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अप्रैल 03, 2016

POST : 500 आया बुलावा भगवान का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           आया बुलावा भगवान  का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

संपादक जी के घर की कॉलबेल बजी , दरवाज़ा खोला तो देखा सामने बजरंग बली जी खड़े हैं । संपादक जी ने पूछा हनुमान जी आप , लगता है गलती से यहां आ गये हैं , मैं तो सभी धर्मों का आदर करने वाला हूं , मगर किसी देवी देवता का उपासक नहीं हूं । मैं अपने आप को सेकुलर मानता हूं और चाहता भी हूं कि मुझे सेकुलर ही समझा जाये । हनुमान जी बोले , महोदय मैं तो आपके लिये प्रभु श्री राम का संदेश लाया हूं  , आपको बुलाया है मिलने को । भगवान का बुलावा अर्थात मौत , सोचने लगे संपादक जी , तो बजरंग बली जी ने समझाया कि वो बुलावा नहीं , मैं तो आपको श्री राम के साक्षात दर्शन को ले जाना चाहता हूं और सकुशल वापस भी छोड़ जांऊगा । प्रभु को आपसे कुछ ख़ास बात करनी है , वो खुद भी आ सकते थे मगर इसलिए नहीं आये ताकि आपकी सेकुलर होने की छवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़े । संपादक जी सोचने लगे बेशक वो सेकुलर ही हैं और सभी धर्मों को समान समझते हैं , मगर किसी धर्म के ईश्वर का साक्षात्कार छापने वाले पहले पत्रकार वो हो सकते हैं , ऐसा अवसर कभी छोड़ नहीं सकते । इसलिए अवसर को गंवाना नहीं चाहते और बजरंग बली जी से जल्द ले चलने को कह दिया । कागज़ कलम साथ लिये चल दिये हनुमान जी के साथ , हनुमान जी ने उनको अपनी हथेली पर बिठाया और उड़ कर सीधे राम दरबार में जा पहुंचे ।

        संपादक जी ने देखा कोई सुरक्षा जांच नहीं , कोई परिचय पत्र नहीं , अपॉइंटमेंट नहीं , जो भी चाहे आ सकता खुले दरबार में अपनी बात कहने को । कोई प्रशासन का अधिकारी नहीं रोक सकता , कुछ बताने की ज़रूरत नहीं पहले से कि कोई शिकायत है या कुछ मांगना है या कोई अन्य काम है । पहुंचते ही श्री राम संपादक जी के अभिवादन का जवाब देते हुए कहने लगे , आपका हार्दिक स्वागत है , आपको यहां आने का कष्ट देना पड़ा कुछ बात ही ऐसी थी । आप जनता तक सभी की बात पहुंचाते हो , शायद हमारी भी लोगों को समझा सको , वर्ना हमें नहीं लगता हमारी बात लोग समझना भी चाहते हैं । संपादक जी को लगा शायद भगवान पूरे पेज का विज्ञापन अख़बार में देना चाहते हैं , अपनी बात का प्रचार करने को । संपादक जी बोले भगवान आपकी सेवा का अवसर पाकर हमें ख़ुशी होगी , हमारी विज्ञापन की दरें और भी कम हो गई हैं , हमारी प्रसार संख्या करोड़ों में है देश भर में , सभी सरकारी विभाग हमें विज्ञापन देते हैं । श्री राम बोले महोदय आप गलत समझ रहे हैं , हमने कोई विज्ञापन नहीं देना है न ही कोई शुल्क ही आपको मिल सकेगा , हमें पता चला आप जनता की बात लिखते हैं अपने कॉलम में और पाठकों की बात में भी , हम चाहते आप हमारी भी बात लोगों तक पहुंचा दो , जनहित की बात समझ कर । संपादक जी भांप गये कि भगवान का इंटरव्यू छपना है , कागज़ कलम लेकर बोले आपसे कुछ सवाल करूंगा जिनके जवाब आप देना ताकि आपकी बात ठीक से समझी जा सके । श्री राम बोले ठीक है ।

                संपादक जी बोले मेरा पहला सवाल अयोध्या में आपके मंदिर को लेकर है , क्या आपको उसके अभी तक नहीं बन पाने से दुःख है या बन जाने से ख़ुशी होगी । श्री राम बोले यही बात तो उनको कहनी है , मुझे किसी ईमारत में कैद नहीं होना है , हम तो अपने भक्तों के मन में बसते हैं । हमारे परम भक्त हनुमान ने अपना सीना चीर कर दिखा दिया था , आपने रामायण नहीं भी पढ़ी हो तो टीवी सीरियल तो देखा ही होगा । मैं तो कण कण में बसता हूं कोई देखना चाहे अगर तो , मेरा मंदिर तो कभी हर घर में हुआ करता था , लोग सुबह शाम राम राम किया करते थे , अब जब कोई भी किसी मर्यादा का पालन नहीं करता तब मेरे भव्य मंदिर बनाने से मुझे क्या प्रसन्नता हो सकती है । भगवान उदास हो गये अपनी बात करते करते । संपादक जी बोले आपको नहीं पता लोगों ने अपने वस्त्रों पर आपका नाम लिखवा रखा है , पत्थरों पर आपका नाम लिख रहे हैं । राम बोले मुझे सब पता है , आह भर कर कहने लगे , मेरे नाम की चादर ओढ़ने से , मेरे नाम की माला जपने से कोई मुझे नहीं पा सकता है । मैं तो तुम सभी के अंदर रहता हूं , मुझे और किसी जगह मत खोजो , जिसको अपने भीतर नहीं मिलता उसको बाहर भी नहीं मिलेगा कोई भी ईश्वर । आप सभी तक मेरा ये संदेश पहुंचा सको तो बहुत अच्छा होगा । लोग अपने घरों में गलियों में , गांव में शहर में मेरे रहने लायक थोड़ी जगह बनायें , अपने आस पास सभी दीन दुखियों की सहायता करें , मैं उन्हीं में रहता हूं । पत्थरों में नहीं बसता हूं मैं । कम से कम मेरे नाम पर , मेरे नाम पर मंदिर बनाने की बात पर कोई राजनीति नहीं करें । मैंने कभी राज-पाठ का लोभ नहीं किया था , हमेशा जनता की भावनाओं का आदर ही किया , तभी इक धोबी के झूठे आरोप पर अपनी पत्नी देवी सीता का त्याग कर दिया । कोई ऐसा नहीं कह सके कि नियम क़ानून राज परिवार पर लागू नहीं होते । अब तो राम राज्य की बात करने वाले खुद शाही ठाठ से राजा बनकर रहते हैं जब लोग गरीबी और भूख से तड़पते हैं । क्या ये मेरे अनुयायी हो सकते हैं ?

         संपादक जी बोले भगवान आपकी बात शत प्रतिशत सही है , जब आपको लगता है यहां कितना बुरा हाल है तो फिर से अवतार लेकर सभी पापियों रावणों से लोगों को निजात क्यों नहीं दिला देते । श्री राम बोले संपादक जी रावण तो महापंडित था , ज्ञानी दुश्मन अच्छा होता है मूर्ख दोस्तों से । और ये खुद को मेरे भक्त कहने वाले कितने समझदार हैं तुमसे छिपा नहीं है । समझदार दुश्मन लाख अच्छा होता है नासमझ दोस्तों से । अचानक संपादक जी की नींद खुल गई और वो अपने सपने के बारे सोचने लग गए , कि राम की बात को कहां जगह दें अख़बार में । संपादकीय में या पाठकों की बात में । सेकुलर इमेज की चिंता के साथ कट्टर-पंथियों के नाराज़ होने का भी डर है । " मानो या ना मानो " शीर्षक कॉलम में ही छापना सही होगा । ये रचना करीब नौ साल पहले की लिखी हुई है सही समय पर हर रचना प्रकाशित हो ऐसा होता नहीं है फिर भी कुछ बातें पुरानी भुलाने से भूलती नहीं या भुलाई नहीं जा सकती हैं । 

 
 देश के प्रसिद्ध और दिव्य मंदिर, जहां साक्षात होते हैं भगवान सूर्य के दर्शन  | Famous And Divine Temples Of The Country, Where Lord Surya Is Visible -  Oneindia Hindi

मार्च 31, 2016

POST : 499 संकल्प ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

            संकल्प ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

जीवन में जाने कितनी बार
किया तो है पहले भी संकल्प
खुद को बदलने का संवरने का
मगर शायद कुछ अधूरे मन से
तभी जब भी आया इम्तिहान
नहीं पूरा कर सका में अपना संकल्प ।

फिर से इक बार कर रहा हूं वही संकल्प
नहीं घबराना असफलताओं से
नहीं डरना ज़िंदगी की मुश्किलों से
छुड़ा कर निराशाओं से अपना दामन
साहसपूर्वक बढ़ाना है इक इक कदम
अपनी मंज़िल की तरफ बार बार ।

नतीजा चाहे कुछ भी हो मुझे करना है
फिर से प्रयास पूरी लगन से निष्ठा से
कोई रुकावट नहीं रोक सकती रास्ता
मुझे करना ही है पार इस बार उस नदी को
और ढूंढनी ही है मंज़िल प्यार की यहीं
इसी जन्म में इसी दुनिया में इक दिन । 
 

 

मार्च 28, 2016

POST : 498 वजूद की तलाश में ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

वजूद की तलाश में ( कविता ) - डॉ लोक सेतिया

जाने कहां खो गया हूं मैं
खोजना चाहता हूं अपने आप को
वापस चला जाता हूं
ज़िंदगी की पुरानी यादों में
समझना चाहता हूं दोबारा
किस मोड़ से कैसे मुड़ गया था
रास्ता ज़िंदगी की राह का कभी ।

शायद चाहता हूं जानना
कि क्या होता अगर तब मैंने
चुनी होती कोई और ही राह चलने को
तब कहां होता मैं आज और क्या होता
मेरा वर्तमान भी और भविष्य भी ।

लेकिन समझ आता है तभी मुझे
ये सच कि कोई कभी भी
लिखी हुई किताब को दोबारा पढ़कर
बदल नहीं सकता है लिखी हुई
इबारत को
गुज़रे हुए पलों को ।

हो सकता है
मेरी ज़िंदगी की किताब में
बीते हुए ज़माने की ही तरह
पहले से ही लिखा हुआ हो मेरा
आने वाला कल भी भविष्य भी
शुरुआत से अंत के बीच
न जाने कब से भटकता रहा हूं
और भटकना है जाने कब तलक
अपने खोये हुए वजूद की तलाश में
मुझे । 
 

 

मार्च 26, 2016

POST : 497 मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

मेरा विवेक जगाता है मुझे ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

आज इक बार फिर
इक कहानी पढ़ते पढ़ते
सोच रहा था
मुझे भी उस कहानी के
किसी पात्र की तरह
अच्छा
बहुत अच्छा बनना है ।

सभी मुझे समझते हैं
मैं बहुत अच्छा हूं
सच्चा हूं
मगर खुद अपनी नज़र में
मुझ में कमियां ही कमियां हैं
सोचता रहता हूं
मैं क्यों नहीं बन पाया वैसा
जैसा बनना चाहिए था मुझे ।

शायद इस दुनिया में अच्छा
सच्चा बनकर जीना
मुश्किल ही नहीं
असंभव काम भी है
और मैंने किया है उम्र भर
असंभव को संभव करने का प्रयास ।

मुझे किसी ने पढ़ाया नहीं
सच्चाई और उसूलों का पाठ
बल्कि हर कोई समझाता रहा
दुनियादारी को सीखने की ज़रूरत ।

