Wednesday, 25 September 2019

खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया

  खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ( अपनी कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

     अब लिखनी चाहिए अपनी ज़िंदगी की कहानी मुझे। नहीं लिखी पहले ये सोच कर कहीं कोई पढ़ नहीं ले कोई समझ नहीं जाये दिल की बात। अब जानता हूं कोई नहीं पढ़ता किसी और की लिखी बात सब की खुद अपनी अपनी कथा है खुद से खुद ही कहनी होती है। कोई अगर पढ़ भी लेगा तो समझेगा नहीं तो अब लिखना आसान है। ये शीर्षक मजरूह की ग़ज़ल से है दस्तक फिल्म की मुझे अपने दिल के करीब लगती है जैसे मेरी अपनी बात हो कोई पचास साल से इसको गुनगुनाता रहा हूं। चलो आपको सुनवाता हूं। 

हम हैं मताए कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निग़ाह ख़रीदार की तरह। 

वो तो कहीं है और मगर दिल के आस-पास , फिरती है कोई शय निगाहे यार की तरह। 

मजरूह लिख रहे हैं वो अहले वफ़ा का नाम , हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह। 

  आपकी बात लिख कर या कोई गीत गुनगुना कर कहना मुझे आसान लगता है। कितने गीत मुझे अपनी कहानी से मिलते जुलते लगते हैं। बचपन से गुनगुनाता रहा हर दिन हर वक़्त मैं ऐसे गीत ग़ज़ल। कुछ लोग कहते भी थे कोई अच्छा गीत गाया कर यार , मैंने बहुत गाया किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , मुझको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। कॉलेज में कमरे में साथ रहने वाला इक सहपाठी मज़ाक किया करता था ये कहकर कि सुबह होते ही गाने लगता है हुई शाम उनका ख्याल आ गया। खैर इतनी बात काफी है समझने को अब जो लिखना है। 

     लोग कहते हैं खुश रहा करो मुझे खुश रहना रास नहीं आता है सीखा ही नहीं कैसे खुश रह सकते हैं जब सामने हर तरफ मातम पसरा नज़र आता है। शायद वो लोग भी सच में खुश नहीं रहते जो हंसने को कहते हैं कि हम सबको हंसना चाहिए इस से बहुत कुछ हासिल होता है असली नहीं तो नकली दिखावे की हंसी ही सही कल ही इक वीडियो देखा आमिर खान के सत्यमेव जयते शो का। चाहकर भी ऐसी हंसी हंस नहीं पाया तभी भीड़ से अलग अकेला उदास खड़ा होना मुझे सुकून देता है। किसी ने उपदेश दिया आपको खुद के दिल दिमाग़ को बेचैन नहीं करना चाहिए समाज की अनुचित बातों को देखकर। कबीरा तेरी झौपड़ी गलकटियन के पास करेंगे सो भरेंगे तू क्यों भयो उदास। आपको क्या लगता है कबीर जो कह रहे हैं उस में उदासी नहीं है खुश रह सके होंगे , नहीं ये विडंबना है उनको लगता होगा कबीर मुझ के दुःखी होने से बदलता नहीं ये सब मगर दुःख था दर्द था बेचैनी रही थी। उदासी थी नानक जी भी उदास रहे थे जिस जिस को समाज की बातें विचलित करती हैं खुश नहीं रह सकता है। 

   जाने कैसे लोग समझते हैं मेरे पास खाने को रोटी है रहने को घर है और जीने को गुज़ारा करने को पैसा भी है तो जिनके पास कुछ नहीं है जो भूखे हैं बदहाल हैं खुले आसमान तले रहते हैं तपती लू बारिश सर्दी आंधी तूफ़ान बिजली की गरज सब को झेलते हैं उनसे मुझे क्या।  बस उनका पता है इक खबर है जिस से मुझे कोई लेना देना नहीं है उनकी चिंता मुझे क्यों करनी है। मुझे अपने बारे स्वादिष्ट भोजन बड़े घर अधिक सुख सुविधा और जाने कितनी ख्वाहिशों की बात सोचनी है बहुत और चाहिए सबसे अधिक और धन दौलत ताकत शोहरत पाने को मौज मस्ती करने की बात सोचनी है। खुश रहने को क्या ज़रूरी है समझना होगा। मुझे बचपन से इक बात की चाहत रही है बस कोई इक दोस्त मिल जाये जिसको कोई स्वार्थ कोई ज़रूरत नहीं दोस्ती अपनेपन की आरज़ू हो। दुनिया के हिसाब-किताब से अनजान हो मेरी तरह थोड़ा भावुक संवेदनशील हो और दोस्ती का अर्थ समझता हो। मगर मिला नहीं तलाश करने को जतन करता रहता हूं अभी भी। लोग खुश होते हैं बड़ा घर कोई पद कोई रुतबा कोई शोहरत पाने से। कोई धन दौलत जमा कर रईस बनकर ख़ुशी हासिल करता है किसी को महल सा आलीशान घर बड़ी बड़ी गाड़ियां ख़ुशी देती हैं कोई भीड़ चाहता है अपने आस पास तो कोई दुनिया भर की सैर करना चाहता है। मुझे इन सब बातों की कोई अहमियत नहीं लगती बस चैन से रहना गुज़र बसर को ज़रूरत को थोड़ा सा सामान और आमदनी अपनी ज़रूरत भर पूरी करने की , इतना बहुत है। पास है कोई कमी नहीं खलती सिवा इक बात के कि काश कोई मुझे समझता मेरी बात को सुनता और जैसा भी मैं हूं अपनाता मुझे।

