Thursday, 12 September 2019

हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जब तक नौकरी व्यवसाय में रहे वो सब किया जो करना चाहा जो करना पड़ता था जो करना नहीं चाहिए था मगर करते रहे विवशता की आड़ लेकर अपने फायदे अपने स्वार्थ लोभ लालच जैसे कितने ही कारण बहाने गिनवा सकते हैं। लेकिन जैसे ही हम ने अपना काम व्यवसाय नौकरी से निजात पाई हम सभी को ज्ञान की अनुभूति हुई कि जो भी जीवन भर किया सब झूठ था व्यर्थ था और वास्तविक आनंद लोभ मोह को छोड़ धर्म कर्म के अच्छे कर्म करने से मिल सकता है। इस सब बताने का अर्थ कदापि ये नहीं है कि हम लोगों को अपने अनुचित आचरण करने कर्तव्य ईमानदारी पूर्वक नहीं निभाने से कोई पछतावा कोई ग्लानि है। हम आज भी गर्व करते हैं कि हम कितने बड़े पद पर रहे और कैसे कैसे हमने अपनी इच्छाओं की पूर्ति की और जो भी मन किया करते रहे हैं। जब कोई इंसान घर बार छोड़ सन्यासी बन जाता है तो उसके पिछले सभी किये अपकर्म भूल जाते हैं और धर्म चिंतन करने से पिछले पापों से मुक्त समझा जाता है। हम ने कोई लिबास बदला नहीं है और घर परिवार से बिछुड़ किसी जंगल में नहीं रहने लगे हैं फिर भी हमारे पिछले सभी बुरे कर्म सेवानिवृत होते ही अपने आप खत्म हो गए मान लिए जाते हैं। तब जो जो भी अनुचित किया हम ने नहीं किसी अधिकारी कर्मचारी व्यवसायी ने किये जो अब हम नहीं हैं और हम इंसान हैं पुरानी पहचान कोई झूठा सपना था और सपने में कोई भी अपराध किया गया गुनाह नहीं होता है।  मंच संचालक अपनी बात कह रहे थे और बारी बरी सभी सदस्य अपनी सच्ची कथा बता रहे थे।

    मैं इक सरकारी अधिकारी था कभी समय पर दफ्तर जाना ज़रूरी नहीं था सेवानिवृत होने के बाद इक संस्था ने शामिल होने और मंच पर विशेष बनकर बैठने का अधिकार दिया तो रविवार को भी सुबह सबसे पहले आना याद रहता है। मेरा कायाकल्प हो गया बहुत कुछ था कुछ भी नहीं रह गया तब पता चला आम ख़ास का अंतर कितना है। लोगों को कितना भटकाया फोन पर बात नहीं की मिलने आने पर मिलने से इनकार किया और अपनी ताकत का जमकर उपयोग किया। जो ख़ास लोग थे उनके लिए हाज़िर किया सब कुछ शासन का मज़ा लूटा जी भर कर और करना क्या चाहिए कभी विचार नहीं किया। अब सबको सीख देता हूं सही राह पर चलने की खुद कभी सही राह गया ही नहीं। सच तो ये है मैंने कभी भगवान खुदा के होने की नहीं होने की चिंता की ही नहीं  धर्म के नाम पर आडंबर किया है केवल जीवन भर मैंने।

     मैं शामिल था पुलिस विभाग में खुद कोई नियम नहीं पालन किया और सीधे सादे इंसानों से ऐसी भाषा में और इस तरह व्यवहार किया करता था जैसे खुद मैं जुर्म और गुनाह से नफरत करता हूं। मगर अपराधी लोगों से खुद ही सम्पर्क भी करता रहा उनको सहयोग भी दिया उनसे डरता भी था। न्याय के साथ खिलवाड़ करना मेरी आदत थी और बड़े अधिकारी या सत्ताधारी नेताओं के गैर कानूनी अनुचित आदेश भी जी हज़ूर कह कर मानता रहा और बदले में सब सुख सुविधा पाता रहा। कभी गलत करता पकड़ा भी गया तो भी मुझे बचाने को अधिकारी नेता खुद आते थे अपनी ज़रूरत को अपनी चमड़ी बचाने को। पुलिस का कर्तव्य क्या है इस की फज़ूल की चिंता मुझे नहीं रही अब जिस संस्था से जुड़ा हूं मानवाधिकार की बात करती है। यू टर्न लिया नहीं है सड़क की गलत दिशा जाने की बात है आपको समझ नहीं आएगी शायद।

    मैंने  गरीबों का हक छीना , उनसे उचित काम करने की रिश्वत वसूल की , ईलाज करने को सरकारी अस्पताल की जगह अपने घर नर्सिंग होम बुलाता रहा। दवा कंपनियों से फायदा उठाकर लूट का भागीदार बना और दाखिल करने से ऑपरेशन करने के लिए अपनी फीस के नाम पर रिश्वत लेता रहा। आजकल समाज सेवा का काम करने का तमाशा करता हूं तो खुद पर हंसता हूं जब अवसर था नहीं किया सही ढंग से काम अब दिखावे को जाने कितना कुछ करता रहता हूं। नेता भी बना कारोबार भी किया और कोई अपराध नहीं जो मैंने किया नहीं। खूब नाम झूठी शान और दौलत जमा की है अब दानी बनकर सभाओं में शान से शोभा बढ़ाता हूं।

      और इस तरह सब ने सेवानिवृत होने के बाद अपनी बात सच सच बताई क्योंकि इक साधु महात्मा ने उनको कहा था ऐसा करने पर आपको फिर से अगले जन्म में जो चाहोगे अवश्य मिलेगा। अब आखिर में उनकी इच्छा की बात संक्षेप में सचिव पढ़कर सुना रहे हैं।  सभी ने अपनी आरज़ू लिख कर पेटी में डाली थी महात्मा जी के कहने पर। सार यही था ये सब कोई मोक्ष की चाहत नहीं करते हैं। स्वर्ग उनको लगता है वही था जो उनको मिला था ज़रूरत से बढ़कर बिना मांगे या छीनकर भी और ये मिला जिस जगह वही नर्क का शासन ही तो है। उनको इसी देश में सब अपकर्म करने की छूट और अधिकार स्वर्ग से भी ऊपर लगते हैं उन्हें यही फिर से दोबारा चाहिए। जी भरा नहीं मनमानी कर के भी और किसी स्वर्ग में भजन कीर्तन करने से अच्छा है यहां इस नर्क में शासक बनकर स्वर्ग से बढ़कर सुख सुविधा हासिल की जाये। सार की बात यही है महत्मा बन जाना वक़्त और हालात के कारण होता है कोई भी साधु संत महात्मा होना नहीं चाहता है। बन जाने के बाद भी मन चाहता है ये झूठ की नकाब छोड़ खुल कर मौज मस्ती करने को। हर महात्मा अपना चोला उतार कर फिर से ज़िंदगी के मज़े लेना चाहता है बुराई की राह लुभाती है अच्छाई सच्चाई की राह चलने से कोई ख़ुशी कोई चैन नहीं मिलता है क्योंकि हमने चुना नहीं है ये सब छोड़ना मज़बूरी थी छोड़ना पड़ा है। अब कोई महात्मा महात्मा बनकर रहना चाहता नहीं है। 

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