बस मेरा किताबें पढ़ने का शौक
अच्छी फिल्मों को देखने का जुनून
मुझे समझाता रहा सही और गलत
अच्छे और बुरे का अंतर करना
और मुझ में मेरा ज़मीर
ज़िंदा रहा हर हाल में ।

जो काम शायद किसी गुरु की शिक्षा
किसी प्रचारक के उपदेश नहीं कर सके
मेरे विवेक ने खुद किया हर दिन
वही काम मार्गदर्शन देने का मुझे
इसलिए हमेशा की तरह फिर
आज भी मैंने किया है निर्णय
तमाम कठिनाईयों के बावजूद
अकेले उसी राह पर चलते रहने का । 
 

 

मार्च 24, 2016

POST : 496 आज मनाई होली इस तरह ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

आज मनाई होली इस तरह  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सुबह से शाम हो गई है
सोच रहा हूं मैं होली के दिन
क्या ऐसे ही होती है होली
जैसे आज मनाई है मैंने ।

कभी वो भी बचपन की होली थी
जब बक्से से निकाल के देती थी
मां हमें चमचमाती हुई पुरानी
स्टील और पीतल की सुंदर पिचकारी ।

और घोलते थे रंग कितने ही मिला पानी में
भरने को दिन भर जाने कितनी बार
खेलते थे बड़ों छोटों के साथ मस्ती में
मन में भरी रहती थी जाने कैसी उमंग ।

फिर होते गये हम बड़े और समझदार
बदलता गया ढंग हर त्यौहार मनाने का
सोच समझ कर जब लगे खेलने होली
नहीं रही मन की उमंग और होता गया
हर बरस पहले से फीका कुछ हर त्यौहार ।

आज चुप चाप बंद कमरे में अकेले ही
खेली दिन भर हमने भी ऐसे कुछ होली
जैसे किसी अनजान इक घर में हो खामोश
पिया बिना नई नवेली दुल्हन की डोली ।

फेसबुक पर कितनी रंग की तस्वीरें
कितने सन्देश कितने लाईक कमेंट्स
मगर दिल नहीं बहला लाख बहलाने से
किसी को नहीं भिगोया न हम ही भीगे
ये कैसे दोस्त सच्चे और झूठे जाने कैसे
नहीं आई घर बुलाने कोई भी टोली हमजोली ।

की बातें फोन पर सभी से कितनी दिन भर
ली और दी हर किसी को होली की बधाई
बने पकवान भी कुछ मंगवाये बाज़ार से
लगी फिर भी फीकी हर तरह की मिठाई ।

लेकिन हम सभी को यही बतायेंगे कल
बहुत अच्छी हमने ये होली है मनाई
नहीं जानते कैसे क्या क्यों बदला है
मगर खुशियां होली की हो गई हैं पराई । 
 

 

मार्च 20, 2016

POST : 495 खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुश्क हैं आंखें जुबां खामोश है
इश्क़ की हर दास्तां खामोश है ।

बस तुम्हीं करते रहे रौशन जहां
तुम नहीं , सारा जहां खामोश है ।

क्या बताएं क्या हुआ सबको यहां
चुप ज़मीं है आस्मां खामोश है ।

झूमता आता नज़र था रात दिन
आज पूरा कारवां खामोश है ।

तू हमारे वक़्त की आवाज़ है
किसलिए तूं जाने-जां खामोश है । 
 

 

मार्च 09, 2016

POST : 494 मत कहो आकाश में कोहरा घना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  मत कहो आकाश में कोहरा घना है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

समरथ को नहीं दोष गुसाईं , पैसा हर कमी को ढक देता है , ये बात इक बार फिर से सच साबित हो गई है। हज़ार एकड़ भूमि की फसल को तहस नहस कर देना , कितने पेड़ पौधों को काट देना , नदी किनारे बालू पर निर्माण करना किसी भव्य कार्यक्रम के आयोजन के लिए। किसी नियम की चिंता नहीं , कोई औपचारकता निभाना ज़रूरी नहीं , केवल किसी एक विभाग से किसी तरह इक मंज़ूरी का कागज़ हासिल कर बाकी सभी कुछ भुला देना। आपको कौन रोक सकता था जब आपके  करोड़ों अनुयाई हैं , अरबों का कारोबार फैला हुआ है विश्व भर में , और सत्ताधारी लोग आपके समर्थक हैं। आधुनिक भगवान ऐसे ही पर्यावरण को बचाते हैं। कभी भगवान भी गलत हो सकते हैं , जो उनमें कमी बताये वो पापी है। भगवान प्रेस वार्ता करते हैं दावा करते हैं कि वो तो महान कार्य कर रहे हैं , उनका उपकार मानना चाहिए। मगर क्या करें हमें सावन के अंधों की तरह हर तरफ हरियाली दिखाई देती ही नहीं। कितनी बुरी बात है कलयुगी भगवान को अदालत में जाना पड़ा है और विभाग ने उन पर पांच करोड़ का हर्ज़ाना भरने का हुक्म सुना दिया है , साथ ही पांच लाख जुर्माना उस सरकारी विभाग को भी अदालत ने लगाया जिसने ये सब होने दिया। इक फिल्म क्या बनी ओह माय गॉड , लोग अदालत घसीट ले गए उनको भी जो गुरु ही नहीं जाने क्या क्या कहलाते हैं। मगर देख लो हर गलत काम सही हो गया पैसे से , तभी तो धनवान और ताकत वाले जो मन चाहे करते हैं। ये राशि क्या है उनके लिए , ऐसे आयोजन से उनको इससे कई गुणा फायदा होना है। साबित हो गया पैसा ही सब कुछ है , अगर पैसा नहीं होता तो शायद ये भगवान भी बेबस हो जाते जब उनका आयोजन रोक दिया जाता। जहां तक छवि खराब होने या बदनामी की बात है तो जो प्रचार इस बात से मिला वो भी कम नहीं है। लेकिन अहंकार में डूबे इस संत का कहना है कि हम जुर्माना नहीं भरेंगे चाहे जेल जाना पड़े। वास्तव में ऐसे आयोजन को रद्द किया जाना चाहिए ताकि सबको समझ आये कि कायदे क़ानून सब के लिए हैं। मगर जब देश का प्रधानमंत्री ऐसे आयोजन में शामिल होता है तब समझ आता है कि बड़े लोग वी वी आई पी लोग देश के क़ानून से ऊपर हैं !

                             इस कदर कोई बड़ा हो हमें मंज़ूर नहीं
                             कोई बन्दों में खुदा हो हमें मंज़ूर नहीं।
                             रौशनी छीन के घर घर से चिरागों की अगर
                             चांद बस्ती में उगा हो हमें मंज़ूर नहीं।
                             मुस्कुराते हुए कलियों का मसलते जाना
                             आपकी एक अदा हो हमें मंज़ूर नहीं। 

         कभी इक कथा में ज़िक्र आया था कि इक गुरु और उसके शिष्य जब धर्मराज के सामने पेश हुए तो गुरु को जितनी सज़ा अपकर्मों की मिली अनुयायियों को उससे कई गुणा दी गई , जब पूछा गया किसलिए तो उत्तर मिला कि आप सभी ने जानते समझते हुए उनका साथ दिया जबकि गुरु की शिक्षा थी झूठ का विरोध करें चाहे वो कोई भी हो। आपने गुरु की दी शिक्षा को ही भुला दिया गुरु की जय जयकार करने में। सब से विचत्र बात ये है कि इस देश में नियम क़ानून का पालन नहीं करने या अनुचित कार्य करने पर किसी को कभी नुकसान नहीं होता है। बिजली चुराने पर लगा जुर्माना जितनी राशि की बिजली चोरी की उस से तो कम ही होता है , और बदनाम भी नहीं होते ऐसा कह कर कि सभी करते हैं। क़ानून से डरना और नियमों का पालन करना कमज़ोर लोगों का काम है। बड़े बड़े लोग इनकी परवाह किये बिना आगे बढ़ते जाते हैं , हर कायदे क़ानून को पांवों तले रौंद कर। सरकारी विभाग भी क़ानून लागू करने में नहीं क़ानून तोड़ने से हर बात पर जुर्माना राशि वसूल करने में यकीन रखते हैं। फलां नियम तोड़ने पर इतना जुर्माना , बस पैसे भर कर अवैध को वैध करार करा सकते हैं। इक समझदार बता रहे हैं बड़े लोग कभी जुर्माना भरते नहीं हैं , पांच करोड़ जुर्माना वसूल हो पाये ये ज़रूरी नहीं है , उनके पास विकल्प खुला है जुर्माने के खिलाफ अपील करने का। मगर कोई विभाग उनके जुर्माना नहीं अदा करने पर सख्त कदम नहीं उठा सकता है। इन महान लोगों का आचरण जो भी सभी को मान्य होता है , लोक कल्याण जनहित जैसे शब्दों की आड़ में सभी कुछ छुप जाता है।

           सच सच सभी सच का शोर करते हैं , पूरा सच कोई बताता नहीं , कोई सुनना भी नहीं चाहता, पढ़ना भी कहां चाहते सब लोग , ऐसे में संपादक और प्रकाशक छापने से परहेज़ करें तो गलत क्या है। न जाने कब कैसे कहां किसी का अपना मतलब अपनी सोच अपनी आस्था बीच में आ जाये और विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी को दरकिनार कर दे। देखिये हम किसी की व्यक्तिगत आलोचना को नहीं छापते , बेशक आपकी बात कितनी खरी हो और कितनी ज़रूरी सच को सच साबित करने के लिए। तभी दुष्यंत कुमार कह गये हैं " मत कहो आकाश में कोहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है "। ऐसी हर घटना चर्चा में रहती कुछ दिन को , फिर कोई नया किस्सा कोई फ़साना सुनाई देता है और पिछली बात खो जाती इतिहास बनकर। कोई कभी सोचेगा कि जो भी अनुचित करने लगा हो उसको नहीं करने दिया जायेगा तभी गलत होना बंद होगा , अन्यथा कभी कुछ नहीं बदलेगा और धनवान हमेशा मनमानी करते रहेंगे। काश ऐसे आयोजन को सख्ती से रोकने का साहस कोई करता ताकि औरों को ये सन्देश जाता कि कानून से ऊपर कोई भी नहीं है। ऐसे तो हर कायदे कानून को इक मज़ाक बना दिया जाता है जैसे चंद सिक्कों में बिकता है हर नियम भी। अब किस किस की बात करें , फिर अंत में दुष्यंत कुमार के शेर अर्ज़ हैं।

                         " अब किसी को भी नज़र आती नहीं दरार ,
                           घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार।
                           इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके - जुर्म हैं ,
                           आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार "।

फ़रवरी 14, 2016

POST : 493 प्यार के दिवस पर मेरा खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 प्यार के दिवस पर मेरा खत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं लिख सका आज तलक
किसी को भी मैं कभी
कोई प्रेम पत्र 
किसी की ज़ुल्फों पर
गोरे गालों पर ।

किसी हसीना पर नहीं
तो किसी भोली सी लड़की पर ही
आ ही सकता था
अपना भी दिल सादगी को देख कर भी ।

कोई तो मिल ही जाती
देखता रहता जिसके सपने मैं भी
मुझे भी लग सकती थी कोई फूलों जैसी ।

चांद जैसी सुंदर
कोई समा सकती थी
मेरी भी बाहों में आकर चुपके से ।

लिख सकता था
कोई प्रेम कविता कोई ग़ज़ल किसी पर
किसी के इश्क़ में मैं भी
भुला सकता था सारे जहां को ।

