अक्टूबर 17, 2026

POST : 2131 तिरंगा फहराएंगे ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

                तिरंगा फहराएंगे  ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

बलशाली नहीं हैं सब के सब कायर हैं 
आधुनिक काल के कुछ जनरल डायर हैं ।
 
पुलिस फ़ौज बंदूकों से न तलवारों से 
निहत्थे लोग कभी नहीं डरते अय्यारों से ।    
 
( अय्यारों का अर्थ है बहरूपियों ) 
 
सत्ता का अहंकार जनता मिटा देती है 
हर तानाशाह को जब चाहा हटा देती है ।  
 
कब तलक विरोध को कोई भी दबाएगा 
जनभावनाओं से जो उलझेगा मिट जाएगा । 
 
हमने तो कफ़न अपने सर पे बांध रखा है  
मुल्क का भविष्य पढ़ो  दीवार पर लिखा है ।  
 
जो बिक चुके हैं कभी नहीं समझ पाएंगे 
बे - ज़मीर लोग ज़िंदा होकर भी मर जाएंगे ।  
 
कौन रोक सकता है हम तो ज़रूर आएंगे 
अपना तिरंगा शान से सब मिल फहराएंगे । 
 

 

अक्टूबर 13, 2026

POST : 2130 बहुत देखी आज़ादी ग़ुलामी देखिये ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बहुत देखी आज़ादी ग़ुलामी देखिये ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

आपको अभी भी समझ नहीं आया तो सरकार क्या करे , शुरू में ही आपको आगाह किया गया था विरोध अनुमति ले कर ही कर सकते हैं । अनुमति मिल भी गई थी तब भी काक्रोच जनता पार्टी को अंजाम दिखाई देना था पुलिस ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी दमन करने में , सरकार समझौता कर कब बदल जाये मुकर जाये उसको कौन रोकेगा ।  फिर भी कोशिश थी इशारों इशारों से सावधान करने को चेतावनी कितनी तरह से दी गई दी जाती रही ।  जनता नासमझ है समझदार होती तो ये सभी दलों के राजनेता संसद की जगह किसी कैद में हो सकते थे , देशभक्ति ईमानदारी और संविधान कानून की बातें करने वाले राजनेता आला अधिकारी और ख़ास समझा जाता धनवान वर्ग कभी जनता और समाज के प्रति निष्ठावान नहीं होते हैं । कुर्सी और सत्ता उनका एकमात्र ध्येय रहता है , लोग उनकी शिकायत भी उन्हीं से करते हैं नतीजा शून्य मिलता है । आखिर सरकार ने सभी पर्दों को हटा दिया है और उसकी असली सूरत सीरत सामने है ।  विरोध प्रदर्शन करने को जंतर मंतर नहीं जहां सरकार को परेशानी नहीं हो दूर कहीं जाकर लोकतंत्र का मातम मनाते रहना , शायद तेहरवीं या श्रद्धांजलि सभा की तरह कुछ फूल चढ़ाकर औपचारिकता निभाते रहें ।  
 
सरकार ने आपको नई व्यवस्था समझानी है , आपको आज़ादी विरोध प्रदर्शन इत्यादि बेकार की बातों को छोड़ कुछ नया आधुनिक सीखना समझना होगा ।   आप सत्ता का गुणगान करिये जहां मर्ज़ी जैसे मर्ज़ी सरकार खुश हो कर आपको मालामाल करेगी , यकीन नहीं हो तो टीवी चैनलों गोदी मीडिया से पूछिए । उनको ऐसा चश्मा मिलता है महंगा धन दौलत का जिस से उनको चारों तरफ विकास की चमक दमक दिखाई देती है कोई अन्याय अत्याचार कोई ज़ुल्म नहीं नज़र आता है  । आप जिनको अंधभक्त कहते हैं उनसे जानिए कि ऐसा करने से क्या परमसुख प्राप्त होता है । पहले ग़ुलामी का मज़ा चखिए फिर कहिए आज़ादी का क्या करना है क्या अचार डालोगे । 79 साल की बूढी है आज़ादी उसकी हालत क्या पूछते हैं ज़िंदा है कि मर गई आपको खबर ही नहीं है ।  
 

 

अक्टूबर 12, 2026

POST : 2129 चिड़िया चुग गई खेत ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

