Wednesday, 25 September 2019

खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया

  खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

     अब लिखनी चाहिए अपनी ज़िंदगी की कहानी मुझे। नहीं लिखी पहले ये सोच कर कहीं कोई पढ़ नहीं ले कोई समझ नहीं जाये दिल की बात। अब जानता हूं कोई नहीं पढ़ता किसी और की लिखी बात सब की खुद अपनी अपनी कथा है खुद से खुद ही कहनी होती है। कोई अगर पढ़ भी लेगा तो समझेगा नहीं तो अब लिखना आसान है। ये शीर्षक मजरूह की ग़ज़ल से है दस्तक फिल्म की मुझे अपने दिल के करीब लगती है जैसे मेरी अपनी बात हो कोई पचास साल से इसको गुनगुनाता रहा हूं। चलो आपको सुनवाता हूं। 

हम हैं मताए कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निग़ाह ख़रीदार की तरह। 

वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास , फिरती है कोई शय निगाहे यार की तरह। 

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। 

  आपकी बात लिख कर या कोई गीत गुनगुना कर कहना मुझे आसान लगता है। कितने गीत मुझे अपनी कहानी से मिलते जुलते लगते हैं। बचपन से गुनगुनाता रहा हर दिन हर वक़्त मैं ऐसे गीत ग़ज़ल। कुछ लोग कहते भी थे कोई अच्छा गीत गाया कर यार , मैंने बहुत गाया किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , मुझको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। कॉलेज में कमरे में साथ रहने वाला इक सहपाठी मज़ाक किया करता था ये कहकर कि सुबह होते ही गाने लगता है हुई शाम उनका ख्याल आ गया। खैर इतनी बात काफी है समझने को अब जो लिखना है। 

     लोग कहते हैं खुश रहा करो मुझे खुश रहना रास नहीं आता है सीखा ही नहीं कैसे खुश रह सकते हैं जब सामने हर तरफ मातम पसरा नज़र आता है। शायद वो लोग भी सच में खुश नहीं रहते जो हंसने को कहते हैं कि हम सबको हंसना चाहिए इस से बहुत कुछ हासिल होता है असली नहीं तो नकली दिखावे की हंसी ही सही कल ही इक वीडियो देखा आमिर खान के सत्यमेव जयते शो का। चाहकर भी ऐसी हंसी हंस नहीं पाया तभी भीड़ से अलग अकेला उदास खड़ा होना मुझे सुकून देता है। किसी ने उपदेश दिया आपको खुद के दिल दिमाग़ को बेचैन नहीं करना चाहिए समाज की अनुचित बातों को देखकर। कबीरा तेरी झौपड़ी गलकटियन के पास करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भयो उदास। आपको क्या लगता है कबीर जो कह रहे हैं उस में उदासी नहीं है खुश रह सके होंगे , नहीं ये विडंबना है उनको लगता होगा कबीर मुझ के दुःखी होने से बदलता नहीं ये सब मगर दुःख था दर्द था बेचैनी रही थी। उदासी थी नानक जी भी उदास रहे थे जिस जिस को समाज की बातें विचलित करती हैं खुश नहीं रह सकता है। 