लेकिन नहीं कर सकता था
मैं ऐसा कुछ भी , क्योंकि
मुझे लगता रहा कुछ और
इस से कहीं अधिक ज़रूरी
मेरे सोचने को समझने को
और परेशान होने को हर दिन ।

देश की गरीबी , भूख , शोषण
अन्याय और भेदभाव
समाज का नकली चेहरा
और झूठ का व्योपार होता हुआ ।

जो नहीं हैं वही कहलाने की
हर किसी की चाहत होना
जिधर देखो सभी डूबे हुए
बस अपने स्वार्थ पूरे करने में ।

लोकतंत्र के नाम पर
जनता को छला जाना बार बार
देश में बढ़ता
अमीरी और गरीबी के बीच का अंतर ।

शिक्षा स्वास्थ्य सेवा
समाज सेवा हर किसी का हाल
जैसे हर जगह बिछा हुआ हो
कोई न कोई जाल ।

इन सभी ने रहने नहीं दिया
मुझे कभी चैन से
कैसे लिखता तुम्हें
प्रेम पत्र ये बताओ तुम्हीं मुझे ।

या हो सके तो पूछना उनसे
जो करते हैं ये दावा
कि उनको है मुहब्बत
तुम में से किसी न किसी से
क्या उनको मुहब्बत है
अपने देश से समाज से ।

इंसानों से इंसानियत से
किया है कभी प्यार
है उनके दिल में दर्द
औरों के लिये कोई तड़प
बिना ऐसे एहसास
भला हो सकती है मुहब्बत ।



फ़रवरी 05, 2016

POST : 492 ट्विटर , फेसबुक और व्हट्सऐप वाली सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      ट्विटर , फेसबुक और व्हट्सऐप वाली सरकार ( व्यंग्य ) 

                                     डॉ लोक सेतिया

किसी बच्चे ने पत्र लिखा प्रधानमंत्री जी को और उसकी समस्या का समाधान किया गया ये बात टीवी के समाचार चैनेल पर विस्तार से दिखाई गई । क्या वास्तव में इसको खबर कहते हैं ? चलो खबर वालों से पूछते हैं खबर की परिभाषा क्या है ? परिभाषा ये है कि खबर वो सूचना है जो कोई जनता तक पहुंचने नहीं दे रहा , पत्रकार का फर्ज़ है उसको खोजना , उसका पता लगाना और उसकी वास्तविकता को सभी को बताना । मगर जिस बात का नेता अफ्सर या अन्य लोग खुद डंका पीट रहे हों उसको खबर कैसे कह सकते हैं , अगर ध्यान दो तो आजकल यही छापा जा रहा अख़बारों में और दिखाया जा रहा सभी टीवी चैनेल्स पर । जिनको याद ही नहीं खबर की परिभाषा वो पत्रकारिता और विचारों की अभिव्यक्ति की सवतंत्रता की बातें करते हैं ।
 
   " रास्ता अंधे सब को दिखा रहे
    वो नया कीर्तिमान हैं बना रहे। "

  ऐसी कुछ और भी खबरें हैं , इक महिला रेल मंत्री को ट्विटर पर अपने बच्चे के भूखे होने की बात बताती है रेल में यात्रा करते समय और रेल मंत्री आदेश देते हैं और अगले ही स्टेशन पर अधिकारी दूध लेकर उपस्थित होते हैं । मगर कोई ये नहीं सोचता कि खुद इक मां को पहले ही क्या याद नहीं था कि उसके बच्चे को सफर में भूख लगेगी तो दूध की ज़रूरत पड़ेगी । चलो ऐसा भी किसी से भी हो सकता है । मगर इस खबर से क्या हम उस दर्दनाक घटना को भूल सकते हैं जब कोई यात्री बीच सफर दुर्घटना का शिकार हो जाता है और ट्रैन की चैन खींचने पर ट्रैन नहीं रूकती न ही स्टेशन के कर्मचारी ध्यान देते हैं और किसी यात्री के शरीर के टुकड़े होने के बाद भी और भी रेल गाड़ियां उसको कुचलती गुज़र जाती हैं ।

         शासक यही किया करते हैं , दान के , धर्म के चर्चे हर जगह प्रचारित किये जाते हैं और जहां कर्तव्य नहीं निभाया उसकी कभी बात नहीं की जाती । कोई अपनी समस्या मंत्री जी को व्हाट्सऐप पर बताता है और मंत्री जी सहायता करें ये अच्छी बात है , मगर जिनके पास मंत्री जी का नंबर नहीं हो उनका क्या ? क्या देश में सभी को सभी मंत्रियों के फोन नंबर मालूम हैं । वास्तव में हर दिन जिनसे जनता का वास्ता पड़ता है उन सरकारी अधिकारियों  के फोन कभी मिलते ही नहीं , बहुत दफ्तरों में फोन करो तो बात सुनने की जगह फैक्स से जोड़ देते हैं । जिसको फैक्स नहीं करना हो बात करनी हो वो क्या करें । और जब किसी अधिकारी के दफ्तर का फोन मिल भी जाये तो कौन हैं क्या काम है पूछने के बाद साहब मीटिंग में हैं या अभी आये नहीं ऐसा बताया जाता है ।  एक सौ पच्चीस करोड़ लोगों के देश में कितने लोग हैं जिनको आधुनिक संचार साधनों से अपनी समस्या प्रशासन तक पहुंचानी आती होगी । जब नेता और प्रशासन घोषणा  करता है ऐसी किसी योजना की तब सोचना  होगा क्या ये सभी के लिए सम्भव है । अधिकांश फोन मिलते ही नहीं घंटी बजती है संपर्क टूट जाता है कोई कितनी बार नंबर मिलाता रहे आजकल ये होने लगा है । 
 
 मुझे जनहित के पत्र अख़बारों में , नेतओं को , मंत्रियों को , सभी दलों की सरकारों को लिखते 45 साल हो गए हैं और इस बीच बहुत कुछ बदला है , गंगा यमुना से कितना पानी बह चुका है मगर इन तथाकथित जनता के सेवकों का रवैया नहीं बदला है । उनको आज भी कोई कर्तव्य की याद दिलाये तो बुरा लगता है , ये सभी चाहते हैं लोग उनसे अधिकार नहीं सहायता की भीख मांगे , हर दिन उनका यही दावा होता है कि देखो हमने लोगों की भलाई के लिए क्या कुछ नहीं किया । ये कभी नहीं बताते जो कुछ करना चाहिए था मगर नहीं किया गया उसका क्या हुआ ।

                                          हक नहीं खैरात देने लगे 
                                          इक नई सौगात देने लगे ।
 
 क्या भारत 26 मई से वॉट्सऐप, फ़ेसबुक और ट्विटर पर प्रतिबंध लगाएगा? संभावना  कम, लेकिन मामला पेचीदा है

जनवरी 17, 2016

POST : 491 जल्दी ही आयेंगे खुद भगवान फेसबुक पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  जल्दी ही आयेंगे खुद भगवान फेसबुक पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 आखिर परम पिता परमात्मा को अपनी दुनिया की याद आ ही गई , और नारद जी को फिर से धरती लोक का हाल जानने को भेजा। लेकिन नारद जी ने जो विवरण प्रस्तुत किया उसने भगवान को भी चौंका दिया। इतना अधिक है संसार में फिर भी आधी आबादी भूखी नंगी और बेघर बदहाल है। उस पर ये भी की दुनिया के लोग ऐसा मानते हैं कि ये सभी भगवान की मर्ज़ी से ही है। परमात्मा ने पूछा नारद जी जिनके पास ज़रूरत से अधिक है वो  दूसरों की सहायता क्यों नहीं करते। नारद जी बोले अगर आपके पास हो तो क्या आप दूसरों को बांटना चाहोगे , भगवान बोले बिल्कुल मुझे खुद के लिए क्या चाहिए। नारद जी बोले क्या वास्तव में कुछ नहीं चाहिए अपने लिए , भगवान ने जवाब दिया भला मुझे कुछ भी किसलिए चाहिए , मुझे तो अपनी बनाई दुनिया में रहने वालों की चिंता है कि उनको जो ज़रूरी वो मिल सके। नारद जी ने एक सूचि दी प्रभु को जिसमें तमाम मंदिरों मस्जिदों गिरिजाघरों गुरुद्वारों की जगह, धन  संपत्ति सोने हीरे जवाहारात की कीमत और आय का विवरण था। और पूछा क्या आपको नहीं पता दुनिया में सब से बड़ा जमाखोर खुद आप ही हैं।  ईश्वर दंग रह गये कि ये कैसे हुआ , उन्होंने तो किसी को भी ऐसा करने को नहीं कहा है कभी। किसी भी धर्म में विशाल धर्मस्थल बनवाने की बात नहीं लिखी गई आज तक। हर साधु संत ने संचय नहीं करने का ही उपदेश दिया है और धर्म का अर्थ दीन दुखियों की सहायता करना बताया है।  फिर ये कैसे हो गया और क्यों अभी तक मुझे किसी ने ये सूचना नहीं दी कि मेरे नाम पर इतना अनुचित हो रहा है दुनिया में। नारद जी बोले कौन बताता आपको , जब आपके सभी देवता और देवियां खुद अपना गुणगान करवा प्रसन्न होती हैं चाहे उनका गुणगान लोग श्रद्धा से नहीं दिखावे को आडंबर की तरह करते हों। जब खुद आप भी उनसे अपनी महिमा सुन सुन गद गद होते हैं तब उनको क्या सन्देश मिलेगा। नारद जी की सच्ची और कड़वी बातें सुन भगवान बेचैन हो गए।

           कुछ भी समझ नहीं आया कैसे सब गलत को ठीक किया जा सकता है। परमात्मा ने तुरंत सभी साधु सन्यासी देवताओं देवियों और अवतारों की आपात बैठक बुलाई है। सभी उपस्थित हो गए हैं और नारद जी ने सारी बातें फिर से दोहराई हैं ताकि सभी समझ सकें और सुझाव दे सकें। एक पुराने अवतार ने प्रस्ताव पेश किया है कि खुद भगवान को नया अवतार लेकर संदेश देना होगा कि कोई मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरुद्वारा नहीं बनाओ बल्कि सभी कुछ गरीबों में बांट दो यही वास्तविक धर्म है। मगर जब ऐसा अवतार लेने की बात हुई तो कोई भी तैयार नहीं हुआ क्योंकि सभी को समझ आ गया था कि अब लोगों को धर्म का पालन नहीं करना होता , उनको धार्मिक होने का दिखावा भर करना होता है। सोशल मीडिया में देख कर लगता है मानो सभी इंसान और इंसानियत की कदर करते हैं जब कि वास्तव में ऐसा मात्र औरों को दिखावे को किया जाता है। अभी तो लोग और भव्य मंदिर धर्मस्थल आदि बनवाने की बातें करते हैं और जो विरोध करता हो उसको नास्तिक कह कर प्रताड़ित किया जाता है , अब कोई अवतार जाकर कहेगा कि सभी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर और गुरूद्वारे अपनी जगह और धन सम्पति दीन दुखियों को बांट दें तो जो धर्म ने नाम पर हलवा पूरी खाते हैं वो भगवान के सन्देश को ही धर्म विरुद्ध बताने लगेंगे।  ईश्वर को मालूम है जब भी कोई नानक कोई यीशु कोई साईं बाबा सच्ची बात कहता है उसको कितने कष्ट भोगने पड़ते हैं जीवन में। जब नहीं रहता तभी लोग उसकी बात समझते हैं लेकिन तब भी उनकी दिखाई राह पर नहीं चलते , मात्र उनकी मूर्ति स्थापित कर उनको भगवान घोषित कर देते हैं। बहुत चिंतन करने के बाद परमात्मा ने पुछा क्या मुझे फिर से अवतार लेना चाहिए और अगर लेना है तो कब कहां कैसे। नारद मुनि ने ये कहकर सभी को दुविधा में डाल दिया है कि अब दुनिया में धर्म नाम के कारोबार से फिर इक जंग उसी तरह की जानी ज़रूरी है जैसे समुंद्र मंथन में आमने सामने हुई थी देवों और दैत्यों के बीच , मगर इस बार नतीजा वही हो ये मुमकिन नहीं क्योंकि भगवान से उनका पलड़ा भारी है जो भगवान को बेचते हैं। और उनकी सहायता सरकारें और राजनेता भी करते हैं , धर्म अब आस्था का विषय नहीं रह गया अपितु अपना अपना स्वार्थ सिद्ध करने का साधन भी बन चुका है। लगता है भगवान को खुद को भगवान साबित करना होगा जाकर दुनिया में चाहे इसके लिये सोशल मीडिया , टीवी चैनेल फेसबुक व्हट्सऐप ट्विटर का सहारा लेना पड़े। जल्दी ही फेसबुक पर भगवान का नया अकाउंट खुलने वाला है , ध्यान रखना आप लोग रिक्वेस्ट भेजना भूल मत जाना।

