Sunday, 22 March 2020

पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया

  पिंजरा कैद बंधन और हम ( समाज और सुरक्षा ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ गीत याद करते हैं। पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। पंछी से छुड़ा कर उसका घर तुम अपने घर में ले आये , ये प्यार का पिंजरा मन भाया हम जी भर के मुस्काए , जब प्यार हुए इस पिंजरे से तुम कहने लगे आज़ाद रहो। हम कैसे भुलाएं प्यार तेरा तुम अपनी ज़ुबां से ये तो कहो। तोड़ के पिंजरा इक दिन पंछी तो उड़ जाना है। कोई गिनती नहीं है और ये भी सच है हम सभी खुद अपने बनाए पिंजरे में बंद हैं निकलते ही नहीं अपनी कैद से। मेरी इक कविता है। 

कैद ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

कब से जाने बंद हूं
एक कैद में मैं
छटपटा रहा हूँ
रिहाई के लिये।

रोक लेता है हर बार मुझे 
एक अनजाना सा डर
लगता है कि जैसे 
इक  सुरक्षा कवच है
ये कैद भी मेरे लिये।

मगर जीने के लिए
निकलना ही होगा
कभी न कभी किसी तरह
अपनी कैद से मुझको।

कर पाता नहीं
लाख चाह कर भी
बाहर निकलने का
कोई भी मैं जतन ।

देखता रहता हूं 
मैं केवल सपने
कि आएगा कभी मसीहा
कोई मुझे मुक्त कराने  ,
खुद अपनी ही कैद से।


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आज हमने किसी के कहने पर खुद को घर में कैद रखना चुना है। सुरक्षा की खातिर। सच तो ये भी है कि शायद भगवान भी चाहता होगा इंसान की बनाई ऊंची ऊंची इमारतों की कैद से मुक्त होना। ये जाने कैसे आस्तिक उसको मानने वाले हैं जिन्होंने उसे भी अपने तालों में कैदी बना रखा है। कितना बड़ा मज़ाक है जिसके लिए भरोसा है सबको दुनिया को बनाया है मिटाता है उसको आपके सहारे की ज़रूरत है घर बनवाने को रहने को। भगवान को दाता नहीं बेबस भिखारी बना दिया है। कब किसी भी धर्म के ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह ने कहा मुझे आलीशान महल चाहिए चढ़ावे में पैसा हीरे मोती जवाहरात चाहिए , शानदार पोशाक चाहिए।

अभी भी आपको धर्म भगवान के नाम पर कुछ करना है तो समझो वास्तविक सच्चा धर्म क्या चाहेगा। किसी भूखे को खाना किसी गरीब को आसरा किसी बेघर को घर रोगियों के लिए अस्पताल बच्चों के लिए स्कूल कॉलेज और उनको वास्तविक जीवन का ज्ञान देना। अंधविश्वास और भेदभाव का अंत करने का संकल्प। अब ये भी समझ लेना चाहिए कि क्या करना अधर्म है। अपना काम ईमानदारी से नहीं करना अधर्म है। शिक्षा स्वास्थ्य जनसेवा राजनीति निजी कारोबार को बेतहाशा धन कमाने का साधन बनाना भी अधर्म है। व्यौपार और लूट में यही अंतर है सही कारोबार उतना मुनाफा लेना जिस से आपका गुज़र बसर हो सके को कहते हैं मगर अपने लिए तमाम साधन और सुख सुविधाओं को हासिल करने को व्यवसाय में मनमाने ढंग से और उचित अनुचित की परवाह नहीं करते हुए धन कमाना अधर्म है। धर्म सबको सब कुछ मिलने का मार्ग है जब लोग अपने पास बहुत अधिक जमा करते हैं तब धर्म की बात कहना आडंबर भी है और छल कपट अधर्म भी।

इक तरफ मानते हैं जीना झूठ है मरना शाश्वत सत्य है दूसरी तरफ जीने को इतना सामान जमा करते हैं जैसे सब सुख साथ लेकर जाना है। विचार करें तो लगता है हम भगवान को धोखा देते हैं ये समझते हैं कि चाहे कुछ भी करते हैं पूजा अर्चना ईबादत और स्तुति चढ़ावे से उसको बहला लेंगे। ये समझदारी है या अज्ञानता है शायद इस से अच्छा होता हम ईश्वर को नहीं मानते नास्तिक ही होते मगर इंसान और इंसानियत को समझते। वास्तविकता में हम जिस पिंजरे में बंद हैं और खुद ही कैदी बने हैं वो पिंजरा है हमारे स्वार्थों और खुदगर्ज़ी के जाल का बुना हुआ पिंजरा। उसे तोडना है और फैंकना है किसी गहरी खाई में इस कथा के अनुसार।

साधु और पिंजरे में बंद पक्षी ( बोध कथा )

 पहाड़ों पर सैर करते इक साधु को घाटी में कहीं दूर से आवाज़ सुनाई दी मुझे आज़ाद करो। ढूंढते हुए उसको इक पक्षी पिंजरे में बैठा ऐसा कहता मिला। मगर पिंजरा तो खुला था बंद नहीं फिर भी साधु ने भीतर हाथ डालकर उसको बाहर निकाला और आसमान में उड़ने को छोड़ दिया। अगली सुबह फिर साधु को वही आवाज़ सुनाई दी और जाकर देखा तो पाया कि पक्षी वापस उसी पिंजरे में चला आया है। उसकी आदत बन गई थी आज़ाद होने को कहना मगर खुद ही कैद होकर रहना। अब साधु ने उस पक्षी को निकाला उड़ाया और फिर उस पिंजरे को उठाकर बहते पानी में गहराई में फेंक दिया। इस तरह उसके लिए पिंजरा ही नहीं रहा वापस आने को। लेकिन आजकल जो संत साधु मिलते हैं उनके पास हमारे लिए पिंजरे हैं वो कभी हमें सही दिशा नहीं समझाने वाले। अपने विवेक से हमने ही अपने आप को स्वार्थ और खुदगर्ज़ी के पिंजरे से मुक्त करना है। घर बैठे चिंतन कर सकते हैं क्योंकि जब आपको बाहर नहीं जाना तभी अपने भीतर जाने का समय होता है।

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