        चिड़िया चुग गई खेत ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया  

खाये आम ख़ुद पर हैं बबूल बोये  
समझते काम अच्छा कबीरा रोये  
जनाज़ा लोकतंत्र का निकाल रहे 
नशे में चूर हैं लगते हैं खोये खोये । 
 
बजाओ ताली कहता हर मदारी 
भुलाने को दुःख दर्द जितने ढोये 
घूंघट हटा कर के नाचना झूमना है 
नंगे हम्माम में हैं लाज शर्म धोये ।  
 
उसूलों पर जिए लोग सब मर गए  
उनका नाम लेकर हैं लोग तर गए  
पाबंदी सरकारी दिल्ली मत आना 
कितने बेगुनाह हैं जेलों में भर गए ।  
 
जनता ख़ामोश रहना बोलना मत 
सुनकर आवाज़ शासक भी डर गए 
खेलते रहे सभी मिल चोर सिपाही 
लुटेरे आये काम अपना वो कर गए । 
 
साहूकारों को दिया सब कुछ जब बेच 
पछताए से क्या चिड़िया चुग गई खेत ।  
 

 
 
 
 
 
 
 

POST : 2128 इंदिरा गांधी जयप्रकाश संवाद ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

       इंदिरा गांधी जयप्रकाश संवाद ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया  

किसी और दुनिया में ख़ुद ही स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री लोकनायक से मिलने पहुंची बहाना था 11 ऑक्टूबर का जन्म दिन का अवसर उचित लगा ।  मुझे देश क्षमा नहीं करेगा लेकिन मुझे आपसे क्षमा मिल जाएगी जानती हूं , पिता समान हैं आपने चाचा होने का फ़र्ज़ निभाया था हमेशा ।  मेरे पिता आपका बड़ा आदर किया करते थे भले उनकी आपकी दोनों की राजनीतिक विचारधारा अलग अलग थी , लेकिन दोनों की राष्ट्रभक्ति एक समान थी ।  रास्ते अलग अलग थे मंज़िल एक ही लक्ष्य समाज देश विशेषकर शोषित वंचित जनता को अधिकार और बुनियादी सुविधाएं देने का संकल्प था ।  मुझे याद है कि एक बार चुनाव में जब जवाहर लाल नेहरू जी भाषण दे रहे थे और उनको जानकारी मिली थी कि उनके कुछ समय बाद वहीं  उस शहर में आपने जनता को संबोधित करना है तब उन्होंने एकत्रित भीड़ को कहा था कि मुझे मालूम हुआ है जयप्रकाश जी ने भाषण देना है मेरा आपसे आग्रह है कि आप उनको अवश्य सुनिए , हमारे बीच राजनीतिक मतभेद हैं लेकिन वह बहुत ही शानदार व्यक्ति हैं उनकी बात सुनकर आपको सुखद अनुभव होगा ।  ये बात मुझे ध्यान रखनी चाहिए थी और आपने जो 25 मार्च 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में भाषण में बोली थी , वो बिलकुल सही थी और मैंने उसको कारण बनाकर आपात्काल की घोषणा कर गलती ही नहीं बल्कि बड़ा अपराध किया था ।  आपने पुलिस सुरक्षाबलों और प्रशासन से उचित ही कहा था कि वो सभी किसी सत्ताधरी शासक सरकार या राजनेता के नौकर नहीं देश कानून और संविधान के प्रति कर्तव्य निभाना उनका मकसद है , इसलिए कोई भी जनता या नागरिक पर लाठी गोली चलाने का आदेश देता है उनके शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करने पर तब आपको उनका आदेश नहीं मानना है और विवेकपूर्ण न्यायसंगत निर्णय लेते हुए शासक से इनकार कर सकते हैं ।  आज वही बात मेरा पोता जनता और सत्ता को बताना चाहता है लेकिन किसी पर कोई असर ही नहीं हो रहा है , मेरी तरह से सत्ता का अहंकार किसी और को गुमराह कर रहा है ।  लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई बात कितनी खरी साबित हुई है बस आपसे क्षमा याचना से रूह को चैन मिलेगा ।   
 

 

अक्टूबर 10, 2026

POST : 2127 अपनी मौत का सामान ले चले ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         अपनी मौत का सामान ले चले  ( तरकश )   डॉ लोक सेतिया

