Wednesday, 14 April 2021

अथ: कोरोना कथा - सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया

सुनसान हैं सारे तीरथ नदियां सारी ( दिलकश नज़ारा ) डॉ लोक सेतिया 

दुनिया भरके तमाम लोग जीवन भर घूमते रहे जिसकी मिलन की दर्शन की आस लिए नदियां पर्वत तीरथ कभी उसको कभी इसको विधाता समझ कर उसको छोड़ और जाने क्या क्या देखा। प्यास बढ़ती गई इक बूंद पीने को नहीं मिली उस प्यार के अथाह सागर से। ज़िंदगी कब गुज़री मौत सामने खड़ी दिखाई दी तब समझे व्यर्थ भटकते रहे हासिल क्या हुआ। पाप धुले नहीं दर्द मिटे नहीं राहत का कोई एहसास हुआ नहीं। जो खुद हमारे भीतर रहता है कस्तूरी मृग की तरह हम भागते रहे दुनिया भर में उसके पीछे और पाया नहीं अंदर झांका नहीं कभी। आसान था मुश्किल बना दिया मन आत्मा परमात्मा का संबंध बनाना। अंतिम घड़ी तक बाहरी शोर तमाशे को समझते रहे सच है और सच अपने अंदर मरता रहा कभी पहचाना नहीं सत्य ईश्वर को। बोध किया नहीं बुद्ध को पढ़ते रहे दुनिया को जाना खुद को जानना भूल गए।  
 
पावन नदी तालाब और बड़े बड़े आलीशान भवन जिन में तमाम धर्म के ईश्वर देवी देवता खुदा अल्लाह वाहेगुरु जीसस का नाम लिखा है सुनसान नज़र आते हैं। ऊपर किसी आसमान पर बैठा भगवान सोच रहा है कैसे ये करिश्मा हो गया है। शायद लोगों ने पाप करना छोड़ दिया है तभी पाप धोने को पावन नदी में नहाने की ज़रूरत नहीं रही और खुदा से ईश्वर से जीसस वाहेगुरु से हाथ जोड़ मांगने की आदत छोड़ दी खुद कोशिश महनत से काबलियत से जितना हासिल कर सकते हैं उसको पाकर संतुष्ट रहने लगे हैं। इंसान को अपनी ताकत और समझ पर यकीन हो गया है किसी भी भगवान की कोई ज़रूरत ही नहीं रही है। सभी ईश्वर खुदा भगवान अल्लाह यीशु एक ही हैं और अपने बनाये इंसान को अपने खुद बनाये धर्म के जाल से मुक्त हुआ देख कर सभी चिंताओं से मुक्त होकर चैन महसूस करते हैं। 
 
दुनिया बनाने वाले ने इंसान बनाया था और सब कुछ दिया था जीवन बिताने रहने को। बस यही एक दुनिया बनाई थी मगर आदमी को जाने किसलिए क्या क्या हासिल करने की तलाश करने की चाह ने भटकाया इधर उधर और सपनों को सच करने को जो मिला था उसकी कीमत नहीं समझ कर उसको दांव पर लगा दिया। विकास और आधुनिकता के जुआघर में जीतने की धुन में हार का जश्न मनाते सदियां बिता दी इंसान इंसानियत को गंवाकर शराफ़त ईमानदारी छोड़कर ज़मीन पर रहना त्याग ऊपर चांद सूरज आकाश को पाने का लोभ लालच करते करते विनाश की तरफ बढ़ता गया। बेबस होकर झूठे सहारे ढूंढने लगा और नदी तालाब धर्म स्थल जा जाकर वास्तविक उजाले की जगह घने अंधकार और काल्पनिक स्वर्ग-नर्क अंधविश्वास में फंसकर खुद अपने साये से ख़ौफ़ खाने लगा। 

