उसके जीवन में कमाल को छोड़ कोई दूसरा कभी नहीं आ सका था। किसी को साथी बनाना तो क्या अपने पास तक नहीं आने दिया उनको जो चाहते थे उसके प्यार बेचने के कारोबार में सहयोगी बनना। रसीली की ज़िंदगी में कमाल की जगह दूसरा कोई ले भी नहीं सकता था , कोई नहीं समझ सकता था कि रसीली वैश्या का कारोबार करने वाली बाकी औरतों जैसी नहीं थी। वो तो सब को हमेशा खुशियां बांटती रहती थी , प्यार  देती थी बेशुमार जो किसी की प्यास बुझा देता था। कमाल के बाद खरीदार  आते भी कैसे , बिना दलाल के  मिलते कहां हैं , जो भी बस्ती में आता जिस्म बेचने वाली बाकी औरतों के दलाल खड़े रहते थे पटाने को।

                            शहर की सब से पॉश कॉलोनी के ठीक सामने ये बदनाम बस्ती कॉलोनी के आबाद होने से भी पहले की बसी हुई है। खाली सरकारी भूमि पर अपना सर छुपाने को अपने हाथों से बनाये थे अपने अपने घर रसीली जैसी औरतों ने। कब्ज़ा कर बनाई ये बस्ती बदनाम है अवैध कामों के लिये , कॉलोनी वालों ने कितनी बार जतन  किया बस्ती को हटवाने का मगर सफल नहीं हो सके। ये माना जाता है कि जब भी बस्ती को हटाने की कोशिश होती , वैश्यावृति करने वाली औरतें इसको बचा लेती , नेता , अफ्सर , पुलिस वालों का बिस्तर गर्म करके। हर दिन इक दूजे से लड़ने झगड़ने वाली सब इक साथ खड़ी हो जाती ऐसे में। पापी पेट का सवाल जो आ जाता था , मगर तब भी रसीली अपनी ज़िद पर कायम रहती थी , किसी की रातें रंगीन करने कभी किसी के घर , होटल या फार्म हॉउस नहीं जाती थी। उसका कहना था जिसको उसकी ज़रूरत है वो बेझिझक चला आये उसके घर का दरवाज़ा खुला रहता है सब के लिये। जिसको डर लगता हो , शर्म आती हो , या जिसको ये बुरा काम लगता हो वो रहे अपने घर में। रसीली जो भी करती थी उसको उसमें कोई झिझक नहीं थी , कोई ग्लानि या अपराधबोध नहीं था। अपना बदन है जो चाहे करे किसी को कोई ज़बरदस्ती थोड़ा बुलाती है। वो ये गीत हमेशा गुनगुनाया करती थी "प्यार बांटते चलो -प्यार बांटते चलो।

                                      रसीली और कमाल ने ज़िंदगी में इतनी ठोकरें खाई थी कि अब उनको किसी भी मुसीबत से कोई डर नहीं लगता था , उन्होंने कभी भी ये चिंता नहीं की कि अगर बस्ती उजड़ गई तो क्या होगा उनका। जब दूसरे बस्ती वाले घबरा रहे होते थे तब भी रसीली सब को हौसला देती , खिलखिला कर मस्ती भरी बातें किया करती। जिंदादिल थी रसीली। सब से प्यार और अपनेपन से बात करती थी वो। कुछ सालों से वो बिमार सी , मुरझाई सी लगती थी , तब भी उसके घर रौनकें लगी रहती , ठहाकों की आवाज़ गूंजती रहती। कमाल दिन भर उसके लिये खरीदार  ढूंढ कर लाता रहता , वो बहुत आसानी से पहचान लेता था कि कौन अपनी हवस मिटाना चाहता है और उससे बात कर ले आता था रसीली के घर। जो एक बार रसीली के घर आता वो बार बार आता ही रहता ,रसीली की बातों उसके अपनेपन में कोई बाज़ारूपन नहीं होता था। बस्ती की बाकी औरतें अपने पास आने वालों से अखड़पन से बात किया करती थी और जैसे भी हो अधिक पैसा छीन लेना चाहती थी , मगर रसीली को ये पसंद नहीं था। उसने जिस्म भी बेचा मगर पूरी ईमानदारी से। उसका व्यवहार अपने खरीदार  से ऐसा रहता जैसा कोई महमान आया हो उसके घर। ये रसीली के घर ही हो सकता था कि जो भी आया हो उसको कमाल साथ शराब का जाम पेश करता अगर पीता हो और जब खुद खाना खाती तब रसीली महमान  को भी अपने हाथ से बना कर रोटी खिलाती। वहां वैश्या के घर जैसा माहौल नहीं था , ये हिसाब नहीं लगाती थी रसीली कि किसने क्या दिया क्या नहीं। धंधा अपनी जगह और घर आये लोगों से व्यवहार अपनी जगह। आने वालों को वो वैश्या का कोठा नहीं कोई घर लगता था जिसमें उन दो को छोड़ रोज़ नये सदस्य होते थे।  बस्ती वाली कई औरतों ने कमाल पर डोरे डालने का जतन  भी किया कई बार उसको अपना दलाल बनाने को मगर उसकी ज़िंदगी में रसीली के सिवा किसी के लिये भी कोई जगह नहीं थी। बस्ती की बाकी औरतों का साथ देना तो दूर की बात , उनसे बात तक करना जुर्म था कमाल के लिये। रसीली को जब पता चलता किसी ने उसके कमाल पर डोरे डालने का जतन  किया तो वो अपना सवभाव बदल कर चंडी का रूप बन जाती थी। सालों आमने सामने रहते बस्ती वाले और कॉलोनी वाले इक दूजे को अच्छी तरह पहचानते थे। बस्ती वाले कॉलोनी वालों को आते जाते सलाम साहब सलाम मेम साहिब कहते रहते मगर उनके कार्यों को जान कॉलोनी वाले उनसे नफरत करते थे। फिर भी जब कोई मेहनत मज़दूरी का काम होता तब बस्ती वाले कभी इनकार नहीं करते थे , मांगते तक नहीं थे अपनी मज़दूरी , जो कोई दे देता चुपचाप रख लेते। आज सोचता हूँ जिन बस्ती वालों का नाम तक नहीं जानते थे उनसे कॉलोनी वाले किसलिये नफरत करते थे।  कुछ भी बुरा उनके साथ नहीं किया था कभी बस्ती वालों ने। कितनी अजीब बात है कि कॉलोनी में बहुत लोग ऐसे रहते थे जो किसी को धोखा देने , अन्याय करने , अपने से कमज़ोर का अधिकार छीनने जैसे अनैतिक काम करते थे तब भी उनसे कोई नफरत का व्यवहार नहीं करता था। वैश्या तो जिस्म बेचती है ये लोग तो दीन ईमान तक बेचते हैं , क्या ये कम बुरे हैं। जैसे अपराधों का कॉलोनी वालों को भय था वो बस्ती वालों ने कभी किया ही नहीं था। खुद को सभ्य और उनको असभ्य मान कुछ लोगों ने बस्ती वालों को उन अपराधों की भी सज़ा दी जो किया ही नहीं था बस्ती में रहने वालों ने। आज अगर पुलिस का अधिकारी आकर कॉलोनी वालों से इस बारे बात न करता और रसीली के परिवार का सदस्य रसीली की ज़िंदगी की उसकी खुद की प्रेम कहानी सब को नहीं बताता तो किसी को पता ही नहीं चलता रसीली के जीवन की सच्चाई। रसीली ने जब कमाल की मौत की खबर उसके घर वालों को भेजी थी तब उसको नहीं पता था वो रसीली के साथ ऐसा भी करेंगे। कमाल के परिवार वाले आये थे , उसकी लाश को कैंटर में डाल कर ले गये थे। रसीली रोई थी गिड़गिड़ाई थी मगर उसको साथ नहीं जाने दिया था। तुम उसकी विवाहिता पत्नी नहीं हो , तुम्हारा न उसके साथ कोई रिश्ता है न ही हमारे साथ। दुनिया वाले कभी नहीं समझ सकते उनके बीच क्या रिश्ता था और कितना गहरा था। कमाल की मौत के बाद रसीली वो रसीली नहीं रह गई थी , पूरी तरह टूट गई थी बिखर गई थी। अकेली पड़ गई थी ,  और ऐसे बहुत समय जी नहीं सकती थी। अब सोचता हूँ जब भी वो सामने से गुज़रती थी उसकी आंखे क्या कहना चाहती थी सब लोगों से। हमने ये महसूस किया था कि कुछ बोलना चाहती हैं दो आंखें , मगर हमें वो भाषा समझना नहीं आता था और रसीली को वही भाषा ही आती थी। हम यूं कहने को इंसानियत के धर्म की बातें करते हैं मगर क्या कभी जाकर जाना है किसी का दुःख दर्द , पूछा किसी से कभी हाल उसका। बस्ती में जो रहते वो भी हैं तो इंसान ही ,  उनका उनकी मज़बूरी उनकी परेशानी किसी कॉलोनी वाले ने जानी , समझी। इसी कॉलोनी में रहते हैं वो भी जो समाज सेवक होने का दम  भरते हैं ,  कई महिलायें हैं जो महिला शक्ति और महिला उद्धार की बात किया करती हैं। उनको सब मालूम था उनके सामने की इस दलदल के बारे में , नहीं किया किसी ने जतन  उनको इस दलदल से बाहर निकालने का। कॉलोनी वाले बचा हुआ खाना जानवरों को खिलाते हैं पुण्य समझ , कूड़ेदान में भी फैक देते हैं पर इन बस्ती वालों का पेट भरने को नहीं देते। कहते हैं ये गंदे हैं इनको पास नहीं रहने देना , एक बार दिया तो बार बार चले आयेंगे। ऐसे लोग क्या कभी समझ सकते हैं कि  कैसे अपना और अपने अपाहिज साथी कमाल का पेट भरने को रसीली ने अपना बदन वासना के भूखे भेड़ियों के सामने परोसा होगा। कितना दर्द  कितनी पीड़ा झेल विवश होकर।

