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जुलाई 28, 2022

POST : 1589 देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

        देशभक्ति तमाशा बन गई ( तरकश ) डा लोक सेतिया

     कुछ लोग गहन विचार-विमर्श कर रहे हैं। देशभक्ति की बात हो रही है। कोई सवाल उछालता है , ये क्या चीज़ है , सुना है बड़े काम आती है आजकल। एक नवयुवक बताता है मनोजकुमार की फिल्म का गीत गाना देशभक्ति का काम है , मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती। जो जितना ऊंचे स्वर में गाता है वो उतना ही महान देश भक्त समझा जाता है। वैसे और भी गीत हैं , कुछ सरकारी विज्ञापन भी हैं , मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा एवं कम-आन इंडिया , दिखा दो। ये भी देशप्रेम को प्रदर्शित करने का ही काम करते हैं। क्रिकेट का खेल देखते हुए तिरंगा लहराना और अपने चेहरे या वस्त्रों को तिरंगे के रंगों में रंगना भी देशप्रेम का प्रमाण है। छबीस जनवरी या पंद्रह अगस्त को दूरदर्शन का सीधा प्रसारण देखते हुए गप शप करना हो , चाहे छुट्टी का मज़ा लेते हुए पिकनिक मनाना ये भी देशभक्ति का ही अंग हैं। देशभक्ति ही वो सलोगन है जो प्रतियोगिता में जीत दिलवा सकता है। ये वो फार्मूला है जो हमेशा हिट रहता है , सौंदर्य प्रतियोगिता में भाग लेने वाली सुंदरियां तक अपने जवाबों में इसकी मिलावट करके अच्छे अंक बटोर सकती हैं। इसलिये वे देश से अनपढ़ता और गरीबी को मिटाने के उदेश्य की बात करती हैं। मगर जब प्रतियोगिता में जीत जाती हैं तब इन सब को भूल कर बड़ी बड़ी कंपनियों के विज्ञापन करने और चमक दमक वाले कार्यक्रम करती हैं देशभक्ति समझ कर। 
 
     देशभक्ति वो विषय है जिसपर कुछ खास दिनों में लिखता है लेखक , छापते हैं अखबार वाले और पत्रिका वाले। अध्यापक को भी ये विषय पढ़ाना होता है छात्रों को ताकि परीक्षा में अच्छे अंक मिल सकें। इस सबक को समझना ज़रूरी है न ही समझाना ही। रटने का सबक है , तोते की तरह हम सब रटते रहते हैं। कुछ अन्य लोगों के लिये ये एक रंगारंग कार्यक्रम की जैसी है वे देशभक्ति के नाम पर कितने ही आयोजन आयोजित किया करते हैं। कभी किसी दौड़ का नाम , कभी मानव श्रृंखला बनाकर प्रदर्शित की जाती है देशभक्ति। पहले कभी देशभक्ति के मुशायरे और कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाते थे मगर आजकल उनका चलन बाकी नहीं रह गया। अब देशभक्ति पर पॉप संगीत के कार्यक्रम सफल होते हैं। आई लव माई इंडिया गाते हुए नाचना इस युग की वास्तविक देशभक्ति समझी जाती है। इस नज़र से देखो तो युवा पीढ़ी देशभक्ति से भरी पड़ी है।

          इन दिनों कई तरह की देशभक्ति दिखाई देती है। आधे घंटे का सीरियल जिसमें दो कमर्शियल ब्रेक हों , और तीन घंटे की फिल्म भी जिसको कई कंपनियां मिल कर प्रयोजित करें। टीवी के हर चैनेल में देशभक्ति का तड़का ज़रूरी है , उदेश्य भले पैसा बनाना ही हो , बात देश प्रेम की ही करनी होती है। सब चैनेल अपने को बाकी से बड़ा देशभक्त साबित करने का प्रयास करते हैं। इन टीवी सीरियल और फिल्मों के नाम और विज्ञापन लुभावने तो होते हैं मगर देखने पर इनका प्रभाव दूसरा ही नज़र आता है। दर्शक सोचते हैं कि देशभक्ति कोई समझदारी का काम नहीं है। बस एक बेवकूफी है , पागलपन है। क्या मिला देशभक्तों को जान गवांने से , क्या काम आई उनकी कुर्बानी। न देश को कुछ मिला न जनता को। बस मुट्ठी भर लोगों ने सब की आज़ादी को , लोकतंत्र को ढाल बना अपनी कैद में कर लिया। आजकल ज़रा दूसरी तरह की देशभक्ति होती है , आंदोलन होते हैं , दंगा फसाद करवाते हैं , तोड़ फोड़ की जाती है। जनता को मूर्ख बना सत्ता हासिल करने को समझौते किये जाते हैं। चुनाव जीत सरकार बनाते ही सब भूल कर वही दुहराते हैं जिसका विरोध किया था। शासक बन ऐश करते हैं , झंडा फहराते हैं ,सलामी लेते हैं , देशभक्त कहलाते हैं। अफ्सर लोगों के लिये देशभक्ति ऐसा ब्यान है जिसे कभी भी किसी भी अवसर पर दिया जा सकता है। जनता के धन से खुद हर सुख सुविधा का उपयोग करते हुए गरीबों की हालत से दुखी होने की बातें करना और गरीबी मिटाने को कागज़ी योजनायें बना उनको कभी सफल नहीं होने देना , देश के विकास के झूठे आंकड़े बनाना देशभक्ति है। सत्ताधारी नेता की चाटुकारिता , मंत्री के आदेश पर हर अनुचित कार्य करना , पद का दुरूपयोग करना भी देशभक्ति है।

           नेताओं के लिये देशभक्ति ऐसा नशा है जिसको अपने भाषणों द्वारा जनता को पिला मदहोश कर उससे मनचाहा वरदान पा सकते हैं। देश को लूट कर खाने वाले नेता डंके की चोट पर देश के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का दावा करते हैं। चुनाव करीब आते ही नेताओं पर देशभक्ति का ज्वर चढ़ जाता है। हर नेता नई रौशनी लाना चाहता है , सत्ता मिलते ही फिर अंधेरों का सौदागर बन जाता है। एक बार कुर्सी मिल जाये तो हर नेता उसे अपनी बपौती समझने लगता है। देशभक्ति इनके लिये कारोबार है , कभी गल्ती से देशभक्ति के नाम पर कोई जेलयात्रा कर आया हो तो वो ही नहीं उसका परिवार भी मुआवज़ा पाने का हकदार बन जाता है। कुछ लोगों की देशभक्ति जनता पर चढ़ा हुआ ऐसा कर्ज़ है जिसका भुगतान करते करते उसकी कमर टूट चुकी है , तब भी वो चुकता नहीं हो रहा , कुछ लोगों के वारिसों को उसका ब्याज ही मिला है , असल बाकी है। 
 
    आज़ादी मिले 75 साल होने को हैं आज़ादी की आयु की चर्चा होने लगी है , वर्षगांठ मनाते मनाते पचीसवीं पचासवीं से पिहचतरवीं तक संख्या पहुंच गई है । गुलामी सैंकड़ों साल की रही है आज़ादी को सौ वर्ष होने को अभी 25 साल और कौन इंतज़ार करता । कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक , वास्तव में आज़ादी के अर्थ तक बदले गए हैं । आज़ादी खो गई है या कहीं गुम है , अभी पिछले दिनों इक पुरानी फिल्म " मैं आज़ाद हूं " दोबारा देखी टीवी पर । अमिताभ बच्चन जी का किरदार लाजवाब है इक अखबारी कॉलम लिखने वाले का काल्पनिक किरदार जनता से सरकार तक शोहरत हासिल कर लेता है । ऐसे में इक बेबस भूखे गरीब को लालच देकर नकली आज़ाद बन कर सबको दिखलाना पड़ता है । टीवी पर अमिताभ बच्चन जी कौन बनेगा करोड़पति शो का संसाचल करते हैं कितने सालों से , विज्ञापन टीवी पर दिखलाया जा रहा है आज़ादी की पिहचतरवीं वर्षगांठ मनाने को लेकर । फिल्म में आज़ाद ख़ुदकुशी कर मर जाता है  , उसको मारने की कोशिशें करने वाले उसको ख़ुदकुशी नहीं करने देना चाहते बल्कि क़त्ल करने की कोशिश करते करते बचाने की ज़रूरत महसूस करते हैं । अमिताभ बच्चन को अपनी असफल रही कमाल की फिल्म की याद कभी न कभी आती होगी , 7 अगस्त को शो की शुरुआत करते हुए किरदार की कड़वी याद आए तो उनका तमाशा सिर्फ तमाशा बन जाएगा । ये देश आजकल तमाशाओं के भरोसे चल रहा है । देशभक्ति का खेल तमाशा इस दौर का सबसे अधिक बढ़िया कारोबार बन गया है । कौन खिलाड़ी है कौन तमाशा दिखलाता है और तमाशाई कौन है सवाल सबसे बड़ी उलझन है। कीमत बढ़ कर सात करोड़ पचास लाख हो गई है करोड़पति बनाते बनाते लोग कंगाली में आटा गीला होने की चिंता करते हैं।



अक्टूबर 04, 2019

POST : 1208 नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया

      नेता की विशेषताएं ( अधर्म-कथाएं ) डॉ लोक सेतिया 

   लिखने वाले को सच की कलम ईमान की स्याही को फेंक देना होता है। झूठ के देवता की वंदना से नेता की हर कहानी को कथा कहना होता है। नेता की असलियत आसानी से सामने नहीं आती है जो होता नहीं दिखाई देने देता और जो कदापि नहीं वो नज़र आने को कुछ भी करता है। जनता को आप अबला नारी समझ सकते हैं और नेता उस शख़्स को समझना होगा जो उस पर बुरी नज़र रखता है उस बेचारी अबला नारी को भरोसा दिलाता रहता है कि मुझे तुझसे प्यार है और बिना किसी स्वार्थ के है। मुझे चिंता है कोई तुम्हारी अस्मत को नहीं लूट जाये मुझे रत्ती भर भी इच्छा नहीं है तुम्हें खराब नियत से छूने की। मगर दिल में हसरत छुपी रहती है कब मौका मिलते ही जनता का सब कुछ लूट सकता है। नेता महिला भी बन सकती है मगर यही बात उस में थोड़ा बदले ढंग से रहती है। साफ सच्ची बात नेता होने को मक्कार झूठा आवारा और हद दर्जे का स्वर्थी जो मतलब को पांव पकड़ सकता है तलवे चाट सकता है और अवसर मिलते ही गले लगाकर पीठ में छुरा घौंप सकता है और किसी का कत्ल करते हुए उसको कोई अपराधबोध नहीं होता है। सफ़ेद रंग के अंदर काला रंग छुपा रहता है इसलिए हर किसी को इस तरह के लोगों से सावधान रहना चाहिए। 

         चुनाव के समय किसी नेता को अपनी ईमानदारी सब से खूबसूरत दिखाई दी और बाकी जितने भी नेता चुनाव लड़ना चाहते थे दाग़ी और अपराधी हैं इसका प्रमाण देते रहे। नेता आरोप लगाते हैं अपने पर सवाल का जवाब देना तौहीन समझते हैं मेरे नाम के साथ जी नहीं लिखा आपकी खैर नहीं की बदले की भावना हर नेता में होती है। राजस्थान में लोग कुत्ते को कुत्तो जी कहकर बुलाते हैं आदर देना उनसे सीख सकते हैं। नेता जी से उनकी पत्नी सवाल कर सकती है ये हर महिला का विशेषाधिकार हुआ करता है। नशे में नेता जी किसी का नाम ले रहे थे मेरी जान हो तुम बिन नहीं जी सकता , नशा उतारना आता है हर पत्नी को। नशा उतरने के बाद पूछा बताओ किस कलमुंहीं की बात है बेशर्मी से हंस दिए जानेमन सत्ता की कुर्सी को प्यार से नाम दिया हुआ है मुझे गलत नहीं समझना आपको छोड़ किसी को देखना भी पाप है। पत्नी भोली नहीं होती मगर भोलापन का दिखावा करना जानती है और रंगे हाथ पकड़ कर फिर जो कहना है करना चाहती है पता चलता है। मगर भारतीय नारी देश की जनता की तरह सब सहती है रोने धोने के बाद झूठी कसम अपनी ही खाने पर चुप हो जाती है और नेता मन ही मन उसके मरने की बात पर चिंतन करता है नहीं मरने वाली कभी। मुझे मारकर खुद सती हो सकती है उपवास रखती है मगर जीने नहीं देती मरने भी नहीं देती है। 

    पत्नी ने सवाल किया ये क्या बकवास ब्यानबाज़ी की है ईमानदारी वाली बढ़ चढ़ कर बात कहने की कोई ज़रूरत नहीं थी। विधायक बनने से पहले जितना पैसा खर्च किया अपने इश्तिहार छपवाने पर उतना तो चुनाव आयोग इजाज़त भी नहीं देता बताओ चुनाव क्या खाक लड़ोगे बिना पैसे के। नेता जी बोले पगली तुम नहीं समझी समझने वाले समझ गए हैं दल की निष्ठा की ईमानदारी की बात है। बाकी सब दलबदलू लोग हैं उनके पिछले पाप धुले नहीं हैं सत्ता की चादर से ढके गए हैं छुपाने की नाकाम कोशिश है छुपे नहीं हैं किसी की नज़र से भी। ये जो पब्लिक है सब जानती है। मुझे भी पहचानती है झूठ सच सब जानती है मगर अंधी है देखती नहीं है आवाज़ के शोर से पहचानती है किस ने उसको बख्शा है। पत्नी को याद आया शादी से पहले का ज़माना नेता जी का जाल बिछाना और मछली का फंस जाना और फिर दोनों का समझना और पछताना। ये पहेली अनसुलझी रहने दो किस ने किस को मुहब्बत के जाल में फंसाया कोई नहीं ये राज़ जान पाया। 

    नेता जी ने फिर समझाया आपको सही अर्थ नहीं समझ आया। इक थानेदार ने ईमानदारी का मतलब यूं समझाया। आधा खाया आधा ऊपर पहुंचाया कभी भी हिस्सा नहीं चुराया , थाने की बोली को निभाया जितना बोया उतना फल खाया। उम्मीदवार बनने को टिकट की कीमत सबने बंद लिफाफे में लगाई है बस मैंने कीमत की जगह खाली छोड़ रस्म निभाई है जितनी मर्ज़ी लिख सकते हैं अपने  पिता की बात दोहराई है।  मुझे छोड़ने की मत पूछना किस किस ने कीमत पाई है बस तुम नहीं मानी मुसीबत घर लाई है। बात सुनते सुनते दोनों को नींद आई है। अधूरी कहानी समझ आपको पूरी नहीं आई है सुबह बाकी बताएंगे। मीनाकुमारी की बात याद आई है। ज़माना बड़े शौक से सुन रहा था हमीं सो गये दास्तां कहते कहते। नेता जी की नींद खुली तो नज़ारा बदल चुका है उनकी ईमानदारी किसी काम नहीं आई और जिस को सबसे बड़ा खराब कह रहे थे उसी को दल के बड़े नेताओं का वरदान मिला है। नेता जी अपने दिल के टूटने का खुद तमाशा देख रहे हैं और लोग उनके दिल के टुकड़ों को गिनते फिर रहे हैं।