   जाने कैसे लोग समझते हैं मेरे पास खाने को रोटी है रहने को घर है और जीने को गुज़ारा करने को पैसा भी है तो जिनके पास कुछ नहीं है जो भूखे हैं बदहाल हैं खुले आसमान तले रहते हैं तपती लू बारिश सर्दी आंधी तूफ़ान बिजली की गरज सब को झेलते हैं उनसे मुझे क्या।  बस उनका पता है इक खबर है जिस से मुझे कोई लेना देना नहीं है उनकी चिंता मुझे क्यों करनी है। मुझे अपने बारे स्वादिष्ट भोजन बड़े घर अधिक सुख सुविधा और जाने कितनी ख्वाहिशों की बात सोचनी है बहुत और चाहिए सबसे अधिक और धन दौलत ताकत शोहरत पाने को मौज मस्ती करने की बात सोचनी है। खुश रहने को क्या ज़रूरी है समझना होगा। मुझे बचपन से इक बात की चाहत रही है बस कोई इक दोस्त मिल जाये जिसको कोई स्वार्थ कोई ज़रूरत नहीं दोस्ती अपनेपन की आरज़ू हो। दुनिया के हिसाब-किताब से अनजान हो मेरी तरह थोड़ा भावुक संवेदनशील हो और दोस्ती का अर्थ समझता हो। मगर मिला नहीं तलाश करने को जतन करता रहता हूं अभी भी। लोग खुश होते हैं बड़ा घर कोई पद कोई रुतबा कोई शोहरत पाने से। कोई धन दौलत जमा कर रईस बनकर ख़ुशी हासिल करता है किसी को महल सा आलीशान घर बड़ी बड़ी गाड़ियां ख़ुशी देती हैं कोई भीड़ चाहता है अपने आस पास तो कोई दुनिया भर की सैर करना चाहता है। मुझे इन सब बातों की कोई अहमियत नहीं लगती बस चैन से रहना गुज़र बसर को ज़रूरत को थोड़ा सा सामान और आमदनी अपनी ज़रूरत भर पूरी करने की , इतना बहुत है। पास है कोई कमी नहीं खलती सिवा इक बात के कि काश कोई मुझे समझता मेरी बात को सुनता और जैसा भी मैं हूं अपनाता मुझे।

         शायद अब खुद को बदलने का समय है , खामोश रहकर जीने की अदा सीखनी है। कोई ज़रूरी नहीं सब को कोई दोस्त मिले जैसा कोई चाहता हो। जिन बातों से दोस्तों को खोना पड़ा है मुझे ही छोड़ना होगा वो सब भले कितना उचित और अच्छा हो। कुछ बातें नहीं समझ आती हैं लोग मिलते हैं तो उनको देश की राज्य की राजनीति की बेकार की बातों या फिर अमीरी के दिखावे को छोड़कर कोई बात चर्चा के लिए पसंद नहीं आती है। मुझे इन में कोई रुचि नहीं है। जब किसी को हर कोई हर पल यही एहसास करवाता रहे कि तुम नासमझ हो , तुन्हें कुछ भी नहीं आता है , पैसा बनाना नहीं आया शान से रहने का दिखावा करना नहीं आया हर कोई तुम्हें देख कर हंसता है कोई कायदे की बात नहीं करता कोई ढंग का धंधा नहीं करता बेकार उलझन में पड़ा रहता है। तारीफ भी करनी हो तो शब्द होते हैं बुद्धू हो जो नहीं समझ सकते आजकल की दुनिया कैसी है। सपनों की दुनिया में जीते हो जहां कोई भेदभाव कोई नफरत कोई झगड़ा किसी धर्म का ख़ास आम बड़े छोटे का नहीं हो। अधिकतर लोग इन्हीं की सोच वाले हैं मतलब की बात अर्थात अपने हित अपनी भलाई की बात बाकी सब बातें फ़ज़ूल लगती हैं। मैं नहीं होना चाहता अपने खुद तक सिमटा हुआ , सार्थक जीवन का अर्थ है अपने से निकलकर सभी की बात करना। जब भी किसी से दिल की बात की है लगता है हर कोई रिश्तों की दुनिया में कीमत लगाता है तोलता है मतलब के तराज़ू पर हर नाते बंधन को। खरीदार बनकर मिलते हैं मुझे लोग और मुझे बिकना मंज़ूर नहीं है। शायद मेरी कुछ भी कीमत नहीं लगती किसी को या फिर कोई समझता ही नहीं कुछ चीज़ें और इंसान भी अनमोल होते हैं जिनका कोई दाम नहीं होता मगर किसी कीमत पर मिलते नहीं हैं बाज़ार में ज़माने के। बस कुछ ऐसा है मेरे साथ सबको किसी काम का नहीं लगता और मुझे चाहिए वो जो मेरी कीमत समझता हो लगाना नहीं चाहता हो।


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