दिसंबर 26, 2015

POST : 490 अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    कुछ समझ नहीं आता हम किस तरफ जाना चाहते हैं। देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है। क्या सरकार का काम कानून का शासन कायम करना है अथवा अपनी सुविधा के अनुसार नियम कायदे कानून बदलना। जनहित का नाम लेकर लूट का कारोबार कब तलक चलेगा। बहुत पहले की बात है मेरे शहर फतेहाबाद में दुकानों की बोली होनी थी , लोग खरीदने को  आये हुए थे , मगर तभी मुख्यमंत्री से मिलकर कुछ लोगों ने वो मार्किट की जगह अपनी बिरादरी की धर्मशाला बनाने को देने को कहा था और बोली रद हो गई थी। ये तब मुख्यमंत्री भी जानते थे की नियमानुसार कमर्सियल जगह नहीं दी जा सकती। मगर कानून को ठेंगा दिखाने का काम हर नेता हर सरकार करती रही है। कम्युनिटी सेंटर की जगह किसी विभाग को देना कैसे सही हो सकता है , जब सरकार ,नेता प्रशासन खुद ही कानून का पालन नहीं होने देना चाहते , न्यायलय कहता रहे आप रिहायशी कोठियों में कारोबार होने देते हैं , तब कुछ भी सही भला कैसे हो सकता है।

         हरियाणा में पिछली सरकार ने सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को ज़मीन का मालिकाना हक दे दिया था , अंधा बांटे रेवड़ियां की तरह। अब नई सरकार ने ऐलान किया है जो कई सालों से किराये पर बैठे हैं उनको दुकानों की मलकियत दे दी जाएगी। शायद आपको लगे की ऐसा गरीबों की भलाई करना होगा , जो वास्तव में नहीं है। इतने सालों में दुकान जाने कितने लोगों से कितने लोगों में बदलती रही और कभी एक ही के नाम पर चलती रही कागज़ों में और धंधा कोई और ही करता रहा , जाने कितने लोग पगड़ी का पैसा लेकर जाते रहे और बहुत लोग हैं जिनको उन दुकानों की ज़रूरत ही नहीं काम करने को , उनकी खुद की कितनी ही दुकानें हैं , असलियत कुछ और ही है। नेता लोग रिश्वत खाकर ये सारे काम करते हैं रिश्वत देने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए।

                  कौन देखता है वास्तव में किसको ज़रूरत है सहायता की और सरकार किन लोगों की सहायता करती है , बस इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं। मेरे इक भाई जो ठेकेदारी करते थे कहते थे की सरकार और माँ से जितना ले सको लेना उचित है , सरकारी घी मुफ्त मिलता हो तो पास बर्तन नहीं भी हो औंगौछे में डलवा लेते हैं , चाहे रिस जाये फिर भी जो चिकनाई बच जाएगी वही सही। ऐसे हो हो रहा है और जिनके पास है उनको ही और और मिलता जाता है , जिनके पास कुछ नहीं वो हमेशा खाली हाथ रहते हैं। ये देख कर लगता है गरीबों की गरीबी तब तक नहीं मिटेगी जब तक उनको सरकारी गोदामों में कोई रास्ता तलाश करना नहीं आता। अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा। 

 

नवंबर 01, 2015

POST : 489 ज़िंदगी चाहती है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      ज़िन्दगी चाहती है ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

चाहती है ज़िंदगी
अभी शायद
और बहुत कुछ दिखाना
तभी चलते चलते
थोड़ा सा थामकर
कहती है बार-बार
सोचो देखो समझो
क्या है हासिल
और हर विपति मुझे
कुछ और ताकत
देकर जाती है हमेशा ।

मालूम होता है तभी
कौन कैसा है अपना-पराया
जो नहीं जान सकते थे
बर्सों में भी हम
ज़िंदगी का कठिन दौर
दिखा देता है ,
समझा देता है
चंद ही दिनों में ।

नहीं सोचता हूं मैं
जीना है कब तलक
न कोई डर है मौत का
मगर चाहता हूं
समझना अपने जीवन की
सार्थकता
नियति ने जो भी तय
किया होगा मेरा किरदार
मुझे निभाना है उसे
निष्ठा से इमानदारी से ।
 

 

सितंबर 13, 2015

POST : 488 हिंदी है माथे की बिंदी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       हिंदी है माथे की बिंदी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   हिंदी दिवस मनाने वाले हैं , पुराना राग सुनाने वाले हैं , हलवा-पूरी खाने वाले हैं , श्राद्ध पक्ष बताने वाले हैं , जाने किस किस को समझाने वाले हैं , रूठने और मनाने वाले हैं , अपना खेल दिखाने वाले हैं , हंस हंस कर रुलाने वाले हैं , रो रो कर भी हंसाने वाले हैं , रेवड़ियां खरीद कर लाने वाले हैं , दूर से सबको दिखाने वाले हैं , खुद ही सारी खाने वाले हैं , रहते अंग्रेजी शहर में साल भर घर अब वापस आने वाले हैं , हिंदी को बहलाने वाले हैं।

    छोटा हमें बतायेंगे वो , अपना रौब जमायेंगे वो , नई किताबें लायेंगे वो , फिर सम्मान-पुरुस्कार पायेंगे वो , हिंदी हिंदी इक रोज़ गायेंगे वो , भाषा को बचायेंगे वो , महत्व मात्र भाषा का औरों को समझायेंगे वो , खुद नहीं अपनायेंगे वो , व्यथा अपनी सुनायेंगे वो , नहीं यहां रह पायेंगे वो , बस आयेंगे और जायेंगे वो।
किताब हम भी कोई छपवाते , समीक्षा मित्रों से लिखवाते , बार-बार विमोचन करवाते , काश राजधानी को जाते , किसी प्रकाशक को भी मनाते , बिना मोल जब कोई न छपता कीमत देकर खुद छपवाते , तब जुगाड़ कोई भिड़वाते , खबर अख़बारों में छपवाते , कोई पुरुस्कार झटक कर लाते , खुद ही उसका मोल चुकाते , और फिर पाकर के इतराते।

    कुछ दिन की हैं बातें सारी , खत्म नहीं होती कभी ये बीमारी , कल उनकी आज अपनी बारी , हम खेलेंगे अपनी बारी , कुर्सी जब मिल गई सरकारी , थे जो कल तलक दरबारी , वही बने हैं आज अधिकारी , है पैसे की मारा मारी , बना है लेखक भी व्योपारी। मिल कर जीजा मिल कर साला , लाएंगे इक नया उजाला , तुमने अब तक हमको पाला , अब हमने तुमको संभाला , लगा हुआ था घर पर ताला , साफ होगा अब सारा जाला , तुम भी इसको पढ़ लो खाला , भैंस बराबर आखर काला , देख के मछली जाल है डाला , बहता है बरसाती नाला। गीत विदेशी भाषा के जो गायें , फिर उन्हीं को मुख्य-अतिथि बनायें , जो दे जायें सब खा जायें , लिख-लिखवा कर जो ले आयें , उसको पढ़ते नहीं घबरायें , सबको भाषण से बहलाएं , शब्द अंग्रेजी के दोहरायें , जब समझ हिंदी को न पायें , जिनको हमने पाल अब तक वही हमीं पर गुर्रायें , उनकी बातें समझ न पाएं , फिर भी ताली खूब बजायें , जो खुद सभा में देर से आयें , समय बहुमूल्य हमको बतायें , पहले आयें -पहले पायें।

              हर वर्ष वही तमाशा , न अधिक तोला न कम माशा , जाने है ये कैसी आशा , जो लगती जैसे निराशा , हिंदी का पेट है खाली लिखने से नहीं मिलती रोटी , उनको लगती है बताशा , हैं जो चौसर के खिलाड़ी  , जीत लेते वो हर पासा। अपने भी हालात अब बदलें , हिंदी के दिन रात अब बदलें , दुनिया बदली हम भी बदलें कभी दिल के जज़्बात अब बदलें , खाली बातों से नहीं कुछ हासिल अपनी हर इक बात अब बदलें , गीत भी अपना हो धुन भी अपनी , कुछ अपनी आवाज़ अब बदलें।

                बिन माँ-बाप की बेटी है हिंदी , अंग्रेजी संग ब्याह रचाया , बनी रही इक अबला नारी , पति को परमेश्वर जो बनाया , हाथ जोड़ खड़ी है रहती , कुछ भी फिर भी हाथ न आया , भीख ही मिलती बस कहने को , नहीं कभी अधिकार को पाया , नहीं सरस्वती मां की कद्र कोई भी , कहने को है दीप जलाया , घर दफ्तर में लक्ष्मी की पूजा करना , सभी को यही है भाया , सरस्वती पुत्र दर दर खाते ठोकर , कैसी है प्रभु की माया , चलो वही तस्वीर सजायें , इक दिन हिंदी का है आया , लेकिन अब इसको भूल न जाना , किस खातिर है ये दिन मनाया। फिर से सबका गुरूर हो हिंदी , चाहत का सिंधूर हो हिंदी , परचम बने आंचल हिंदी का अब , हिंदी चमके बनकर देश के माथे की बिंदी।

अगस्त 18, 2015

POST : 487 मुझे जन्म देने से पहले , माँ ! ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 मुझे जन्म देने से पहले , माँ ! ( आलेख )  डॉ लोक सेतिया 

     यही अच्छा है कि मुझे अभी मार डालो , अपनी कोख में ही कर दो मेरे जीवन का अंत , अगर पाल-पोस कर बड़ी होने पर सालों बाद मार ही देना है , इस अपराध के लिये कि मैं अपनी इच्छा से जीना चाहती हूं , जिसको पसंद करती उसी से विवाह कर खुश रहना चाहती हूं , जाति - मज़हब की सीमा को नहीं मानती। अगर तब कानून से नहीं डरना , न ही इंसानियत की परवाह करनी है तो अभी भी क्यों संकोच करते हैं। कल अगर अपने झूठे मान सम्मान और अहंकार के लिये मुझे सूली चढ़ाना है तो मुझ पर उपकार कर दो , मुझे जन्म ही न लेने दो। आपके इस दकियानूसी समाज का यही चलन रहा तो हम बेटियां खुद ईश्वर से प्रार्थना करेंगी कि हमें नहीं जन्म दे ऐसे समाज में। जो समाज हैवानियत का नंगा नाच करने पर शर्मसार नहीं होता बल्कि शान से सिर उठाकर चलता है , उसमें बेटी बन जन्म लेना तिल तिल करके मरना है। उस समाज में बेटी , बहन , बहु क्या माँ तक का कोई स्थान नहीं हो सकता , उसे तो नारीविहीन होना चाहिए ताकि उसका अंत हो सके। जब बेटियां जन्म ही नहीं लेंगी तो वो समाज कब तक बचा रहेगा। मुझे ऐसे समाज से कुछ प्रश्न पूछने हैं।