        समझदार राजनेता वक़्त की नज़ाकत को समझते हैं विलाप नहीं करते मुराद पूरी नहीं होने पर। कोई और चौखट तलाश लेते हैं झट से और रंग बदलते हैं भगवा छोड़ हरा अपना लेते हैं। पांच साल पहले का रंग का बदलना भी उचित था फिर तीसरी बार बदलना भी अच्छा है। रंग बदलती दुनिया है नेताओं ने गिरगिट से सीखा है मौसम के साथ जिस डाली जिस पेड़ की शाख पर हो उसी जैसा हो जाना। ये विशेषता बड़े काम आती है।

         


मई 31, 2018

POST : 794 आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       आसमान उठा रखा है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      सोशल मीडिया पर कुछ लोग यही कर रहे हैं। ऐसे कहावतें बहुत हैं और अधिकतर उनमें किसी न किसी जीव जंतु की बात होती है। वैसे तो सिख गुरुओं की बाणी में भी उस बात पर सवाल उठाया गया है जिसमें मान्यता है कि धरती इक बैल के एक सींग पर टिकी हुई है और जब बैल थककर सींग बदलता है तो भूकंप आता है। सोचने की बात है कि  वो बैल भी खड़ा है तो उसके नीचे इक और धरती है फिर उस धरती के नीचे इक बैल और होगा।  ऐसे कितनी धरती कितने बैल।  विज्ञानिक चांद और बाकी ग्रहों तक जा पहुंचे अपने नीचे की धरती की सुध नहीं अभी भी। मगर बात आसमान की है , किस ने उठा रखा है। इक मान्यता की तरह कथा है कि इक बेहद छोटा सा जीव है जो जगता रहता है क्योंकि सब ने समझाया हुआ है कि जब कयामत आती है तो आसमान टूट कर धरती पर गिर जाता है , और जब भी उसको सोना होता है तब भी वो अपनी चारों टांगों को ऊपर की तरफ ही रखता है ये मानकर कि आसमान गिरा तो वो थाम लेगा। कुछ लोग खुद मानते हैं या नहीं मगर सभी को मनवाना चाहते हैं कि देश एक व्यक्ति के बिना नहीं कायम रह सकता। उन्होंने अपने हाथ पैर ऊपर आसमान की तरफ उठा रखे है ताकि उस नेता को सत्ता नहीं मिली तो वो उसी जीव की तरह कयामत को रोक लेंगे। उन्हें देश के इतिहास और संविधान का कुछ पता नहीं है उनके लिए जो उनका आका कहता है वही सच है। कितने झूठ पकड़े गए हैं और अभी भी झूठ पर झूठ बोल रहा है मगर तब भी आका को झूठा नहीं मानते हैं ये। 
 
       इक ऐसे बचपन के सहपाठी से बात हुई , हालांकि ऐसे लोग कभी विचार विमर्श और सार्थक वार्तालाप करने में यकीन नहीं रखते। जो उनकी बात से सहमत नहीं उसको भला बुरा कहने से देश का दुश्मन तक बता सकते हैं। उनको स्वस्थ लोकतंत्र में मतभेद और बहस का मतलब नहीं पता। बंद कुवें में कैद कैफ़ी आज़मी की कविता के लोगों की तरह , रौशनी चाहिए आज़ादी चाहिए का शोर मचाते हैं मगर कोई उनको कुंवे से बाहर निकाले तो घबरा जाते हैं खुली हवा और रौशनी को देख कर , और खुद ही  वापस छलांग लगा देते हैं कुंवे के अंदर। और फिर से नारे लगाने लगते हैं। मगर ये मेरे सहपाठी हैं और भले सीधे नहीं टेङी तरह से राजनीति में हैं फिर भी शिक्षित हैं और सभ्य दिखाई देना भी चाहते हैं , तो बात की जा सकती थी। मैंने कहा आपको क्यों लगता है वही नेता सब ठीक कर रहे हैं , कमियां नहीं बताता आप अच्छाई क्या है बतला दो। जो जो भी कहते थे हुआ हो या किया हो तो दिखाओ , जवाब देते नहीं बना। ऐसे में उनके पास तुरुप का पत्ता यही होता है कि दूसरा कोई विकल्प ही नहीं है। उनकी समझ पर दया आती है। क्या इतना बड़ा देश एक व्यक्ति का कोई विकल्प नहीं तलाश कर सकता , कितनी बार कितने लोगों का ये भ्र्म तोड़ा है देश की जनता ने। बात उल्टी है उनके पास या उस नेता के पास विकल्प नहीं है , और किसी देश में उनको कुछ भी नहीं मिल सकता। 
 
                       सालों से देखता रहा हूं इन लोगों को , कभी उस दल में कभी इस तो कभी किसी तीसरे दल में होते हैं। जिस दल में होते उसी के नेता को दंडवत चरण वंदना करते देखा है। अपनी आयु से बीस साल छोटे दल के नेता के सामने पांव को हाथ लगाते  भरी सभा में। एक दोस्त चुनाव से कुछ दिन पहले बता रहे थे ये दल किसी की कदर नहीं करता है तीस साल रहने पर कुछ नहीं हासिल हुआ तब अपमानित होकर दूसरे दल में शामिल हुआ हूं , यहां बहुत अच्छा है। मगर हैरान हुआ जब फिर से वापस उसी दल में चले गए वो भी आदर की बात भुलाकर क्योंकि चुनाव में टिकट उन्हें नहीं किसी और को दिया गया। साफ़ कर सकता हूं कि जिस की बात पहले की उनके परिवार में किसी को। मगर अब दोनों एक साथ एक दल में हैं , बराबर भी हैं क्योंकि एक को टिकट मिला नहीं दूसरा चुनाव हार गया। ये दोनों जब हारते हैं तो अपनी बिरादरी को दोष देते हैं और जीत जाते तो अपने नेता को श्रेय देते हैं। यही इनकी समझ है कि वोट देने वाली जनता का दिल से आभार कभी नहीं मानते हैं। 
 
               आपने सुना होगा इक स्टिंग ओप्रशन कोबरा पोस्ट ने किया अभी अभी बताया गया है। उस में तमाम मीडिया वालों को टीवी चैनल वालों से लेकर पेटीएम तक उसी जीव की तरह पीठ के बल लेटकर शोर मचाना था कि अगर इक नेता को नहीं जिताया तो कयामत आने वाली है। वो सब ऊपर को चारों टांगें कर आसमान को गिरने से बचाने का काम कर रहे है , मगर देश की खातिर नहीं पैसे की खातिर।
 
      जिसकी बात है उसने पहले ही बताया था मैं आपका पहला सेवक हूं। कुछ लोग बार बार सेवक शब्द उपयोग कर याद दिलवाते हैं बहुत भोले हैं। सरकारी नौकरी भी सेवा कहलाती है , मगर आप एक बार जिसे रख लिया आसानी से हटा नहीं सकते हैं। काम नहीं करना नौकरी से हटाने का कारण या बहाना नहीं हो सकता। ये खुद को जनता का निर्वाचित सांसद समझ ले तो बात पांच साल की हो जाती है , सेवक बनकर हमेशा सर पर चढ़े रह सकते हैं। इरादा साफ है अभी भी नहीं समझे तो और उदाहरण भी हैं। इक दवा कंपनी में नौकरी मिली मगर काम नहीं करते थे , घटना वास्तविक है , कंपनी से मिले दवा के मुफ्त डॉक्टरों को देने वाले सैंपल बेच देते केमिस्ट को। पता चला तो कंपनी ने नौकरी से हटाया भी , कोई सरकारी नौकरी भी नहीं थी , मगर एम आर एसोसिएशन साथ खड़ा हुआ तो उसे वापस रखना पड़ा। मगर निजि कंपनी वाले भी कम नहीं होते हैं , उनको जाल बिछाना आता है। कुछ दिन बाद उस को तबादला कर मैनेजर बना दिया और उसके बाद मैनेजर को काम नहीं करने पर हटा दिया। अब समझ आया कि नहीं। सेवक जिस जगह काम करते हैं हमेशा ध्यान रखते हैं कोई और उस जगह उसकी जगह काम नहीं कर सके। किसी दूसरे को अपनी जगह आने ही नहीं देते हैं।

                             लोग आज तक समझे नहीं सेवा में मेवा है का अर्थ क्या है। कुछ साल पहले की बात है हमारी एसोसिएशन के दो सदस्य मीटिंग में अपने अपने नाम का समर्थन देने की मांग करने लगे। संस्था को राजनीति से कोई सरोकार नहीं है और किसी को भी समर्थन नहीं मिलना था उनको भी पता था। आपसी हंसी मज़ाक में बात करते करते उनसे पूछा गया कि इतना लालायित क्यों हैं विधायक बनकर क्या करोगे।  इक सदस्य खुशमिज़ाज हैं बोले यार पिछले दल में घर फूंक तमाशा देखा है , दलबदल किया ही है घाटे की भरपाई और कमाई करने को। ये कोई राज़ की बात नहीं है , लोग शहर के वार्ड के पार्षद बनते हैं तो मालामाल हो जाते हैं। सभापति बनने की चाह रखने वाले लाखों देते हैं ताकि सभापति करोड़ों लूट सके। सारा खेल पैसे का है।

                             आखिर में बात आसमान से शुरू की थी उसी पर आते हैं। आसमान का कोई अस्तित्व होता ही नहीं है , सब जानते हैं ये हमारी नज़रों की सीमा है और कुछ नहीं। डरिये नहीं आज तक आसमान के गिरने टूटने की कोई कथा कहानी तक नहीं लिखी मिलती है। ये जो आसमान उठाये हुए हैं का दावा करते हैं उनकी असलियत यही है। गांव वाले बताते हैं गड्डा , जिसे बैलगाड़ी कहते हैं , उसके नीचे नीचे इक कुत्ता चलता हुआ समझता है कि गड्डे का बोझ उसने उठा रखा है। देश चल रहा है जनता के दम पर किसी को मुगालते में नहीं रहना चाहिए। 
 



 

सितंबर 06, 2017

POST : 733 मुहब्बत तब से अब तक ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

     मुहब्बत तब से अब तक ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

               आजकल ये होता नहीं है , कभी अक्सर हुआ करता था। किसी विषय पर खुली सभा में चर्चा करवाना। आजकल टीवी पर ही बहस होती है और सब को पता होता है जो आजकल जिस दल के साथ है उसको उसकी ही बात कहनी है। हमने इसी को शोध का विषय रख दिया और जिनको पी एच डी की डिग्री लेनी उनको इस पर शोध करना पड़ा और आज सब का सार इस सभा में चर्चा में सामने आया है। जब परदादा जी का समय था तब मुहब्बत करते थे हर किसी से , घर परिवार ही नहीं , आस पड़ोस तक नहीं , गांव क्या हर जान पहचान वाले से बात करते तो प्यार से ही और याद रखते सभी को। इश्क़ किसे कहते कभी सोचा ही नहीं था किसी ने। नफरत कोई किसी से नहीं करता था , किसी की बात अच्छी नहीं लगती तब भी बड़े प्यार से बताते भाई ये ठीक नहीं है , और कोई बुरा भी नहीं मानता था। दादा जी के ज़माने में फिल्मों और नाटकों में मुहब्बत की बात होती थी , मुहब्बत करना आंसू बहाना और अपने आप को तबाह करना। सब इस से बचते थे , दिल में ऐसा बुरा ख्याल आये भी तो निकाल देते थे। महिला क्या पुरुष भी लाज शर्म का पास रखते थे। पिता जी के समय रंगीन फिल्मों का युग आया तो युवकों पर फ़िल्मी नायिकाओं से प्यार का खुमार चढ़ा हुआ था। मगर शादी हो जाती तो अपनी बीवी ही फ़िल्मी नायिका सी लगती थी। अगली पीढ़ी बीच मझधार में अटकी रही , दिल ही दिल में प्यार मगर इज़हार करने से डरते डरते , बात खत्म हो जाती। बड़े भाई के समय लोग बिना सोचे समझे इश्क़ कर बैठते , मगर शादी तक बात नहीं पहुंच पाती थी। कोई कोई भाग कर शादी की मुसीबत मोल लेता , अधिकतर तकदीर का फ़साना जाकर किसे सुनाएं , इस दिल में जल रही हैं अरमान की चिताएं , जैसे गीत गाकर अपनी भड़ास निकाल लिया करते। ज़माना बड़ा ज़ालिम है कहते रहते। 
 
             अब तक संक्षेप में पुरानी कहानी सुनाई , आगे विस्तार से आधुनिक प्रेम की लघुकथा सुनाते हैं। लंबी नहीं चलती अब इश्क़ की कहानी , उपन्यास तो लिखा ही नहीं जा सकता। सब से पहले हर प्रेम कहानी में तीसरा किरदार होना लाज़मी है। साक्षी के साथ ही राहुल भी कॉलेज में पढ़ता था , और अब दोनों एक ही शहर में जॉब कर रहे हैं , राहुल का दोस्त अलोक साक्षी के साथ ही उसी कंपनी में जॉब करता है। सप्ताह के अंत में तीनों साथ साथ सिनेमा जाते हैं डिनर करते हैं मस्ती करते हैं। कभी कभी शादी की बात भी होती है मगर कोई खुलकर बताता नहीं उस के दिल में क्या है। हम अच्छे दोस्त हैं इतना ही सोचते हैं , मगर साक्षी भी समझती है राहुल और अलोक चाहते हैं उस से शादी करना , अभी कहना नहीं चाहते क्योंकि अभी उनको पहले जॉब में तरक्की अधिक ज़रूरी लगती है। साक्षी को यही लगता है शादी किसी से भी कर लें कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता क्योंकि शादी के बाद सब एक जैसे हो जाते हैं। पति पद मिलते ही महिला पुरुष एक समान नहीं रह जाते , कई सहेलियों को देखा है , प्यार किया शादी की और उसके बाद कुछ भी नहीं रहता। कोई जल्दी नहीं है , उसे खुद पहल नहीं करनी है , ऐसी कोई ज़रूरी भी नहीं शादी करनी। मगर करनी पड़ेगी नहीं तो पिता जी जाने कब कहीं रिश्ता कर देंगे। 
 
            इक दिन साक्षी नहीं आई तो राहुल और अलोक में शादी को लेकर बात हो ही गई। साफ भी हो गया दोनों को ही ऐसी लड़की चाहिए जो जॉब करती हो ताकि ज़िंदगी आराम से कट सके। अब वो साक्षी हो चाहे कोई और ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता , इसलिए दोनों ने फैसला किया कि इस से पहले कि कोई तीसरा भाजी मार जाये हम आपस में टॉस कर लेते हैं। सवाल इस का है कि साक्षी को कौन अधिक पसंद है ये पता लगाना ज़रूरी है। ये तय किया गया कि दोनों अपना अपना प्रस्ताव खत लिखकर साक्षी को भेजते हैं और फिर मिलकर बात करेंगे किस को साक्षी क्या जवाब देती है। दोनों इक दूजे को नहीं बताएंगे क्या लिखा है। और एक साथ दोनों के खत स्पीड पोस्ट से भेजे गए। अगले सप्ताह मिलने पर बताया जाना है कोई जवाब आया या नहीं आया। 
 
