Thursday, 9 January 2020

अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) डॉ लोक सेतिया

     अंधे कुआं में झूठ की नाव की आज़ादी ( ये किसे चाहिए ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

  आज देश की सबसे बड़ी अदालत के लिए परीक्षा की घड़ी है। उसको निर्णय देना है कि जिस कश्मीर राज्य की जनता को 158 दिनों से आधुनिक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है उस के संविधान से मिले मौलिक अधिकार की सुरक्षा को लेकर न्यायपालिका कितनी संवेदनशील है। पांच महीने से विपक्षी नेताओं को बंधक बना रखा गया है देश के विरोधी दल के सांसदों को कश्मीर जाने की अनुमति नहीं है मगर सरकार 15 विदेशी देशों के सांसदों को कश्मीर ले जाकर सब ठीक है दिखलाने की बात करती है। जो लोग विरोध या असहमति जताने को अपने ही देश के भाई बहनों को गद्दार या देश विरोधी कहने का कार्य करते हैं उनको समझना होगा कि उनकी निष्ठा किसी नेता या दल अथवा सरकार के लिए हो सकती है लेकिन देश और संविधान तथा लोकतंत्र के लिए नहीं है। लोकतंत्र में देश और संविधान सबसे महत्वपूर्ण है। उनको कभी पांच महीने अपने बुनियादी अधिकारों सुविधाओं से वंचित रहना पड़े तभी समझ आएगा। विडंबना की बात ये है कि ये लोग भूल गए हैं आपात्काल में जो हुआ उसको लोकतंत्र की हत्या बताने वाले खुद अघोषित आपात्काल जैसे हालत बनाए हुए हैं। 

   ये कैसी व्यवस्था है जिस में एक विश्वविद्यालय में पुलिस भीतर घुसकर छात्रों को मारती पीटती है और एक विश्वविद्यालय में नकाबपोश गुंडे जाकर मार पीट दहशत फैलते हैं तो पुलिस नहीं आती बचाने को और किसी भी नकाबपोश को पकड़ती नहीं न ही कोई एफआईआर दर्ज करती है। शिक्षा के मंदिरों की बदनाम करने को यही पुलिस मनघड़ंत कहानियां बनाती है किसी को देश विरोधी साबित करने को मगर अदालत में झूठी साबित हो जाती है। हमने 1975 से सभी दल की देश की और राज्यों की सरकारों को देखा है समझा है और उनकी असंवैधानिक बातों का खुलकर विरोध किया भी है मगर कभी जनहित की बात को अनुचित कहने का कार्य किसी ने नहीं किया जैसा आजकल तथाकथित भक्त लोग करते हैं। उनको समझना होगा ये वही देश है जिस के नागरिक अहिंसा के मार्ग पर चलकर विश्व की तब की सबसे ताकतवर हक़ूमत से लड़ कर देश को आज़ाद करवाते हैं। आपात्काल घोषित करने वाली नेता की ज़मानत ज़ब्त करवाते हैं और इक नया विकल्प तलाश कर जनता दल की सरकार बनवाते हैं। 

मगर इन चाटुकार लोगों को तो इसी भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी जी की कही बात भी याद नहीं है। उन्होंने कहा था सरकारें बदलती रहती हैं नेता आते जाते रहेंगे मगर आपसी मतभेद या विरोध के बावजूद भी देश की एकता और संविधान की भावना को कायम रखना चाहिए और ऐसा नहीं कहना चाहिए कि पिछली सरकारों ने कुछ नहीं किया है। जो भी ऐसा कहता है वो देश के किसानों मज़दूरों और नगरिकों के पुरुषार्थ का अपमान करता है। शायद भाजपा को इस पर चिंतन करने की ज़रूरत है। वास्तविक देशभक्ति  किसी नेता दल की नहीं संविधान और न्याय की बात निडरता से कहना है। 

  सोशल मीडिया पर अंकुश लगाकर टीवी चैनल अख़बार को विज्ञापन से मालामाल कर खरीद कर आप अपनी महिमा का गुणगान करवा सकते हैं। अंधे कुएं में झूठ की नाव तेज़ दौड़ेगी मगर बाहर दुनिया आपसे सच बुलवाएगी। और भूलना नहीं सत्य कभी पराजित नहीं हो सकता है।

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