    जिस धर्म , जिस इतिहास की आप बातें करते हैं , जिनपर कहते हैं गर्व है , क्या उसमें किसी ने प्यार नहीं किया था , प्रेम विवाह नहीं होते रहे , कन्या ने अपने वर चुनने के अधिकार का उपयोग नहीं किया था। किस किस को मिटाना चाहोगे , मीरा को , राधा को , कबीर के दोहों को , रहीम के दोहों को किताबों से नहीं जन जन के दिल से कैसे मिटा पाओगे। इक ताजमहल को ही नहीं और  तमाम प्रेम के स्मारकों को ध्वस्त करना होगा , कितने ही धर्म-स्थल को तोड़ना होगा , प्यार का नामो निशां मिटाना है अगर। खुद मिट जाओगे , नहीं मिटा सकोगे।

                आज मुझे हर समाज की , दुनिया भर की महिलाओं से इक बात कहनी है , जो माँ बनना चाहती हैं , बनने जा रही हैं। क्या आज जिसे अपनी कोख में पाल कर सृजन की अनूठी प्रसन्नता को हासिल करने का सौभाग्य प्राप्त कर रही हैं , कल अपने ही हाथों से झूठे रीति रिवाज़ों के नाम पर उसका अंत करना चाहेंगी।
ईश्वर ने तुम्हें मातृत्व का सुख इसलिए नहीं दिया कि तुम जब चाहो अपने ही अंश को मिटा दो। माँ बनना आसान नहीं है ममता का फ़र्ज़ निभाना होगा जीवन प्रयन्त।  बेटी को जन्म देना चाहती हैं तो संकल्प लें उसकी रक्षा करने का। माँ के नाते को समझे बिना माँ बनने की भूल नहीं करना। मेरी ही नहीं हर बेटी की हर माँ से यही विनती है , वो बेटियां जो जन्म ले चुकी हैं और वो भी जो अभी जन्म नहीं ले पाई। 

 

अगस्त 16, 2015

POST : 486 सुनो मेरी कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

               सुनो मेरी कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

मैंने कुछ भी नहीं जोड़ा न ही कुछ कम किया , उस बेचारी डेमोक्रेसी नाम की महिला की बात सच सच लिख दी। क्या लिखता कौन दोषी है कौन निर्दोष , ये पढ़ने वालों पर छोड़ दिया , मुझे समझ नहीं आया इसको क्या शीर्षक दूं , इसलिये बिना किसी शीर्षक ही कहानी लिख दी। पढ़ते ही वो गंभीर हो गये , कहने लगे समस्या बहुत विकट है , तुम नहीं जानते बिना शीर्षक की कहानी का क्या हाल होता है। शीर्षक ही तो पढ़ने को मज़बूर करता है। बिना शीर्षक की कहानी तो कटी हुई पतंग की तरह है , छीना झपटी में ही फट जाती है , किसी के भी हाथ नहीं लगती।  या जिसके हाथ लगे वही मनमानी कर लेता है उसके साथ। ऐसी पतंग से कोई सहानुभूति नहीं जताता , क्या तुम चाहते हो तुम्हारी कहानी की ऐसी दशा हो देश की जनता जैसी। नहीं चाहते तो जाओ कहीं से कोई लुभावना सा शीर्षक तलाश करो जो बाज़ार में बिक सकता हो , फिर उसको कई गुणा दाम पर बेचो। ठीक वैसे जैसे मोदी जी का स्लोगन , अच्छे दिन आने वाले हैं , ऐसा भाया जनता को कि उनको जितना मांगते थे उससे भी बढ़कर बहुमत मिल गया।  ये सबक अरविन्द केजरीवाल को भी समझ आया और नतीजा देख लो , कहां उनको उम्मीद थी इतनी सफलता की। जब तक खुद अपनी कीमत बड़ा चढ़ा कर नहीं बताओगे , कोई इक धेला भी नहीं देगा। तुम जानते हो लोग अपनी आत्मकथा औरों से लिखवाते हैं , सभी को कहां लिखना आता है , ऐसे लेखक अपनी कीमत पहले वसूल लेते हैं दोगुनी , क्योंकि उनका नाम तो होता नहीं लिखने वाले के रूप में। अपने दुखों को बेचना तो बड़े बड़े लेखकों का काम रहा है , ऐसी मनघड़ंत कहानियां पुरुस्कार अर्जित किया करती हैं। इस तुम्हारी कहानी में न कहीं कोई नायक है न ही कोई खलनायक ही , कोई नाटकीयता भी नहीं , कोई सस्पेंस भी नहीं।  कोई प्रेम प्रसंग नहीं , न ही अवैध संबंध की ही बात। सब किरदार जैसे आस पास देखे हुए से लगते हैं , लोग , पाठक-दर्शक तो जो नहीं होता वही तलाश करते हैं। देख लो इन दिनों फिल्मों में नायक वो वो करते हैं जो नहीं किया जाना चाहिए , फिर भी लोग वाह-वाह करते हैं। अब तो खलनायक ही लोगों को अधिक भाते हैं। हर कहानी में ये सभी मसाले होने ज़रूरी हैं , वरना कहानी नीरस हो जाती है। लोग फिल्म देखते हैं या कहानी पढ़ते हैं तो रोमांच के लिए , न कि किसी विषय पर चिंतन करने को।  ये काम सभी औरों के लिए छोड़ चुके हैं , यार छोड़ , मस्त रह , मौज मना , ये सोच बना ली गई है।

          बिना मिर्च मसाले का फीका खाना तो लोग मज़बूरी में डॉक्टर के कहने पर भी नहीं खाते आजकल , तुमने कभी होटल रेस्टोरेंट का खाना खाया है , बड़े बड़े पांचतारा होटल का खाना न भी खाया हो , फिल्मों में , टीवी सीरियल में तो देखा होगा। कितना सुंदर लगता है , सजा कर परोसा जाता है , किसकी मज़ाल है जो उसको अस्वादिष्ट बता दे। कोई बताये तो लोग कहते उसको मालूम ही नहीं कांटिनेंटल खाना किसे कहते हैं। तुम्हारी कहानी कोई स्कूल की किताब में शामिल थोड़ा है जो पढ़नी ही होगी , कोई मुख्यमंत्री भी नहीं रिश्तेदार कि उसके प्रभाव से प्रकाशक तगड़ी रॉयल्टी देकर भी छापना चाहे। कहानी का नाम ही ऐसा रखो कि लगे कि ऊंचे दर्जे की कहानी है , अक्सर लोग जो कहानी समझ नहीं पाते उसको ऐसी समझते हैं। इक और बात जान लो , जिन कहानियों का प्रचार किया जाता है सच्ची घटना या किसी के जीवन पर है , उनमें सबसे ज़्यादा झूठ होता है। झूठ को कल्पना से मिला कर उसको बेचने के काबिल बनाया जाता है , कहानी का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है , अपनी इस कहानी को आधुनिक रूप दे दो , अच्छे अच्छे डॉयलॉग शामिल करो , खुद न लिख सको तो डॉयलॉग राइटर से लिखवा लो , या चाहो तो फिल्मों से टीवी सीरियल से अथवा पुरानी किताबों से चोरी कर लो , कोई नहीं रोकने वाला। जहां कहानी दुःख दर्द से बोझिल होती लगती है , वहां साथ में थोड़ा हास्य रस का समावेश कर दो , जैसे अभिनेता चुटकुले सुना देते हैं हंसाने को। शृंगार रस की कोई बात ही नहीं कहानी में , जैसे भी हो कोई दृश्य ऐसा हो कि पाठक - दर्शक फ़ड़फ़ड़ा उठें। कहानी में सभी की रूचि का ध्यान रखना है , आगे क्या होगा ये प्रश्न मत छोड़ो , अंत ऐसा हो कि  लोग वाह वाह कह उठें। ऐसा अंत सभी गलतियों को छुपा लेता है। अब बाकी रह जाता है किताब को या कहानी को आकर्षक ढंग से पेश करना , तो ये काम तुम संपादकों पर छोड़ दो , वे कहानी में से निकाल कर कुछ खूबसूरत शब्द ऐसे मोटे मोटे अक्षरों में छापेंगे कि  देखने वाला पढ़ने को उत्सुक हो जाये। जैसी मैंने समझाया वैसी कहानी लिखो तभी उसको अख़बार , पत्रिका , प्रकाशक छापेंगे।  लगता है मेरी कहानी अनकही अनसुनी ही रहेगी।

अगस्त 13, 2015

POST : 485 सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

    सब लूटने - सब बेचने की आज़ादी  ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

      जाने क्यों मुझे लगा कि फेसबुक पर "बात महिला जगत की" पेज पर महिलाओं की बात लिखनी है तो कुछ पत्रिकाएं जो विशेषकर महिलाओं की कहलाती हैं को पढ़ना उपयोगी हो सकता है। और मैं अखबार - पत्रिकाएं बेचने वाले से ऐसी पत्रिकाएं खरीद लाया। जब पढ़ा उनको तो पता चला कि औरत को न तो खुद को कैसे ज़िंदा रखे इसकी चिंता है आज जब सुनते हैं छोटी छोटी बच्चियां तक वहशी लोगों की हवस का शिकार हो रही प्रतिदिन , न ही उसको और कोई गंभीर समस्या। पत्रिकाओं से पता चला कि आज की औरत की सब से बड़ी समस्या है कैसे उनका रंग गोरा हो सकता है , कैसे वो स्लिम हो सकती हैं , कैसे उनको नया फैशन अपनाना है , उनको मेहंदी कैसे लगानी हाथों पर , कौन सा इत्र , कौन सा दुर्गन्ध नाशक इस्तेमाल करना है , कैसे घर को कीमती चीज़ों से सजाना है। कहीं नहीं लगा कि उसको भूख की गरीबी की , खुद पर हो रहे अन्याय - अत्याचार की भी कोई समस्या है। अधिक नहीं तो 60 से 7 0 प्रतिशत महिलाओं की , जो खेतों में - घरों में दिन रत काम करती रहती , जो मज़दूरी करती हैं , जो सड़कों - गलियों से कूड़ा एकत्र कर बेच कर अपना और अपने बच्चों का पेट भरती हैं , जो हर जगह प्रताड़ित की जाती रहती हैं , डरी सहमी रहती हैं , उनकी एक भी बात मुझे नहीं मिली पढ़ने को।  लगा जो समाज मैं देखता हूँ आस पास वो तो यहां कहीं है ही नहीं , न जाने ये कहां की महिलाओं की बात है। मगर उन्हीं को दोष देना उचित नहीं है , यहां धर्म वालों को लोगों को धर्म क्या है , उस पर कैसे चलना है , नहीं सिखाना , उनको धर्म को बेचना है ताकि वो नाम शोहरत और दौलत कमा सकें।  कोई शिक्षा का कारोबार करता है , कोई स्वास्थ्य सेवाओं को बेचने में लगा है , मीडिया-पत्रकारिता की बात और सच्चाई की बात करने वाले , सच को नहीं तलाश करते वो सच का लेबल लगा कुछ भी बेच रहे हैं। पैसा कमाना ही एकमात्र उद्देश्य बन गया है सभी का। समाजसेवा तक एन जी ओ बना कर की जाती है ताकि सरकार से देश विदेश से चंदा लेकर जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकें। अब कोई आपकी पहचान का अफ्सर या विधायक - सांसद  बन गया तो उस से सरकारी धन अपने लिये पाने का ये आसान रास्ता है , इन जी ओ बना लो ! खास बात है सभी शीशे के घर में रहते हैं , कौन दूसरे को गलत बता सकता है। ये जो नेता उपदेश देते हैं आपको त्याग करने का औरों के लिये , आप सब्सिडी नहीं लो तो किसी और को देंगे , उनसे कोई पूछे तो कि देश में सब से बड़े परजीवी कौन हैं , आप नेता लोग जिनको इस गरीब देश से सभी कुछ चाहिए। जाते हैं गांधी जी की समाधि पर फूल अर्पित करने , की चिंता सब से दरिद्र की , भाषण देते हैं देशभक्त शहीदों का नाम लेकर , क्या यही सपना था उनका कि आप शासक बन राजसी शान से रहो और यहां हज़ारों लोग गरीबी से तंग आकर ख़ुदकुशी करते रहें। 