          साक्षी को भी आज आना था उसी पार्क में , राहुल और अलोक थोड़ा जल्दी ही पहुंच गए आपस में बात करने को। राहुल खुश था उसको साक्षी का जवाब मिल गया था , लिखा था मुझे कोई ऐतराज़ नहीं है तुमसे विवाह करने में मगर घरवालों की अनुमति लेनी होगी। आजकल कोई लड़की भाग कर कोर्ट मैरिज नहीं करती , माता पिता भी देखते बेटी खुश रहेगी ऐसा लड़का होना चाहिए। आमदनी और अपना घर रहन सहन बस यही देखना होता है , मिलकर दोनों के परिवार तय करते हैं। राहुल को लगा था बात बन ही गई है। अलोक के चेहरे पर भी कोई दुःख दर्द नहीं था , इक मुस्कान थी होंटों पर। राहुल ने पूछा क्या तुम्हें भी यही जवाब मिला है। अलोक ने बताया कि नहीं उस ने साफ लिखा है हम दोस्त हैं और इक दूसरे को समझते हैं पसंद भी करते हैं मगर तुमने जो जो दावे किये मुहब्बत में चांद तारे तोड़ लाने और मेरी ख़ुशी की खातिर सब करने के मुझे नहीं लगता तुम्हारी जॉब का भविष्य और आर्थिक हालत अभी उस सब की अनुमति देती है। अभी तुम इस बात को छोड़ अपने भविष्य की सोचो मेरा यही कहना है जो इक सलाह है। 
 
             तभी साक्षी भी आ गई थी , अलोक ने कहा साक्षी मुझे ख़ुशी है तुमने राहुल को चुना है , मगर मुझे इक बात समझ नहीं आई कि मैंने तो खत में कोई बात लिखी ही नहीं थी। तुमने कैसे समझा मैं आजकल का युवक चांद तारे लाने की बात करूंगा। साक्षी ने कहा सच बताऊं मैंने तुम्हारा खत खोलकर पढ़ा ही नहीं क्योंकि मुझे डर था तुमने ऐसी बातें लिखी होंगी जैसी कविताएं तुम सुनाया करते हो। और कहीं मैं भावुकता में आकर तुम से शादी करने की भूल न कर बैठूं।  मगर तुमने क्या लिखा था बताओ तो। अलोक ने बताया कि मैंने तो कोरा कागज़ ही भेजा था ताकि तुम उस पर चाहो तो अपना नाम लिख दो। 
 
            आपको लगता है अब तो सब साफ हो गया है। राहुल और साक्षी की शादी हो गई होगी। मगर ऐसा नहीं है। गगन को साक्षी पसंद थी जो उसकी कंपनी में जॉब करती थी। गगन ने अपने पिता जी को अपनी पसंद बताई और उन्होंने जाकर साक्षी के माता पिता से उसका हाथ मांग लिया। गगन को लगा था साक्षी ही ऐसी लड़की है जो उसके साथ मिलकर कंपनी को और उंचाईयों पर ले जा सकती है। अलोक से राहुल अच्छा था और राहुल से गगन अधिक अच्छा है। साक्षी को कोई और अच्छा मिल जाता तो गगन से भी शादी नहीं करती शायद। आजकल के इश्क़ की अच्छी बात ये है कि कोई किसी से नाराज़ नहीं होता दुश्मनी नहीं करता इस बात को लेकर। सब को उस से और अच्छी या अच्छा मिल ही जाता है । 
 

 

अगस्त 17, 2017

POST : 716 इश्क़ कोतवाली 2017 ( व्यंग्य कथा ) डॉ लोक सेतिया

   इश्क़ कोतवाली 2017 ( व्यंग्य  कथा ) डॉ लोक सेतिया 

               कोतवाल साहब का बुलावा आया तो दिल धड़कने लगा न जाने क्या माजरा है। आजकल कुछ पता नहीं चलता कब किस पर क्या इल्ज़ाम लगवा कर थाने में बंद करा दिया जाये। अभी चलना पड़ेगा सिपाही से पूछा कोई वारंट जारी हुआ है , वो हंसने लगा। शायर जी आप भी कमाल करते हैं आपको बुलवाया है कोतवाल जी कोई कवि सम्मेलन करवाना चाहते हैं आप नाहक डर जाते हैं। कविता में तो शेर सा दहाड़ते हैं और थाने के नाम से कांपने लगते हैं वीर रस वाले कवि। कोई बात नहीं अभी थोड़ा सांस ले लो अपनी घबराहट को मिटा लो फिर चले आना साहब के निवास पर। सुनकर डर भाग गया और ख़ुशी का एहसास होने लगा। अब देरी करने का मतलब ही नहीं था। तभी चल दिए साथ हम भी। जाकर देखा तो बहुत हैरान हुए देखकर कोतवाल जी को , देवदास बने हुए थे। हमने पूछा साहब सब कुशल तो है , कहने लगे मत पूछो हमारे दिल पर क्या गुज़री है आज। आओ पहले दो घूंट ज़िंदगी के पी लो , हमने कहा भाई हम शराब नहीं पीते। बोले जानते हैं तभी आपको शुद्ध आयुर्वेदिक वाले दो घूंट साथ देने को दे रहे हैं। हमने कहा भाई उनकी बनाई स्वदेशी वस्तुओं को हम उपयोग नहीं करते मगर कारण नहीं पूछना बड़ी मुश्किल होगी। बाबा जी सरकारी हैं जो भी कहते हैं ठीक है। तब तक कोतवाल जी चार पैग लगा चुके थे और मूड़ में आ चुके थे। शायद उन्हें याद नहीं था हमको किस बात को बुलवाया है। कहने लगे भाई आप तो लेखक बंधु कोमल हृदय होते हैं सब की पीड़ा समझते हैं , मेरी दर्द भरी कहानी सुनोगे तो आंसू रोक नहीं पाओगे। तभी इक और सिपाही आकर बोला बुला आया हूं आपकी मुहब्बत को। साथ वाले कमरे में हैं जाकर मिल लो उससे।

              कोतवाल बोले कवि तुम भी साथ चलो आज देख लो हम कोतवाल भी इश्क़ करते हैं कोई पत्थर दिल नहीं हैं। ये पत्थर दिल तो वो हैं जो समझते ही नहीं हमारी मुहब्बत को हमारी मज़बूरियों को। देख लो ये इक कोठे वाली है और हमें शहर के कोतवाल को ही कोठे पर आने नहीं देती है। कितना बड़ा ज़ुल्म है इक बेचारे आशिक़ पर।  आज तुम ही बताओ कैसे इस रूठी महबूबा को मनाया जाये , कोई ग़ज़ल कोई कविता लिखनी आती नहीं हमें। इस की खातिर कवि सम्मेलन करवाना है और जैसे भी हो इसको मनाना है। अब उस अबला नारी से चुप नहीं रहा गया बोली कोतवाल जी बस करो और कितना झूठ बोलेगे सरकार की तरह। मैं तो आपकी गुलाम हूं देश की जनता जैसे नेताओं की गुलाम है। भला आपको नाराज़ कर कोई शहर में रह सकता है , हर कोठे से आपको रिश्वत भी मिलती है और आपकी हर चाहत भी पूरी होती है। फिर भी आपने इतना बड़ा झूठ बोला कि आपको कीमत लेकर भी बदले में नहीं मिलता कुछ हम सब से। अब इतना बड़ा इल्ज़ाम बेवफ़ाई का कोई कैसे सहे। कवि तुम ही सुन लो मेरी आपबीती और बताओ मैं क्या करूं जियूं या मरूं। सब लूट कर भी कोतवाल निर्दोष मासूम और खुद तबाह होकर भी हम गुनहगार मुजरिम। अदालत इनकी गवाह इनके फैसला करने वाले भी यही और इंसाफ की बात कौन करे।

                    अपनी कहानी सुनाने लगी जब तो कोतवाल की ज़ुबान बंद हो गई। कहने लगी मुझे इश्क़ के झांसे में फंसाया और सालों तक अपनी हवस मिटाते रहे। किसी और से शादी की और मुझे रखैल से कोठे वाली तक का सफर तय करवाते रहे। अपनी तरक्की की सीढ़ियां मुझे कुचल कर चढ़ते गए। कभी सोचा ही नहीं जो दो उपहार मुझे दिए इक बेटा इक बेटी के रुप में उनका क्या हाल है। खुद अपनी औलाद को जाने किस  की औलाद हैं बताते रहे। मुझ से दिल भर गया तो हर दिन किसी कोठेवाली के घर जाते रहे। जाने किस से इक जानलेवा रोग ले लिया और किस किस को रोगी बनाते रहे। अब जब सब को पता चला और सब कोठेवालियों के दरवाज़े बंद हुए तब मेरे दर पर दस्तक देने आते रहे। सब धन दौलत भी छीन लिया मुझ से किसी न किसी तरीके से। अब चाहते मुझे भी अपना रोग देकर और एहसान करना , मुझे भी आसान हो जाता इस तरह जीने से तो मरना। मगर क्या करूं उनका जिनका कोई दोष नहीं है , इस पिता को बच्चों का कोई होश नहीं है। निज़ाम है इन्हीं का तलवार भी इनकी है। कत्ल होने को इनकार भी नहीं है। पर इन आशिकों से कोई जाकर कैसे कहे आज खुद ही बिके हुए हो तुम सारे के सारे ही। जो खुद बिका वो होता खरीदार नहीं है।
 

 

अगस्त 02, 2017

POST : 694 भाषण भी उद्योग है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         भाषण भी उद्योग है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       बहुत सारे नेता अच्छा भाषण देने के लिए विख्यात रहे हैं। उनका भाषण सुनने को लोग बड़ी संख्या में खुद भी आते रहे हैं वरना अधिकतर भाषण देने को जनता को लाया जाता है , किसी न किसी तरह से। पिछले चुनावों में दूर दूर से लाया गया दिहाड़ी पर मज़दूरों को ताली बजवाने को। उनको टिफिन मिला जिस में पांच सौ वाला नोट जो तब वैध था भी रखा हुआ था खाने के साथ और जाने आने को बढ़िया बस भी। कुछ नेता समझा जाता चुनाव की हवा बदल देते हैं भाषण देकर ही , उनकी ज़रूरत बढ़ जाती है चुनाव में। किसी रैली की भीड़ को चुनाव जीतने का प्रमाण समझा जाता है वैसे ये बात कई बार गलत भी साबित हुई है। नेता अपने भाषण में हल्की फुल्की बातें चुटकुलेबाज़ी भी करते हैं ताकि भीड़ का मनोरंजन हो और भीड़ भाग नहीं जाये। बड़े नेता तो कम भीड़ होने का पता पहले से लगा लेते हैं और आना स्थगित कर देते हैं। अभिनेता के डायलॉग पर दर्शक फ़िदा  हो जाते हैं भले अभिनेता जो संवाद बोलता है उस जैसा खुद होता नहीं है। प्राण खलनायक था मगर वास्तव में बेहद भला मानुष और बहुत नायक असल में जो किरदार निभाते उसके विपरीत होते हैं। बड़े बड़े साहस वाले किरदार निभाने वाले जीवन में कायरता दिखलाते हैं और सच पर मिटने वाले फ़िल्मी अभिनय करने वाले झूठों के सरदार हुआ करते हैं। कुछ फ़िल्मी कलाकार भी भीड़ जमा करने को बुलवाये जाते हैं और कुछ इसी तरह राजनेता भी बन गए हैं। तभी तो कहते हैं काजल की कोठड़ी में कितना भी स्याना घुस जाये कालिख लग ही जाती है। राजनीति में दाग़दार कौन है बेदाग़ कौन ये भी रहस्य की बात है। जब चाहा किसी को दाग़ी करार दिया और जब अपनी तरफ आया तो बेदाग़ समझ लिया क्लीन चिट दे दी। सत्ता की गली में बेदाग़ ढूंढते रह जाओगे , अभी तक किसी डिटरजेंट बनाने वाले ने सत्ता से मिले दाग़ मिटाने का दावा नहीं किया है। ये काम केवल और केवल सी बी आई ही करती है। अदालत भी अपराधी साबित नहीं होने पर दाग़ मिटा नहीं सकती। लोग दाग़ी मानते रहते हैं। कोई कंपनी सी बी आई ब्रांड का डिटरजेंट बनाती तो मालामाल हो जाती। अभी भी लोगों को इस नाम पर भरोसा है , सी बी आई भी बड़े चमत्कार दिखलाते हैं जिसे खुद रंगे हाथ पकड़ा उसी को निर्दोष ठहराते हैं। बदली सरकार तो ये भी बदल जाते हैं।

            भाषण देना भी इक कला है दाग़ मिटाना भी कला है। भाषण में खुद पर लगे दाग़ विपक्षी पर चिपका देते हैं। उसके पायजामे को मैला और अपने कुर्ते को चकाचक सफेद बताते हैं। लोग हर झूठ पर तालियां बजाते हैं और नेता सोचते हैं जनता उल्लू है और सोचकर मुस्कुराते हैं। भाषण सुनकर अंधे बन जाते हैं तभी हर तरफ जनता को हरियाली दिखलाते हैं। नेताओं का यकीन है देश की जनता को रोटी की शिक्षा की स्वास्थ्य सेवाओं की नहीं भाषणों की ज़रूरत है तभी हर दिन भाषण खिलाते हैं भाषण पिलाते हैं। सभा में ही नहीं टीवी शो और रेडियो तक क्या सोशल मीडिया पर भी खूब ज़ोर ज़ोर से चिल्लाते हैं। हंसते हैं गाते हैं और खुलकर मुस्कुराते हैं , वोट देने वाले बाद में आंसू बहाते हैं , अच्छे दिनों की अच्छी सज़ा पाते हैं। लोग आजकल बहुत घबराते हैं , मालूम नहीं क्या नया अब ये लाते हैं। जनता को बुनियादी सुविधा देने को सकुचाते हैं और खुद करोड़ों अपने पर हर दिन उड़ाते हैं। सत्ता मिलते मकसद भी बदल जाते हैं , फूल खिलाने थे और पत्थर बरसाते हैं। सब सपने सुनहरे बिखर जाते हैं और अच्छे दिन वाले कैच हाथ से फिसल जाते हैं। राजधानी में पत्थरों के महल बनवाते हैं , नर्म दिल लोग भी वहां पत्थर दिल हो जाते हैं।

            भाषण देने वालों की जेब में भाषण भाषण से टकराते हैं। उद्द्घाटन वाले भाषण बंद वाले भाषण से बतियाते हैं। बधाई देने के बाद दुःख भी किसी को जाकर जताते हैं , बिल्लियों को लड़वा बंदर रोटी खाते हैं। भाषण लिखते नहीं लिखवाते हैं और पुरानी बात को हमेशा भूल जाते हैं , जिसे खराब कहते रहे बढ़िया है समझाते हैं शब्दों तक के अर्थ बदल जाते हैं। कहने का मतलब और था बोलते हुए नहीं शर्माते हैं। जनता के हिस्से बस भाषण आते हैं जो अपने खास हैं वही सत्ता की रेवड़ियां खाते हैं। किसी को मंत्री किसी को अधिकारी बनाते हैं , चंदा देने वाले इशारा समझ जाते हैं। चुनाव सुधार और ईमानदारी निष्पक्षता टके सेर बिक जाते हैं। झूठे लोग सच बोलने की शपथ खाते हैं। कुछ दिन भाषण की बौछार लाते हैं जब आज़ादी और गणतंत्र दिवस मनाते हैं। हर बार पुराना संकल्प दोहराते हैं अंधियारे लेकर उसे नई रौशनी बताते हैं। जनता को बदलाव लाने का पाठ पढ़वाते हैं और खुद सभी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं।