कभी कभी ख़ामोशी जो कहती है शब्दों से नहीं ब्यान किया जा सकता लेकिन आजकल शोर शराबा बहुत है ऐसे में जिसको ख़ामोशी की आवश्यकता होती है ढूंढते हैं कोई जगह कहीं मिल जाये ।  ऐसा क्यों है जिस दौर से हम पचास साल पहले गुज़र चुके हैं लगने लगा है वही दौर वापस लौट कर पहले से बढ़कर दुश्वारियां सामने खड़ी कर रहा है ।  तब कोई शख़्स था जो दिखाई देता था साहस और यकीन के साथ उस कोहरे को हटाकर खुले आसमान को दिखाएगा । लेकिन आज तो घना अंधकार छाया हुआ है मगर कोई उजाला करने वाला दूर दूर तलक दिखाई नहीं देता । कहने को कितने लोग जतलाते हैं कि वो सब कुछ जिसको ध्वस्त किया जा चुका ही नहीं निरंतर ध्वस्त करने का प्रयास जारी है उस सब को फिर से दोबारा पहले जैसा बना देंगे , लेकिन तब किसी की बात उसके मकसद पर शंका का सवाल ही नहीं था जबकि आज चाह कर भी फिर किसी पर भरोसा किया ही नहीं जा सकता ।  ऐसा इस कारण है कि उस एक शख़्स जैसा कभी कोई दूसरा नज़र कभी नहीं आया जिस को ख़ुद अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए था सिर्फ देश जनता की चिंता थी । अब तो बार बार यही हुआ है कि जिसे समझते कुछ था पर अवसर मिलते ही वही आदमी कुछ और ही निकला और जितनी आशाएं जगाई थी उस से कहीं अधिक कई गुणा निराशाओं का कारण साबित हुआ ।  तभी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहना है और कहना भी किस को है इधर कोई किसी की बात सुनता ही नहीं है । सभी बोलना जानते हैं वह भी बिना सोच विचार किए ही ।  
 
दिल में कितने अरमां थे जब किसी को ढूंढ कर लाए थे भिखारी से बादशाह बना बैठे , ये आशिक़ी भी ख़ुद ही अपनी जान की दुश्मन होती है । जितना भरोसा करते हैं उतना ही अधिक धोखा खाते हैं हम बदनसीब दिल में बसा कर प्यार अरमान ले चले हम आज अपनी मौत का सामान ले चले ।  ऐसे कितने फ़िल्मी गीत गाकर दिल को बहलाते हैं कि हमारे साथ जो हुआ जाने पहले किस किस के साथ होता ही रहता है ।  अब किसी की बातों पर यकीन नहीं करना बस सभी देवता लगते हैं साबित आदमी तक नहीं होते बाद में ।  जावेद अख़्तर जी फ़रमाते हैं ,   नर्म अल्फ़ाज़ , भली बातें , मुहज़्ज़ब लहज़े , पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं ।  ऐसे में किसी शायर की इक ग़ज़ल याद आई है उसी को पढ़ते हैं सोचते समझते हैं ।   
 

तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला 

मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला । 

मैं रफ़्ता रफ़्ता हुआ क़त्ल जिस के हाथों से 

वो बदनसीब  वो क़ातिल मैं आप ही निकला । 

     ( शायर का नाम मालूम  नहीं है )  


 

 
            

अक्टूबर 08, 2026

POST : 2126 दिन साल महीने गिनते ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया

                  दिन साल महीने गिनते ( फ़लसफ़ा ) डॉ लोक सेतिया  

मुसाफ़िर हैं चलना है चलते रहना है निर्धारित लक्ष्य अथवा मंज़िल तक पहुंचना ही नहीं मंज़िल को पाना भी है ।  लेकिन होता कुछ ऐसा है कि अधिकांश लोग अक़्सर एक सीमित  दायरे में या परिधि में ही चक्र लगाते रहते हैं जीवन भर  । कुछ सालों से इक व्यर्थ का चलन राजनीति में चल पड़ा है किसी सरकार का एक दो तीन चार वर्ष का कार्यकाल पूर्ण होने का जश्न मनाना ।  सत्ता या कुर्सी का ऐसा मोह वास्तव में शासकों को सही मार्ग से भटकाने का काम करता है  । शासन में बने रहना किस काम का अगर आपने देश समाज को कुछ भी बेहतर ही नहीं बनाया है तब ।  अभी किसी ने कहा कि किसी राजनेता का इतने साल निरंतर शासन में रहने का रिकॉर्ड बनाना महान बात है ।  ये कुछ वैसे ही है जैसे इधर कुछ लिखने वाले हर कुछ समय के बाद प्रकाशित किताबों की गिनती को बताते गर्व का प्रदर्शन करते हैं मगर कभी नहीं सोचते कि उनके लेखन में कितनी गहराई पहले से अधिक हुई है कुछ समाज को हासिल हुआ है या सिर्फ कुछ नाम शोहरत ईनामात पुरूस्कार का संचय करना ही लक्ष्य रहता है ।  हमने ऐसे महान राजनेता देखे हैं जो बहुत थोड़े समय तक पद पर रहे लेकिन उन्होंने उस समय में ऐसे कीर्तिमान बनाये जो कोई पचास वर्ष शासन कर भी नहीं कर सकते हैं  ।  नाम बताने की ज़रूरत तो नहीं है , सभी को लाल बहादुर शास्त्री जी इक ऐसे में ऊंचे शिखर पर खड़े दिखाई देते हैं , कभी कोई प्रयास नहीं किया बड़ा कहलाने का , छोटे कद का आदमी कितना बड़ा किरदार हर तरह से निभाया था ।  कोई हुआ जिस ने उनकी तरह रेल दुर्घटना होने पर त्यागपत्र खुद दे दिया हो ।  आज लोकतंत्र का विध्वंस करने वाले भी कितना विरोध होता रहे पद नहीं छोड़ना चाहते बल्कि इक मिसाल कायम कर रहे हैं लोकलाज को ताक पर रखने की । 
 
चलिए आपको कुछ और नाम याद दिलाते हैं बाबू जगजीवन राम जी को लेकर कभी सोचा है जिस जिस विभाग में मंत्री रहे तभी कितना बेमिसाल लाजवाब कार्य देश की सरकार ने किया ।  हरित क्रांति से बंगलादेश बनाने में बागडोर किस ने संभाली थी तब भी श्रेय किसे मिला कोई अंतर नहीं पड़ता है , लोकतंत्र में सरकार जब केवल किसी एक व्यक्ति को ही सबसे महत्वपूर्ण समझने लगती है तब समाज सही दिशा में प्रगति कभी नहीं कर सकता है ।  आज़ादी के 79 साल बाद भी अगर देश में आधी आबादी गरीबी और बदहाली में रहती है तब समझ लेना चाहिए शासन जिस किसी भी राजनेता के हाथ में रहा है वास्तविक समाज कल्याण किसी ने नहीं किया है ।  खेद है कि पिछले पचास सालों से देश की राजनीति इतनी ख़राब हो चुकी है कि सभी राजनेताओं को सिर्फ़ सत्ता की चाहत है देश सेवा और समाज कल्याण को मात्र मुखौटा बनाया जाता रहा है ।  शर्म की बात है कि आज फिर से 21 साल इंतज़ार करने की बात कहने लगे हैं कि 2047 तक देश शानदार बना देंगे जबकि अभी तक उस दिशा में इक कदम भी उठाया दिखाई देता  नहीं है ।  अब कौन जीता है कौन देखेगा कुछ भी कर दिखाना नहीं बस झूठे दिलासों से जनता को बहलाना चाहते हैं जबकि लोग अब इतने भी नासमझ नहीं उनको ये खोखली बातें प्रभावित ही नहीं करती हैं । 
 
कोई भी शासक नहीं जानता भविष्य में इतिहास उसको कैसे देखेगा , दुनिया में सैंकड़ों साल शासन करने वाले भी लोग हुए हैं जिनको लेकर कहते थे उनके साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं है लेकिन उनका आंकलन किया गया ये समझ कर कि उनके साम्राज्य में लोग खुश थे आज़ाद थे या बेबस और ग़ुलाम थे ।  जिनको लगता है उनके चाटुकार लोग या खरीदे गए लेखक पत्रकार मीडिया वाले उनकी छवि को शानदार दर्शाने को सोने की क़लम से सुनहरी रंग की सियाही से उनका कालखंड स्वर्णिम लिखेंगे उनको वास्तविकता मालूम नहीं है ।  शासकों के गुणगान करने वालों की झूठी बातें मनघड़ंत कहानियां कभी किसी को प्रभावित  नहीं करती हैं , राजाओं की झूठी कथाएं विश्वसनीय नहीं लगती बल्कि कितनी घटनाएं तब की साबित करती हैं कि उनके शासन में झूठ का परचम फहराता रहा था । 
 