       क्या कहोगे कि ख़ुदकुशी का गरीबी से कोई ताल्लुक नहीं , चलो नरेंदर मोदी जी की सरकार के पहले साल के ये आंकड़े देखते हैं  , जिन लोगों ने आत्महत्या की उनकी आमदनी क्या थी , देखें :-

91820 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से कम थी।

35405 जिनकी वार्षिक आय एक लाख से पांच लाख तक थी।

3656 जिनकी वार्षिक आय पांच लाख से दस लाख तक थी।

785 जिनकी वार्षिक आय दस लाख से अधिक थी।

       ( अब भूख से मरने वालों की गिनती तो कोई करता ही नहीं , 
               उसको तो किसी रोग से मरना बताते हैं )

      पंद्रह अगस्त को आज़ादी का जश्न कौन लोग मनाते हैं , कितने गरीब शोषित , गलियों में भीख मांगते बच्चे , रोज़ काम की तलाश में भटकने वाले युवा , और भी बदनसीब हैं जिनको अभी आज़ादी का अर्थ तक नहीं मालूम।

अगस्त 04, 2015

POST : 484 महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल ( शायर मजाज़ लखनवी से डॉ लोक सेतिया "तनहा" तक )

            महिला जगत के लिये , पैगाम-ए-ग़ज़ल 

     ( शायर  मजाज़ लखनवी से डॉ  लोक सेतिया "तनहा" तक )

                        मजाज़ लखनवी जी  की  ग़ज़ल :- 

                    हिजाबे फ़ितना परवर अब हटा लेती तो अच्छा था ,
                  खुद अपने हुस्न को परदा बना लेती तो अच्छा था।

                   तेरी नीची नज़र खुद तेरी अस्मत की मुहाफ़िज़ है ,
                   तू इस नश्तर की तेज़ी आज़मा लेती तो अच्छा था।

                    तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत ,
                    तू अपने सर से ये बादल हटा लेती तो अच्छा था।

                     दिले मजरूह को मजरूहतर करने से क्या हासिल ,
                     तू आंसू पौंछकर अब मुस्कुरा लेती तो अच्छा था।

                     तेरे माथे का टीका मर्द की किस्मत का तारा है ,
                     अगर तू साज़े बेदारी उठा लेती तो अच्छा था।  

                       ( साज़े - बेदारी = बदलाव का औज़ार )

                      तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन ,
                      तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था ।





   ये शायद गुस्ताखी है कि ऐसे शायर के इतने लाजवाब कलाम के बाद ये नाचीज़ अपनी नई लिखी ताज़ा ग़ज़ल सुनाये।  मगर ऐसा इसलिये कर रहा हूं कि मुझे भी वही पैगाम आज फिर से दोहराना है , अपने अंदाज़ में।  पढ़िये शायद आपको कुछ पसंद आये :::::::

                         ग़ज़ल डॉ लोक सेतिया "तनहा"

                      ज़माने को बदलना है , नई दुनिया बसाना है ,
                      उठा कर हाथ अपने , चांद तारे तोड़ लाना है ।

                      कभी महलों की चाहत में भटकती भी रही हूं  मैं ,
                      नहीं पर चैन महलों में वो कैसा आशियाना है ।

                      मुझे मालूम है तुम क्यों बड़ी तारीफ करते हो ,
                      नहीं कुछ मुझको देना और सब मुझसे चुराना है ।

                     इसे क्या ज़िंदगी समझूं , डरी सहमी सदा रहती ,
                     भुला कर दर्द सब बस अब ख़ुशी के गीत गाना है ।

                      मुझे लड़ना पड़ेगा इन हवाओं से ज़माने की ,
                       बुझे सारे उम्मीदों के चिरागों को जलाना है ।

                     नहीं कोई सहारा चाहिए मुझको , सुनो लोगो ,
                    ज़माना क्या कहेगा सोचना , अब भूल जाना है ।

                      नहीं मेरी मुहब्बत में बनाना ताज तुम कोई ,
                  लिखो "तनहा" नया कोई , हुआ किस्सा पुराना है ।

                                ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )   
 

 

जुलाई 25, 2015

POST : 483 है तो बहुत कुछ और भी बताने को , हो अगर फुर्सत कभी ज़माने को ( आलेख ) - डॉ लोक सेतिया

 है तो बहुत कुछ और भी बताने को  हो अगर फुर्सत ज़माने  को 

                             ( आलेख )   डॉ लोक सेतिया                    

     कभी कभी सोचता हूं क्या अच्छा होता है , खुश रहना , मौज मस्ती करना , मुझे क्या हर बुराई को देख यही सोचना या फिर उदास होना देख कर कि देश समाज कितना झूठा कितना दोगला और कितना संवेदनाहीन हो चुका है। कोई सत्येंदर दुबे मार दिया जाता है भ्र्ष्टाचार के बारे पत्र लिखने के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को , क्योंकि वो पत्र लीक हो जाता है देश के प्रधानमंत्री कार्यालय से। नहीं ये अकेली घटना नहीं है , ये हर दिन होता है। हज़ारों पत्र लिखे जाते हैं मुख्यमंत्रियों को अधिकारियों को जो रद्दी की टोकरी में फैंक दिये जाते हैं। हमारा समाज देखता तक नहीं उनको जो चाहते हैं बंद हो ये सब , कोई दुष्यंत कुमार अपनी बात ग़ज़ल में बयां करता है तो कोई दूसरा लिखने वाला व्यंग्य या कहानी में। सोचता है कोई , समझता है कोई। हां जब कोई शोर मचाता है लोकपाल के लिये आंदोलन का या कुछ भी बताकर और खबरों में छा जाता है हम उसको मसीहा मान लेते हैं। हम क्यों देखें कि इनमें कौन क्या है , इक वो है जो आयकर विभाग से वेतन लेकर विदेश पढ़ने को जाता है मगर वापस आकर नियमों का पालन नहीं करता कि अब उसको दो साल विभाग को अपनी सेवायें अनिवार्य रूप से देनी हैं। इतना ही नहीं वो विभाग से लिया क़र्ज़ भी तब तक लौटने को तैयार नहीं होता जब तक चुनाव लड़ने को ऐसा करने को मज़बूर नहीं होता। क्या यही ईमानदार है , या फिर इनका दूसरा साथी जो कहने को शिक्षक है , वेतन पढ़ाने का पाता रहता है मगर काम कोई और ही करता है मीडिया में जुड़कर। ये सब अवसरवादी लोग सत्ता हासिल करते ही उन्हीं के जैसे हो जाते जिनको कोसते थे पानी पी पी कर। अब उनको एक ही काम ज़रूरी लगता है विज्ञापनों द्वारा खुद को महिमामंडित करना।

             चलो उनको छोड़ औरों की बात करते हैं , पिछली सरकार ने हर विधायक को मंत्री-मुख्य संसदीय सचिव बना रखा था , उसका विरोध करने वाले अब खुद वही कर रहे हैं। हरियाणा में जो पहली बार विधायक बने उनको भी कुर्सी मिल गई , किसलिये ? क्या प्रशसनिक ज़रूरत को , कदापि नहीं , ताकि वो भी अपना घर भर सकें। और मोदी जी क्या करना चाहते हैं , किन लोगों की चिंता है ? देश की इक तिहाई जनता जो भूखी रहती है आपको उसकी ज़रा भी चिंता है , लगता तो नहीं।  किसानों की बात भी ज़रूरी है , मगर मोदी जी मिलते हैं अमिताभ बच्चन जी जैसे किसानों से , कोई गांव का किसान भला मिल सकता किसी ज़िले के अफ्सर से भी , मंत्री की बात तो छोड़ो।  मिल कर भी क्या होगा , ये सत्ता पर काबिज़ होते ही भीख देना चाहते हैं उनको जो वास्तव में देश की मालिक है जनता। मोदी जी तो इक कदम आगे बढ़कर अब सब्सिडी को छोड़ने को कहते हैं ये वादा कर कि किसी और को देंगे। ये नेता और इनके वादे , प्रचार पर पैसा बर्बाद करने वाले क्या जानता ये पैसा जिनका है वो भूख से मर रहे हैं , ख़ुदकुशी करने वाले किसानों को मोदी जी के मंत्री नपुंसक और असफल प्रेमी बताते हैं निर्लज्जता पूर्वक।  शर्म करो। बात आम आदमी पार्टी की हो या भाजपा की , जो कांग्रेस किया करती थी अपनों के अपकर्मों पर खामोश रहना वही ये भी करते हैं। किसी शायर का इक शेर याद आया है :-
                 " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला ,
                   मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। "

                  चलो इक और बात की जाये , बेटी बचाओ की बात , बेटी के साथ सेल्फ़ी की बात , अखबार भरे पड़े हैं तस्वीरों से , मुस्कुराती हुई।  वो जो कचरा बीनती फिरती हैं , कौन हैं ? वो जो घर घर सफाई बर्तन साफ करने का काम करती वो कौन हैं , इक सेल्फ़ी भी उनकी नहीं जिनके हिस्से कुछ भी नहीं है।  चलो छोड़ो उनका भाग्य ऐसा मानकर , मगर जिनकी सेल्फ़ी देख रहे हैं उनको क्या सब अधिकार मिलेंगे।  ये पूछना उस पिता से क्या उसको बेटे के बराबर सम्पति में हिस्सा दोगे ?