           पुलिस वालों ने हम सबको ये बताया कि आपके सामने बस्ती में रहने वाली रसीली नाम की औरत की मौत दो दिन पहले ही हो चुकी है और कोई नहीं है जो उसकी लाश को ले कर अंतिम संस्कार कर सकता हो। दो दिन पहले बस्ती में रहने वालों ने रसीली के परिवार को और कमाल के घर वालों को फोन पर बताया तो जवाब मिला था उनका रसीली से कोई नाता नहीं रहा है , वो कब की मर चुकी है उनके लिये। आज जब बदबू होने लगी तब बस्ती वालों ने पुलिस थाने रपट दर्ज करवाई है कि कोई शव सड़ रहा दो दिन से बिना किसी देखभाल के। अब पुलिस को ही उसको लावारिस घोषित कर सब करना होगा , मगर उसके लिये आपको रसीली की पहचान कर कुछ कागज़ी करवाई में सहयोग देना होगा। पुलिस वाले सुन कर हैरान रह गये थे कि जो कब से उनके घरों के सामने रहती थी किसी कॉलोनी वाले को उसका नाम भी मालूम नहीं था। जानते भी कैसे जब वो उनसे बात करना तक पसंद नहीं करते थे। बस्ती वालों ने बताया था एक रिश्तेदार रहता है जो मिलने आता है कभी कभी रसीली से जब कोई मतलब होता है। पुलिस वाले खोज लाये थे उसको मगर उसने भी इनकार कर दिया रिश्ता निभाने से। हमने उसको कहा था कि जो भी बात रही हो वो तुम्हारी अपनी थी , मरने के बाद तो सब भूल कर उसका अंतिम संस्कार कर दो , हम तुम्हें आर्थिक मदद देने को तैयार हैं। हमारी बातों ने उसको विवश कर दिया था रसीली की ज़िंदगी की पूरी दास्तां सुनाने के लिये। बात कई साल पुरानी है।

                           ( जारी है कहानी  बाकी आगे की पोस्ट पर )

सितंबर 12, 2014

POST : 452 जीवन की पहचान ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         जीवन की पहचान ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कभी सोचा है
कभी जाना है
खुद को कब
पहचाना है ।

ये टेड़ी सीधी
जीवन की राहें
जाती हैं किधर
किधर जाना है ।

खुद को खिलाड़ी
समझने वालो
कोई खेल रहा है
और खेलते जाना है ।

तकदीर का लिखा
न जनता कोई भी
लकीरें हैं पानी पे
बस उसको मिटाना है ।

इक नाटक है ज़िंदगी
किरदार सभी इसमें
जब तक हैं पर्दे पर
किरदार निभाना है ।

औरों से शिकवा
खुद से गिला करना
हासिल नहीं कुछ भी
झूठा ही बहाना है ।

जीने का तरीका
केवल है इतना ही
खोना है खुद को जब
तब ही सब पाना है । 
 

 

सितंबर 08, 2014

POST : 451 सखी ( कहानी ) डा लोक सेतिया

                 सखी ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

             सखी कहकर पुकारा था मैंने इक दिन किरन को। कुछ साल ही रहा हम दोनों का साथ। मगर मुझे मालूम था कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा किसी और को चाहती थी वा सब से अधिक खुद को चाहती थी। खुद को चाहना बुरा भी नहीं होता है , भले कोई आपको प्यार करे न करे आप तो अपने आप से प्यार करो। मैं शायद किरन के लिये उन खिलौनो की तरह थी जिनसे वो खेला करती जब भी चाहती और जब मन भर जाये तब उनको छुपा कर अपनी अलमारी में रख देती थी। अपने खिलौनो से बहुत प्यार था किरन को , जाने क्यों उसको लगता था कोई उससे उसके खिलौने छीन लेगा। बस मुझपर विश्वास था कि मैं कभी उसके खिलौने नहीं छीन सकती , वो जानती थी मैं नहीं खेलती कभी भी खिलौनो के साथ। खिलौने क्या मुझे किसी के साथ भी खेलना पसंद नहीं था। मैं तो हमेशा खामोश रहती थी और जो भी कुछ कोई बोलता हो चुपचाप सुना करती थी। अकेले में यूं ही कुछ सोचती रहती और अपनी पसंद के गीत गुनगुनाती रहती थी। रेडियो पर रात दिन पुराने दर्द भरे गाने सुना करती और उन में खुद को महसूस किया करती थी। अक्सर किसी गीत को सुनते मेरी आंखे भर आती थी और मैं सब से छुप कर रोया करती थी। इक और पागलपन किया करती थी मैं , अपना रोता हुआ मुखड़ा दर्पण में देखती और उसको देख और भी अधिक रोना मुझे आ जाता था। मुझे याद है हॉस्टल में किरन के कमरे से बाहर निकल रही थी मैं और मेरी पसंद का गीत , दस्तक फिल्म का रेडियो पर आ गया था। हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। वहीं बुत बनी खड़ी रह गई थी मैं , मेरी पलकें भर आई थी आंसुओं से , मुझे किरन ने पहली बार रोते हुए देखा था। हैरान थी , पूछने लगी क्या हुआ तुझे पगली , कुछ भी नहीं मैंने कहा था। जानती थी इक पागलपन था वो सपनों की दुनिया बना कर उसी में जीना , खो जाना। किरन जैसे कोई तितली जैसी थी , हमेशा उड़ती रहती इधर उधर , अभी यहां थी अब कहीं और पल भर में। सभी की दुलारी थी वो , बहुत प्यार करते थे सब उसको , हॉस्टल कॉलेज घर में हर जगह। मगर उसकी खुशनसीबी भी अधूरी थी , जिसको वो चाहती थी दिलोजान से वही किरन की ज़रा भी परवाह नहीं करता था। किरन को ये उसकी इक अदा लगती थी , शायद वो मान ही नहीं सकती थी कि कोई उसकी चाहत को भी ठुकरा सकता है। उसका साथ पाते वो सब को भूल जाती थी , भुला सकती थी। हम दोनों का नसीब एक सा था , मैं उसकी सखी थी , उसको अपनी सखी बनाना चाहती थी मगर उसको किसी दूसरे की सखी बनना पसंद था। कई बार मेरे मन में भी ये बात आती थी कि क्यों नहीं मैं किसी और को सहेली बना उससे घुल मिल कर रहती हूं। किया ये भी प्रयास मगर उसकी जगह किसी को नहीं रख सकी।

                     किरन की शादी की बात चल रही थी , उसको कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था। मां बाप की लाड़ली बेटी को हमेशा मिलता जो रहा था अपनी पसंद का सभी कुछ। वो लोगों को भी कपड़ों और खिलोनो की तरह रंग और चमक देख पसंद करती थी। उसको देखने जब कभी कोई लड़का और उसका परिवार आता तो मुझे पास बुला लिया करती थी , थोड़ी दूरी पर ही तो मेरा घर। शायद मेरे होने से उसे अपने सुंदर होने का , अच्छे पहनावे का , सब से खुल कर बातचीत करने का आत्मविश्वास बढ़ जाता था। इसलिये कि मैं साधारण नज़र आने वाली हरदम चुप रहने वाली , हमेशा बहुत ही आम से कपड़े पहनने वाली लड़की थी। जाने क्या देख कर किरन को सूरज पसंद आ गया था , मैंने देखा वो शरमा रहा था किसी लड़की की तरह , उसने किरन से कोई सवाल नहीं पूछा था। जैसे सूरज हम दोनों को कनखियों से देख रहा था उससे लगता था किरन का जादू उसपर चल गया था। जब दोनों से पसंद है का सवाल किया गया और हां हो चुकी तब किरन उसको अपने कमरे में लाई थी , और सूरज को मुझसे मिलवाते हुए कहा था ये मेरी सब से प्यारी सखी है। मैं यही जाने कब से सुनना चाहती थी , वो पल मेरे लिये ऐसे था जैसे मुझे पूरी दुनिया ही मिल गई है। मैंने उसको भावावेश में गले लगा लिया था और चूम कर बोली थी मेरी जान हो मेरी सखी , दुआ करती तुम यूं ही खुश रहना। किरन का परिवार इस बात को लेकर खुश था कि उनकी लाड़ली यहीं इसी शहर में रहेगी , सूरज की नौकरी यहीं लगी थी। मुझे भी ख़ुशी थी कि मैं जब भी चाहूंगी मिल सकूंगी उससे। किरन और मैं हमेशा हर नई फिल्म इक साथ देखते थे , किरन की सगाई के बाद आनन्द फिल्म रिजीज़ हुई थी वा मैंने उसको सूरज के साथ प्रोग्राम बनाने को कहा था , उसने मुझे तीन टिकट मंगवा लेने को कहा था , और सूरज को साथ लाने की बात की थी। किरन को घर से अनुमति मिल गई थी सूरज और मेरे साथ सिनेमा जाने की। जाने क्यों किरन के होने वाले दूल्हे के साथ फिल्म देखने को लेकर मैं बेहद उत्साहित थी , मैं खुद जाकर तीन टिकेट एडवांस बुकिंग से ले आई थी। किरन की बात फोन पर सूरज से हो गई थी , सिनेमा हाल पहुंच कर किरन ने बताया था कि उनके पास बॉक्स की टिकट हैं और वो दोनों अकेले बैठ कर उसमें फिल्म देखना चाहते हैं। मैं अलग अकेली ड्रेस सर्कल में बैठ देख लूं , और बाकी दोनों टिकट किसी को बेच दूं। शायद मुझे खुद समझना चाहिये था कि मुझे कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहिये। मगर मैं उसकी बात से बहुत नाराज़ हो गई थी और जब वो दोनों अंदर चले गये थे तब मैंने वो तीनों टिकट फाड़ कर फैंक दी थी। दूसरे दिन मैंने किरन से अपनी नाराज़गी जता भी दी थी , उसको इतना ही बोली थी कि जब तुमको अलग बैठ कर फिल्म देखनी थी तो मुझे नहीं बुलाना चाहिये था। वो जान गई थी मैं बिना फिल्म देखे ही लौट आई हूं। किरन ने कहा था कि सच में ये फिल्म तो दोस्त बनाने के विषय पर है और ये उसको सूरज के साथ नहीं मेरे साथ ही देखनी चाहिये थी। उसने मुझसे वादा किया था मुझे खुद साथ ले जा कर आनन्द फिल्म दिखायेगी , मगर हमेशा की तरह वो भूल गई थी मुझसे किया हुआ वादा। मैंने कई साल तक वो फिल्म नहीं देखी थी , जब टीवी पर घर में अकेले बैठ सालों बाद देखी तब आनंद से खुद को मिला कर सोचती रही , लेकिन मेरी किस्मत में कोई बाबू-मोशाय जैसा दोस्त कहां था।