सच सौ पर्दों में भी छुपाने से छुपता नहीं है और झूठ का कितना भी डंका पीटते रहो आखिर ढोल की पोल खुलती है और दिखाई देता है ढोल का शोर उसके भीतर के खोखलेपन का प्रतीक था ।  कोल्हू का बैल समझता है कितना लंबा रास्ता तय कर लिया जबकि घूमता उसी दायरे में रहता है । हाऊ मच लैंड ए मैन नीड कहानी आधुनिक युग का सच लगती है , कितना दायरा दुनिया भर को नापने के प्रयास में आख़िर हाथ मलते हैं , सब कुछ गंवा के भी होश नहीं आता तभी कुछ भी नहीं कर दिखाने वाले अपनी ख़्वाबों ख़यालों की दुनिया में खोये सच्चाई से बेखबर रहते खुद ही अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं ।  इक गीत है निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल का निशां मालूम नहीं ।  धर्म की बात कहते हैं तो ऐसे कहना होगा , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास  ।   इतिहास का काला अध्याय सुनहरी रंग में सोने की क़लम से लिखने से क्या मिलेगा । 
 

 

अक्टूबर 05, 2026

POST : 2125 छुट्टियों का अभिप्राय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

              छुट्टियों का अभिप्राय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया  

छुट्टियां अपना भावार्थ बदल चुकी हैं 
हमने भी छुट्टियां मनाना छोड़ दिया है   
बचपन की छुट्टियां अभी तक याद हैं 
लौट आते थे पढ़ने वाले सब बच्चे गांव 
शहर नौकरी काम करने गए सब लोग  
घर गांव गलियां लगती ख़ुशरंग कितनी  
 
घर परिवार का कोई बड़ा मुखिया तब 
पत्र भेजता या किसी को भेजता रहता   
बुलाने लिवाने सभी बेटियों को घर पर 
ससुराल से बाबुल के प्यारे आंगन में 
बड़ी प्यारी हुआ करती थी वो छुट्टियां ।    
 
दिन कैसे बीत गए पता नहीं चलता था 
वापस लौटते थे सभी बारी बारी तब 
ख़ूबसूरत यादों को साथ लिए हुए जिन्हें 
जीवन भर सालों बाद भी भुला नहीं पाये 
 
बड़े शहरों में रहते हुए खो गई हैं छुट्टियां 
सोसाइटी की सड़कें सुनसान वीरान हैं 
पड़ोसी अपने लगते अजनबी अनजान हैं 
भीड़ में अकेलापन तन्हाई का आलम है 
इधर उधर कहीं भागते फिरते हैं सब लोग 
जाने किस चीज़ की तलाश में मालूम नहीं ।   
 
पहाड़ों से हरी भरी वादियों जंगलों तक में 
कोई सुकून कभी नहीं मिलता ढूंढते फिरते 
रेगिस्तानों से लेकर नदियों झीलों किनारे 
कितना कुछ करते हैं चाहा अनचाहा कहीं 
उकताहट होती है समय लगता है थम गया 
कितना पैसा खर्च कर समय व्यतीत कर के 
लौटते हैं और भी ख़ामोश उदासी लिए हुए । 
 
शहरी समाज की सभी छुट्टियां लगती जैसे
बोझिल हवाएं लिए जिन में सांसें घुटती हैं 
लगती थी बचपन वाली खुशियों की छुट्टियां 
छोटी छोटी बातों जिनकी कीमत कुछ नहीं थी 
कितनी अनमोल स्मृतियां संजोये प्रतीत होती 
दिल चाहता तो है लौटना गांव छुट्टियों में कभी 
मगर हम भूल गए गांव जाने वाले सब रास्ते 
गूगल भी नहीं बता सकता लोकेशन हमको ।    
 

 

अक्टूबर 04, 2026

POST : 2124 नाम बड़े और दर्शन छोटे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