शिक्षा विज्ञान और तर्क शक्ति पर कायरता आडंबर अंधविश्वास अधिक भारी पड़े और समझदारी छोड़ मूर्खताओं की तरफ बढ़ता गया। आखिर इक ऐसा रोग फैला जिस ने दुनिया को विवश कर दिया ये समझने को कि कुदरत से खिलवाड़ कर विकास का आधुनिक ढंग कितना खतरनाक है। और जब सामने इक छोटा सा कीटाणु दैत्याकार खड़ा अट्हास करने लगा और कोई धर्म कोई ईश्वर कोई स्नान कोई दर्शन कोई धार्मिक आडंबर किसी काम नहीं आया करोड़ों लोग उपसना आरती ईबादत करते करते थक गए मगर समस्या मिटाने ये तथाकथित शक्तिमान उपयोगी साबित नहीं हुए तब जाकर इंसान की अक़्ल ठिकाने आई और उसको खुद अपने भरोसे जीने और अपनी दुनिया को वास्तव में अच्छी और रहने के काबिल बनाने को निर्णय करना पड़ा कि जो भगवान जो ख़ुदा अल्लाह जीसस देवी देवता इंसान की रक्षा करने उसको बचाने नहीं आया उसको कब तक मनाते रहें। जो सामने खड़ा है उसी दैत्य को मनाना उसकी मिन्नत करना शायद कारगर हो इस लिए सभी दिन रात उसी के नाम उसके गुणगान करने में लगे हैं। भगवान का बुलावा कभी भी आ सकता है ये बात झूठी साबित हुई है बस इक वायरस का साया हर जगह दिखाई देता है उसी से उस से बचाव की तरकीब पूछते हैं। 
 

                          अथ: कोरोना कथा

 


Monday, 12 April 2021

( इस पोस्ट को अवश्य पढ़ना ) उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) डॉ लोक सेतिया

     उलझन सुलझती नहीं उलझाने से ( भगवान से इंसान तक ) 

                                    डॉ लोक सेतिया 

        कौन बड़ा है भगवान या मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे।  हमने ईश्वर को सत्य में नहीं आडंबर में खोजा और बिना समझे बिना पाये ही पत्थर को किताब को इमारत को भगवान कहने लगे। किसी ने कहा तुमको ईश्वर से मिलवा सकता हूं और आप उसको ईश्वर से बड़ा समझने लगे और लोग भगवान को सामान बनाकर बेचने लगे। भगवान को इंसान क्या दे सकता है और भगवान को पैसा या कोई उपहार कुछ खाने को कपड़े गहने आरती पूजा ईबादत की अपने गुणगान की क्या ज़रूरत है क्या मिलता है ईश्वर को अपनी आराधना से ख़ुशी महसूस होती है नहीं उपासना करने से बुरा लगता है फिर वो भगवान कदापि नहीं हो सकता है। भगवान के इंसान के बनाये घरों में जाकर माथा टेकने उपसना आरती इबादत करने के बाद इंसान से झूठ छल कपट धोखा और स्वार्थ की खातिर तमाम अनुचित कार्य करते हैं और मानते हैं भगवान के भक्त उपासक हैं। इतना ही नहीं हम ईश्वर से हिसाब किताब रखते हैं लिया दिया बदले में क्या क्या। भगवान को बाज़ार समझ बैठे हैं। 
 
   संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं जिस में वो लोग बैठे हैं जिनको सत्ता के अधिकार और खुद अपने लिए तमाम साधन सुविधा चाहिएं जनसेवा के नाम पर चोरी ठगी लूट की जगह बना दिया। न्याय करने वाले न्याय का आदर नहीं अपने अनादर की चिंता करते हैं। न्यायालय में न्याय की हालत बदहाल है। कुछ नेताओं अधिकारी बने लोग कर्मचारी पुलिस सुरक्षा के लोग दफ़्तर में बैठ जनता को हड़काने वाले अपनी जेबें भरते लोग , कुछ धनवान बने लोगों और बाबा गुरु बनकर पैसा कमाने वाले लोगों ने इंसानियत को ताक पर रखकर कर्तव्य निभाने की जगह अनैतिक आमनवीय आचरण किया है। खुद नहीं जानते मगर आपको समझाते हैं ठग हैं साधु संत महात्मा बने हुए हैं।
 