               किरन की शादी हो गई थी , वह बहुत खुश थी। अपने मायके वाले घर जब भी आती , मुझे झट बुला पास लिया करती। मुझे हर बार अपने घर आने को कहती थी , मगर मुझे संकोच होता था बिना कारण कैसे जाऊं। एक दिन अपनी कसम दे गई थी कि ज़रूर उसका घर देखने आऊं। जब किरन ने पूछा कब आओगी तब मैंने यूं ही सरप्राइज देने की बात कह दी थी। और एक दिन यही सोच किरन के घर चली गई थी उसकी ख़ुशी की खातिर। बैल देने पर दरवाज़ा सूरज ने खोला था , आओ अंदर आओ कहकर मुझे घर में प्रवेश करवाया था।  मैंने किरन को बुलाने को कहा था तो सूरज ने बताया कि वो घर के बाकी लोगों के साथ बाज़ार तक गई है आती ही होगी। मैं उठ कर वापस जाने लगी तो सूरज ने रोक लिया था ये बोलकर कि पहली बार आई हैं अपनी सखी के घर बिना कुछ लिये नहीं जा सकती। मैंने कहा था दोबारा फिर आउंगी , तो सूरज ने कहा की आप कोल्ड ड्रिंक पियें इतने में शायद आ ही जाये किरन। मुझे कोल्ड ड्रिंक देकर सूरज अपनी और किरन की शादी की एलबम्ब दिखाने का बहाना बना मेरे करीब आकर बैठ गया था। उसने बार बार मुझे जानबूझकर छूने का प्रयास किया था तो मुझे डर लगने लगा था , मेरी धड़कने बढ़ गई थी और मैं भाग जाना चाहती थी। उठ कर चलने लगी तो सूरज ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उसकी आंखो में वासना देख मैं घबरा गई थी , मगर जाने कैसे साहस कर सूरज को बोली थी आपको ऐसा सोचते हुए भी शर्म आनी चाहिये थी , आपकी बीवी की सहेली आपके लिये बहन जैसी होनी चाहिये। और अपना हाथ छुड़ा बाहर चली गई थी। ये मेरे साथ कभी नहीं हुआ था , मेरा बदन गुस्से से कांप रहा था व ये बात मैं किसी को नहीं बता सकती थी , किरन को बता कर पति पत्नी के नये नये रिश्ते में दरार नहीं डाल सकती थी। मुझे किरन पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मुझे अपनी कसम दी थी बुलाने को , जबकि इसमें उसका कोई दोष नहीं था। दूसरे दिन किरन अपने मायके वाले घर आई हुई थी , मुझे संदेशा भेजा था आने को , इनकार कर दिया था मैंने। कुछ ही देर में वो खुद चली आई थी , मस्ती के मुड़ में थी , उसको नहीं बताया था सूरज ने कि मैं उसको मिलने गई थी उसके घर। मुझे तब लगा किरन को उसके पति की उस हरकत के बारे बताना ही चाहिये , और मैंने उसको सब बता दिया था। बेचैन सी हो गई थी किरन और उसका चेहरा तमतमाया हुआ था , अचानक उसको जाने क्या हुआ कि उसने मुझे कई थपड़ जड़ दिये थे , और बुरा भला कह कर चली गई थी। मैं सन्न रह गई थी , समझ नहीं पा रही थी कि उसको बताना सही था या गल्त। मगर ये सोच लिया था अब कभी मिलना नहीं होगा किरन से ज़िंदगी भर।

              लेकिन अगले ही दिन जब मुझे किरन के नर्वस ब्रेकडाउन होने और अस्पताल में दाखिल होने का पता चला तब मैं खुद को रोक नहीं पाई थी। मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर फूट फूट कर रोते हुए अपनी गलती की माफी मांगने लगी , मुझे बिना बात थपड़ मारने की और शायद अपने पति की गलती की भी। मेरे मुंह से अचानक निकल गया था सब भूल जाओ तुम , छोड़ो उस के लिये खुद को दोषी न समझो। जब मैं निकल रही थी कमरे से तब सूरज आया था मेरे पास और बोला था आई एम वेरी सॉरी , मुझसे अपराध बहुत बड़ा हुआ है फिर भी मुझे कर सको तो अपनी प्यारी सखी के लिये माफ कर देना। मुझे कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं लगा था। बहुत दिन तक उस एक घटना ने मुझे बेचैन रखा था , लाख कोशिश करके भी उसे भुला नहीं पा रही थी। मुझे दूर अपने शहर से महानगर में जॉब मिली तो शायद इस सब से बचने के लिये मैंने नौकरी कर ली थी। कुछ दिन में मैंने खुद को संभाल लिया था , अपने काम में रात दिन जुटी रहती थी। मुझे पहले भी तनहाई पसंद थी और उस एक घटना के बाद तो किसी से जान पहचान बढ़ाना अच्छा नहीं लगता था। मगर समय के साथ मैं परिपक्व होती गई थी और अब सब से बेझिझक बात कर सकती थी। वो भय मिट गया था कि कोई मुझसे बदतमीज़ी कर सकता है।

      कई सालों बाद अचानक एक दिन मुझे पत्र मिला अपनी सखी किरन का। सूरज को यहां सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाना था , मुझे अस्पताल से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेनी थी और किरन को सूचित करना था। फिर एक बार मुझे पुरानी घटना याद आ गई थी जिससे मेरी दिमाग की नसें तनाव महसूस कर रही थी। मगर किरन को मैं मना नहीं कर सकती थी कभी भी , अब जब वो किसी परेशानी में थी तब तो हर हाल में उसका साथ देना ज़रूरी था। डॉक्टर से समय लेकर सूचित कर दिया था मैंने। किरन और सूरज अपने दो बच्चों को लेकर जब आये थे तब लगा जैसे वो सब भुला चुके हैं , मुझे भी यही करना था तभी साथ रह सकते थे इक परिवार की तरह। उनको अपने दो कमरों के छोटे से घर में रखना थोड़ा मुश्किल तो था मगर सब समझते थे वक़्त की नज़ाकत को। सदा की तरह किरन जो भी मुझसे चाहिये पूरे अधिकार पूर्वक लेती थी , ये भी बातों बातों में बता दिया था कि सूरज की बिमारी पर बहुत पैसा खर्च होने से वो आर्थिक तंगी में है। ऐसे में उनसे स्वाभाविक ही मुझे सहानुभूति हो गई थी। मैंने किरन को कह दिया था कि मेरे पास जो भी राशि जमा है वो जब भी चाहे ले सकती है। कई महीने तक सूरज का ईलाज चलता रहा और जितना भी मुमकिन था मैं खुद ही अस्पताल और दवाओं का खर्च करती रही , लेकिन सूरज की दशा में कोई सुधार नहीं हो सका था। डाक्टरों ने सूरज के दोनों गुर्दे खराब होने की बात बताई थी और किसी अपने को सूरज को अपना एक गुर्दा देकर उसकी जान बचाने की सलाह दी थी। सूरज के परिवार के लोग अलग अलग रहते थे और कोई भी गुर्दा देने को तैयार नहीं हुआ था। किरन चाहती थी किसी भी तरह अपने पति की जान को बचाना मगर उसका गुर्दा सूरज से मैच नहीं हो सकता था। जाने क्यों मैंने अपना गुर्दा देने पर विचार ही नहीं किया था , मुझे ये सोच कर ही अजीब लगा था कि मैं अपने शरीर का कोई अंग उसको दे दूं जिसने मुझे बुरी भावना से छुआ था।

              किरन की उम्मीद टूट रही थी हर दिन , मुझे उसका बुझा बुझा सा चेहरा देख कर घबराहट होने लगती थी , सूरज अस्पताल में दाखिल था , बच्चों को दादा दादी ले गये थे।  मैं और किरन अकेली थी घर में। किरन ने तब मुझे अपने गुज़रे हुए जीवन के बारे बहुत बातें बताई थी। कैसे सब अपनों के होते भी वो अकेली थी। अब भी उसको भरोसा था केवल बचपन की इस सखी पर तभी सूरज को लेकर मेरे पास आई थी। मैंने तभी निर्णय ले लिया था कि अपनी सखी को निराश नहीं होने दूंगी , और अगले ही दिन डॉक्टर से बात कर मैंने अपने सभी टेस्ट करवा लिये थे। सूरज को मेरा गुर्दा मैच कर गया था , हम दोनों का सफल ऑपरेशन हो गया और सूरज को डॉक्टर्स ने पूरी तरह सवस्थ घोषित कर दिया था। कुछ दिन आराम करने के बाद जब वापस जाने लगे तब किरन और सूरज दोनों की आंखों में आंसू छलक आये थे , सूरज की पलकों से पश्चाताप के आंसू और किरन की आंखों से कृतिज्ञता के। मेरी भी आंखें भर आई थी सखी भाव से। जाते जाते सूरज ने कहा था कि क्या मुझे अपना भाई समझ सकती हैं , मैं आपको दीदी बुला सकता हूं। मैंने भी मन से इस पवित्र रिश्ते को स्वीकार कर लिया था और अब मुझे जल्द ही अपनी सखी ही नहीं अपने भाई के घर भी जाना है। 

अगस्त 31, 2014

POST : 450 बदलते समय की मुहब्बत ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      बदलते समय की मुहब्बत ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

            कहानी सच्ची है केवल नाम बदले हुए हैं। शायद अभी अधूरी है कहानी। लगता है नई कहानी का भी वही पुराना अंजाम ही होगा। ललित कॉलेज में पढ़ता था कुछ साल पहले जब उसको किसी से इश्क हो गया। मिलते रहे दोनों हर शाम , जन्म जन्म तक साथ देने की बातें की आपस में। शिक्षा पूरी करने के बाद ललित ने बाज़ार में अपना गिफ्ट शॉप का कारोबार शुरू कर लिया और प्रेमिका को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। शहर अलग अलग थे दोनों के कुछ किलोमीटर की दूरी थी। अपना कारोबार जमा लेने के बाद ललित मिला अपनी प्रेमिका से जाकर और शादी की बात की उसके साथ। सोच में पड़ गई प्रेमिका क्या करे। उसको इस बीच साथ  जॉब करने वाले सीनियर अधिकारी ने परपोज़ किया था मगर  उसने माता पिता से बात करने को कह दिया था। तब पंद्रह साल पहले सब के पास फोन नहीं था हर दिन सम्पर्क करने को। ललित की मां को जब ललित ने बताया कि उसको किसी से प्यार है तो इकलौते बेटे की खुशी को सब से अधिक महत्व देने वाली ममता भरी मां कैसे नहीं मानती। वो खुद ही चली गई थी रिश्ते की बात लेकर। सोच कर बताने को कहा गया था। सोचना क्या था , जब दोनों इक दूजे को पसंद कर चुके थे। मगर जब प्यार को दुनियादारी के तराज़ू में तोला जाता तब अंजाम यही होता है। प्रेमिका मान गई थी कि माता पिता ठीक  ही कहते हैं कि उसके लिये सरकारी जॉब वाला लड़का ही सही रहेगा। देखने में सुंदर नहीं तो क्या हुआ , और प्यार तो शादी के बाद हो ही जाता है। बीस साल की उम्र का प्यार तो नासमझी में हो जाता है। तब लड़की किसी बेल की जैसी होती है जो सहारा मिले उसी को लिपट जाती है। कोई जवाब नहीं मिला था ललित को न उसकी मां को , वो इंतज़ार करते रहे और पता चला कि उस प्रेमिका की चट मंगनी पट शादी हो गई। ललित ने कोई शिकायत नहीं की थी किसी से , मान लिया था कि प्यार में अपनी नहीं उसकी खुशी देखनी चाहिये जिसको चाहते हो। शायद उसके लिये वही ठीक होगा। मां को भी समझा लिया था कि ये बात कभी किसी को नहीं कहनी है। मां ललित के लिये लड़की , अपनी बहू की तलाश अधूरी छोड़ दुनिया को अलविदा कहने से पहले अपनी ननद को ये काम पूरा करने को कह गई थी।