                सरकार बदलती है , तरीका नहीं बदलता , दिखाने को खिलाड़ियों को करोड़ों के ईनाम , असल में बच्चों को खेलने देने को समय नहीं न ही सुविधा। हरियाणा में किसी खिलाड़ी को स्कूल बनाने को ज़मीन , किसी को नौकरी भी पुरूस्कार भी। जब वक़्त आता देश के लिये पदक लाने का तब बिक जाते हैं खिलाड़ी बाज़ार में महंगे दाम पर। अब अदालत ने पूछा है हरियाणा सरकार से वो क्या कर रही थी जब सरकारी नौकरी पर नियुक्त खिलाड़ी विज्ञापन कर रहा था बिना अनुमति प्राप्त किये। लो इक नई खबर , वही पुराना तरीका , हरियाणा में अपने ही वरिष्ठ मंत्री , नेता को उन्हीं के विभाग के कर्यक्रम में नहीं बुलाना या समझ लो ऐसे बुलाना जैसे न आने को , फिर उसकी जासूसी करते सी आई डी वाले।  क्या डर है इनको , अगर सच ईमानदारी से देश सेवा करनी तो कोई आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। पर्दादारी की ज़रूरत तभी होती है जब राज़ होते हैं छुपाने को। 

 

जुलाई 12, 2015

POST : 482 आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की दशा कैसी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

      आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली की दशा कैसी ( आलेख ) 

                             डॉ लोक सेतिया

    कभी लगता है की जैसे सच में हमारी आयुर्वेदिक पद्धति फिर इक बार लोकप्रिय हो रही है , जबकि ये सही नहीं है। आयुर्वेद के नाम पर कुछ लोग दवाओं का कारोबार ज़रूर कर रहे हैं और खूब मुनाफा कमा रहे हैं , लेकिन वास्तव में वो आयुर्वेद का कोई भला नहीं कर रहे , उसका दुरूपयोग ही कर रहे हैं ! वे लोगों को रोगमुक्त करने को कोई दवा नहीं बना रहे , बनाते हैं कुछ दवायें जिनसे उनको मनचाहा मुनाफा मिल सके ! जैसे सुंदरता बढ़ाने का दावा करने वाली क्रीम या मोटापा दूर करने वाली दवायें ! यौवनशक्ति वर्धक दवायें या कोई लंबे बाल करने और गंजापन दूर करने की दवा ! यहां मुझे ये सवाल नहीं पूछना की वो कितनी कारगर हैं या मात्र धोखा हैं ! जो सवाल करना है वो उनसे भी और खुद अपने आप से भी करना है , वो ये कि क्या हम जानते हैं आयुर्वेदिक पद्धति का अभिप्राय क्या है ! ये पैसा बनाने का कोई कारोबार नहीं है , ये वो मानव कल्याण का मार्ग है जिसमें विश्व में सभी के स्वास्थ्य की कामना की गई है !आप आयुर्वेदिक दवाओं को मात्र कोई उत्पाद समझ नहीं बना और बेच सकते अपने लाभ के लिये ! आजकल जैसे आयुर्वेदिक दवाओं को विज्ञापन द्वारा प्रचार से या कुछ लोग अपनी शोहरत का उपयोग कर शहर-शहर फ्रैंचाइज़ी बेच कर रहे वो तो इक छल है आयुर्वेद के साथ। वास्तव में किसी भी पद्धति में ऐसे उपचार नहीं किया जा सकता न ही किया जाने दिया जा सकता है। ये तो लोगों के जीवन से खिलवाड़ करना है जिसको प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता , लेकिन खेद की बात है स्वास्थ्य विभाग ऐसा होते देख कोई कदम नहीं उठा रहा , खामोश रह सब होने दे रहा है।
 ये धारणा गल्त है कि हर दूसरा आदमी आयुर्वेदिक जानकार हो सकता है , अख़बार में विज्ञापन देकर या टीवी चैनेल पर रोगों का निदान और उपचार बताना अनुचित ही नहीं कानून के अनुसार भी अपराध है , और चिकत्सा क्षेत्र से तो धोखा करना है ही। पद्धति जो भी हो सब से महत्वपूर्ण होता है इक योग्य चिकित्स्क का होना जिसने ज्ञान , शिक्षा और प्रशिक्षण प्राप्त किया हो अर्थात क्वालिफाइड हो। सही निदान वही कर सकता है और निर्धारित करता है किसको क्या दवा दी जानी चाहिए।

                आपको आयुर्वेदिक ईलाज उसी चिकित्स्क से ही करवाना चाहिये , एलोपैथी हो , होमियोपैथी चाहे आयुर्वेदिक प्रणाली सभी में स्नातक कोर्स होते हैं , जिसमेंचिकित्सा के बहुत सारे विषय पढ़ाये जाते हैं , आयुर्वेद हज़ारों साल पुरानी प्रणाली है मगर यहां भी , द्रव्य-गुण , रोग-निदान , काया-चिकित्सा , शल्य-चिकित्सा , बाल-रोग , इस्त्री रोग जैसे तमाम विषय हैं पढ़ने को ! मगर आज भी लोग एक चिकित्स्क में और नीम हकीम में भेद करना नहीं जानते , तभी किसी से भी अपने स्वास्थ्य के बारे राय ले लिया करते हैं। अस्पताल में काम करने वाला हर कर्मचारी चिकित्सक नहीं हो सकता , बेशक वो इक अंग है जो सहायक है चिकित्स्या करने में। दवा बेचने वाला केमिस्ट जब आपको अधकचरी जानकारी से किसी रोग पर सुझाव देता है तो उसको भले थोड़े धन का लोभ हो वो आपके स्वास्थ्य से खिलवाड़ ही करता है। मगर आप हैं कि कम्पाउंडर या नर्स तो क्या वार्ड में रख-रखाव को नियुक्त व्यक्ति को भी अपना सलाहकार बना लेते हैं। कभी सोचा है खुद अपनी जान को कितना सस्ता समझ लिया है हमने। कुछ लोग ऐसा समझते हैं कि देसी दवा कोई भी बता सकता है , जो सही नहीं है। आपको नहीं मालूम आयुर्वेदिक प्रणाली को विकसित होने में हज़ारों वर्ष लगे हैं , आधुनिक प्रणाली में लैब में कुछ ही दिन में परीक्षण किया जाता है जबकि आयुर्वेद की दवायें अपने समय में चिकिस्क बहुत जोखिम उठा कर खुद पर परीक्षण करते रहे हैं। आपको हैरानी होगी कि वो जांच वो परीक्षण इतने सत्य थे कि हज़ारों साल पहले जो लिखा हुआ चरक-सुश्रुत में वो आज भी सही साबित होती हैं , जबकि आज जो बात आधुनिक लैब जांच के बाद डॉक्टर्स बताते हैं कुछ वर्ष बाद गल्त साबित होती रही हैं। कितनी दवायें सालों देते रहने के बाद प्रतबंधित की जाती रही हैं।

           आयुर्वेद कोई अवैज्ञानिक प्रणाली नहीं है , आपको मालूम है मोतिया बिंद ( कैटरेक्ट ) का जो ऑपरेशन किया जाता है वो कैसे संभव हुआ होगा , ये जानकारी भी आयुर्वेद के ग्रंथों की देन है। आज आयुर्वेद की दशा भी ईश्वर जैसी है , सब जगह लोगों ने आस्था को अपना कारोबार बना लिया है। आयुर्वेदिक दवायें बनाने वाली कम्पनियों ने भी , पंडित-मौलवी , धर्म-गुरु की तरह इसको मुनाफा कमाने को इस्तेमाल किया है फ़र्ज़ को दरकिनार कर के। उनका उदेश्य रोगों की दवायें बनाना नहीं है , उनको ऐसी दवायें बनानी हैं जो प्रचार से बेच कर तगड़ा मुनाफा कमाया जा सके। ये आयुर्वेद के साथ धोखा है , विश्वासघात है , छल है। वो ऐसी दवायें बेच करोड़पति बन गये मगर आयुर्वेद की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर। मीडिया का दखल हर जगह बढ़ गया है , सही गल्त की पहचान करना और सभी को जानकारी देना उचित है , मगर बिना विषय की जानकारी भी खुद को निर्णायक समझने की मानसिकता ने उसको मार्ग से भटका दिया है। जब अख़बार टीवी पत्रिका वाले बताने लगें कि इस रोग की ये दवा है तब वो चिकित्सा नहीं आपके जीवन से खिलवाड़ है। मगर ऐसा काम खुले आम हो रहा है जो आयुर्वेद और जनता दोनों के लिये हानिकारक है। सरकार केंद्र की हो चाहे राज्यों की सभी ने जनता के स्वास्थ्य से किया जाने वाला ये अपराध होने दिया है। आयुर्वेद के साथ तो सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है , सरकार के बजट का मात्र तीन प्रतिशत बाकी सब चिकिस्या पद्धति को और सत्तानवे प्रतिशत एलोपैथी को आबंटित किया जाता है। ऐसे में आयुर्वेद को बढ़ावा देने की बातें और आश्वासन कोरे झूठ हैं। मुझे इक पत्रिका ने कुछ साल पहले इक पत्र लिखा था जिसमें लिखा हुआ था कि आजकल लोग आयुर्वेद की ओर आकर्षित हैं और चाहते हैं आयुर्वेदिक ईलाज कराना , संपादक जी चाहते थे कि मैं आयुर्वेद का स्नातक होने के कारण उनकी पत्रिका के लिये इक कॉलम लिखूं लोगों को रोगों की दवायें बताऊं। वो गल्त नहीं कह रहे थे कि ऐसा करने से मुझे भी नाम मिलेगा और दूर-दूर तक पहचान भी। मगर मुझे आयुर्वेदिक चिकिस्या प्रणाली का दुरूपयोग अपने लाभ के लिये करना अनुचित लगा था और मैंने इनकार कर दिया था।मैंने उनको जवाब भेजा था कि मेरे विचार से ऐसे रोगों का सही उपचार नहीं किया जा सकता , हां अगर आप चाहें तो मैं पाठकों को कुछ लेख द्वारा जागरुक कर सकता हूं ताकि उनको जानकारी हो कि ज़रूरत पड़ने पर कैसे अपना चिकित्स्क और प्रणाली का चयन करना चाहिये। खान-पान , रहन-सहन , आचार-व्यवहार में क्या बदलाव कर स्वस्थ जीवन बिता सकते हैं। ये भी कि जानकारी दी जा सकती है कि कब किस डॉक्टर के पास जाना चाहिये , लोगों को समझाया जाना चाहिये कि छोटा-बड़ा अस्पताल या डॉक्टर नहीं होता है , देखना ये है कि कब आपको किसकी आवश्यकता है। हर वह डॉक्टर अच्छा नहीं हो सकता जिसके पास भीड़ लगी हो या जिसका नाम प्रचार बहुत सुना हो , सही ईलाज के लिये ऐसा डॉक्टर होना चाहिये जो आपकी सही जांच , और आपकी समस्या को ध्यान पूर्वक सुनने को समय दे सकता हो। इक सच आपको नहीं मालूम होगा कि जिनके पास बहुत अधिक भीड़ होती है उनको अपने डायग्नोसिस पर नहीं दवाओं पर ऐतबार होता है और वे आपको कितनी ही ऐसी दवायें लिख देते हैं जिनकी ज़रूरत नहीं होती अगर उनके पास रोग को समझने और निदान करने को समय या फुर्सत होती। सही इलाज के लिये सब से ज़रूरी है चिकत्स्क की योग्यता , अनुभव और अपने काम के प्रति उचित दृष्टिकोण। मगर उन संपादक जी को मेरा सुझाव नहीं पसंद आया था , क्योंकि उनको अपने पाठकों को प्रसन्न करना था जागरूक नहीं।

               मुझे ये स्वीकार करने में बिल्कुल संकोच नहीं है कि आयुर्वेद को खुद आयुर्वेदिक प्रणाली के शिक्षित लोगों ने भी दगा दी है। कई आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज में जहां मिश्रित प्रणाली की शिक्षा दी जाती है , छात्रों को एलोपैथी और आयुर्वेदिक दोनों का ज्ञान वा जानकारी दी जाती है , वहां भी अधिक ज़ोर आधुनिक प्रणाली पर दिया जाता है। हम अपने मरीज़ों को ये नहीं समझाना चाहते कि आयुर्वेदिक दवायें अधिक सुरक्षित हैं जबकि अंग्रेजी दवाओं के दुष्प्रभाव बहुत अधिक होते हैं। कितनी बार ऐसी दवायें रोग को खत्म नहीं करती , केवल लक्षणों को मिटाती हैं। यहां किसी प्रणाली को कमतर नहीं बताया जा रहा , बेशक एलोपैथी में नये अविष्कार और अनुसंधान से कितनी जटिल समस्याओं का हल मिला है शल्य-चिकिस्या द्वारा या बहुत सारी नई दवाओं से। ज़रूरत है सभी तरह की चिकित्सा को मिल कर अपना दायित्व निभाने की , सभी को स्वास्थ्य रहने में सहयोगी होने की। इक बात समझनी होगी कि सवासौ करोड़ की आबादी वाला देश बिना अपनी देसी चिकित्सा प्रणाली को महत्व दिये सभी को स्वस्थ रखने का मकसद हासिल नहीं कर सकता।