        अभी तक इतने उपजाऊ उद्योग पर कोई आयकर नहीं लगाया गया है। अब तो नया चलन चला है नेता भाषण भी टिकट बेचकर देने जाते हैं और बिके लोग खुद पैसे खर्च कर तालियां भी बजाते हैं। तभी तो टीवी पर नज़र आते हैं। जी एस टी लगाने वाले हमको इतना नहीं बताते हैं कितने फीसदी जी एस टी भाषणों पर खुद चुकाते हैं। कोई नहीं हिसाब मांगता भाषण देकर कितना मुनाफा कमाते हैं। राजनीति भाषण से शुरू भाषण पर खत्म होती भी है। मगर इस इतने बड़े उद्योग की आमदनी और जमापूंजी वा संम्पति सब करों से मुक्त है , धारा  चार सौ बीस का उपयोग कर के।

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जुलाई 03, 2017

POST : 680 हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

          हास्य कवि की चाहत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

मैं अपनी ये रचना फेसबुक और व्हाट्सएप्प के नाम करता हूं। जब तक मैं इन दोनों को नहीं समझा था बेचैन रहता था। सोचता था लोग दोस्त बनते हैं बस नाम को ही , इक संख्या हैं हम सभी , भारत सरकार के किसी विभाग के झूठे आंकड़ों की तरह। सैकड़ों नहीं हज़ारों दोस्त फिर भी बातें दोस्ती की कम दुश्मनी की अधिक लगती , या कभी लगता इक लेन देन है। बाजार में आप जेब खाली कर पसंद का कुछ खरीदते हो , फेसबुक पर जेब भी भरी रहती और जो आपको पसंद वो भी मिल जाता। आपको लाइक्स के बदले लाइक्स ही करनी है और कमैंट्स में वाह क्या खूब लिखना है , बस थोड़ा झूठ बोलकर किसी को ख़ुशी देना इस में गलत क्या है। आप किसी को गलती से भी सलाह मत देना कि आपकी कविता में कोई कमी है , हर कविता नाम की लड़की नाराज़ हो जाएगी , खुशबू रानी को भी बुरा लगेगा , और ग़ज़ल तो रूठ ही जाएगी। मुझे ये सब इक साथी हास्य कवि से समझ आया है। उसकी बात आखिर में , पहले अपनी भड़ास निकालनी है। काफी चिंतन करने के बाद मैंने इक फेसबुक और बना डाली व्यंग्य साहित्य नाम से ये सोचकर कि अब इस पर कौन क्या है बिना सोचे दोस्त बना लेना और फिर ये चिंता नहीं करनी उसकी पोस्ट पर क्या लिखा है या मेरी पोस्ट कोई पढ़ता भी है कि नहीं। सब ज्ञानी लोग ज्ञान बांट रहे हैं अपना ज्ञान खुद पास नहीं रखते औरों को देते हैं अव्यवहारिक ज्ञान। मुझे अपनी मूर्खता को ज्ञान नहीं समझना ये हमेशा से सोचा हुआ है , मुझे समझदारी और अक्लमंदी से फासला रखना पसंद है। समझदार लोग जो करते हैं सब जानते हैं , औरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करना। आप ये मत पूछना उल्टा और सीधा उल्लू होता क्या है , मैं उल्लू नहीं न किसी को बनाता ही हूं। अब वापस असली बात पर उस हास्य कवि की कविता से बात करते हैं। 
 
    देख कर सब कवि हैरान थे , सब से बढ़कर छा गया था , इक प्रेम की कविता सुनाकर , जो कवि उसको मिली थी सभी , महिला श्रोताओं की तालियां , जैसे सभा में बैठी उसकी सालियां।  मगर बताया था बाद में राज़ , फैला दी थी उसने सभा में बात , जिसको चाहता है उसी पर लिखी , आज आया है खुद उसे सुनाने को , और जाने किस किस को लगा था , ज़रूर मुझी से हुई है मुहब्बत , सब , समझ रही थी है वही उसकी चाहत। इक कवि भाई ने अकेले में पूछा , दिखला दो मिलवा दो भाई हमें भी , देखी अभी तक कोई कविता सी नहीं , हंसकर बोला कोई हो तो मिलवाऊं , ख्वाब की मेहबूबा को हकीकत बनाऊं , मुझे तो सब की सब लगती हैं आफत , मेरी रचना ही है केवल मेरी मुहब्बत।
 
         बस मुझे इक गुरुमंत्र मिल गया था , मुझे दूसरों की नकल करना पसंद नहीं है इसलिए मैंने अपना वास्तविक तरीका अपनाया। मैंने भी अपना इक फेसबुक और इक व्हाट्सएप्प का ग्रुप बनाया जिसका एडमिन खुद को बनाया , अपनी मर्ज़ी से धूप की अपनी मर्ज़ी से छाया। मगर अपनी सच बोलने की बुरी आदत फिर भी नहीं छोड़ पाया। मैंने संबंध बनाने का अलग अपना नुस्खा अपनाया , खुले में लिखकर नहीं किसी को गलत को गलत बताया।  उस लिखने वाले को या लिखने वाली को इनबॉक्स समझाया , इस तरह बहुत को अपना चाहने वाला बनाया। लोग ग्रुप में महिला दोस्तों की बेकार कविताओं को पसंद कर रहे थे , इधर हम दो कदम और आगे बढ़ रहे थे। उनकी रचनाओं को सही करने का काम कर रहे थे , वो समझती थी हम उन पर मर रहे थे। सर जी सर जी सुनकर मज़ा आ रहा था , कोई अनपढ़ गुरु बन गया था , दसवीं फेल टीचर नहीं बन पाया अब योग सिखला रहा था। मैं देख कर चुपके चुपके मुस्कुरा रहा था। मुझे इक पुराने दोस्त की बात जो कभी नहीं समझ आई थी समझ आई थी , जब उस से अपनी कुट्टी है बिना बात हुई लड़ाई थी। आज होने लगी बात तो वो भी बताता हूं , इक सच्ची बात पर आज तलक पछताता हूं। दोस्त अखबारी छपास का मारा है उसको लगता अपना छपा नाम सब से न्यारा प्यारा था। इक दिन उसने अख़बार में समाचार लिख भेजा , किसी को नहीं खबर थी किस किस को किस ने देखा। जो लोग उस दिन शहर में नहीं थे खबर में उस कवि गोष्ठी में उपस्थित थे। मैंने किया फोन और बोला मेरे भाई , जो नहीं आया उसकी भी बधाई , इतना सितम नहीं करो मेरे यार। बुरा मान गया था , वो समझाता था भगवान को भी तूती पसंद है , हम तो आदमी हैं तारीफ के भूखे हैं। बस मुझे इसीलिए भगवान को मनाना आया नहीं , झूठी बातों का भोग मैंने लगाया नहीं। अब काम की बातें लिखना छोड़ बेकार की अनाप शनाप लिखता हूं और अपनी लिखी पोस्ट को जब भी खुद पढ़ता हूं खुद ही लाइक भी और कमेंट भी करता हूं। बस मुझे सोशल मीडिया की समझ आई है , खुद अपनी पीठ सब से थपथपाई है। टीवी हो अख़बार हो या फिर अपनी सरकार हो , सब खुद अपनी आरती गए रहे हैं , कोई  नहीं सुने फिर भी दोहरा रहे हैं। जो कहते थे न खाएंगे न खाने ही देंगे आजकल मौज मना रहे हैं।

जून 11, 2017

POST : 662 मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            मेरी कालजयी रचना ( व्यंग्य )  डॉ  लोक  सेतिया

  बड़ा ही सुंदर नज़ारा है , मंच सजा हुआ रंग बिरंगे फूलों से , उत्सव सा माहौल , खचाखच भरा हाल। साहित्यकार बुद्धीजीवी वर्ग और मेरे सभी सब दोस्त रिश्ते नाते वाले , मुझ से जलने वाले भी बैठे हुए हैं। मुझे मंच पर बैठा देख रहे सब लोग , इंतज़ार कर रहे हैं कि कब देश के सर्वोच्च पद पर आसीन महानुभव मंच संचालक के बुलावे पर उठ कर आएं और मुझे साहित्य लेखन और उम्र भर जनहित की बात करने पर पुरुस्कृत एवं सम्मानित करें। आखिर वह पल आ ही गया और मुझे मुख्यातिथि द्वारा फूलों का गुलदस्ता भेंट कर प्रशस्ति पत्र और सम्मान राशि का चेक दिया गया और सभा के सभी उपस्थित लोग तालियां बजा कर मेरा अभिवादन कर रहे थे। इस मुख्य काम की औपचारिकता पूरी होने के बाद मंच संचालक ने मुझे डायस पर आने और आज जिस रचना और कार्य की खातिर ईनाम मिला उन सब की बात बताने का आग्रह किया। मैंने तुरंत माइक को अपने अनुसार सही किया और अपनी बात विस्तार से बतानी शुरू की। ऐसा अवसर मुझे पहली बार मिला था और शायद अंतिम बार भी यही हो मुमकिन था। ये ईनाम जिस रचना पर मिला उसकी बात आखिर में करना उचित होगा , मैंने कहना शुरू किया इन शब्दों से। कहानी का अंत शुरू में पता चल जाये तो कहानी का लुत्फ़ नहीं रहता है। शुरू से बताता जो जो भी हुआ। 
 
           कुछ भी हो सकता है आज यकीन हुआ मुझे भी , अभी कुछ महीने पहले मेरे पासक्या था , अनाम इक लेखक। सभी कहते थे आप ने क्या हासिल किया है , साहित्य अकादमी क्या किसी स्थानीय संस्था तक से कोई पुरुस्कार सम्मान नहीं , किसी प्रकाशक से कोई किताब छपवाई नहीं। कितने साल से लिखते हर विधा में लिखा और देश भर में रचनाएं छपती रहीं फिर भी आपकी गिनती किसी में नहीं। सैंकड़ों व्यंग्य सैकड़ों ग़ज़ल कविताएं और जीवन की वास्तविकता पर मन को छूती कहानियां और झकझोर देने वाली रचनाएं आपके लिखे जनहित पर निडरता पूर्वक बेबाक लेख , इंसानियत के दर्द को कितना अच्छी तरह बयान किया है आपने। आपका अपना तरीका है सीधे साफ आसान शब्दों में बगैर कठिन गूढ़ शब्दों का उपयोग किये , अपनी खुद की शैली में लिखना बगैर किसी और से प्रभावित हुए आपकी रचना पढ़ना इक अनुभव कराती है। आपने क्यों अन्य मित्र लेखकों की तरह तमाम किताबें नहीं छपवाई , आपको ईनाम पुरुस्कार मिलते कैसे। आप किसी सरकारी संस्था , साहित्य अकादमी के सदस्य भी रहे नहीं कभी , किसी नेता अधिकारी से दोस्ती करके। जबकि अधिकतर लेखक खुद ये सब करते हैं अपनी ही जेब से पैसा खर्च कर किताबें छपवाना क्योंकि उनका मानना है इसी तरह उनका नाम सदा कायम रहेगा , दो सौ प्रतियां किताब की छपवा मुफ्त में पहचान वालों में बांट कर।

                          मैं भी सभी लिखने वालों की तरह चाहता था , मेरी भी किताबें कोई प्रकाशक छापता , मगर किसी ने संपर्क किया ही नहीं कभी। खुद अपने पैसे खर्च कर कुछ प्रतियां मुफ्त में बांटना वो भी उन को जिनको शायद पढ़ने में रूचि भी नहीं हो , मुझे उचित लगा नहीं। और अख़बार पत्रिका वाले भी बहुत कम हैं जो उचित मानदेय भी देना चाहते हों। करोड़ों की आदमनी करने वाले तक हिंदी के लेखक को इतना भी नहीं देना चाहते जिस से उस का जीवन यापन हो सके। शोषण की बात लिखने वाले लेखक खुद शोषण का शिकार हैं। मगर अख़बार और पत्रिका वाले नहीं मानते वो कोई गलत काम करते हैं , उनका विचार है वो रचना छाप कर लिखने वाले पर एहसान उपकार कर साहित्य की सेवा करते हैं। उनको रोटी की ज़रूरत है पेट भरने को मगर लेखक को भूख कहां लगती है , उसकी भूख तो छपने की ही है। कानून बदल गया हो तो क्या , आज भी जाने माने लेखकों को रायल्टी कौन देता है , भीख की तरह नाम को राशि देकर सभी अधिकार खरीद लेते हैं , गैर कानूनी ढंग से भी। मुझे इस सब से तालमेल बिठाना नहीं आया।

                     मगर अचानक कुछ महीने पहले मुझे इस बात का ख्याल आया कि , कोई नेता अपने भाषणों के जादू से ऐसा रुतबा हासिल कर चुका है जो भगवान से कम हर्गिज़ नहीं है। सब लोग समझते हैं जैसे कोई फरिश्ता या मसीहा ज़मीं पर उत्तर आया है हमारे सब दुःख दर्द मिटाने को। अब गरीबी भूख , अव्यवस्था , भरष्टाचार और महिलाओं बच्चों के शोषण , देश में फैली गंदगी जैसी समस्याओं का अंत कर अच्छे दिन सब को दिखाई देने लगेंगे। देश विदेश में भारत का नाम रौशन होगा और कोई किसान मज़दूर क़र्ज़ से तंग आकर आत्महत्या नहीं करेगा। सब को रोज़गार मिलेगा और सब अधिकार समानता के भी बराबर सबको। तीन साल तक कुछ भी ऐसा किये बिना ही टीवी अख़बार और सोशल मीडिया के उस चतुर खिलाड़ी ने विज्ञापनों द्वारा हर तरफ अपने नाम की गूंज खड़ी कर दी है। कोई जब उसको झूठा बताता है तब लोग मानते हैं जैसे कोई अधर्मी पापी भगवान का अपमान कर रहा है। जैसे कोई जादूगर तमाशा दिखलाता है और जो असंभव उसको देख हम सच समझने लगते हैं ,उसी तरह , मगर अंतर है हाल से बाहर निकलते हम समझ लेते जो देखा नज़रों का धोखा था असलियत नहीं। लेकिन इस जादूगर नेता का सम्मोहन खत्म नहीं होता बढ़ता जा रहा है। तब मुझे लगा बहुत लोग कोई आरती कोई चालीसा लिखते हैं चढ़ते सूरज को प्रणाम कर। मैंने ढूंढा तो पता चला अभी तलक नहीं सूझा किसी को ये। शायद मुझे ही करना होगा ये महान काम , इक भजन लिखना जो जन गण मन और सारे जहां से अच्छा गीत की तरह लोकप्रिय हो। जिस के बारे सरकार घोषणा कर दे कि इस भजन को गाने से सब समस्याएं हल हो जाएंगी और अच्छे दिन आ जाएंगे। जब मैंने ये अपना विचार सरकार को भेजा तो उसे पसंद आया ताकि हर विज्ञापन के साथ जोड़ इसको सोशल मीडिया पर उपयोग किया जा सके। और मैंने ये भजन लिखा।