        ललित को आंटी ने अपना दूसरा बेटा मान लिया था और उसका ध्यान रखने लगी , दो घर थे साथ साथ , बीच की दीवार हटा कर एक बड़ा घर बन गया। आंटी जॉब करती , अपने बेटे की शिक्षा पूरी करवाती रही और ललित को शादी करने को मनाती रही।  ललित को कोई भी पसंद ही नहीं आती थी , आंटी सेवानिवृत हो गई , उसके बेटे की शादी भी हो गई मगर ललित अभी तक कुंवारा ही था। चालीस की उम्र में उसकी पसंद की लड़की मिलना और भी कठिन हो गया। आंटी चाहती थी ललित की बहू आये उसका घर संभाल ले ताकि वो अपने बेटे और बहू के साथ दूसरे नगर में जाकर रह सके। आंटी की इक सहेली को उनकी बहू ने बताया अपनी दोस्त राधिका के बारे में जो उनके राज्य में सरकारी नौकरी करती है और जो बहुत ही सुशील है मगर उसकी शादी नहीं हो पा रही क्योंकि उसकी जन्मकुंडली ही नहीं मिलती जिस किसी को भी पसंद करती जब रिश्ते की बात होती माता पिता से। जब उसने आंटी के भतीजे ललित के बारे बताया तो उसने कहा कि लगता तो दोनों के लिए सही है हां ललित की उम्र सात साल ज़्यादा है जबकि राधिका अपनी उम्र से भी कम की नज़र आती है। उस सहेली ने राधिका की बड़ी बहन को फोन पर बताया था। वंदना अपनी बहन राधिका के लिये ललित को देखने आई थी , उसको पसंद आया था ललित बहुत , वो कुंडली भी साथ लेकर आई थी और इक फोटो भी राधिका का। पंडित जी को फोन पर सब जानकारी देकर वंदना ने कुंडली मिलवा ली थी , जो मिल गई थी। ललित को आंटी ने तैयार कर लिया था और वो गया था राधिका को देखने। दोनों दो घंटे मिले थे अकेले में और खुल कर हर बात की थी , जाने कैसे क्या हुआ कि दोनों को महसूस हुआ था कि यही तो है जिसकी मुझे तलाश है। ललित ने राधिका को कहा था कि अभी हम दोनों सब सोच लें और एक दो बार और मिलते हैं ताकि बाद में कोई बात दिल में नहीं रह जाये , राधिका मान गई थी। मिले थे दो बार , रविवार को ललित आता था मिलने घर से बाहर। कुछ ही दिन में उनको प्यार हो गया था इक दूजे से। घर पर बता दिया था दोनों ने कि हमको रिश्ता मंज़ूर है , लगा बात बन गई है , मगर जो हुआ वो हैरान करने वाला था। पिता को लगा की दूसरे राज्य के शहर विवाह किया तो बेटी की नौकरी का क्या होगा और उन्होंने ये कह दिया ललित की आंटी को कि रिश्ता केवल तभी हो सकता अगर ललित यहां आकर कारोबार करने को राज़ी हो। ये बात आंटी को बिल्कुल भी पसंद नहीं थी कि कोई लड़का ससुराल जाकर रहे।बात बीच में ही रह गई थी।

        मगर ललित को लगा कि एक बार राधिका से बात करनी चाहिये दोस्त बन कर। जब उसने राधिका से पूछा कि क्या कोई रास्ता नहीं है इस समस्या का हल निकालने का। साफ साफ बता दो आपके दिल में मेरे लिये क्या भावना है। राधिका का जवाब था कि ललित जी आपको क्या लगता है मेरे बारे पहले आप मुझे बताओ। ललित ने कहा मुझे आप बेहद पसंद हैं और मैं आपको अपना जीवनसाथी बनाना चाहता हूं। राधिका बोली थी ललित जी मुझे भी आप बहुत ही अच्छे लगते हैं और मुझे भी आपको जीवनसाथी बनाना है। सच कहूं तो मुझे लगता है मुझे प्यार हो गया है आपसे मगर समझ नहीं पा रही थी आपसे कैसे कहूं। आज लगा कि अगर नहीं कहा तो आप मुझे कभी मिल नहीं सकोगे। मुझे अपनी नौकरी की चिंता नहीं है मैं आपके लिये उसको छोड़ सकती हूं मगर अपने परिवार को कैसे समझाऊं मैं नहीं जानती। तब ललित ने कहा था राधिका जी मैं भी इन कुछ ही दिनों में आपको दिलोजान से प्यार करने लगा हूं और आपके लिये सब कुछ कर सकता हूं। मेरा कारबार दस साल पुराना है और स्थापित है फिर भी मैं अगर आप कहोगी तो उसको बंद कर आपके राज्य में किसी शहर में नया फिर से शुरू कर सकता हूं , लेकिन किसी शर्त को मान कर नहीं , आपकी ख़ुशी के लिये। मगर आपके इस शहर को छोड़कर , क्योंकि ऐसा मुझे अनुचित लगता है , आप जिस भी शहर में अपना तबादला करवा लगी मैं वहीं आपके लिये घर खरीद लूंगा। आप अपने मॉम डैड को मना लो। राधिका ने कहा कि आपकी बात सही है और अगर आप मेरे लिये ये सब करने को तैयार हैं तो मुझ से भाग्यशाली और कोई नहीं हो सकती , लेकिन आपको ऐसा करने को विवश करके मैं खुद अपनी ही नज़र में गिर जाऊंगी इसलिये ये बात मैं कभी नहीं होने दूंगी। मुझे आपसे कोई शर्त नहीं मनवानी है मॉम डैड की। शायद अब मेरे प्यार का भी इम्तिहान है और मेरा प्यार स्वार्थी नहीं है। मैं आज ही सब को बता दूंगी कि मुझे आपको छोड़ किसी से भी शादी नहीं करनी है और मुझे अपने इस राज्य में नौकरी नहीं करनी है। हम आपके शहर में दूसरी नौकरी तलाश कर लेंगे। राधिका और ललित ने तभी वंदना दीदी को ये निर्णय बता दिया था ताकि वो घर में बाकी सब को मना सके। ललित और राधिका ने तय कर लिया था कि चाहे जो भी हम दोनों अलग नहीं होंगे। हर रविवार बीच में इक शहर में मिलते रहेंगे , वही प्रेमियों का पुराना बहाना , सतसंग को जाना और प्यार से मिलना।

              ललित ने आंटी को बता दिया था कि राधिका और मैं प्यार करते हैं और हमने तय किया है कि राधिका अपनी जॉब छोड़ देगी और यहां नई जॉब ढूंढ लेंगे हम मिलकर। उधर वंदना ने जब घर पर बताया कि ललित और राधिका इक दूजे को चाहते हैं और ये भी कि राधिका अपनी नौकरी छोड़ने को तैयार है ललित की खातिर। पुरानी सोच के माता पिता ये सुन कर आग बबूला हो गये थे , उनको लगा कि बेटी उनकी मर्ज़ी के बिना शादी करने को कैसे तय कर सकती है। वो अपनी पुरानी बात पर अडिग थे कि रिश्ता तभी हो सकता है अगर ललित उनके शहर में आकर रहने को राज़ी हो। इस तरह बहुत बातें दो परिवारों में होने लगी इक दूजे को अपनी बात समझाने को। वंदना ने ललित की आंटी को कहा था कि आंटी बेशक ऐसा मुझे भी उचित नहीं प्रतीत होता तब भी अगर आप और हमारे मॉम डैड अपनी अपनी बात पर अड़े रहे तो ये दोनों चाह कर भी खुश नहीं रह सकेंगे। फोन पर ही बात हुई थी , आंटी ने कहा था कि उनका मकसद कोई ज़िद नहीं है केवल ललित और राधिका का भविष्य है। आज ललित की बहुत ही अच्छी आमदनी है , चलता हुआ पुराना कारोबार है , कल अगर नई जगह ईश्वर न करे नहीं चल पाया तो परेशानी उन्हीं को होगी। और राधिका को जॉब हम यहां भी दिलवा सकते हैं। मैं आपके मॉम डैड से बात करूंगी और उम्मीद है वो भी समझेंगे। आखिर बेटी को जाना ही होता है पति के घर , आप भी तो उनसे दूर रहती हो अपने पति के साथ। आंटी ने उसी दिन शाम को फोन किया था और राधिका के डैड को कहा था कि मेरे लिये राधिका मेरी बेटी है मैं उसको कोई परेशानी नहीं आने दूंगी , आप ये शर्त छोड़ कर मेरी झोली में डाल दो राधिका को। अब वो मेरी बेटी है। मगर राधिका के माता पिता नहीं माने थे। राधिका के पिता ने कहा था कि आप धर्म को मानने वाली महिला होने की बात करती हैं और किसी से उसकी बेटी ज़बरदस्ती छीन लेना चाहती हैं , क्या ऐसा करना आपको शोभा देता है। आंटी ने कहा था भाई साहब मैं तो दोनों बच्चों की ख़ुशी चाहती हूं तभी आपसे निवेदन किया है , विवश करने का तो सवाल ही नहीं और छीनना तो कदापि नहीं। आपसे ये मेरा वादा है कि मैं कभी आपकी मर्ज़ी के बिना राधिका की शादी ललित से नहीं करना चाहूंगी , उनको ऐसा कोई कदम उठाने को मैं नहीं कह सकती। और ललित अगर चाहे तो कहीं भी राधिका के संग रह सकता विवाह करके , मैं रोकूंगी नहीं उसको , लेकिन जब खुद राधिका ही अपनी जॉब छोड़ना चाहती है तब उसको इतनी तो आज़ादी मिलनी ही चाहिये। आप ठंडे मन से सोच कर फैसला करें यही आग्रह करती हूं।