स्कूल कॉलेज शिक्षक राह भटक कर शिक्षा का कारोबार कर अज्ञानता को बढ़ा रहे हैं। समाजसेवा कह कर अपने स्वार्थ सिद्ध करते हैं चालाक और मक्कार लोग और हम पापी अधर्मी अनुचित कार्य करने वालों को सर झुकाकर सलाम करते हैं और सच बोलने वालों को अपमानित करते हैं। कोरोना क्या है हम नहीं जानते उसका उपाय और रोकथाम को टीका बन गया फिर भी रोग नहीं होगा कोई  नहीं बताता बस यही भगवान सरकार धर्म उपदेशक सभी हैं कहने को भरोसा किसी का नहीं ज़रूरत और वक़्त पर सब बेकार साबित हुए हैं। हमारी नासमझी और मूर्खता कि हमने ऐसे पण्डित पादरी उपदेशक कथावाचक लोगों को ईश्वर से अधिक महत्व देना शुरू कर दिया और उनको धर्म भगवान के नाम पर उचित अनुचित जो मर्ज़ी करते रत्ती भर संकोच नहीं होता है। भगवान ये समझते हैं उनका बंधक बन गया है जिसको ये जैसे मर्ज़ी उपयोग कर सकते हैं। भगवान ने सबको बनाया है बताते हैं लेकिन समझते हैं ईश्वर को उन्होंने बनाया है उसको इनका आभारी होना चाहिए। 
 

 

Saturday, 3 April 2021

लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"   

लिख कर ख़त ये तमाम रखे हैं 
पढ़ ले जो उसके नाम रखे हैं। 
 
आंचल में इनको भर लेना 
जो अनमोल इनाम रखे हैं।
 
हम अब पीना छोड़ चुके हैं
उनकी खातिर जाम रखे हैं। 

जिनको खरीद सका न ज़माना
अब खुद ही बेदाम रखे हैं।

पत्थर चलने की खातिर भी
शीशे वाले मुकाम रखे हैं।

खुद ही अपनी रुसवाई के
हमने चरचे आम रखे हैं।

जिन पर बातें दिल की लिखीं हैं
ख़त वो सभी बेनाम रखे हैं।
 
जुर्म नहीं बस की जो मुहब्बत
सर पे कई  इल्ज़ाम रखे हैं।
 
उनपे नहीं अब "तनहा" परदा 
राज़ वो सब खुले-आम रखे हैं।

दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया

      दिखाने को पर्दा करते हैं ( कव्वाली ) डॉ लोक सेतिया 

हुस्न वाले जलवा अपना , 
दिखाने को पर्दा करते हैं 
 
समझना मत वो चेहरा 
छुपाने को पर्दा करते हैं। 
 
बस देख इक झलक कोई 
हो जाये आशिक़ दीवाना 
 
नज़रों से नज़र चुपके से 
मिलाने को पर्दा करते हैं। 
 
बनते हैं बेखबर तोड़कर 
दिल आशिकों का कितने 
 
बेवफ़ा अपनी बेवफ़ाई 
छिपाने को पर्दा करते हैं। 
 
दिल ही दिल खुश होते 
हुस्न की तारीफ सुनकर 
 
बुरा मानते शर्म हया को 
दिखाने को पर्दा करते है। 
 
जब बेपर्दा बाहर आये तो 
देखा न किसी ने उस दिन  
 
पर्दानशीं क्या बात उनकी 
समझाने को पर्दा करते हैं।  
 
शोलों को और भड़काने 
आता है मज़ा सताने में  
 
दिलजलों की दिल्लगी 
बढ़ाने को पर्दा करते हैं। 
 
कौन कहता है हुस्न को 
छुपाने को पर्दा करते हैं 
 
चिलमन खुद उठाकर के 
गिराने को पर्दा करते हैं।
 

Friday, 2 April 2021

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हम जो चाहत में आह भरते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