           अब दिन अच्छे आये हैं , गूंगे भी सब गाये हैं। 

  भजन की धूम से हर तरफ मेरा नाम छा गया , और प्रकाशकों ने मेरा छपा अनछपा सब मुंह मांगे दाम देकर किताबों के रूप में छापा ही नहीं अन्य भाषाओं में अनुवादित भी किया। मुझे इक भजन ने मालामाल कर दिया है , मैं सुबह शाम उसी को गाता हूं और रोज़ बहुत कुछ मनचाहा पाता हूं। आप भी इस को जपना शुरू करो ताकि आपका भी कल्याण हो। मेरा संबोधन सुनकर सब तालियां बजा अभिवादन कर रहे थे खड़े हो कर। अचानक श्रीमती जी ने मुझे झकझोर कर जगा दिया , उठो अब दिन निकल आया है कब तक सोते रहोगे। काश मेरी नींद खुलती नहीं और मेरा सपना सच हो जाता , मेरा लिखा भजन राष्ट्रीय भजन घोषित किया जाता। कालजयी रचना इसी तरह रची जाती है।

जून 08, 2017

POST : 659 भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     भगवान धर्मराज की अदालत में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

सोचा ही नहीं था उसने , उसको तो लोग भगवान का दूसरा रूप ही मानते हैं , इक दिन उसे भी धर्मराज की अदालत में कटघरे में खड़ा किया जायेगा। और हिसाब लिया जायेगा अपने सारे कर्मों का , अपने हर कर्म को उम्र भर उचित ही माना है उसने। भला भगवान से कोई पूछता है उसने कुछ सही किया गलत किया , धरती पर तो उसको हर जगह विशेषाधिकार मिलते थे। न्याय करने की हर सरकारी जगह उसको न्याय देने वाला अपने बराबर कुर्सी पर बिठाया करता था , आखिर उसको भी मालूम ही होता था डॉक्टर की ज़रूरत कभी भी पड़ सकती है। हर कोई उसको हाथ जोड़ नमस्कार किया करता था सब जगह। धर्मराज ने पहला सवाल यही किया हे मनुष्य तुमने क्या क्या उचित कर्म किये क्या क्या अनुचित क्या याद हैं। डॉक्टर की आत्मा ने जवाब दिया मुझे अच्छी तरह याद है मैंने हमेशा बहुत अच्छे काम ही किये हैं , मैंने कितने लोगों की सेवा की है उनको रोगमुक्त किया है। धर्मराज बोले वह करना तो आपका कर्तव्य था आपने उस सब के लिए वेतन लिया सरकार से या फिर अपने हॉस्पिटल में अपनी फीस ली। मगर क्या आपने बदले में वही किया जो ईमानदारी पूर्वक आपको करना चाहिए था। आपने इक शपथ भी ली हुई थी , और आपने जाने क्या क्या तख्ती लगा रखी थी अपने बारे में अपने यहां उपलब्ध सेवा को लेकर ही नहीं ईश्वर की मूर्ति तस्वीर और बड़ी ऊंची आदर्शवादी बातें लिख कर। आप जो होने का दावा कर रहे थे क्या आप वही थे वास्तव में , आप कोई अनपढ़ नहीं थे अनजान नहीं थे पढ़े लिखे जानकर थे और खूब समझते थे अच्छा क्या है और बुरा किसको कहते हैं। आप की कहानी आपको फिर से याद दिलानी है ताकि आपको पता चले कि आज यहां आपको वास्तव में इंसाफ दिया जाना है आपके अच्छे और बुरे सारे कर्मों का हिसाब देखकर। और इक बात और समझ लो इस अदालत में ऐसा नहीं किया जाता कि अच्छे कर्मों का ईनाम जमा किया और बुरे का क़र्ज़ नाम लिखा और उसके बाद गणित लगाया क्या बचता है खाते में बनिये वाली बही की तरह। यहां अच्छा किया उसके अलग हिसाब और जो बुरा किया उसका अलग हिसाब किया जाता है। आपने जो किया संक्षेप में बताता हूं क्योंकि बाकी आप भी समझ सकते हो। 
 
                        आप डॉक्टर बन गए और सरकारी हॉस्पिटल में नौकरी मिली आपको , आप कभी समय पर हॉस्पिटल नहीं पहुंचे , आपने हॉस्पिटल जाने से पहले घर पर न केवल अनुचित ढंग से रोगी से पैसे लिए इलाज करने को बल्कि आपने तमाम लोगों से ऑप्रेशन की फीस भी वसूली जब कि आप सरकारी डॉक्टर थे। हैरानी की बात है कि तब भी आप मंदिर जाकर धार्मिक होने का दावा किया करते थे। आपने अपनी ड्यूटी अपने बड़े अधिकारी से मिलकर उस विभाग में लगवाई जिस में पुलिस केस वाले लोग आते और आप रिश्वत लेकर उनकी मर्ज़ी की रिपोर्ट लिखा करते थे। आपको वो सब करना कभी गलत नहीं लगा , रात को आपकी ड्यूटी होती तो आप अपनी जगह नहीं मिलते बल्कि कहीं जाकर सोया करते और आपकी जगह कोई चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी रोगी देख उनके स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया करता था। आपने इस तरह काली कमाई कर बहुत धन जमा कर लिया और फिर अपना निजि हॉस्पिटल बना लिया। आपने कभी किसी देश के कानून का आदर नहीं किया , अपना हॉस्पिटल भी आपने हर कायदे कानून की अवेहलना कर बनाया। आपने सड़क और फुटपाथ पर अनधिकृत कब्ज़ा किया अपने सामान को अपनी जगह में नहीं रख कर बाहर रखा। आपने बिना पूरी व्यवस्था किये गंभीर रोगियों के इलाज का दावा किया जबकि आपके पास उपचार का पूरा प्रबंध नहीं था। आपने अप्रशिक्षित लोग रख स्वास्थ्य सेवा के नाम पर रोगियों की जान को खिलौना समझ केवल पैसा बनाने को जो भी किया आप जानते हैं वो कितना गंभीर अपराध था। आपने कितनी बार रोगी को ध्यानपूर्वक देखना तक ज़रूरी नहीं समझा , बिना ज़रूरत उनके टेस्ट कराये बिना ज़रूरत एडमिट किया दवाएं लिखीं अपनी कमाई को , यहां तक कि आपने जानबूझकर घटिया दवाएं बिकवाईं अपने हॉस्पिटल में। आपने क्या क्या नहीं किया , आपके पास को ज़हर खाकर आया तो उसकी जान बचाने की बात से पहले आपने उसके घर वालों से अनुचित रूप से बहुत पैसा लिया ताकि उनकी सूचना पुलिस को नहीं देनी। आप इक अपराधी की तरह आचरण करते रहे और खुद को सभ्य नागरिक मानते रहे। याद करो जब कोई दुर्घटना का शिकार घायल आपके पास लाया गया तब आपने क्या किया। आपने किसी दलाल की तरह उन को बताया कि आपका ऑप्रेशन का खर्च तीस हज़ार आएगा जो आपको नहीं देना आपका जिस वाहन से टकराव हुआ उस से मांग कर मुझे दिलवाना है। मगर जब दूसरा पक्ष सामने आया और उसने बताया कि सब ने देखा गलती खुद इनकी ही थी हम तो मानवता की खातिर इसको हॉस्पिटल लेकर आये  हैं। ये बेशक एफ आई आर लिखवा दे हम साबित कर सकते दुर्घटना खुद इसी की गलती से हुई। और हमारे पर ड्राइविंग लाइसैंस और बीमा दोनों हैं , तब आपने बताया ऑप्रेशन ज़रूरी नहीं था पर जब रोगी को सलाह दे चुके तब करना तो होगा मगर उसकी फीस तीस हज़ार नहीं दस हज़ार ही होगी। आप डॉक्टर होकर ब्लैकमेलर की तरह काम करते रहे हैं। आपने कभी सोचा आपकी गलती से कितने रोगी जान से हाथ धो बैठे , आपने कभी मुफ्त कैंप की आड़ में कभी किसी और ढंग से रोगियों को छला है , कभी किसी को बाहर बड़े हॉस्पिटल में भेज कमीशन खाई तो कभी किसी अपने से छोटे डॉक्टर को या झोला छाप को कमीशन दी। 
 
             जब विश्व स्वास्थ्य संगठन के बार बार अनुरोध पर देश की सरकार ने कोई नियम कोई कानून बनाना चाहा ताकि रोगियों को स्वास्थ्य सेवा उचित तरीके से मिल सके तब आपको जनहित की बात अपनी मनमानी के खिलाफ लगी क्योंकि आपने असूल और मानवता के नियम को कभी समझा नहीं माना नहीं। हमारे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं जो आपके पल पल का हिसाब लगा झट से बताता। मगर इतना स्पष्ट है आपने जो भी किया खुद अपने पेशे को कलंकित ही किया। भगवान कहलाने की आड़ में आपने हैवानियत तक को शर्मसार किया है। अब आपको बहुत जन्म तक गंभीर रोगों का रोगी बन अपने कर्मों का हिसाब चुकाना होगा। बेशक आपने बहुत रोगियों को स्वास्थ्य सेवा देकर उनकी भलाई भी की मगर उसकी कीमत आपने ज़रूरत से कहीं ज़्यादा वसूली जो खुद धर्म करना ही अधर्म बन गया। आपने लूट की आमदनी से बहुत मज़े किये हैं , अब आपको बीमार भी बनना है और बेहद गरीब भी जिसको ईलाज करवाने को रोज़ मौत की तरह जीना हो। आप को फिर भेजा उसी देश में जायेगा जिस में सरकार अभी भी जनता को स्वास्थ्य सेवा या शिक्षा देना अपना कर्तव्य नहीं समझती। विकास के नाम पर विनाश जारी है आज भी , उसी देश में आपको जीने होगा शोषण का शिकार बनकर और हर सुविधा से वंचित होकर। और ये निर्णय केवल आपके लिए नहीं , न सिर्फ डॉक्टर्स की बात है , और भी तमाम पेशे वालों की गति यही होने वाली है। आपको पहले से मालूम तो था अच्छे बुरे कर्मों का फल इक दिन मिलना ही है।



     

मार्च 07, 2017

POST : 614 महिला दिवस मनाया गया ऐसे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  महिला दिवस मनाया गया ऐसे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हर साल शहर की महिलाओं का संगठन आठ मार्च को महिला दिवस मनाता ही है , जिस में शहर के सब से वरिष्ठ अधिकारी की धर्मपत्नी और विधायक और सांसद की पत्नियां मुख्य अतिथि होती हैं अध्यक्षता करती हैं। उनको महीना भर पहले से अनुरोध करना पड़ता है ताकि वो सभी उस दिन उपस्थित रहकर सभा की शोभा बड़ा सकें और महिलाओं का मार्गदर्शन कर सकें। इस बार भी ऐसा ही दोहराया गया और बड़े अधिकारी से मिल उनकी धर्मपत्नी को अध्यक्षता करने की विनती की गई। अधिकारी प्रशासनिक कार्य करने के साथ साथ लेखन का कार्य भी करते हैं और उन्होंने कहा आप बतायें हर साल आप कैसे मनाती हैं महिला दिवस। उन्हें बताया गया उस दिन सब शिक्षित और धनवान घर की महिलायें एकत्र होती हैं किसी जगह और महिलाओं के अधिकारों और उनकी समस्याओं पर भाषण दिये जाते हैं सुनकर तालियां बजाई जाती हैं। सब बन ठन कर आती हैं और कई तरह से मनोरंजक खेल खेले जाते हैं , सौंदर्य प्रतियोगिता , फैशन और कैसे खुद को फिट रखती हैं पर विमर्श किया जाता है। शहर में सब से सुंदर महिला का ख़िताब दिया जाता है और विवाहित महिला होकर भी खुद को बेहद आकर्षक बनाये रखने वाली महिला को सम्मानित किया जाता है। गीत संगीत होता है नाच गाना होता है और शीतल पेय से शुरू होकर स्वादिष्ट भोजन कई प्रकार का परोसा जाता है , अंत में चाय कॉफी और स्मृति चिन्ह मिलते हैं सभी महिलाओं को। इस तरह उस दिन महिलायें केवल मौज मस्ती करती हैं दिन भर और साबित किया जाता है कि आज की महिला जागरुक है और किसी भी तरह पुरुष से कमतर नहीं है।

                         अधिकारी को सब समझ आ गया और उसने कहा ये तो बहुत अच्छी बात है , पर क्या मैं भी उस आयोजन में शामिल होकर कुछ नया और सार्थक प्रयास कर सकता हूं। मैं चाहता हूं इस बार प्रशासन ये सब प्रबंध शानदार तरीके से करे और किसी बड़े मंत्री की पत्नी को भी आमंत्रित किया जाये। महिला संगठन इस पर राज़ी हो गया तो अधिकारी ने इक आग्रह और किया कि क्यों नहीं इस बार हम मिलकर समारोह तीन दिन पहले करें और आठ मार्च को उन महिलाओं से मिलकर उनके लिये कुछ सार्थक किया जाये जिन को शायद पता ही नहीं रहता किस दिन महिला दिवस है। इस तरह निर्णय हो गया तीन दिन पहले ही महिला दिवस मनाने का। और सब जैसा हर साल होता था उसी तरह और भी शानदार ढंग से किया गया , सारा प्रबंध भी प्रशासन ने किया और आलीशान बैंकट हाल में। आखिर में अध्यक्षीय संबोधन में अधिकारी ने प्रस्ताव रखा कि जो महिलायें आपके हमारे घरों में काम करती हैं उस दिन उनका अवकाश रख उनको महिला दिवस का उपहार दिया जाये , जो महिलायें मज़दूरी करती हैं उनको उस दिन छुट्टी देने की खातिर हम में से जो महिलायें सुख सुविधा से जीती हैं इक दिन उनका काम उनकी जगह करें। बोझ उठाना खेत में काम करना इंटें उठाना मिट्टी गोबर का काम करना , किसी ऑफिस की सफाई करना जैसे जितने भी काम उनको साल भर बिना अवकाश करने होते हम करें ताकि उनकी दशा हम समझ सकें। अधिकारी ने मंच से ही पूछा सभी बतायें क्या उस दिन वो ये करने को राज़ी हैं। सब ये सुनकर अचंभित भी थीं मगर दिखावे को सब ने हामी भी भर दी तालियां बजाकर। और घोषणा हो गई आठ मार्च को सुबह ही फिर से उसी जगह एकत्र होने की ताकि अधिकारी के बताये हुए स्थान पर जाकर सब अलग अलग अपना दायित्व निभा महिला दिवस को सार्थक बना सकें। आज महिला दिवस है मगर कोई भी महिला मंच की महिला आई नहीं है , सब ने कहलवा दिया है व्यस्त होने के कारण उपस्थित नहीं हो पाने की क्षमाप्राथी हैं। इस तरह देश की अधिकतर महिलाओं की तरह मेरे शहर की भी अधिकतर महिलायें आज भी अपनी रोज़ी रोटी की जद्दोजहद में लगी नहीं जानती ये महिला दिवस क्या बला है , इस को मनाने में किसका भला है। 
 

 