                नाम बड़े और दर्शन छोटे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कहावत बचपन से सुनते आये हैं आज ऐसे ही लोग तमाम जगह दिखाई देते हैं ।  दुनिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति को ऐसा करते हुए देखा शांति का नोबेल पुरुस्कार पाने की हसरत की खातिर लाज शर्म छोड़  कोशिशें करते रहे ।  मैंने जॉर्ज सविले की इक बात को बार बार दोहराया है जो उद्धरण नीचे दिया गया है ।  लेकिन आजकल शोहरत पाने का पागलपन छाया हुआ है और जिसे देखो खुद ही अपनी बढ़ाई करना करवाना चाहता है ।  देश का ख़ज़ाना लुटवाया जाता रहा है किसी को देश ही नहीं दुनिया में सबसे बड़े शिखर पर दिखलाने को यशस्वी उपाधि जोड़ने से यशोगान करने से ख्याति नहीं मिलती है उल्टा इक कसौटी सामने खड़ी हो जाती है ।  इतिहास में जितने भी महान लोग हुए हैं उन्होंने महान कहलाने की ख़ातिर कभी कुछ नहीं किया उनके कार्यों ने उनको महानता के शिखर पर बिठा दिया । अब लोग प्रयास करते हैं उस शोहरत को पाने की ही नहीं उनको छोटा साबित कर खुद को बड़ा साबित करने की भी कोशिश करने से खुद और भी छोटे दिखाई देते हैं ।  जिस शोहरत को पाने को पैसा खर्च कर विज्ञापन देने से लेकर प्रतिदिन आडंबर करने को तमाशे दिखाने पड़ते हों ऐसी खोखली शोहरत को कहते हैं शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है , जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है , शायर डॉ बशीर बद्र जी  का शेर है ।  इधर जब किसी की  ऐसी ही हालत हुई है तब लोग उसको भारत रत्न देने की बात उठाकर क्या जले पर नमक छिड़कने की बात करना चाहते हैं  ।  ऐसे दोस्त  दुश्मन से बढ़कर ख़तरनाक होते हैं मगर यही होता है जब किसी को चाटुकारिता भाने लगती है तब कुछ स्वार्थी उसकी जय-जयकार गुणगान कर बदले में कुछ न कुछ हासिल करते रहते हैं ।  सुनते थे बादशाह अपने दरबार में कुछ ऐसे भांड रखा करते थे लेकिन जानते थे भांड ऐसा अपने बादशाह को झूठी ख़ुशी देने को करते हैं यही उनका धंधा हुआ करता था हुनर आता था सरकार की ख़ामियों को भी ख़ासियत बताना ।  बादशाहों को दिल बहलाने को ये सब कुछ करना पसंद हुआ करता था बदले में इनामात दिया करते थे और सभी दरबारी बादशाह की वाहवाही पर तालियां बजाते थे ।  लेकिन लोकतंत्र में यही सब से बड़ा रोग क्या अपराध कहलाता है तब भी हर खोटा सिक्का खुद को बेशक़ीमती समझने की भूल दोहराता है पैसे खर्च कर अपने नाम तस्वीर के बैनर लगवाना वैसा ही है जैसे कोई किराए पर हंसने रोने वाले बुलाकर ख़ुशी अथवा दुःख का तमाशा करता है , रुदाली फ़िल्म का यही विषय था ।  आज यही चलन बन गया है राजनीति नहीं प्रशासन के अधिकारी भी अपने वास्तविक कर्तव्य को निभाना छोड़ इसी को लेकर प्रयासरत रहते हैं स्थानीय अख़बारों से सोशल मीडिया तक पर खुद मिंयां मिट्ठू बनना आदत बन जाती है ।  काश बड़े अधिकारी बड़े पद पर बैठ अपना फ़र्ज़ ईमानदारी से निभाने पर ध्यान केंद्रित करते तो उनको जो मिलता वो सही और सार्थक होता भले उस से अपने निजी स्वार्थ अधूरे रहते धन दौलत और पदोन्नति के लेकिन भीतर कोई आत्मग्लानि नहीं रहती कुछ अनुचित करने की । 
 
आज किसी को मुंह छुपाए रहना पड़ रहा है , देश के साथ धोखा छल कपट कर  इतने बड़े पद पर रहकर भी आपने आपराधिक आचरण अनुचित हथकंडे अपना कर खुद अपने साथ इक महान संस्था की गरिमा को छलनी छलनी कर दिया है ।  विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र क्या इतना नीचे गिर सकता है ,  इतिहास में आपके समय को कितना कालिख़ भरा और अंधकारमय लिखा जाएगा जिस से देश समाज  की प्रतिष्ठा धूल में मिल जाएगी । ' ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने , लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई ' मुज़फ़्फ़र रज़्मी जी का शेर आधुनिक युग की कड़वी हक़ीक़त बन गया है ।