                      बात वहीं रुक कर रह गई थी , मगर ललित और राधिका हर रविवार मिलते रहे। शायद दोनों ने इसको नियति मान लिया था कि चाह कर भी वो एक नहीं हो सकते थे। फोन पर बात होती रहती थी ये बात ललित की आंटी भी जानती थी और राधिका के मॉम डैड और बड़ी बहन वंदना भी। और इस बीच इक घटना हुई या फिर इक इतेफाक कि जब शाम को राधिका को उसकी ट्रैन पर चड़ा कर ललित बसस्टैंड पहुंचा तब बस निकल चुकी थी उसके शहर जाने वाली , और वो सड़क पर किसी अन्य वाहन की राह देख रहा था। तभी एक कार रुकी थी और उसका मालिक चाय पीने लगा था स्टॉल पर , ललित ने जाकर उनसे पूछा था , अंकल जी आपको किधर जाना है।  मेरी आखिरी बस छूट गई है और मुझे अपने अमुक शहर जाना है , क्या आप मुझे लिफ्ट दे सकते अगर उसी तरफ जाना है। और वो मान गये थे , बताया था कि उनको जिस शहर तक जाना है वहां तक चल सकते और वहां से बस चौबीस घंटे मिलती भी है। रस्ते में इक दूजे को बताया दोनों ने अपना अपना परिचय। वो इक कहानीकार हैं और ललित उनके नाम से परिचित भी था इसलिये उनसे मिलकर ख़ुशी हुई उसको। इस बीच राधिका का फोन आया था , बताने को कि वो घर पहुंच चुकी है , ललित कहां तक पहुंचा है पूछना चाहती थी।  ऐसे में नेटवर्क चला गया और बात बीच में कट गई थी , कार चला रहे व्यक्ति ने पूछा क्या आपकी पत्नी का फोन था , अगर आपके फोन का नेटवर्क नहीं है तो मेरा उपयोग कर सकते हो। नहीं , वो मेरी प्रेमिका है हमारी दोनों की शादी हुई नहीं अभी तलक , मगर शुक्रिया आपका फोन उपयोग नहीं कर सकता न ही ज़रूरत है।  उनको ललित की साफगोई अच्छी लगी थी , उन्होंने कहा था बेटे मुझे आपकी निजि ज़िंदगी से कोई मतलब नहीं है मगर इतना अवश्य समझाना चाहता हूं कि जीवन में सच्चा प्यार पाने को सब कुछ करना चाहिये। ये इसलिये कहता हूं क्योंकि मुझे भी जवानी में किसी से प्यार हुआ था लेकिन मैंने उसका इज़हार तक नहीं किया था इस डर से कि वो इनकार कर देगी। बेशक मैं खुश हूं मेरी शादी हो चुकी है , बीवी अच्छी है , बच्चे हैं जो प्यारे हैं तब भी कभी कभी सोचता हूं कि मुझे उसको न केवल बताना चाहिये था कि मुझे उस से प्यार है बल्कि हर कोशिश करनी चाहिये थी। मैं नहीं जनता मेरी प्रेम कहानी का अंजाम क्या होता , और ये बात मेरी कहानियों में भी झलकती है अक्सर। मगर तुम अपनी प्रेम कहानी को सही अंजाम तक ज़रूर ले जाना। ललित ने कहा था अंकल आपसे मिलकर बेहद अच्छा लगा है , और मैं आपकी बात याद रखूंगा। शायद कभी आप हम दोनों की प्रेम कहानी भी पाठकों तक पहुंचा दो और लोग जान सकें कि आज भी ऐसा प्यार कोई किसी को करता है। अंकल बोले थे आप दोनों बताओगे और मुझे अनुमति दोगे तो ज़रूर लिखने की कोशिश करूंगा , लेकिन ऐसा तभी हो सकता है अगर मुझे सब की हर बात की सही जानकारी हो। ललित ने कहा था कि अपनी प्रेमिका से पूछ कर बतायेगा , सम्पर्क नंबर ले लिया था , उनको दे भी दिया था।

             उन अंकल ने ही फेसबुक की बात भी की थी और बताया था कि बहुत लोग उसपर ही पहचान करते हैं दोस्त बनते हैं। मगर सावधान भी रहना सब सच नहीं होता है , आजकल झूठ बहुत है। जाने क्या सोचकर ललित ने उस दिन अपना फेसबुक अकाउंट शुरू किया था और कुछ अजनबी लोगों को दोस्त बना लिया था। उन्हीं में इक महिला भी थी आशा रानी , उनसे चैट पर बात करते ललित ने अपनी बात बता दी थी। राधिका भी चाहती है और ललित भी तो कोई दूसरा कैसे रोक सकता है आशा जी को ये समझ नहीं आया था , भाग कर शादी कर लेने की सलाह दी थी उन्होंने ललित को। ललित ने अपनी उलझन बताई थी कि अगर मेरी आंटी नहीं चाहती , राधिका के मॉम डैड नहीं चाहते , यहां तक कि जिसने ये सब शुरू किया वो राधिका की बड़ी दीदी भी नहीं पसंद करती वो कैसे सही हो सकता है।   क्या हम अपने प्यार में इतने स्वार्थी हो जायें कि बाकी सभी की भावनाओं की परवाह ही नहीं करें। ललित ने राधिका को भी फेसबुक पर आशा रानी से दोस्ती कर सलाह करने को कहा था , राधिका ने ललित की बात मान ली थी मगर ये भी विचार प्रकट कर दिया था की यूं किसी की बात को बिना समझे नहीं मानेंगे हम दोनों।  जब जो वर्षों से हमें जानते हैं वो भी नहीं समझते कि हमारी भलाई किस में है तो ऐसे फेसबुक की पहचान के लोग कुछ ही दिन में क्या समझ सकते हैं। 

           राधिका की बड़ी दीदी ज्योतिष पर यकीन रखती है , उनके पंडित जी ने ललित और राधिका की जन्म पत्री देख कर बताया है कि अभी उन दोनों के दिन ठीक नहीं हैं , जल्द ही अच्छे दिन आने वाले हैं। उन्होंने कोई पूजा करने को भी कहा है और पूजा को बुलाया है वंदना दीदी ने उनको। शायद अब भगवान ही उनको राह दिखा सकता है। राधिका के कॉलेज में उसके साथ शिक्षक पद पर नियुक्त इक दोस्त ने जब देखा कि परिवार के लोग दो प्यार करने वालों को मिलने नहीं देंगे तो उसने चुपके से उनका विवाह पास के शहर में जाकर करवा दिया था। इस बीच राधिका को अचानक पेट दर्द हुआ तो पता चला उसके भीतर इक रसोली है और ऑपरेशन करना होगा , तभी राधिका की बड़ी बहन को भी पति के कहने पर राधिका से अपने देवर के साथ विवाह पिता से करनी पड़ी क्योंकि उसको नहीं मालूम था कि ललित और राधिका अदालत में शादी कर चुके हैं। अपने पति के आदेश पर छोटी बहन की शादी अपने देवर जिसकी पहली पत्नी से तलाक हो चुका था से करने को घरवालों को मना लिया था। लेकिन राधिका ने अपनी मां को वास्तविकता बता दी थी और ललित को छोड़ किसी और से विवाह नहीं करने का निर्णय बता दिया था। वास्तविकता समझ जब पिता भी मान गये और विवाह की बात तय कर दी तो विधि का विधान ऐसे हुआ कि ललित की आंटी का देहांत हो गया और समाज की परंपरा के कारण विवाह साल भर को टल गया।  कुछ महीने बाद राधिका की ललित से सामाजिक रीतिरिवाज़ से फिर शादी हो गई थी और राधिका ने अपनी नौकरी छोड़ ललित के राज्य के इक शहर में नौकरी तलाश कर ली थी। पति पत्नी दो तीन घंटे के सफर की दूरी पर रहने लगे और सप्ताह के अंत में मिलते , आजकल की महिला खुद अपने पांव पर खड़ी रहना पसंद करती है चाहे पति की आमदनी कितनी अच्छी क्यों नहीं हो। साल बाद इक बिटिया घर पर आई तो लगा हर सपना सच हो गया है। मगर फिर अलग अलग रहते हुए दूरियां बढ़ने लगी और संबंधों में दरार आने लगी। मगर कोई भी ऐसा नहीं था जो उनकी समस्या को समझता और सुलझाता। राधिका ने अपनी फेसबुक बंद कर दी थी तीन साल बाद फिर से नई फेसबुक खोली और पुराने फेसबुक दोस्त अंकल से चर्चा की और सब हालात बताये। ये भी बताया कि ललित से रिश्ता समाप्त हो चुका है और बड़ी बहन अभी भी चाहती है उसके देवर से विवाह करवाना। कहना कठिन है कि जिसको अभी समझा जा रहा है सब सुलझ गया है कब तक ठीक है। इक मासूम भोली सी मुहब्बत को जाने कितने इम्तिहान देने हैं बाकी। शुभकामना है इस बार उसका जीवन सुखी और खुशहाल रहे। ललित की नैया अभी भी मझधार में ही है। आखिर में इक बात बताना ज़रूरी है कि प्यार में कोई एक या फिर दोनों कसूरवार हों ऐसा लाज़मी नहीं होता है। उन दो मुहब्बत करने वालों में भी बेवफा कोई नहीं मगर निभाने में कमी दोनों ही से हुई है। सवाल उनसे अधिक इक नन्हीं परी का है शायद।  

अगस्त 20, 2014

POST : 449 कौन बनेगा करोड़पति में पूछे जाने चाहिएं ये सवाल ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    कौन बनेगा करोड़पति में पूछे जाने चाहिएं ये सवाल ( तरकश ) 

                              डा लोक सेतिया         

                         " बिका ज़मीर कितने में हिसाब क्यों नहीं देते ,

                            सवाल पूछने वाले जवाब क्यों नहीं देते। "

             मेरी ग़ज़ल का मतला है। अब क्या बतायें कि किन लोगों के बारे सोच कर लिखा था। सब जानते हैं अब सब से अधिक सवाल कौन पूछते हैं। हर किसी से पूछते हैं कटघरे में खड़ा करके। मगर सब को आईना दिखलाने वाले खुद को नहीं देखते कभी। कभी माना जाता था कि जो बिक गया वो खरीदार नहीं हो सकता , मगर अब वही खरीदार हैं जो खुद बिक चुके हैं। इधर फिर से कौन बनेगा करोड़पति का खेल शुरू हो चुका है जिसमें सदी का महानायक और मीडिया द्वारा घोषित भगवान चौदह प्रश्न पूछ कर आपको सात करोड़ जीतने का अवसर देता है। मगर कभी किसी ने उनसे नहीं पूछा कि आप कैसे धनवान बने हैं। ये तथाकथित भगवान इतना भी नहीं जनता कि वो खुद क्या है , अभिनेता है या झूठे विज्ञापन करने वाला इक चालाक कारोबारी है जिसके लिये पैसा ही खुदा है। या फिर वो छलिया है जो अपनी मधुर वाणी से ठगता है। या जैसा उसने लोनावाला में बीस एकड़ भूमि खरीदने के लिये शपथपत्र दिया था कि वो इक किसान है। और उसको साबित करने के लिये किसी ज़माने में मित्र रहे नेता के सहयोग से उत्तर प्रदेश में जालसाज़ी कर के प्रमाण एकत्र किये थे। मगर इस महानायक कहलाने वाले का एक चेहरा और भी है , कभी ये लिखता है अपने ब्लॉग पर कि उसकी ईश्वर से ईमेल पर बात होती है। जनाब अगर थोड़ी सी मेहरबानी कर सब को भगवान का ईमेल ही दे दें तो सब लोग अपनी समस्या सीधे ईश्वर को लिख कर भेज सकें। क्या हम उसको झूठा कह सकते हैं जिसको लोग भगवान का दर्जा देते हों। हां इस बात की हैरानी ज़रूर है कि इस कलयुगी भगवान की धन हवस बढ़ती ही जा रही है , और धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि जिसके पास सब कुछ हो फिर भी और पाने की चाह हो वो सब से दरिद्र होता है। अब ऐसा मनुष्य किसी को क्या दे सकता है। इक टीवी शो आया था जिसमें सच बोलने पर इनाम दिया जाता था , मगर वो सच बहुत कड़वा होता था। महाकरोड़पति के खेल में एक दिन इस कार्यक्रम पर ऐसे ही सवाल हों और उनका जवाब वही दे जो अब तक बाकी लोगों से सवाल पूछता है। ये सच बताया जाये कि आज तक इस खेल से कितने लोगों को कितना धन मिला है और उस से कितने गुणा इनको मिला है और कितने हज़ार गुणा चैनेल को मिला है। ये भी कि ये पैसा आया किसको उल्लू बना कर है , यूं भी उल्लू बनाने की बात का विज्ञापन करने वाले भी प्रयोजक हैं इनके खेल में। जाने कैसी राह दिखाना चाहते हैं ये लोग , क्या ऐसे ही गरीबी दूर हो सकती है सब की , बेशक इनकी होती है मगर अभी और कितना चाहिये इनको। ये अपनी तरह का ढंग है लोगों से छीनने का एस एम एस का जाल बिछा कर। अंत में किसी शायर के चंद शेर इनके नाम।