मार्च 02, 2017

POST : 613 देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    देशभक्ति का प्रमाणपत्र ज़रूरी (  तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      क्या आपके पास है प्रमाणपत्र , मुझे भी ज़रूरत है , बता दो कहां से मिलेगा। बहुत जल्दी में घबराये हुए आये और सवाल दाग दिया। समझ नहीं आया कैसा प्रमाणपत्र , धर्म जाति का , अगड़े पिछड़े का , किसी संस्था के सदस्य होने का। पूछा आराम से बैठो तो फिर कहो क्या चाहते हो। बोले बैठने को फुर्सत नहीं राजधानी जाना है , सुना है इसकी ज़रूरत पड़ेगी। हमने कहा किस प्रमाणपत्र की , क्या आधार कार्ड परिचय को। नहीं वो तो है पर मैं देशभक्त हूं इसके सबूत का कोई प्रमाण नहीं मेरे पास। मैंने पूछा आप देशभक्त हैं इसका सबूत कौन मांगता है , हर कोई देशभक्त होने की बात कह सकता है। वो बोले भाई आजकल इस पर बड़ी बहस छिड़ी हुई है हर जगह , टीवी चैनेल से लेकर सड़क तक। जो किसी को देशद्रोही नहीं मानता उसको देशभक्त नहीं मानते , जो किसी की देशभक्ति का कायल है वही देशभक्त है। कुछ समझ नहीं आया कौन देशभक्त कौन देशभक्त नहीं। हमने कहा भाई आजकल देशभक्ति की क्या आवश्यकता पड़ गई वो तो कब की प्रचलन से बाहर है। जब देश आज़ाद है तब क्या करना देशभक्ति का , मौज मस्ती करो और देश प्रेम के गीत गाओ , इतना काफी है। मगर वो फिर भी अड़े हुए हैं कि राजधानी जाने से पहले इक तमगा लगा कर जाना ही है। उनको जाकर इसी विषय पर चर्चा में हिस्सा लेना है। उनकी तसल्ली को आज़ादी के मुकदमें किताब निकाली ताकि देशभक्तों की जीवनी पढ़कर समझ सकें ये क्या चीज़ होती थी। तब पता करेंगे किसी बाजार से मिलती है या नहीं , पहले मालूम तो हो कहते किसको देशभक्ति। 

               इतिहास में कहीं नहीं मिला किसी ने खुद को देशभक्त साबित करने को किसी को कोई सबूत दिखलाया हो , न ही किसी ने दूसरे से मांगा ही कोई सबूत। क्या आजकल के सब नेता प्रशासनिक अधिकारी देश के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखते हैं , निस्वार्थ भाव से देश को अपनी सेवा देते हैं। क्या वो भी देशभक्त हैं जो सत्ता की खातिर कुछ भी करने को तैयार हैं , साम दाम दंड भेद सभी अपनाते हैं कुर्सी पाने को।

     या सब दूसरे को देशद्रोही घोषित कर मानते हैं इसी से वो देशभक्त हैं। तभी पता चला अपने नगर में भी आज इक जलूस निकाला जा रहा है , मशाल लेकर और नेता जी की प्रतिमा पर जाकर अपने खून से इक पोस्टर लिख राजधानी भेज रहे हैं। जाना पड़ा समझने को। जाकर देखा इक डॉक्टर सिरिंज से एक सी सी ब्लड निकाल इक बोतल में एकत्र करता जा रहा है , उसका उपयोग प्रमाणपत्र बनाने को किया जाना है। अभी दस लोगों की धमनियों से खून लिया था और सौ लोग कतार में खड़े थे , कोई पूछ रहा था इस तरह खून देने से कोई नुकसान तो नहीं होगा , किसी तरह का कोई रोग तो नहीं होगा , आपकी सिरिंज की सुई कीटाणुरहित तो है। कोई दूसरा सवाल कर रहा था कि सब अलग अलग ग्रुप के ब्लड को एक साथ जमा करना क्या उचित है। क्या सब का ब्लड ए , बी , ओ , और एबी , के लेबल से नहीं रखना चाहिए। कोई हिचकिचा कर ऊंची जाति नीची जाति के खून को एक साथ रखने पर सवाल कर रहा था। तभी राज्य स्तर के नेता जी आये और उनके साथ इक सहयोगी इक बाल्टी जिस में लाल रंग का पदार्थ भरा दिखाई दे रहा लिए हुए था। नेता जी ने समझाया और किसी को रक्तदान नहीं करना है , खून का रंग पक्का नहीं होता खून से लिखे प्रमाणपत्र जिन के पास थे भी नष्ट हो गये या कर दिए गए। ये रंग जिस कंपनी का है उसका दावा है पांच साल तक रंग कायम रहने का। जो लोग खून दे चुके उनकी फोटो टीवी और अख़बार वालों को दिखा देंगे , बाक़ी सभी के लिए इस रंग की सिहायी से लिख प्रमाणपत्र दिये जायेंगे , चंदा लेकर। आप चंदे की रसीद की फ़िक्र मत करना , कानून भले बीस हज़ार की या फिर दो हज़ार की सीमा बताये आप लाखों दे सकते बिना किसी पैन नम्बर के भी।

                    तभी हैलीकॉप्टर से देश के नेता जी भी पहुंच गये सभा स्थल पर , उन्होंने आते ही भाषण देना शुरू कर दिया। उन्होंने बताया आपको कुछ नहीं करना है , हम राजधानी से प्रमाणपत्र बनवा साथ लाये हैं , मगर लाल रंग हमारा नहीं है इसलिये लाल को छोड़ हर रंग का प्रमाणपत्र है। हम किसी एक दल के नहीं हैं गठबंधन में सभी का अपना अपना रंग तो है ही और वक़्त बदलते हम खुद भी रंग और दल कपड़ों की तरह बदलते रहते हैं। जिसको नीला पसंद उसको नीली स्याही वाला , जिसको काला पसंद उसे काली वाला , हरा , पीला सतरंगा सभी हैं अभी ले सकते।  जिस को दुविधा है जितने रंग के चाहे खरीद सकता है। देशभक्ति किसी एक रंग की नहीं हो सकती। आपको देश को कुछ भी नहीं देना , दो बूंद खून भी नहीं , बस ज़ोर ज़ोर से वही दोहराना है जो मंच से बोलने वाला बोलने को कहे। सत्ता का राग अपने राग को मिला एक सुर में जुगलबंदी करते अलापना है। राग दरबारी सभी को सीखना ज़रूरी है। याद रखना बयालीस साल पहले जो हुआ था , इक लोकनायक ने भाषण दिया था कि सुरक्षाकर्मी सरकार के आदेश पर बेकसूर जनता पर गोली नहीं चलाएं दमन नहीं करें , और उसको बगावत को  भड़काना कहकर आपात्काल घोषित किया गया था। सत्ता को गंधर्व राग सुनना है तो आपको गदहे की तरह मधुर स्वर में जय जयकार करनी होगी।  इक सबक ध्यान रखना है हम देशभक्त हैं इसके प्रमाणपत्र की कीमत तभी है जब हम साथ मिलकर शोर मचाते रहें कि जो हमको देशभक्त मानते नहीं वो असली देश भक्त नहीं हैं। दूसरे की देशभक्ति पर सवाल उठाकर ही खुद अपने आप देशभक्त साबित हो जाते हैं। जो खाली जेब आये थे उनको प्रमाणपत्र नहीं मिल सका , सब पैसे वाले , साधनयुक्त लोग , अपना अपना प्रमाणपत्र सोशल मीडिया पर दिखला रहे हैं। देशभक्ति आजकल फेसबुक व्हाट्सऐप और ट्विटर पर ही अधिकतर होती है।  
 

                                      नया अध्याय :-

 
   ये सात साल पुरानी रचना है ऊपर दोहराई गई है। अब देशभक्त होने का प्रमाण सबको हासिल हो सकता है मिल रहा है जगह जगह घर घर गली गली नगर नगर गांव गांव जिसको चाहिए ले कर प्रदर्शित कर सकता है । मान्यता सरकारी खुद ब खुद मिल जाएगी जिस ने तमगा लगाया होगा उस से कोई सवाल नहीं कर सकेगा। लगता है बहुत जल्दी देशभक्ति का नशा समाज देश पर इस कदर छा जाएगा कि धनवान उद्योगपति बड़े बड़े पैसे वाले रिश्वतखोर अधिकारी से घोटालेबाज़ नेता तक अपना काला सफेद धन देश को देकर  समाज से गरीबी भूख बेरोज़गारी बड़े छोटे का भेदभाव खत्म कर वास्तविक आज़ादी सब को समानता न्याय की लेकर ही रहेंगे। 
 

 

फ़रवरी 26, 2017

POST : 612 आधा सच है आधा झूठ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आधा सच है आधा झूठ ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

              सदा सच बोलो । ये तीन शब्द बेहद खतरनाक हैं । जो इनको मान ले उसकी दशा खराब हो जाती है । सच बोलने का सबक पढ़ाने वाले खुद सच ही बोलें ये लाज़मी नहीं है । एक बार झूठ को बेनकाब करने वाले भी झूठे साबित हो गये मगर तब भी उन्होंने अपने झूठ को झूठ मानने से इनकार कर दिया , कहने लगे ये उनका अपना नज़रिया है । इस तरह सच की इक और परिभाषा बना दी उन्होंने । सच वही जिसे आप माने । इस बात से अभिप्राय यूं निकला कि सच और झूठ परस्पर विरोधी नहीं हैं । दो जुड़वां भाई हैं , बस ये पता नहीं चलता कौन बड़ा है कौन छोटा । एक जैसे दिखते हैं हमशक्ल भाईयों की तरह , देखने समझने वाला धोखा खा जाता है । अंतर केवल रंग का है सच गोरा है झूठ सांवला सलौना सब का मन मोह लेता है । चाल ढाल दोनों की अलग अलग है , सच फटेहाल है झूठ सूटेड-बूटेड है चमक दमक लिये है । सब उसी को पसंद करते हैं सच को लोग दूर से देख कतरा कर निकल जाते हैं बचकर । सच अभी कुंवारा है बेघर है , भटकता रहता है किसी ऐसे की तलाश में जो उसको अपना बना ले । झूठ को हर दिन कोई न कोई वरमाला पहना देता है , उसके कितने ठिकाने हैं , बहुत घर हैं उसके । सच फुटपाथ पर रहता है तब भी खुश है इस बात पर लोग आचंभित हैं । झूठ का कुनबा दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है , खूब फल फूल रहा है । सच के भूखे मरने की नौबत आ गई है , इस ज़माने में उसका साथी कोई भी नहीं है । सच पर इल्ज़ाम है कि उसने बहुत लोगों की नींद उड़ा रखी है जिससे उनका जीना मुहाल है , वो चाहते हैं सच को सूली पे लटका दिया जाये । सच पर तमाम मुकदमें दायर हैं ।

                इक और दुकान खुली है सच बेचने का धंधा करने वालों की बस्ती में , जो दावा करती है असली सच उन्हीं की दुकान से मिलता है । जिसे ज़रूरत हो उनसे जब जितना सच चाहे खरीद सकता है , मुंहमांगे दाम चुकाकर । कीमत बाक़ी की दुकानों से थोड़ी अधिक है मगर उनका सच प्रमाणित है गारंटी वाला । सब लोग उनसे प्रमाणपत्र वाला सच खरीद अपने ड्राइंगरूम की दीवार पर टांग रहे हैं सच्चे कहला रहे हैं । किसी किसी ने तो घर के बाहर प्रवेशद्वार पर ही सच को टंगवा लिया है ताकि सब देख सकें । सच को हर कोई नहीं खरीद सकता , जिसकी हैसियत है वही मोल चुका सकता है । आजकल सच अमीर लोगों का रईसी शौक बन गया है , हर महंगी वस्तु की तरह । महंगा कालीन , महंगे शोपीस , बहुमूल्य पेंटिंग की तरह ही सच सजावटी सामान बन गया है । सच अब बोलता नहीं है उसके होंठ सिल चुके हैं , पिंजरे वाले तोते और गमले के पौधे के साथ इक कोने में शोभा बढ़ा रहा घर के मालिक की । आजकल सजावट में सूखा ठूंठ या कैक्टस का कांटेदार पौधा , मिट्टी के बर्तन घड़े जाने क्या क्या ऊंचे दाम खरीद लेते हैं ।

            सच बेचने वाले कमाल के अदाकार लोग हैं । झूठ के पांव नहीं हैं तो सच के पैर काट उन पे झूठ का बदन लगा बहुत तेज़ी से भगा सब को खुश कर देते हैं । उनको ये कला आती है तभी इस धंधे में उनका नाम है , उनके दफ्तर से निकल छोटे से कस्बे से चलता झूठ राजधानी पहुंच जाता है । सच हर जगह कत्ल किया जा रहा है , सभाओं में , बाज़ारों में , सरकारी भवनों में , अदालतों की चौखट पर , सब कहीं उसी के लहू की लाली है । मगर कोई स्वीकार करना नहीं चाहता कि सच को मार दिया गया है । सब कहते हैं सच ज़िंदा है , उनकी तिजोरी में अलमारी में या दफ्तरी फाइल में सुरक्षित है । अभी उसकी ज़रूरत नहीं है जब भी ज़रूरत हुई निकाल लेंगे । सच का दम घुटता रहे तब भी उसकी मौत नहीं हो सकती , सच कभी नहीं मरता ये मान्यता है । झूठ की जय-जयकार हो रही है , सच पर मुकदमा चल रहा है । कटघरे में खड़े सच को झूठ साबित किया जा रहा है । झूठ दावा कर रहा है बहुमत उसी के साथ है । शासन करने का अधिकार उसी को है । अदालत बेबस है उसको सबूत नहीं मिले सच को कैद करने अपहरण करने या मार दिये जाने के । जांच करने वाले सभी झूठ के साथी हैं , निष्पक्ष जांच हो सकती ही नहीं । अदालत जांचकर्ता को चेतावनी देती रही है कितनी बार मगर उस पर कोई असर नहीं होता है । झूठ किसी की परवाह नहीं करता , वो सच बनकर वातानुकूलित घर दफ्तर में रहता है । कोई भी मौसम हो उसको कुछ फर्क नहीं पड़ता , हर तरह के मौसम से ज़ेड केटगरी की सुरक्षा उसको मिली हुई है । 
 
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नवंबर 20, 2016

POST : 563 बातें राजा और बेताल की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      बातें राजा और बेताल की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  बेताल खुद वापस लौट आया और प्रधानमंत्री जी के कंधे पर लटक गया और बोला , " राजन अब आपको मौन रहने की ज़रूरत ही नहीं अब आप बेफिक्र हो जो भी कहना हो कह सकते हैं । अब मैं आपको छोड़ कहीं जा ही नहीं सकता क्योंकि जिस पेड़ पर मेरा ठिकाना था आपने उसे ही जड़ से काट कर उसका नामोनिशान तक मिटा दिया है । आपको हर दिन मैंने इक नई कहानी सुनाई है अभी तक , मगर आपने कभी खुद अपनी कहानी मुझे नहीं सुनाई । विश्व के सब से बड़े लोकतंत्र के आप निर्वाचित शासक हैं , आपकी ताकत का अंदाज़ा मुझे भी है । आपका पांच साल का कार्यकाल कब खत्म हो जायेगा आपको पता ही नहीं चलेगा , आपने देश की जनता को सुनहरे भविष्य का सपना दिखाया था और उसी से चुनाव जीता था । अभी तक जनता के जीवन में कोई ऐसा बदलाव हुआ दिखाई नहीं देता फिर भी आपको यकीन है अगला चुनाव भी आपका दल जीतेगा आपके ही भरोसे । आपके दल को भी आपके नेतृत्व और करिश्मे का ऐतबार है और सभी सोचते हैं आज आपसे लोकप्रिय कोई दूसरा नेता नहीं है न दल के भीतर न किसी और दल के पास । आप भी खुद को पहाड़ समझते हैं और बाकी सभी आपको बौने लगते हैं ।
 
