Sunday, 22 March 2020

हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) डॉ लोक सेतिया

   हादिसों की अब आदत हो गई है ( हाल-ए-गुलिसतां ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

 सच से भागना संभव नहीं है भले आपको सच सुनना अच्छा नहीं लगता है। जब कोई मुसीबत सामने खड़ी हुई तब समझ नहीं आया सामना कैसे करें। अब लोग या तो उपदेश देते हैं ये करना ज़रूरी है या फिर अपनी मूर्खता का सबूत देते हुए चुटकले बनाते हैं। गंभीर समस्या पर गंभीरता से चिंतन नहीं करते हम लोग। चलो जो हुआ अब कोई सबक तो समझ सकते हैं क्योंकि हर घटना आपको सबक सिखाती है। सरकार ने कहा लोग घर से बाहर नहीं जाएं अपना बचाव सबका बचाव करना है , चलो माना ये करने से कुछ तो बचाव शायद मुमकिन हो मगर कितना और कब तक कोई नहीं जानता। आधुनिक उपचार निदान के समय हम ये कहां खड़े हैं। मगर सवाल करना लगता है आलोचना है जबकि कमियां निकालना और वास्तविकता से नज़र मिलाने की बात करना दो अलग बातें हैं। 

विचार करो क्या सबक मिल रहा है। सच ये है कि चांद पर जाने एटम बंब बनाने सबसे ऊंची मूर्ति बनाने की बातें करने वाली सरकार ने देश की वास्तविक समस्याओं की अनदेखी की है उपचार क्या जांच की भी सुविधा उपलब्ध नहीं है। जब समस्या खड़ी तब उपाय सूझता नहीं तब शोर मचाने जैसे काम किये जाते हैं। अभी खबर दिन भर सुनते रहे किसी फ़िल्मी गायिका की लापारवाही के आचरण की और हर कोई उसको दोष देता रहा मगर क्या हम सब भी अपना फ़र्ज़ निभाते हैं जब भी कोई बात हो अपने बारे सच जाकर बताते हैं और अपने कारोबार को छोड़कर सबकी भलाई की बात करते हैं। वास्तव में अधिकतर लोग यही किया करते हैं सच बताने से घबराते हैं। कितने लोग जब पता चला जांच करवाने की जगह शहर छोड़ भाग गए। 

इक और बात समझना ज़रूरी है। भगवान को लेकर कोई गलतफ़हमी मत रखना सब कुछ उसकी इच्छा से नहीं होता है हमने अपनी दुनिया को कितना बर्बाद किया है और जो जो भी अनुचित करते हैं उसका दोष किसी और पर नहीं दिया जा सकता है। अपने मतलब स्वार्थ को अंधे होकर हम कितना खिलवाड़ कुदरत से करते हैं। अब जब मंदिर मस्जिद धार्मिक स्थल वाले उनको बंद कर रहे हैं तब भी आपको समझ नहीं आया कि इन जगह वास्तव में कोई भगवान आपको क्या खुद को भी नहीं बचाने वाला। विश्वास के नाम पर आपकी भावनाओं का दोहन किया जाता है , कितना अंबार धन आदि जमा करना धर्म उचित ठहराता है , कदापि नहीं। यही जन कल्याण पर खर्च करते तो सच्चा धर्म हो सकता था। 

टीवी चैनल वाले खुद अपने पर कोई नियम नहीं मानते हैं। विज्ञापन के जाल में आपको फंसाते हैं अपनी पीठ थपथपाते हैं जबकि अपना कर्तव्य नहीं बिभाते निष्पक्षता से और टीआरपी और कमाई की खातिर अंधे हुए हुए हैं। राजनेताओं को अपने आप पर रोज़ लाखों करोड़ ऐशो आराम पर खर्च करते लज्जा नहीं आती है। हर दिन बेशर्मी से कोई कहता है देश जनता की सेवा नहीं कर सकता बिना संसद या कोई पद मिले इसलिए इस दल से उस दल में जा रहा हूं , क्या ऐसे स्वार्थी मतलबी लोग किसी की भलाई कर सकते हैं। और राजनीति के इस हम्माम में सभी नंगे हैं। टीवी चैनल वाले आज भी उसी से करोना पर चर्चा कर रहे हैं जिसका अनुभव केवल सब कुछ बेचकर मुनाफा कमाकर भी महानता का दावा करना है। उसकी शिक्षा जानकारी से नहीं इन को मतलब है उसके विज्ञापन से मिलने वाली राशि से। मामला चोर चोर मौसेरे भाई वाला है। हद है कि ये भी उसको अवसर लगता है अपने धंधे को लेकर। 

ध्यान से देखें तो पिछले सालों में धर्म राजनीती और खबर वालों टीवी अख़बार वालों का नैतिक पतन सबसे बढ़कर हुआ है। राजनेताओं की कठपुतलियां बनकर अधिकारी और अन्य संस्थानों में नियुक्त लोग देश से धोखा करते हुए शर्मसार नहीं हैं। ये सब अपना कर्तव्य नहीं समझते निभाने की तो बात क्या करें मगर आपको आम नागरिक को आदेश उपदेश देते हैं और फिर भी उनकी नहीं मानो तो कानून की लाठी न्याय नहीं अत्याचार करने को तैयार है व्याकुल है। 

कल ये भी बीत जाएगा और सब सामान्य हो जाएगा मगर क्या हम इन से कोई सबक भविष्य को बेहतर बनाने को लेते हैं या नहीं ये हम पर निर्भर है।

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