                            " इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं ,
                      कोई  बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।

                   रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर ,
                      चांद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।

                     मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना ,
                     आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। "

 

अगस्त 08, 2014

POST : 448 काठ की हंडिया कब तक चढ़ती रहेगी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

 काठ की हंडिया कब तक चढ़ती रहेगी ( तरकश ) डा लोक सेतिया

           इक नायक है देश का दूसरा सदी का महानायक कहलाता है। नायक अच्छे दिन लाने वाला है महानायक सब को करोड़पति बनाना चाहता है। दोनों की जोड़ी खूब है जय-वीरू की जोड़ी की तरह। अब देश में सब कुछ सही हो जायेगा। नायक जो मांगता था उसको वो मिल गया है लोकसभा में पूर्ण बहुमत। महानायक के पास तो पहले से सभी कुछ है , कुछ लोगों ने उसको भगवान तक घोषित कर रखा है। नायक कभी चाय बेचता था , खुद गरीब रहा है , उसको पता है भूख-बेबसी क्या होती है। ये महानायक भी बहुत फिल्मों में गरीबों का हितेषी वाला किरदार बखूबी निभा चुका है। आनंद फिल्म में बाबू-मोशाय इक डॉक्टर है जो जानता है कि देश में गरीबी है भूख है कुपोषण है। ऐसे ही किरदार निभाते निभाते महानायक उस जगह जा पहुंचा है जहां उसको कुछ मिंट का विज्ञापन करने के लिये ही करोड़ों मिलते हैं। पहले भी कई बार वो लोगों को करोड़पति बनने का सपना बेच चुका है। वो बताता है कि एसएमएस करो अपनी तकदीर बदलने के लिये , कुछ आसान से सवालों का जवाब ही तो देना है। पिछली बार उसने दावा किया था बहुत लोगों की तकदीर बदलने का। हर सवाल के बाद पूछता था हॉट सीट पर बैठे व्यक्ति से कि ये रकम उसके लिये क्या मायने रखती है। लगता था गरीबी का उपहास उड़ा रहा हो , दिखलाता था मानो दानवीर है और भीख दे रहा है। प्रतिभागी लोगों ने उनसे कई बातें पूछी हैं केवल यही नहीं पूछा कि इस केबीसी का सच क्या है। इसने किसको कितना अमीर बनाया है और किस किस से कितना लूटा है सपनों का जाल बिछा कर। मगर क्या किया जाये इधर परोपकार ऐसे ही किया जाता है , जितना देते हैं या देने का दावा करते हैं उस से कई गुणा खुद अपनी जेब में आ जाता है। सब से बड़ा कारोबार है अब समाज सेवा भी। अगर इस बार केबीसी में कोई एपीसोड इसको लेकर हो कि अब तक वहां कितने लोगों को करोड़पति बनाया गया है , लोग कितनी राशि जीत कर ले गये हैं और उस से कितने हज़ार गुणा कौन मुनाफा कमा गया है। इक वो भी थे जो कहते थे कि " देनहार कोऊ और है देत रहत दिन रैन , लोग भरम मोपे करें याते नीचे नैन " और इक ये हैं जो लोगों से छीन कर बहुत धन बहुत चालों से , उसमें से नाम मात्र का देकर दानवीर कहलाते हैं। और वो जो अच्छे दिन लाने की बात करते थे अब राजसी जीवन जी रहे हैं , उनका पूरा ध्यान अपना वर्चस्व बनाये रखने पर है।  जनता के पैसे से वो भी खूब मनमानी करने लगे हैं , ये भुला कर कि लोग किस दशा में हैं। लगता है उन्होंने ने भी देश की जनता की समस्यायें भगवान भरोसे छोड़ दी हैं , गरीबों की अब कोई बात नहीं की जाती। वही दलगत राजनीति , वही वोटों का गणित , वही अपनी सत्ता का विस्तार प्रमुख बन गये हैं। सत्ता मिलते ही चाय बेचने वाला जनता का धन उपयोग कर राजसी पूजा में शामिल होकर करोड़ रुपये की चंदन की लकड़ी दान कर आता है बिना सोचे कि उसको इस धन की रखवाली करनी है , ये उसकी विरासत नहीं है जिसको दिल खोल कर लुटा सके। ये कोई धर्म नहीं है। नायक के भाषण में और महानायक की बातों में अच्छी लगने वाली बातें क्या सच में अच्छी हैं या झूठ और छल को किसी आवरण से ढक दिया गया है। जो भी हो संसद में वही जंग जारी है , काठ की तलवारों वाली।

अगस्त 03, 2014

POST : 447 जश्न आज़ादी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

         जश्न आज़ादी का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

            नेता जी सलामी ले रहे थे। ऐसे चल रहे थे मानो कोई ठेल रहा हो। कदम थे कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे। देश के विकास की तरह गति थी। सुरक्षा कर्मी उनको हिदायत दे रहा था कि लाल कालीन पर ही चलना है। नेता जी देश को सही दिशा में ले जाने और विकास करने की बात दोहरा रहे थे भाषण में। पूरा देश छुट्टी मना रहा था। हम भी टीवी पर वही तमाशा देख रहे थे। घर से बाहर निकले तो एक रिक्शा वाला नज़र आया , हमने उसको बुलाया तो वो वो हमारे पास चला आया। हमने पूछा तुम्हारा नाम क्या है। "भारत नाम है मेरा साहिब " बताया उस फटेहाल ने। नाम सुनकर अच्छा लगा , वास्तविक पहचान लगी , महान लगा। हमने उसको प्यार से कहा , भारत तुम आज़ाद हो , आज आज़ादी का दिन है आज तो छुट्टी मनाओ , आज जानवरों की तरह बोझा न ढोवो। वो कहने लगा अरे बाबू ज़रा ये तो बताओ कि हमें किस बात की आज़ादी है। अगर छुट्टी मनायेंगे तो शाम को घर का चूल्हा कैसे जलेगा , पूरा परिवार भूखा सोयेगा रात को आज के दिन।

     ये आज़ादी का जश्न मनाना तो उन लोगों का चोंचला है जिनको पेट भरने की चिंता है न रहने की कोई समस्या। वो भले कोई काम नहीं करें फिर भी ठाठ से रहते हैं। जनता के पैसे से राजसी ठाठ से रह गरीबी पर भाषण देते हैं हर बार। ये घोटाले करें , लूट मार करें , अपराधियों से गठजोड़ करें इनको आज़ादी है। ये वोट लेने के लिये हमको झूठे वादे करें , प्रलोभन दें कि अगर हमारी सरकार बनी तो क्या क्या मुफ्त में बांटेगे , कोई इनसे सवाल नहीं करता कि ये सब आपका दल देगा , आपके नेता देंगे अपने पास जमा की हुई लूट की दौलत से या जनता का सरकारी धन बर्बाद करेंगे अपनों को खुश करने को। चुनाव आयोग को क्या नज़र नहीं आता ये अनुचित ढंग से वोटर को ललचाने का तरीका। सतसठ साल में इनसे इतना भी नहीं हुआ कि देश की दो तिहाई जनता को दो वक़्त रोटी ही मिल सकती , और हर दिन देश का धन बर्बाद करते रहते हैं ऐसे ही समारोहों पर आयोजनों पर। कसके लिये है ये जश्न , क्या उनके लिये जो आज भी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। यही पैसा उनको बुनियादी सुविधायें देने , उनकी शिक्षा , स्वस्थ्य आदि पर खर्च होता तो बेहतर था।

           हमने कहा भारत तुम कहते तो ठीक हो फिर भी तुम आज तो मिठाई खाना क्योंकि आज ही के दिन हमने विदेशी गुलामी से मुक्ति पाई थी। वो बोला क्यों उपहास की बात करते हो बाबू , रोटी खाने को पैसे नहीं हों , घर में आटा दाल चावल कुछ भी नहीं हो , बच्चे बीमार हों तब मैं सब को भुला कैसे मिठाई खा लूं। ये तो नेता लोग ही कर सकते हैं कि जनता की हालत जो भी हो इनको शाही शानो-शौकत से रहना है। हमने कहा हे मूर्ख जब ख़ुशी मनानी हो जश्न मनाना हो तब सब समस्याओं को भुला क़र्ज़ लेकर भी मिठाई खा लेते हैं। देश पर अरबों रुपये का क़र्ज़ है , लोग भूखे हैं , बेघर हैं , बेरोज़गार हैं ,उग्रवाद है , विपतियां हैं , दुर्घटनायें हैं तब भी सरकार नित नया जश्न मनाती रहती है। नई आर्थिक नीति लागू है जिसमें इंसान इंसान नहीं हैं उपभोक्ता है , कम्पनियों से लेकर सरकारों तक के लिये। तुम भी अपना ढंग बदल लो और नये ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चलो। रिक्शा वाला हमें वहां ले आया था जहां सरकारी समारोह चल रहा था।

                                       धूप में , गर्मी में स्कूली छात्र छात्रायें कर्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे , मनोरंजक प्रस्तुति देकर। नेता अफ्सर , खास लोग ताली बजा रहे थे , शामियाने में छांव में बैठ कर आनंद लेते हुए , शीतल पेय का पान करते हुए। मगर जो बच्चे घंटों से धूप में , गर्मी में प्यास से व्याकुल थे उनको हिलने तक की आज़ादी नहीं थी। ऐसे में इक बच्ची बेहोश होकर गिर गई थी , उसको छाया में ले जाया गया और पानी पिला होश में लाया गया। अध्यापक उसको ऐसे देख रहा था मानो उसने कोई अपराध किया हो। उसको घर वापस जाने को कह दिया गया , उसको आज़ादी का सबक याद करवाना था , उसको आज़ादी तो नहीं थी। अब चौदह नवंबर को उसकी बात होगी , फिर किसी दिन मानव अधिकारों की भी बात होगी , आज उस सब का कोई मतलब नहीं था। परेड के बाद रेवड़ियों की तरह ईनाम - पुरुस्कार वितरित किये गये , तालियां बजाई गईं , जन-गण-मन गीत गाया गया।