 राजन आपने घोषणा कर दी है उस काले राक्षस का आपने अंत कर दिया है , जबकि आप भी जानते हैं उस दैत्य का ठिकाना जहां रहा है वहां तक जाने का साहस आप भी नहीं कर पा रहे हो । आप भी वही करने लगे हो जो पहले बहुत शासक करते आये हैं , शोले फिल्म के गब्बर सिंह की तरह सभी को समझाते हो कि मुझ से बचना है तो दूसरा कोई रास्ता नहीं है मेरी शरण में चले आओ । आपने किसी परिवार का अंत कर उसके मुखिया को अपाहिज बना डाला है , ताकि कोई आपसे लड़ने का साहस नहीं कर सके भविष्य में । आपके दल में सिर्फ आप ही आप हो और कोई कद्दावर नेता बचा नहीं है । आपके पास हर दिन इक नई योजना भी रहती है जनता को बताने को कि आप बहुत कुछ करना चाहते हैं । मगर आपको नहीं मालूम कि एक सौ चालीस  करोड़ जनता को सुनहरे दिन किस तरह दिखाई दे सकते हैं , आप चाहते हो कि अगले चुनाव में जनता आपका पुराना वादा भूल जाये और इक नया नारा सुन कर फिर से आपकी बातों में आ जाये । शायद पिछले चुनाव में सुनहरे दिनों का सपना दिखलाते समय आपको लगा ही नहीं था कि जनता उस पर भरोसा कर आपको इतना बहुमत दे सकती है । आपने सोचा तक नहीं था वो सपना हकीकत बनाना किस तरह है । "
 
 प्रधानमंत्री जी बोले , " बेताल तुम्हें लोकतंत्र की राजनीति का ज़रा भी ज्ञान नहीं है । जनता ने मुझे नहीं चुना था , जो पहले सत्ता में था उसको हराना था और विकल्प में मेरे सिवा कोई दूसरा दिखाई दिया ही नहीं उसको । पिछली सरकार की बदनामी मेरे बड़े काम आई , काला रंग सामने होता तभी सफेद रंग की चमक नज़र आती है । मुझे अपनी चमक बरकरार रखनी है पांच साल तक और अपने से ज़्यादा किसी को चमकने नहीं देना है , बस और कुछ भी नहीं करना है । रही जनता की बदहाली तो सरकार कोई भी हो उसकी चिंता अपना खज़ाना बढ़ाने की रहती है । कर तो जनता से ही वसूल करना होता है , और हर शासक अधिक धन चाहता है सत्ता की खातिर । यही अर्थशास्त्र है राजनीति का । चलो आज तुम्हें इक नीति कथा सुनाता हूं । जाग कर सुनना , कहीं नींद में आधी सुन बाद में भूल मत जाना , आम लोगों की तरह ।
 
 धरती का रस । यही नाम है उस कथा का । इक राजा शिकार को गया और रास्ता भटक अपने सैनिकों से अलग हो गया , दोपहर होने को थी और उसको गर्मी में प्यास लगी थी । चलते चलते उसको इक खेत में इक झोपड़ी नज़र आई तो वहां चला गया । इक बुढ़िया बैठी थी वहां , मगर सादा भेस में उसको राजा की पहचान मालूम नहीं हुई थी । राजा बोला मईया मुझे प्यास लगी है पानी पिला दो , बुढ़िया ने सोचा मुसाफिर है जाने कितनी दूर से आया है और आगे भी जाना होगा , इसलिये उसको पानी की जगह गन्ने का रस पिलाती हूं , और वो खेत से इक गन्ना काट लाई और उसका रस निकाल गिलास में भर राजा को दिया पीने को । रस पीकर राजा को बहुत अच्छा लगा और वो थोड़ी देर को वहीं छाया में चारपाई पर आराम करने लगा । राजा ने बुढ़िया से पूछा उसके पास कितनी भूमि है कितने बच्चे हैं और कितनी आमदनी होती है । बुढ़िया ने बताया उसके चार पुत्र हैं और चार जगह ऐसा ही इक खेत है सबका अपना अपना । चार रुपया आमदनी है , एक रुपया खर्च आता है और तीन रूपये बचत होती है , दो रूपये से घर चलता है , फिर भी एक बच ही जाता है जो बचत करते हैं । बात करते करते राजा सोचने लगा कि अगर मैं ऐसे हर खेत से एक रुपया अधिक कर लेने लग जाऊं तो मेरा खज़ाना कितना बढ़ सकता है । और उसको नींद आ गई थोड़ी देर को , जागा तो देखा दूर से उसके सैनिक आ रहे हैं । राजा ने बुढ़िया से कहा , मईया क्या मुझे एक गिलास और गन्ने का रस पिला सकती हो , बुढ़िया बोली ज़रूर , और फिर से खेत से इक गन्ना काट कर ले आई । मगर जब रस निकाला तो वो बहुत थोड़ा था इसलिए बुढ़िया इक और गन्ना लाई , मगर तब भी गिलास नहीं भरा , इस तरह चार गन्ने से एक गिलास रस मुश्किल से निकला । राजा भी ये देख हैरान हुआ और उसने बुढ़िया से सवाल किया , मईया पहले तो एक ही गन्ने से गिलास भर रस निकल आया था अब क्या बात हुई जो कम निकला रस । बुढ़िया बोली ये मुझे भी समझ नहीं आया कि इतनी देर में ऐसा क्या हुआ , मगर इतना सुनते आये हैं कि जब राज्य या देश का शासक लालच में आ जाता है और लोकहित को भुला देता है तब धरती का रस सूख जाता है । और प्रकृति में सब गलत होने लगता है । राजा समझ गया था ऐसा क्यों हुआ था । "

        बेताल प्रधानमंत्री जी की कथा सुन कर हंस दिया , तो प्रधानमंत्री जी ने हंसने का कारण पूछा । बेताल बोला राजन कोई भी व्यक्ति देश से बड़ा नहीं होता , सभी को कभी न कभी सत्ता को छोड़ना ही पड़ता है । एक सौ चालीस करोड़ की जनता किसी भी नेता या दल के रहमोकरम पर कभी नहीं रही है । चाहे कोई खुद को कितना शक्तिशाली समझता रहा हो सभी को जनता ने जब चाहा बदल दिया है । जाने क्यों तब भी किसी को ये बात कभी समझ नहीं आई है । मैंने सभी को आगाह किया है , आपको भी बताना चाहता हूं , जनता को मूर्ख समझने की भूल मत करना । राजन मैं तुम्हें फिर से छोड़ कर जा रहा हूं , मुझे किसी राजा किसी शासक के कंधे की सवारी की ज़रूरत नहीं है , न ही कोई पेड़ मेरा ठिकाना है । आज तुम्हें समझाया है कभी पहले वाले को समझाया था , कल जो शासक बनेगा उसको भी समझाऊंगा ही । मैं अपना फ़र्ज़ निभाता आया हूं , कोई समझे न समझे , अब वक़्त जाने या इस देश की अभागी जनता , जो बार बार ठगी जाती है ।

 

अक्टूबर 09, 2016

POST : 534 मेरा घर है या पागलखाना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     मेरा घर है या पागलखाना ( व्यंग्य )  डॉ लोक सेतिया 

                  उसको देखा तड़पते हुए ज़ख़्मी हालत में तो मुझे दया आ गई और मैं उसको अपने घर ले आया। नाम पूछा तो कहने लगा सच है मेरा नाम। मैंने कहा सच ये कैसी हालत हो गई है तुम्हारी , किसने घायल किया है तुम्हें। कहने लगा अब किस किस का नाम लूं , सभी तो शामिल हैं मुझे ज़ख्म देने में। जब कोई अदालत किसी बाहुबली नेता को बरी करती है सभी गुनाहों के आरोपों को निराधार बता कर तब एक गहरा घाव मेरे बदन पर होता ही है। जब हर दिन टीवी वाले और अख़बार वाले सत्ता के लोभी नेताओं का गुणगान करते हैं उनको देशभक्त बताते हैं तब भी मुझे ज़ख्म मिलता ही है।चाहे नेताओं के झूठ फरेब वाले भाषण हों अथवा मीडिया द्वारा तर्क कुतर्क से गलत को सही और झूठ को सच साबित करना , मेरी आत्मा तक को घायल करते हैं। सच को ये रोज़ क़त्ल करते हैं और खुद को सच का पैरोकार भी बताते हैं। मैं सच को अपने घर ले आया तो घर के लोग मुझ से नाराज़ हो गये , कहते हैं भला किस काम है ये आजकल , सच को घर में जगह देना बड़ी मुसीबत मोल लेना है।  मुझसे कहते हैं परिवार वाले कभी तो फायदे  का सौदा किया करूं , जो भी करता हूं घाटे का ही काम करता हूं। मगर मैंने सच को अपने घर में ठिकाना बनाने दिया और सोच लिया कि जब ओखली में सर दिया है तो मूसलों से क्या डरना। सच को शायद थोड़ा चैन अवश्य मिला होगा मेरी बात से फिर भी बोला भाई लेखक तुम मुझे अकेला तो नहीं छोड़ दोगे अपना बना कर। मैंने कहा तुम निराश क्यों होते हो , मैं ही नहीं यहां और भी तमाम लोग हैं जो तुम्हें बेहद चाहते हैं वो सभी तुम्हारे लिये बहुत कुछ करेंगे जब देखेंगे तुम्हारी दशा को। बस तुम एक बार चल कर उनसे मिल तो लो अख़बार वालों से टीवी चैनेल वालों से। वह हंस दिया , मगर उसकी हंसी में तंज नहीं दर्द था , अपनों द्वारा छले जाने का। कहने लगा कितने मूर्ख हो लेखक अभी तक नहीं समझे उनको , उन्हीं के कारण ही तो मेरी ऐसी हालत हुई है। कभी मेरा ठिकाना वही था  , अब तो उन्होंने मुझे निकाल बाहर फैंक दिया है , पहचानते तक नहीं मुझे आजकल। मुझे समझाते हैं खामोश रहो नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे। वो तो झूठ को सच साबित कर उसका कारोबार करने लगे हैं , कोई पत्रकार सच को तलाश करने नहीं जाता कहीं। उनको तो मेरी क्या खबर की भी परिभाषा तक याद नहीं है।

                        मैंने कहा चलो हम चलते हैं उनको अपनी बात कहते हैं , उनका दावा है सभी के विचारों को  अभिव्यक्त करने के अधिकार की रक्षा करते हैं वो। सच बोला सुना है मैंने मगर ऐसा वो केवल अपने लिये मानते हैं दूसरों के लिये हर्गिज़ नहीं , और जो उनसे सहमत नहीं हो उसके लिये तो कदापि नहीं। अब खुद को समाज का चौकीदार या रखवाला नहीं खुदा समझते हैं जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता , बस उन्हीं को हर किसी पर सवाल करने का हक है। देश समाज की भलाई से अधिक महत्व उनके लिये अपने अहम का है , समाज को जागरुक करना या बदलाव की बात करना उनका मकसद नहीं रहा , टी आर पी , प्रसार संख्या , सब से पहले और तेज़ कौन की अंधी दौड़ में शामिल होकर बाकी सब पीछे छोड़ आये हैं। आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास , पत्रकारिता की दशा ऐसी हो चुकी है। आज कुछ कहते हैं दो दिन बाद कुछ और कहते हैं , उल्टी बात को सीधा साबित करते हैं और कभी नहीं मानते कल जो कहा था वो गलत था , उनको खेद है। अपनी भूल कभी स्वीकार नहीं करते , औरों को खुद न्यायधीश बन अपराधी घोषित भी करते है और साबित भी। किसी से बयान लेते हैं मगर उसको बोलने नहीं देते , उसको कहते हैं आप यही कहना चाहते हैं , ऐसे अपनी बात अपने शब्द दूसरे के मुंह में ठूंसते हैं। हर बात में उनको अपना विशेषाधिकार याद रहता है , सभी को बराबरी का अधिकार हो ये उनको मंज़ूर नहीं है। प्रशासन और नेताओं से मित्रता करते हैं सरकारी विज्ञापन और अन्य सुविधा हासिल करने को , अपने काम निकलवाने को , अपनी गाड़ी पर प्रेस शब्द लिखवा समझते हैं अधिकार मिल गया यातायात नियमों को अनदेखा करने का। लगता है आज की पत्रकारिता निरंकुश है , बंदर के हाथ में तलवार की तरह खतरनाक। हर कोई इनसे भय खाता है , शरीफ लोग अधिक डरते हैं।

                 मैंने सच से कहा चलो आज खरा सच क्या है और किसके सच में खोट मिला है इसकी परीक्षा करते हैं।  इक नामी पत्रकार हैं जो साक्षात्कार लिया करते हैं हर किसी का और समझा जाता है नीर क्षीर को स्पष्ट कर सकते हैं। मैंने उनको फोन किया और बताया सच के बारे और पूछा क्या आप उस से मिलना चाहते हैं , सच से मुलाकात करेंगे ताकि उसका साक्षात्कार प्रकाशित कर सकें अपने कालम में। बोले पहले बताओ उसके पास कोई प्रमाणपत्र है सच होने का , किसी सरकारी विभाग से मिला परिचय पत्र , किसी अदालत ने उनकी सच होने की पहचान को शपथ लेकर प्रमाणित किया है। सच ने कहा भला सच को इनकी क्या ज़रूरत है , यूं भी यही सब तो झूठ लिये फिरता है सबूत सब को दिखने को। क्या खुद को सच साबित करने को मुझे भी झूठ ही का सहारा लेना होगा , प्रमाणपत्र पाने को। सच क्या सभी को समझ नहीं आता कि यही सच है। पत्रकार सच की बात से चिढ़ गये और बोले ये तो कोई पागल लगता है , मुझे किसी पागल से मिलने की फुर्सत नहीं है आज , आज तो मुझे साक्षात्कार लेने जाना है उन लोकप्रिय नेता जी का जिनको अदालत ने कई साल बाद ज़मानत पर रिहा किया है। किसी दार्शनिक ने कहा है सच बोलना पागलपन ही होता है , और समझदार लोग सदा सच से दूर रहते हैं ताकि किसी से बैर या टकराव की नौबत नहीं आये। झूठ की जय जयकार से लोग मालामाल हो जाते हैं। क्या जहां सच रहता हो वो पागलखाना होता है , मुझे अपने घर को क्या पागलखाना नहीं बनने देना चाहिये , क्या मैं भी पागल हूं , सच की तरह। 
 



 

