Friday, 24 January 2020

फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     फिर इक रावण का सीता हरण ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       राम और रावण दो किरदार हैं समय समय पर इंसान किरदार बदलता रहता है। उन के भीतर हमेशा से इक ऐसा इंसान छुपा हुआ था जो महिला को अपनी बनाकर छोड़ना अपना अधिकार समझता है। उसने कभी अच्छे होने का किरदार निभाना नहीं चाहा मगर कोई नहीं जानता वो देखने को असली चेहरा रखता है वास्तव में किसी और का मुखौटा है जैसे कठपुतली नाचती है ऊपर किसी के हाथ में पकड़े धागे के इशारे पर उसे भले होने का किरदार अनचाहे निभाना पड़ा है। अभिनेता की तरह निर्देशक की हर बात को स्वीकार करना उसकी नियति है। आखिर अब उसने जो चाहा करने की अनुमति मिल गई है और उसको नाच नचवाने वाले ने उसे नायक नहीं खलनायक बनाने की बात मान कर उसे खुली छूट दे दी है अपना किरदार खुद लिखने और दिल में छुपे सभी अरमान जी भर पूरे करने को डायलॉग क्या कथा तक अपनी इच्छा से लिखवाने की। कब से उसकी हसरत थी सीता रुपी जनता का हरण करने की और इस के लिए अब और इंतज़ार भी उसको नहीं करना तभी उसने शुरुआत ही उसी अध्याय से करने का निर्णय कर लिया है। जनता बेचारी हमेशा से कैद रही है सुरक्षा के नाम पर सत्ता की बनाई परिधि के भीतर। और हर युग में रावण को खुली छूट मिली होती है छलने को भेस बदलने से लेकर अहंकार पूर्वक नारी को हरने की राम से बदला लेने की खातिर। पुरुषों की कायरता ढकी रहती है हर हाल में रावण बनकर सीता हरण करने पर भी और राम होकर सीता से अग्नि परीक्षा लेने पर भी। अपनी पत्नी को असुक्षित अकेली छोड़ने की बात कोई नहीं पूछता महिला उद्धार की कथा सुन ताली बजाते हैं सभी। 

        कलयुग के समय भी कोई देश की जनता को छलने साधु बनकर मधुर भाषा और सुनहरे सपने दिखा सत्ता की वरमाला डलवा कर असली रंग ढंग में सामने आने लगा है। सेवक बनने की बात भूल सत्ता की लाठी चलाने लगा है। आधुनिक रावण अयोध्या को लंका बनाना चाहता है अपने हाथ से आग लगाकर दुनिया को नई रौशनी दिखाना चाहता है। अपनी नाभि में अमृत कलश समझता है जिस समर्थन को वास्तव में वही उसकी सत्ता की संजीवनी को सबसे बड़ा खतरा हैं ये विभीषण भी नहीं समझा पाएगा। अब विभीषण रावण के दर की चौखट नहीं लांघ पाएगा। आधुनिक युग की रामायण कोई बाल्मीकि नहीं लिखेगा कोई तुलसी नहीं लिख सकेगा। रावण का शासन है उसकी मर्ज़ी उसकी पसंद उसकी अनुमति लेकर भाड़े पर रखे सोशल मीडिया टीवी अख़बार मिलकर लाइव सीधा मंच से सब होता जो नहीं होना चाहिए उसे भी हो रहा दिखलाने को बेताब हैं। सीता से सवाल किया जाएगा उसने रावण को पहले क्यों नहीं पहचाना उसकी गलती है जो कलयुग में मर्यादा पुरषोत्तम की चाहत भी की । सीता को विरोध किस की अनुमति नहीं मिल सकती और सत्ता के अधिकारी की हर आज्ञा का पालन करना उसका फ़र्ज़ है।

    मगर कुछ ऐसा हो गया है जिसकी कल्पना आधुनिक रावण ने नहीं की थी। देश की जनता रुपी सीता उठ खड़ी हुई है कायरता का त्याग कर साहस के साथ। सीता ने अपनी नारी शक्ति और हर महिला की वास्तविक ताकत को पहचान लिया है और रावण को चेतावनी दे रही है कि बिना अनुमति उसको अपहरण करने की बात तो दूर उसको छूना भी चाहा तो सती अपनी शक्ति से उसको भस्म कर देगी। अपनी सुरक्षा किसी लक्ष्मण की बनाई रेखा के भरोसे नहीं खुद अपने आत्मसम्मान और स्वाभिमान के दम पर लड़कर करने को तैयार है। किरदार बदले हुए खलनायक को कहीं भीतर डर लगने लगा है पुरुष होकर अपनी छाती का नाप बताने वाले को औरत से मात खाने हारने के अपमान झेलने का। इतने साल तक उसने महिला जगत से छल किया उसको लुभावने नारे और समानता के अधिकार देने की बात कहकर बहलाता रहा है सत्ता पाने को उनकी सुरक्षा शिक्षा और आगे बढ़ने के अवसर देने की करते हुए जबकि दिल से उसने नारी को कभी आदर देने की क्या महत्व समझने का भी काम किया नहीं। मगर फिर इक बार अहंकारी का अहंकार ज़िद पर अड़ा है औरत से टकराने की एतिहासिक गलती दोहरा रहा है। उसको खबर नहीं सीता हरण के बाद की कथा क्या होगी और उस से पिछली जो कहानी नहीं दिखाई गई अभी और अगले अध्याय में फ़्लैशबैक में समझाने का विचार है उस का क्या होगा। मंदोदरी और सीता दोनों साथ मिलकर उसकी दशा वो कर सकती हैं कि अयोध्या और लंका दोनों जगह उसको अपने किरदार निभाने में कठिनाई होगी क्योंकि राम बनना अब संभव नहीं और रावण होने की कीमत जान से प्यारी सत्ता हाथ से निकलना हो सकता है।  



                                

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