                                    कुछ मज़दूर जो कई दिन से समारोह की तैयारी में दिहाड़ी पर लगे हुए थे , समारोह की समाप्ति पर फिर सब ठीक पहले सा करने के काम पर लग गये। उनको कई दिन की बकाया मज़दूरी मिलने की उम्मीद थी , मगर उनको बताया गया कि आज छुट्टी का दिन है उनका पैसा आज नहीं दिया जा सकता। वो आज भी प्रशासन के सामने हाथ जोड़े खड़े थे , अपने हक की भीख मांगते। उनकी गुलामी का अंत अभी भी नहीं हुआ है , साहूकार , मिल मालिक , ज़मीदार सब आज भी उसको बंधक बनाये हुए हैं। उधर सरकारी बाबू अधिकारी को बता रहा है कि कितना पैसा खर्च हुआ और कितना बचा लिया है मिल बांट कर खाने को। सब  कर्मचारी - अधिकारी अपना हिस्सा लेकर जा रहे हैं ताकि अपने परिवार के साथ आज़ादी का जश्न मना सकें , फिर जाने कब ऐसा अवसर मिलेगा छुट्टी मनाने का। बाहर सड़क पर  पुलिस वाले लोगों को रोके खड़े हैं , मंत्री जी का काफिला जो गुज़रना है। कोई भूले से उधर से जाने की कोशिश करे तो डंडा चलने को तैयार है। मंत्री जी की सुरक्षा भारी है आम जनता की आज़ादी पर।

( ये मन घड़ंत नहीं है , ऐसा देखा है खुद अपनी नज़र से। शायद हर जगह हर साल दोहराया भी जाता है )

जुलाई 31, 2014

POST : 446 मेहरबानी दोस्त मुझे याद रखा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

  मेहरबानी दोस्त मुझे याद रखा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कब सोचा था
कभी सच होगा ये सपना भी
किसी को यूं ही किसी दिन
आयेगा ये भी ख्याल
कि जाने कहां खो गया
कोई दोस्त कई दिन से
और वो चला आयेगा
मेरे घर में पूछने हाल मेरा ।

लोग कहते हैं
आज के नये दौर में
भला किसे फुर्सत है
जो सोचे किसी दूसरे के लिये ।

मगर फेसबुक के दोस्तों में भी
मुझे रही है तलाश ऐसे ही
दोस्त की जो रखे याद ।

वो बात जो कही थी हमने
दोस्त बनते समय कि
हम हैं इक घर के सदस्य
जो रहते हैं बेशक दूर
मगर होता है एहसास
उनके करीब होने का ।

मेहरबानी
मेरे फेसबुक के दोस्त ।



जुलाई 30, 2014

POST : 445 नियम-कानून लागू कब होते हैं ( आलेख ) डा लोक सेतिया

 नियम कानून लागू कब होते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज इक खबर छपी है शाम के अखबार में। हरियाणा सरकार ने फतेहाबाद नगर में जो सरकारी भूमि दो संस्थाओं को देनी है वो कलेक्टर रेट पर दी जायेगी और इस शर्त पर कि उसका उपयोग वाणिजयक कार्य के लिये नहीं किया जा सकेगा। ये सही बात है , मगर सवाल और भी है कि पहले जिन जिन को सरकार ने भूमि दी थी धर्मशाला बनाने के लिये क्या उन पर भी यही शर्त लागू थी। ज़रूर ये शर्त तब भी रही होगी , मगर क्या इसका पालन किया गया। हुआ ये कि तब धर्मशाला बनाने से पहले ही वहां मार्किट बना दी गई , और धर्मशाला भी कैसी जिसमें कोई मुसाफिर बिना कमरे का किराया दिये रात भर नहीं रुक सकता। जब संत महात्मा तक धर्म प्रचार के नाम पर कारोबार करने लगे हों तब बाकी समाज से क्या उम्मीद की जाये। धर्म खुद लोभ लालच के जाल में भटक रहा है। यहां एक सवाल और भी है कि क्या सरकार का समाजिक कार्य के लिये भूमि देना जनहित की बात है अथवा वोट बैंक का मोह। क्योंकि जब इन दोनों संस्थाओं को भूमि आबंटित होने की बात हुई थी तब संस्थाओं वाले सत्ताधारी नेताओं का आभार प्रकट कर रहे थे और उपकार मान रहे थे जैसे कि भूमि वो अपनी निजि दे रहे हों। अगर देश समाज को गलत दिशा में जाने से रोकना है तो ये तय करना होगा कि जिस भी संस्था को जो भूमि जिस काम के लिये दी जाये और जिन शर्तों पर उसका वही उपयोग ही हो। अगर कोई दुरूपयोग करे तो उसको रोका जाये। क्या सरकार तैयार है इसके लिये कि जो सरकारी भूमि को धर्मशाला बनाने को लेकर वाणिजयक उपयोग कर रहे हैं राज्य भर में , उनपर कठोर करवाई हो , उनके अनुचित उपयोग को बंद करवाया जाये। या फिर यहां भी वही दोहराया जायेगा।
       देश में सरकार अर्थात सत्ताधारी नेता अपनी साहूलियत से नियम कानून ताक पर रख लेते हैं। सरकारी विभाग अपने मास्टर प्लान में बदलाव कर पार्क की जगह संस्थाओं को आबंटित करते हैं , बाज़ार की कीमती ज़मीन किसी को धर्मशाला बनाने को दे देते है और उस का उपयोग दुकानें बनाकर किया जाता है। कोई कानून ऐसे ख़ास लोगों के समाजिक कार्य की जगह किराये की दुकानें बनाने को रोकता नहीं है। मगर कोई अपने घर या कमर्सिअल स्थान में अपनी खुद की जगह में नक्शे में बदलाव करते हैं तो कीमत से बढ़कर जुर्माना लगा दिया जाता है।  क्या नियम आम नागरिक पर लागू किये जाने को ही बने हैं , खुद नियम लागू करने वाले किसी नियम का पालन नहीं करते। हर आम आदमी ये देख कर बेबस महसूस करता है , कहीं कोई कानून नहीं पालन करवाने वाले सरकारी विभाग के अधिकारी जब चाहे उस पर कोई भी आरोप लगा देते हैं। तीस चालीस साल बाद नक्शा पास करवाने की बात क्या उचित है। सरकारी विभाग बदल गए और नियम कानून भी , ऐसे में पचास साल पहले किसी विभाग द्वारा बेचे प्लाट पर जो विभाग बनाया ही उस की बोली के दस साल बाद हो और इमारत निर्माण होते समय उस एरिया पर उसका नियम लागू ही नहीं हो , जब भी मर्ज़ी नोटिस देकर परेशान करते हैं वो भी तमाम लोगों को नहीं किसी एक को चुनकर जो विभाग को जनहित में उसी के प्लॉट्स और फुटपाथ पर अवैध कब्ज़े करने वालों की सूचना देता हो। ये तो अपने पद और विभाग के नियम कानून की आड़ में उसे तंग करना है जो विभाग को उसी के प्लॉट्स पर अवैध कब्ज़े की जानकारी देता है , अधिकारी विभाग के प्लॉट्स फुटपाथ पर सड़क पर कब्ज़ा करने वालों को कुछ भी कहता मगर अपने प्लाट में बनाये निर्माण पर तीस साल बाद नोटिस भेजता है।
                 किसी भी समाज में सरकार और विभाग इस तरह काम नहीं कर सकते हैं। किसी को सब माफ़ और किसी को किसी भी तरह सज़ा देना सच बताने पर। 

 

जुलाई 21, 2014

POST : 444 झूठ से दोस्ती नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

झूठ से दोस्ती नहीं करते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

झूठ से दोस्ती नहीं करते
हम कभी बस यही नहीं करते ।

इक खुदा ने सवाल पूछा है
आप क्यों बंदगी नहीं करते ।

साथ जीना है साथ मरना भी
बस तभी ख़ुदकुशी नहीं करते ।

बेवफ़ा हम उन्हें कहें कैसे
बेवफ़ाई वही नहीं करते ।

आज कहने लगे हमें आकर
आप क्यों आशिक़ी नहीं करते ।

क्यों बुलाते हो तुम रकीबों को
यार से दिल्लगी नहीं करते ।

याद "तनहा" उन्हें ज़माना सब
बात पर आपकी नहीं करते । 
 

 

मई 19, 2014

POST : 443 दर्द-ए-ग़ज़ल ( एक खत ग़ज़ल का ) { तीरे-नज़र } डा लोक सेतिया

 दर्द-ए-ग़ज़ल ( एक खत ग़ज़ल का ) { तीरे-नज़र } डा लोक सेतिया

मुझे चाहने वालो , मेरा सलाम। तुम मुझे बेहद चाहते हो , मेरे दीवाने हैं दुनिया भर में तमाम लोग। मुझे नाज़ है उन सब पर जिनको इश्क़ है मुझसे। मगर जाने क्यों ये कुछ नासमझ लोग मेरे साथ इक खिलवाड़ करने लगे हैं। और कहते हैं कि मेरे चाहने वाले हैं। मैं बेहद नाज़ुक हूं , मेरी सुंदरता मेरे स्वभाव की कोमलता , हर बात कहने के मेरे अपने सलीके और सभी को लुभाने वाले मेरे अंदाज़-ए-बयां में है। मेरे रंग रूप को जैसे चाहो वैसे बदलोगे तो मेरी सारी कशिश ही समाप्त हो जायेगी। मेरे साथ इस तरह छेड़खानी करने वाले मेरा नाम ही बदनाम कर देंगे। मैं तो उन शायरों की विरासत हूं जिन्होंने पूरी उम्र साधना करके मुझे सजाया , संवारा और निखारा है। मगर आजकल तो मुझे जाने समझे बिना ही हर कोई दावा करने लगा है कि मैं उसी की हूं। इनमें से कितने तो इतना भी नहीं जानते कि मेरा नाम ग़ज़ल क्यों रखा गया है , वे क्या मुझे समझेंगे और कैसे मुझे अपना बनायेंगे। हमेशा से मैं सभी का दर्द बयां करने का माध्यम रही हूं , मगर आज मुझे कोई नहीं नज़र आता जो मेरे दिल का दर्द दुनिया को बता सके। मैं किसके पास जाऊं इंसाफ मांगने , है कोई मुंसिफ जो उनको सज़ा दे सकता हो जो खेल रहे हैं मेरी अस्मत के साथ बार बार। मुझे क़त्ल करने वाले , मुझे खून के आंसू रुलाने वाले खुद को शायर बता रहे हैं। ये देख मुझ पर क्या बीतती है कौन समझेगा। इस खत से पहले भी मैंने कुछ खत लिखे थे उन शायरों के नाम जिन्होंने मुझसे मुहब्बत ही नहीं की , जो तमाम उम्र मेरी इबादत करते रहे।ग़ालिब , दाग़ , जिगर जैसे मुझे दिलो जान से चाहने वाले लोग। उन लोगों ने कभी भी मेरी नफासत को दरकिनार नहीं किया , मेरी खुशबू को मेरे मिजाज़ को हमेशा बचाये रखा। वो जानते थे बेहद नाज़ुक हूं मैं , छूने भर से मुरझा सकती हूं , उन्होंने मेरा एहसास अपनी रग रग में , अपनी हर सांस में भर लिया था। काश मुझे चाहने वाले वो शायर आज फिर से आ जायें और मैं खुद को उनकी आगोश में छिपा लूं।