हम जो चाहत में आह भरते हैं 
जैसे कोई गुनाह करते हैं। 
 
मार कर पत्थरों से अहले-जहां 
पेड़ से फल की चाह करते हैं। 
 
याद करके अतीत हम अपना 
अपनी रातें सियाह करते हैं। 
 
हमको उनसे नहीं गिला कोई 
दिल को हम खुद तबाह करते हैं। 
 
एक सहरा में हम- से दीवाने 
ख़्वाब में सैरगाह करते हैं।  
 
सब मुसाफिर नये नई मंज़िल 
इक नई रोज़ राह करते हैं। 
 
कौन सुनता तुम्हें यहां "तनहा"
बस वो सुनकर के वाह करते हैं।
 
 

Thursday, 1 April 2021

सच की तिजारत करने वाले झूठ के पैरोकार लोग ( सोशल मीडिया ) डॉ लोक सेतिया

   छिपा है गंदगी का ढेर चमक- दमक के पीछे ( डरावना सच ) 

      सच की तिजारत करने वाले झूठ के पैरोकार लोग (  सोशल मीडिया ) डॉ लोक सेतिया

             पहले अपनी इक ग़ज़ल उसके बाद बात सच बेचने वालों की :-     
             
                     ग़ज़ल-   डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।
 
 बताने की ज़रूरत नहीं कि सबसे अधिक गंदगी उन्हीं के घरों में छिपी हुई है जो शानदार लिबास पहने चमकती रौशनी वाले महलों में बैठे मख़मली कालीन पर पांव रख कर चलते हैं। बड़ी बेशर्मी से ऊंची आवाज़ में सवाल करते हैं खुद जवाब नहीं देते कि उनका ज़मीर कितने में किस किस को कितनी बार बेचा है। ज़िंदा मुर्दा की ये मिसाल अलग है वो नहीं जिसको अस्पताल में डॉक्टर ने मरा घोषित किया था और वो बोल रहा था मुझ में जान बाकी है। ये वो नहीं हैं जिनमें थोड़ा ईमान बाकी है। ऊपर जाने की हसरत में कितना नीचे गिर गये ये टीवी चैनल अख़बार मीडिया वाले फिर भी इनका और भी उंचाई का अरमान बाकी है उन्होंने ज़मीन से नाता तोड़ लिया है और झूठ वाला आसमान बाकी है। कुछ लोग औरों की तकलीफ़ देखते हैं और रोमांच का आनंद का अनुभव करते हैं। जिस की हालत खराब हो उसकी तकलीफ़ नहीं समझते बल्कि सवालात करते हैं आपको कैसा महसूस हो रहा है। खबरची बनते मानवीय संवेदना छूट जाती है और इंसान मशीन बनकर बोलता चलता है टीवी वालों को आपराधिक कहानियां मनोरंजन के नाम पर परोसना अच्छा लगता है जानकारी देने को नहीं गुमराह करने के लिए। सवाल समाज का नहीं पैसे टीआरपी का है।
 
चलिये समझते हैं इनकी असलियत कोई पहेली नहीं है। बेईमानी झूठ लूट घोटाला अपराध से लेकर समाज में नग्नता और अश्लीलता के साथ नैतिकता के पतन को बढ़ावा देने के बाद खुद को सबसे महान आदर्शवादी घोषित करने का काम करते हैं। सरकारी विज्ञापन की लूट देश का ऐसा सबसे बड़ा घोटाला है जिस में देश का खज़ाना जनता की कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च होने की जगह इन मुट्ठी भर लोगों की तिजोरियां भरने में बर्बाद होता है और ऐसा 73 साल से नियमित होता रहा है जिसकी धनराशि बढ़ती बढ़ती दैत्याकार रूप ले चुकी है। ये लुटेरे मसीहाई की बात करते हैं चोर अधिकारी नेताओं से मिलकर डाका डालते सबसे बड़ा हिस्सा पाते हैं। 