अक्टूबर 05, 2016

POST : 530 मुहाफिज़ गरीबों के ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            मुहाफिज़  गरीबों  के ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     देखो तुम नाराज़ मत हो , जो हम कर रहे उसका बुरा नहीं मानो , ऐसा करना ज़रूरी है। टीवी का एंकर उस गरीब महिला को बहला रहा है , जो आग बबूला हो गई थी जब कैमरा मैन ने उसकी कमीज़ को फाड़ दिया था। वो समझ रहा है , तुम्हारी भूख और गरीबी पूरी तरह दिखाई देगी तभी देखने वालों पर असर होगा। तुम्हारी कमीज़ को इसीलिये फाड़ा गया है ताकि दर्शकों की नज़रें तुम पर ठहरें , नंगा बदन देखने को , तुम्हारे लिये सहानुभूति पैदा करना ही हमारा मकसद है आज। तुम्हें नहीं मालूम हमारे कैमरे की नज़र पड़ते ही छोटी से छोटी चीज़ बड़ी लगने लगती है। लाखों लोग तरसते हैं कि कभी मीडिया उन पर मेहरबान हो और उनका चेहरा टीवी पर आये और वो आम से ख़ास होकर फोकस में आयें ताकि सेलिब्रिटी बन सकें। तुम्हें मुफ्त में ये अवसर मिल रहा है , बस्ती की सीधी साधी भोली औरत को एंकर चुप करवा रहे हैं , सामने देखो सभी को तुम्हारी छिपी सुंदरता भा रही है। बेचारी महिला अपमानित महसूस करती करती मान गई है कि उसकी और बाकी गरीबों की भलाई हो रही है टीवी शो से , शायद यहां से निकलते ही उनको सब कुछ मिलेगा जो अभी तक सिर्फ सरकारी वादों घोषणाओं में ही था। एंकर खुद एक कठपुतली है उस के हाथों की जिसका टीवी चैनेल से अनुबंध है हर रविवार कोई चर्चा शो आयोजित करने का। सप्ताह भर उसको चिंता रहती है नया विषय तलाश करने की। काफी दिन से अख़बार और समाचार चैनेल वाले इस सदाबहार विषय को भुला बैठे हैं और फालतू की बहस में पूरा दिन उलझे रहते हैं , जैसे देश में भूख - गरीबी जैसी कोई समस्या बाकी ही नहीं रही , और सरकारी आंकड़े सच हैं। कुछ नया और दूसरों से अलग और सब से पहले की चाह में ये विषय आज की बहस का चुना है। प्रभावशाली बनाने को कुछ गरीब लोग बस्ती से पकड़ लाये हैं खुशहाली का सपना दिखला कर और शो के बाद भरपेट खाना खिलाने का वादा करके। कार्यक्रम शुरू होने से दो घंटे पहले उनको लाकर फोटोजनक रूप दिया गया है , कुर्ता पायजामा उतार धोती बनियान पहनाई गई है , किसी की सलवार कमीज़ बदल घाघरा चोली पहनने को कहा गया है। भूख से मुरझाये चेहरों को मेकअप से चमकाया गया है कैमरे की खातिर , इस पर इतना पैसा खर्च किया गया है जितने से वो सप्ताह भर भोजन कर सकते थे। मगर करें क्या मीडिया का कैमरा खाली पेट को नहीं देख सकता , मनहूस मुरझाया चेहरा उसको अच्छा नहीं लगता। बताया गया है यहां सब वास्तविक है , कुछ भी नकली नहीं है।

                  टीवी चैनेल के पास कुछ खास गिने चुने लोग हैं जो बुद्धिजीवी कहलाते हैं और हर विषय पर बहस कर सकते हैं। ज़रूरत हो तो एंकर ही तय करता है किस को किस पक्ष की बात कहनी है , और उनके विचार उसी पक्ष में बदल भी जाते हैं , मज़बूरी है उनकी दाल रोटी इसी तरह चलती है। उनका भी एक ग्रुप सा है , अपनी सुविधा से तय करते हैं आज किस को बुलाना है विषय का विशेषज्ञ समझ कर। जब टीवी पर उलझते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे जन्म जन्म के विरोधी हैं , इक दूजे की जान के दुश्मन , लेकिन रिकार्डिंग खत्म होते ही  सभी गले मिल बधाई दे रहे होते हैं प्रभावशाली ढंग से बहस करने की। नतीजा तुरन्त उनको हज़ारों रूपये का चैक मिल जाता है टीवी चैनेल से , उनका वास्तविक सरोकार इसी से ही होता है। गरबों की चिंता , पर्यावरण की बातें , सांप्रदायिक सदभावना जैसी बातें सिर्फ मिलने वाली राशि की खातिर होती हैं। 

                       सभी पैनिलिस्ट आ गये हैं , बहस शुरू हो रही है।आंकड़े बता कर सब को प्रभावित किया जा रहा है , कोई सेलफोन कार ऐ सी के आंकड़े लाया है तो दूसरे के पास भूख से मरने वालों की संख्या में साल दर साल बढ़ोतरी के आंकड़े भी हैं। कोई बता रहा गरीबी की रेखा से नीचे प्रतिशत लोग है तो कोई देश में बढ़ती करोड़पतियों की गिनती बता रहा है। लेकिन कैमरा बार बार वहीं जाकर रुक जाता है जहां उस महिला की कमीज़ को फाड़ दिया था ताकि उसकी गरीबी के साथ सुंदरता भी दर्शक देख सकें। इक पैनेलिस्ट भी ये देख खुद को रोक नहीं पाता और बात बात में इशारा भी करता है कि जिसके पास भगवान की दी ऐसी खूबसूरती हो उसको गरीब कहा ही नहीं जाना चाहिये। उसके पास तो खज़ाना है , सभी बेशर्मी से खिलखिला देते हैं। पूरी चर्चा में कहीं भी किसी के चेहरे पर गरीबी और गरीबों की दुर्दशा पर संवेदना का भाव भूले से भी आया नहीं। टीवी शो की शूटिंग पूरी होने के बाद सभी मेहमान साथ के हाल में डिनर का आंनद ले रहे हैं शाकाहारी मांसाहारी और शराब के जाम का भी लुत्फ़ उठाया जा रहा है। उन गरीबों को सभी भूल गये हैं जो कब से खाना मिलने की आस लगाये हुए थे। गरीबी घबरा गई है अमीरों को करीब देख कर , गरीब बाहर निकल आये हैं , एक भूख से बेताब ने साहस कर वहां खड़े किसी से पूछ ही लिया कि उनको खाने को कब मिलेगा कुछ। बताया गया है बड़े लोग खा रहे हैं , उनके खाने के बाद जो बचेगा तुमको बांट दिया जायेगा। शायद गरीबों के प्रति सहानुभूति बहस में ही खर्च हो गई थी , खाने के वक़्त दिलों में इंसानियत बाकी ही नहीं बची थी। सारे भूखे गरीब इक बैंच पर बैठ इंतज़ार कर रहे थे रोटी मिलने का। बहुत देर बाद एक पैनलिस्ट और एंकर झूमते हुए निकले थे , गरीब हाथ जोड़ खड़े हो गये थे। ये वही पैनलिस्ट थे जो सुंदरता को दौलत बता रहे थे , एंकर से कह रहे थे उसको मेरी कोठी पर आने को कह देना , मुझे उसकी गरीबी पर बहुत तरस आ रहा है। कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। खास लोगों के जाने के बाद बचा हुआ कहना पैक कर गरीबों को दिया जा रहा है , घर जाकर खाने को। अब ऐसी साफ सुथरी जगह उनको खाने की अनुमति भला कैसी दी जा सकती है।  गरीब आज भी अमीरों की गरीबी दूर करने को काम आये हैं  , आखिर इन्हीं के नाम से कार्यक्रम सफल होगा और टीवी वालों को खूब मुनाफा भी होगा विज्ञापनों की आमदनी से।

                     एंकर उस गरीब महिला से बात कर रहे हैं , उनका विज़िटिंग कार्ड देकर समझ रहे हैं , तुम उनको खुश करोगी तो गरीबी कभी तुम्हारे पास तक नहीं फटकेगी। पैसा घर नाम कार तक सब मिलेगा। अच्छा , गरीब महिला ने पूछा उनको खुश करने को क्या करना होगा मुझे , ये भी बता ही दो। बस उनकी रातें रंगीन करनी होगी , बेहद बेशर्मी से एंकर बताता है। गरीब महिला गुस्से से पूछती है , क्या तुम लोग इसी तरह अमीर बने हो , क्या क्या बेचा है , अपना ज़मीर भी। अपने पूरे कार्यक्रम में क्यों ये नहीं बताया कि तुम सभी की सोच कैसी गिरी हुई है , गरीबी मिटाने का यही उपाय समझ आता है तुमको। इक बात जान लो अगर ऐसे गरीबी मिटानी होती तो हम कब के गरीबी से छुटकारा पा लेते , मगर नहीं हमको तुम जैसे दोगले लोगों की दिखाई रह पर कभी नहीं चलना। आज तुम पर ऐतबार कर धोखे में आ गये थे पर अब देख लिया तुम लोगों का चेहरा उतरी हुई बकाब के बाद। सच तुम बेहद कुरूप हो , हमारी गरीबी कभी इतनी कुरूप नहीं हो सकती। 

अगस्त 03, 2014

POST : 447 जश्न आज़ादी का ( तरकश ) डा लोक सेतिया

         जश्न आज़ादी का ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

            नेता जी सलामी ले रहे थे। ऐसे चल रहे थे मानो कोई ठेल रहा हो। कदम थे कि उठने का नाम ही नहीं ले रहे थे। देश के विकास की तरह गति थी। सुरक्षा कर्मी उनको हिदायत दे रहा था कि लाल कालीन पर ही चलना है। नेता जी देश को सही दिशा में ले जाने और विकास करने की बात दोहरा रहे थे भाषण में। पूरा देश छुट्टी मना रहा था। हम भी टीवी पर वही तमाशा देख रहे थे। घर से बाहर निकले तो एक रिक्शा वाला नज़र आया , हमने उसको बुलाया तो वो वो हमारे पास चला आया। हमने पूछा तुम्हारा नाम क्या है। "भारत नाम है मेरा साहिब " बताया उस फटेहाल ने। नाम सुनकर अच्छा लगा , वास्तविक पहचान लगी , महान लगा। हमने उसको प्यार से कहा , भारत तुम आज़ाद हो , आज आज़ादी का दिन है आज तो छुट्टी मनाओ , आज जानवरों की तरह बोझा न ढोवो। वो कहने लगा अरे बाबू ज़रा ये तो बताओ कि हमें किस बात की आज़ादी है। अगर छुट्टी मनायेंगे तो शाम को घर का चूल्हा कैसे जलेगा , पूरा परिवार भूखा सोयेगा रात को आज के दिन।

     ये आज़ादी का जश्न मनाना तो उन लोगों का चोंचला है जिनको पेट भरने की चिंता है न रहने की कोई समस्या। वो भले कोई काम नहीं करें फिर भी ठाठ से रहते हैं। जनता के पैसे से राजसी ठाठ से रह गरीबी पर भाषण देते हैं हर बार। ये घोटाले करें , लूट मार करें , अपराधियों से गठजोड़ करें इनको आज़ादी है। ये वोट लेने के लिये हमको झूठे वादे करें , प्रलोभन दें कि अगर हमारी सरकार बनी तो क्या क्या मुफ्त में बांटेगे , कोई इनसे सवाल नहीं करता कि ये सब आपका दल देगा , आपके नेता देंगे अपने पास जमा की हुई लूट की दौलत से या जनता का सरकारी धन बर्बाद करेंगे अपनों को खुश करने को। चुनाव आयोग को क्या नज़र नहीं आता ये अनुचित ढंग से वोटर को ललचाने का तरीका। सतसठ साल में इनसे इतना भी नहीं हुआ कि देश की दो तिहाई जनता को दो वक़्त रोटी ही मिल सकती , और हर दिन देश का धन बर्बाद करते रहते हैं ऐसे ही समारोहों पर आयोजनों पर। कसके लिये है ये जश्न , क्या उनके लिये जो आज भी गरीबी की रेखा से नीचे हैं। यही पैसा उनको बुनियादी सुविधायें देने , उनकी शिक्षा , स्वस्थ्य आदि पर खर्च होता तो बेहतर था।

           हमने कहा भारत तुम कहते तो ठीक हो फिर भी तुम आज तो मिठाई खाना क्योंकि आज ही के दिन हमने विदेशी गुलामी से मुक्ति पाई थी। वो बोला क्यों उपहास की बात करते हो बाबू , रोटी खाने को पैसे नहीं हों , घर में आटा दाल चावल कुछ भी नहीं हो , बच्चे बीमार हों तब मैं सब को भुला कैसे मिठाई खा लूं। ये तो नेता लोग ही कर सकते हैं कि जनता की हालत जो भी हो इनको शाही शानो-शौकत से रहना है। हमने कहा हे मूर्ख जब ख़ुशी मनानी हो जश्न मनाना हो तब सब समस्याओं को भुला क़र्ज़ लेकर भी मिठाई खा लेते हैं। देश पर अरबों रुपये का क़र्ज़ है , लोग भूखे हैं , बेघर हैं , बेरोज़गार हैं ,उग्रवाद है , विपतियां हैं , दुर्घटनायें हैं तब भी सरकार नित नया जश्न मनाती रहती है। नई आर्थिक नीति लागू है जिसमें इंसान इंसान नहीं हैं उपभोक्ता है , कम्पनियों से लेकर सरकारों तक के लिये। तुम भी अपना ढंग बदल लो और नये ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चलो। रिक्शा वाला हमें वहां ले आया था जहां सरकारी समारोह चल रहा था।

                                       धूप में , गर्मी में स्कूली छात्र छात्रायें कर्यक्रम की शोभा बढ़ा रहे थे , मनोरंजक प्रस्तुति देकर। नेता अफ्सर , खास लोग ताली बजा रहे थे , शामियाने में छांव में बैठ कर आनंद लेते हुए , शीतल पेय का पान करते हुए। मगर जो बच्चे घंटों से धूप में , गर्मी में प्यास से व्याकुल थे उनको हिलने तक की आज़ादी नहीं थी। ऐसे में इक बच्ची बेहोश होकर गिर गई थी , उसको छाया में ले जाया गया और पानी पिला होश में लाया गया। अध्यापक उसको ऐसे देख रहा था मानो उसने कोई अपराध किया हो। उसको घर वापस जाने को कह दिया गया , उसको आज़ादी का सबक याद करवाना था , उसको आज़ादी तो नहीं थी। अब चौदह नवंबर को उसकी बात होगी , फिर किसी दिन मानव अधिकारों की भी बात होगी , आज उस सब का कोई मतलब नहीं था। परेड के बाद रेवड़ियों की तरह ईनाम - पुरुस्कार वितरित किये गये , तालियां बजाई गईं , जन-गण-मन गीत गाया गया।

                                    कुछ मज़दूर जो कई दिन से समारोह की तैयारी में दिहाड़ी पर लगे हुए थे , समारोह की समाप्ति पर फिर सब ठीक पहले सा करने के काम पर लग गये। उनको कई दिन की बकाया मज़दूरी मिलने की उम्मीद थी , मगर उनको बताया गया कि आज छुट्टी का दिन है उनका पैसा आज नहीं दिया जा सकता। वो आज भी प्रशासन के सामने हाथ जोड़े खड़े थे , अपने हक की भीख मांगते। उनकी गुलामी का अंत अभी भी नहीं हुआ है , साहूकार , मिल मालिक , ज़मीदार सब आज भी उसको बंधक बनाये हुए हैं। उधर सरकारी बाबू अधिकारी को बता रहा है कि कितना पैसा खर्च हुआ और कितना बचा लिया है मिल बांट कर खाने को। सब  कर्मचारी - अधिकारी अपना हिस्सा लेकर जा रहे हैं ताकि अपने परिवार के साथ आज़ादी का जश्न मना सकें , फिर जाने कब ऐसा अवसर मिलेगा छुट्टी मनाने का। बाहर सड़क पर  पुलिस वाले लोगों को रोके खड़े हैं , मंत्री जी का काफिला जो गुज़रना है। कोई भूले से उधर से जाने की कोशिश करे तो डंडा चलने को तैयार है। मंत्री जी की सुरक्षा भारी है आम जनता की आज़ादी पर।

( ये मन घड़ंत नहीं है , ऐसा देखा है खुद अपनी नज़र से। शायद हर जगह हर साल दोहराया भी जाता है )