            शायद आपको मालूम होगा कि आज भी कितने ही रोगों की आधुनिक प्रणाली में कोई दवा नहीं है। एलोपैथिक डॉक्टर भी उनके लिये आयुर्वेदिक दवायें ही लिखते हैं , पीलिया , बवासीर , पत्थरी होना , पौरुष ग्रंथि का रोग , शुक्राणुओं की कमी , महिलाओं की समस्याओं का ईलाज आयुर्वेदिक दवाओं से ही किया जाता है। इक अपराध आयुर्वेद और अन्य सभी देसी प्रणाली के चिकित्स्क करते रहे हैं , अपनी जानकारी को गोपनीय बना पीड़ी दर पीड़ी अपने पास रखना , मानव कल्याण को भुला कर। हां इक अहम बात , ये मान लेना कि केवल नाड़ी देख कर सभी रोगों का पता चल सकता है , कदापि सही नहीं है , पल्स देखना एक हिस्सा मात्र है रोगी की जांच का। अब इक चौंकाने वाली डब्लू एच ओ की रिपोर्ट , कई साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चेतावनी दी थी कि भारत में ज़रूरत से पांच गुणा अधिक दवायें इस्तेमाल की जा रही हैं और वो भी अधिकतर शहरी इलाके में , गांवों तक नहीं पहुंचती वो दवायें। इक कटु सत्य ये भी कि अस्पतालों-नर्सिंगहोम्स की बढ़ती संख्या के साथ रोग और रोगी कम नहीं हो रहे अपितु अधिक बढ़ रहे हैं , ये गंभीर चिंता की बात है। हमारे यहां भेड़ चाल की बुरी आदत है , हर चमकने वाली चीज़ सोना नहीं होती , ये जानते हुए भी चमक-दमक और प्रचार से प्रभावित हो कुछ भी अपना लेते हैं।

      मुझे लगा फेसबुक पर केवल खुद की अपने मतलब की बात को छोड़ , इक सार्थक काम किया जाये , सोशल मीडिया पर सभी को आयुर्वेद और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी और जहां संभव हो राय भी दी जाये।
मगर यहां भी लोग सोचते अपनी गंभीर समस्या को घर बैठे हल कर लें , जो हो नहीं सकता। ज़रा इक बात सोचना , जब आप जाते किसी डॉक्टर के पास तब क्या वो कोई एक दवा ही लिखता है ? नहीं , उसको पूरा इक नुस्खा लिखना पड़ता है आपकी समस्या को समझ कर। तब कोई एक दवा किसी भी इक रोग का पूरा उपचार कैसे हो सकती है। बेशक कुछ समस्याओं का समाधान हो सकता है उन पुराने तजुर्बों से , मगर हर बिमारी का ईलाज बिना चिकित्स्क को मिले नहीं हो सकता। आसानी कभी कठिनाई बन सकती है , याद रखना।

( आपने ये लेख पढ़ा , अपनी राय देना , और अच्छा लगा हो तो औरों को भी बताना।  नेक काम होगा ) 
 

 

मई 31, 2015

POST : 481 राष्ट्रपिता होने की निशानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      राष्ट्रपिता होने की निशानी  ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

                    ( पुरानी दास्तां लो फिर याद आ गई )  

बच्चों का खेल नहीं है बच्चों के सवालों के जवाब देना । बड़े बड़े ज्ञानी लोग बच्चों के सवाल का हल नहीं खोज पाते । अपनी अज्ञानता को छुपाने को कह देते हैं , ये बच्चों की समझ की बातें नहीं हैं । मगर हमेशा ये इतना आसान नहीं होता । भले टीवी पर इक विज्ञापन दावा करता है की अमुक ब्रांड का जांगिया पहन आप असम्भव को सम्भव कर सकते हैं " बड़े आराम से " । सरकारी विज्ञापन कब से समझा रहे हैं जनता को कि  देश प्रगति कर रहा है , मगर हम क्या करें देश में भूख से लोग मरते हैं , किसान खुदकुशी करने को मज़बूर हैं , लोगों को साफ पानी तक नहीं मिलता पीने को , बच्चे आज भी पढ़ने की उम्र में मज़दूरी करने को विवश हैं , गरीबों को कहीं भी मुफ्त इलाज नहीं मिलता । सरकार उनके मरने पर बीमे की बात करती है , ज़ख्मों पर नमक छिड़क कर कहती है , लो अच्छे दिन आये हैं । लगता है मैं भावावेश में विषय से भटक गया , चलो मुद्दे की बात करते हैं । काश बाज़ार के और सरकार के विज्ञापन झूठे नहीं होते , तो हर समस्या का समाधान किया जा सकता । कल तक अगर किसी बच्चे के सवाल का जवाब नहीं दे सकते थे तो चुप रहने से काम चल जाता था । आज़ादी के बाद कितने समय  से देश में सरकारें यही करती आई हैं , लेकिन सूचना के अधिकार ने  सरकार को बहुत परेशानी में डाल रखा है ।

    लखनऊ वालों की बात ही अल्ग होती है , जब वहां रहने वाली लड़की का नाम ऐश्वर्या हो तो कहना ही क्या । दस साल की ऐश्वर्या ने देश की सरकार को दुविधा में डाल दिया है , वह भी इक सवाल पूछकर कि  किस आधार पर महत्मा गांधी को राष्ट्रपिता का दर्जा मिला हुआ है । बच्ची ने सवाल पी एम ओ से पूछा था , पी एम ओ ने उसे ग्रहमंत्रालय और ग्रहमंत्रालय ने उसे राष्ट्रीय अभिलेखागार को भेज दिया था , अभिलेखागार की सहायक निदेशक जयप्रभा रवींद्रन ने जवाब भेजा की उनके पास कोई भी ऐसा दस्तावेज़ मौजूद नहीं है । अर्थात भारत सरकार को इसकी जानकारी नहीं है की महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता किस आधार पर माना जाता है । अब इससे आगे का प्रश्न बहुत ही असहज करने वाला हो सकता है । पुरानी कितनी हिट फिल्मों की कहानी पिता के नाम की , मां की अथवा माता - पिता के कातिल की तलाश को लेकर होती थी । उन फिल्मों से स्टार सुपरस्टार क्या नायक महानायक तक बन गये लोग । हमारे समाज में पिता का नाम होना बेहद ज़रूरी है , यदा कदा उसके सबूत की ज़रूरत आन पड़ती है । कभी किसी के पिता या बेटे होने पर संशय हो तो मामला संगीन हो जाता है । इक राजनेता को अदालत में घसीटा गया , डी एन ए टेस्ट करवाया गया ये साबित करने को कि  वो किसी का पिता है । अब दुनिया वाले हमसे सवाल पूछ सकते हैं की बताओ क्या सबूत है गांधी जी के राष्ट्रपिता होने का , ऐसे में हम डी एन ए टेस्ट भी नहीं करवा सकते कितने सालों  पहले स्वर्ग सिधार चुके महात्मा गांधी जी का । यहां उनकी चीज़ों का कारोबार ही होता आया है , उनके विचार सब कभी के भुला ही चुके हैं । दिखाओ कोई हो जो इक धोती में रहता हो ये देख कर की लोग नंगे बदन हैं ।

         जब भी ये सवाल खड़ा होगा साथ कितने और प्रश्न भी लायेगा , पिता के नाम के साथ जन्म की तिथि की भी बात होगी । देश आज़ाद भले 1947 में हुआ हो उसका जन्म तब नहीं हुआ था वो बहुत पहले से था , नाम बदलता भी रहा हो तब भी इतना तो तय है की देश का अस्तित्व महात्मा गांधी के जन्म लेने से पहले से था । अर्थात राष्ट्र के पिता का जन्म बाद में हुआ जबकि राष्ट्र पहले से था । बात मुर्गी और अंडे जैसी सरल नहीं है , लगता है हमने एक पुत्र को अपने ही पिता का पिता घोषित कर डाला । " चाइल्ड इस फादर ऑफ़ मैन " कहते भी हैं , लेकिन दार्शनिकता की नहीं ठोस वास्तविकता की बात है । लोग इधर नकली प्रमाण पत्र बना लेते हैं , हमें ऐसा नहीं करना है , तलाश करना है किस आधार पर उनको राष्ट्रपिता घोषित किया गया । क्या है कोई सबूत या यहां भी किसी फ़िल्मी कहानी की तरह कोई इतेफाक है जो अंत में मालूम पड़ता है । सरकार को संभल जाना चाहिये , मीडिया को भी हर किसी को भगवान घोषित करने से सबूत सामने रखना चाहिये , जो आम इंसान भी नहीं साबित होते कभी वक़्त आने पर , उनको आपने कैसे कैसे भगवान घोषित किया हुआ है , खुद आपका भगवान तो केवल पैसा ही है ना । कल कोई बच्चा अपने मां - बाप से कह सकता है , मुझे तो नहीं लगता कि आप मेरे माता-पिता हैं । 
 
 इस बीच दस साल गुज़र चुके हैं और गंगा जमुना से कितना पानी बह चुका है ऐसी कहावत व्यर्थ है बल्कि आजकल दिल्ली की हवा तक ज़हरीली हुई है पानी की स्वछता को छोड़ देना चाहिए । सरकार की सोच के बदलने की चिंता करनी चाहिए । जैसे विवाह में कुंडली मिलान करते हैं तो अधिकांश पंडित जी कन्या की राशि उसका नाम बदलने से स्वभाव बदलने की बात बताते हैं । सब जानते हैं नाम बदलने से कुछ कभी नहीं बदलता है लेकिन टोटके आज़माना हमारी परंपरा रही है । आधुनिक सरकार ने नाम बदलने में कीर्तिमान स्थापित किया है बस नामकरण करने को ही महान कार्य समझा जाने लगा है । बदलते बदलते महात्मा गांधी का नाम योजना से चतुराई से गायब किया जा रहा है ।  महत्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम का नाम बदलने से सरकार का विश्वास है सभी कुछ बदल जाएगा । सत्ता की विशेषता यही होती है कि खुद को कभी नहीं बदलती दुनिया भर को बदलने की बात करती है ।  जिनको हमेशा से महात्मा गांधी कोई नायक नहीं खलनायक लगते थे उनके पास यही विकल्प था कि गोडसे का नाम नहीं रख सकते तो गांधी को कुछ इस तरह छोटा कर दिया जाए कि लोग ढूंढना भी चाहें तो नहीं मिल सके , मगर ऐसा होता नहीं है किसी ने महात्मा गांधी को उस शिखर पर नहीं बिठाया जिस से कोई और हटा सके । नाम बदलने से क्या कभी भारत देश की तकदीर को बदल सकते हैं , बड़े नादान है जनाब अपनी बड़ी लकीर नहीं बना सकते किसी की लकीर को मिटा कर छोटा करने की कोशिश कर रहे हैं । 
 
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