इनके सीरियल से रियलटी शो और चर्चा तक नैतिकता की धज्जियां उड़ाते हैं हिंसा और अराजकता से लेकर जुआ अंधविश्वास और धार्मिक बैरभाव फैलाने का काम करते हैं। सच को छिपाते नहीं दफ्नाते हैं और झूठ को सच साबित करने को मनघडंत किस्से कहानी बनाकर दर्शक को उलझाते हैं। सच  का लेबल लगाकर झूठ को मनचाहे दाम बेचते हैं फिर भी सच के रखवाले कहलाते हैं। हर घटिया चीज़ को असली खरी और बढ़िया बताकर बिकवाते हैं ठगों चोरों से भाईचारा निभाते हैं। ये कमाल करते हैं उल्टी गंगा बहाते हैं और सत्ता की गंदगी के गंदे नाले को पाक साफ़ समझ उसमें डुबकी लगाते हैं। पाप और अधर्म की कमाई से गुलछर्रे उड़ाते हैं अपनी करनी पर कभी नहीं लजाते हैं हराम की खाकर शान से इतराते हैं। सदी के महानायक जिनको बनाते हैं वो पैसे को अपना भगवान समझते हैं मोह माया में फंसकर ज़हर को दवा कहकर धन दौलत बनाते हैं झूठ का इश्तिहार बन जाते हैं। खिलाड़ी नाम खेल से पाकर जुआ खेलने का रास्ता समझाते हैं। कलाकार खिलाड़ी बाबा बनकर लोग टीवी अखबार में धंधा बढ़ाते मालामाल हो जाते हैं। छोटे काम करते बड़े समझे जाते हैं। खबर ख़ास लोगों की सौ बार दोहराई जाती है उनकी सच्चाई नहीं सामने लाई जाती है। आवारगी उन लोगों की सच्ची मुहब्बत बताई जाती है। कितने कितने आशिक़ों से प्यार की पींगें झूलने वाली नायिका मल्लिका ए इश्क़ कहलाती है। शराफत खुद को गुनहगार समझती मगर गुनाह देख इनके ताली बजाती है।

हर गुनहगार से इनका मधुर नाता है आतंकवादी अपराधी क़ातिल हर कोई इनसे रिश्ता निभाता है। पास इनके सभी का बही खाता है बस इनका दाग़दार चेहरा कभी नहीं सामने नज़र आता है। मेकअप उनको सबसे खूबसूरत दिखलाता है। जो भी  टीवी चैनल अख़बार सोशल मीडिया का कारोबार चलाता है हर किसी को खराब बताकर खुद को सच्चा बतलाता है पर्दे पर नायक बनकर किरदार निभाता है। पीछे से सभी को अपनी उंगलियों पर नचाता  है। ये बंदर की तरह जनता का रक्षक बनकर उस्तरा उसी की गर्दन पर चलाता है। जनता की रोटी बिल्लियों में बांटने को ये सोशल मीडिया वाला बंदर तराज़ू बनकर खुद खाता जाता है। चौकीदार हुआ करता था पहले आजकल यारी चोरों से खूब निभाता है। सबसे बड़ा चोर यही है चोर - चोर का शोर भी मचाता है।

 

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये 
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिये। 
 
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क़ का 
सोच कर उसका अंजाम हम रो लिये। 
 
हम तो डर ही गये , मर गये सब के सब 
आप ज़िंदा तो हैं , अपने लब खोलिये। 
 
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह 
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिये। 
 
जुर्म उनके कभी भी न साबित हुए 
दाग़ जितने लगे इस तरह धो लिये। 
 
धर्म का नाम बदनाम होने लगा 
हर जगह इस कदर ज़हर मत घोलिये।
 
महफ़िलें आप की , और "तनहा" हैं हम 
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिये।

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार होने लगे सब ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ये कैसे समझदार  होने लगे सब
दिया छोड़ हंसना  हैं  रोने लगे सब।

तिजारत समझ कर मुहब्बत हैं करते 
जो था पास उसको भी खोने लगे सब।

किसी को किसी का भरोसा कहां है
यहां नाख़ुदा बन डुबोने लगे सब।

सुनानी थी जिनको भी हमने कहानी 
शुरुआत होते ही सोने लगे सब।

खुले आस्मां के चमकते सितारे 
नई दुल्हनों के बिछौने लगे सब।

जिन्होंने हमेशा किए ज़ुल्म सब पर
मिला दर्द पलकें भिगोने लगे सब।

ज़माने से "तनहा" शिकायत नहीं है
थे अपने मगर गैर होने लगे सब।