                        ये खत भेजा है ग़ज़ल ने मुझे , मेरे नाम अपने सभी चाहने वालों के नाम। इस पर कोई नाम नहीं लिखा हुआ है , ये सभी ग़ज़ल को चाहने वालों के नाम है इक संदेश। पढ़कर परेशान हो गया हूं मैं , करूं तो क्या करूं , ग़ज़ल के इस दर्द को जाकर किसको समझाऊं और किस तरह। आज के लिखने वाले तो बड़े ही बेदर्द हो गये हैं।
"ग़म ज़माने के लिखते रहे उम्र भर , खुद जो एहसास-ए-ग़म से भी अनजान थे"।
हमसे कई बार भूल हो जाती है , जिसको फूल सा कोमल मान लेते हैं वो पत्थर सा कठोर होता है। आशिक़ भी प्यार में जब प्रेमिका को ग़ज़ल नाम दे बैठते हैं तो बाद में पछताते हैं जब उनकी कविता का रूप पहले सा नहीं रहता।

        "खुद ग़ज़ल हैं वो हमारे दिल की , क्या भला और सुनायें उनको"।

ग़ज़लकार ये अनर्थ कर बैठते हैं , अपनी महबूबा को ग़ज़ल नाम देना अर्थात उसको महफ़िल के हवाले कर देना। हर कोई उसकी तारीफ करे और उसको चाहने लगे ये देख कर खुद जलन होने लगती है। हर कोई समझता है उसी का अधिकार है ग़ज़ल पर बाकी तो कहने को ग़ज़ल कह रहे हैं। ग़ज़ल इक खूबसूरत ख़्वाब है। शायर हर बार सोचता है कि आज जो ग़ज़ल सुनाने जा रहा है वो लाजवाब है , मगर मुशायरे में सुनाने के बाद फिर सोचता है अगली ग़ज़ल ऐसी शानदार लिखेगा कि सब वाह वाह कर उठेंगे। ग़ज़ल का अंदाज़ कहां सभी को आता है , तभी तो कहा था ग़ालिब ने कि , है ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयां और।

                 मैंने भी अपने दिल में ग़ज़ल की इक दिलकश सी तस्वीर बना राखी थी। आज जब मेरे सामने आई तो देख कर हैरान हो गया हूं , मैंने पूछा था ग़ज़ल से ये क्या हाल बना रखा है तुमने प्रिय। सुन कर रोने लगी थी अपनी दुर्दशा पर। बोली , देख लो छापने वाले ने मेरी कैसे दुर्गति की है , इससे तो बेहतर होता बिना छापे लिखने वाले को वापस ही भेज देता। इस तरह छपा देख कर मुझे लिखने वाले के दिल पर क्या बीत रही है ये वही जानता है या मैं समझती हूं। उस पर ये प्रकाशक मानता होगा कि उसने कोई उपकार किया है छाप कर। उसके लिये ग़ज़ल में या कुछ और छापने में कोई अंतर नहीं है , उसको किसी तरह जगह भरनी है , कुछ भी परोसना है पढ़ने वालों को। ग़ज़ल कहने लगी आजकल ग़ज़ल संध्या के नाम पर तमाशा किया जाता है , गाने वाले ऐसे गाते हैं कि वो सहम कर रह जाती है। ये गायक इतना भी नहीं जानते कि मुहब्बत या इबादत और बात है और किसी को ज़बरदस्ती अपना बनाना दूसरी बात। इक दर्द ये भी है ग़ज़ल का कि सभाओं में उसके शेरों को गलत ढंग से सुनाया जाता है बिना उसका अर्थ जाने , तालियां बटोरने के लिये। शायरी का ये क़त्ल उससे देखा नहीं जाता। बड़ा ही अनाचार होने लगा आजकल ग़ज़ल के साथ , उसपर हो रहे ज़ुल्म की शिकायत मैं जाकर किस से करूं। कौन उसको बचाये उनसे जो ग़ज़ल की आबरू तार तार करने पर तुले हैं। ग़ज़ल को बचा लो , कहीं बेमौत न मर जाये ग़ज़ल। कर सको तो ग़ज़ल के इस दर्द को आप भी दिल की गहराई से महसूस करो। आपकी पलकों पर अगर दो आंसू आ जायें ग़ज़ल का दर्द सुनकर तो समझना कि आप भी शामिल हैं ग़ज़ल के चाहने वालों में। 
 

 

मई 16, 2014

POST : 442 आशिक़ी का जुनून है ( अनकही ) डॉ लोक सेतिया

        आशिक़ी का जुनून है   ( अनकही ) डॉ लोक सेतिया

       किसी दिन हम अपनी कहानी लिखेंगे ,  हम अपनी प्यास को तब पानी लिखेंगे । 

जब किसी को आस पास कहीं से भी प्यार नहीं मिलता तब वो अपनेपन को तरसता है और जब भी कोई दो बोल प्यार के बोलता है तब उसी का होकर रह जाता है और रहना चाहता है जीवन भर को लेकिन उम्र भर समझ नहीं पाता कि सपनों की बातें वास्तविक जीवन में हक़ीक़त नहीं बनती हैं । घड़ी दो घड़ी पल दो पल या कुछ दिन साल महीने का साथ सभी निभाते हैं और अचानक किसी मोड़ से राहें अलग अलग हो जाती हैं । कुछ लोग नासमझ नादान होते हैं और अपनी नादानियों से प्यार करते हैं बचपन से लेकर बड़े होने तक खोये रहते हैं पुरानी यादों में जो ख़्वाब ही थे वास्तविकता कभी नहीं बने ये बात ऐसे लोग मानते ही नहीं । बस जहां जो भी प्यार से मिला उसी के हो जाते हैं और दिल में बसाते हैं उनको दिल से निकालते नहीं कभी भी भले समझाते हैं अनुभव कि कोई किसी का हमेशा को होता नहीं है यही दुनिया का चलन है । जिनको चाहा दिल में जगह दी उनको पराया समझना उनको नहीं आता कभी भी । कोई दोस्त कोई अन्य किसी रिश्ते से जुड़ जाता है ये सिलसिला चलता रहता है ज़माने की तरह कोई दूसरा मिल गया तो पहले जितने संगी साथी थे उनको छोड़ना आदत नहीं होती कुछ लोगों की । कितने सालों बाद फिर से अचानक पुराने लोग मिल जाएं तो यूं लगता है कभी जुदाई आई ही नहीं , दुनिया को गिले शिकवे शिकायत याद रहते कुछ विरले ही लोग होते हैं जिनको सिर्फ दोस्ती प्यार अपनापन और जिस जिस ने जैसे जितना साथ निभाया बस वही रहता है याद । 

मन की बातें कभी किसी से कहना नहीं आता हर किसी को वक़्त की धारा संग बहना नहीं आता । भूले से कभी दिल में कुछ आये भी तो दिल को समझा लेते हैं सब को दर्द की दौलत भी कहां नसीब होती है । ज़िंदगी के सफ़र में ग़म ही तो साथ निभाते हैं खुशियां कब रहती है हमेशा टिककर । क्या हुआ जो दिल बार बार टूटता रहा ये तजुर्बा भी कोई थोड़ा तो नहीं जिस ने दामन छुड़ाया उसको नहीं मना सके पर कभी हाथ पकड़ कर  छोड़ा तो नहीं । किसी भी किताब पर किसी पन्ने पर इक अपना ही नाम नहीं लिखा रहता पलटते हैं ज़िंदगी की किताब के पन्ने तो हर पन्ने पर कोई नया कभी फिर से वही पुराना कोई नाम शक़्ल सूरत बदल दिखाई देता है । हर अध्याय कुछ और कहानी कहता है कोई सामने नहीं होता फिर भी बंद कमरे में रहता है कोई तो है जो शायद इस दुनिया में नहीं है तब भी अपने दुःख दर्द समझता है पीड़ा को सहता है । कभी नहीं सोचा न कभी जाना ज़माना पागलपन दीवानगी कहता है । सपनों का खूबसूरत महल ज़ेहन में रहता है कभी नहीं ढहता है कौन परायों को अपना समझता है चले आओ या मुझे बुला लो बार बार कहता है । कभी कोई खिड़की कभी कोई दरीचा कभी छत का कोई कोना कभी बारिश कभी तपती गर्मी कभी यूं ही किसी शाम किसी के साथ कितनी यादें जुड़ी को सीने में सबसे छुपाए रखते हैं । जिनको नहीं वापस लौटना उनकी आस लगाए रखते हैं शाम की सैर वो बहता पानी दो किनारे लंबे होते साये हमेशा याद रखते हैं । 

कभी अपनी मुहब्बत की रुसवाई नहीं करते सितम करने वाले को हरजाई नहीं कहते । सब की अपनी कोई मज़बूरी थी बस और कोई नहीं दूरी थी । कुछ ख़त लिखे थे कुछ मिले थे सभी को हमेशा को जाने कब कहां रख दिया कि ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे किसी को खुद को भी नहीं । अपने देखा है एकांकी नाटक जिस में बस इक किरदार सामने रहता है बाक़ी सभी कल्पना से निर्मित होते हैं दर्शक को अनुभव होता है कितने और हैं मगर सब काल्पनिक होता है । ऐसे ही कुछ लोग जिनको कोई नहीं मिलता कोई बात तक नहीं करता कोई देखता नहीं किस तरह अकेलेपन को झेलता है कोई शख़्स अपने लिए इक ख्याली दुनिया बसा कर जीते हैं दुनिया को पता ही नहीं चलता कि उनकी कहानी में कोई भी वास्तविक किरदार नहीं रहा सपनों में जीने की आदत क्यों कैसे किसी को पड़ जाती है क्या पता शायद ज़िंदा रहने को कोई और तरीका उनको सूझता नहीं है तो खुद से अपने आप से बातें करते हैं , कभी झगड़ते हैं खुदी से कभी खुद को मना लेते हैं । हर रस्म निभा लेते हैं ख्वाबों को सजा लेते हैं । जिन का कोई वजूद नहीं कुछ होते हैं उनसे नाता बना लेते हैं निभा लेते हैं तन्हाई में उन बातों से खुद को बहला लेते हैं मुहब्बत से मुहब्बत का कहां सब लोग सिला देते हैं ।