         शायद अब खुद को बदलने का समय है , खामोश रहकर जीने की अदा सीखनी है। कोई ज़रूरी नहीं सब को कोई दोस्त मिले जैसा कोई चाहता हो। जिन बातों से दोस्तों को खोना पड़ा है मुझे ही छोड़ना होगा वो सब भले कितना उचित और अच्छा हो। कुछ बातें नहीं समझ आती हैं लोग मिलते हैं तो उनको देश की राज्य की राजनीति की बेकार की बातों या फिर अमीरी के दिखावे को छोड़कर कोई बात चर्चा के लिए पसंद नहीं आती है। मुझे इन में कोई रुचि नहीं है। जब किसी को हर कोई हर पल यही एहसास करवाता रहे कि तुम नासमझ हो , तुन्हें कुछ भी नहीं आता है , पैसा बनाना नहीं आया शान से रहने का दिखावा करना नहीं आया हर कोई तुम्हें देख कर हंसता है कोई कायदे की बात नहीं करता कोई ढंग का धंधा नहीं करता बेकार उलझन में पड़ा रहता है। तारीफ भी करनी हो तो शब्द होते हैं बुद्धू हो जो नहीं समझ सकते आजकल की दुनिया कैसी है। सपनों की दुनिया में जीते हो जहां कोई भेदभाव कोई नफरत कोई झगड़ा किसी धर्म का ख़ास आम बड़े छोटे का नहीं हो। अधिकतर लोग इन्हीं की सोच वाले हैं मतलब की बात अर्थात अपने हित अपनी भलाई की बात बाकी सब बातें फ़ज़ूल लगती हैं। मैं नहीं होना चाहता अपने खुद तक सिमटा हुआ , सार्थक जीवन का अर्थ है अपने से निकलकर सभी की बात करना। जब भी किसी से दिल की बात की है लगता है हर कोई रिश्तों की दुनिया में कीमत लगाता है तोलता है मतलब के तराज़ू पर हर नाते बंधन को। खरीदार बनकर मिलते हैं मुझे लोग और मुझे बिकना मंज़ूर नहीं है। शायद मेरी कुछ भी कीमत नहीं लगती किसी को या फिर कोई समझता ही नहीं कुछ चीज़ें और इंसान भी अनमोल होते हैं जिनका कोई दाम नहीं होता मगर किसी कीमत पर मिलते नहीं हैं बाज़ार में ज़माने के। बस कुछ ऐसा है मेरे साथ सबको किसी काम का नहीं लगता और मुझे चाहिए वो जो मेरी कीमत समझता हो लगाना नहीं चाहता हो।


Tuesday, 24 September 2019

मन की उलझन सुलझती नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

    मन की उलझन सुलझती नहीं ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

    कोई उधर जाने कोई इधर जाने की बात करता है। जाता कोई कहीं नहीं है ठहरे हुए पानी की तरह विचार भी कहीं अटके हुए हैं। बहता हुआ पानी कुछ भी हो थोड़ा पीने के काबिल रहता है रुका हुआ पानी बदलना चाहिए दुष्यंत कुमार कह गए हैं। अब तो इस तालाब का पानी बदल दो ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। सुबह कोई कुछ कहने लगा तो मैंने कहा आपको संदेश भेजा था इस को लेकर कहने लगे फुर्सत नहीं है पढ़ने की। सोशल मीडिया पर लोग दिन रात लिखते हैं बिना पढ़े ही और फिर सबको कहते हैं मेरी पोस्ट पढ़ना। गांव में कहावत है आप बैल को तालाब तक ले जा सकते हैं पानी पीने को विवश नहीं कर सकते छी-छी कहने से पानी नहीं पीता है पशु भी। मुझे कहोगे आप क्यों लिखते हैं जब लोग पढ़ते नहीं तो कारण मन की उलझन है सुलझती नहीं है। विचलित होने की आदत है जब भी कुछ देखता सुनता हूं बिना लिखे बेचैनी नहीं जाती है। रात को कोई मिला कुछ बात कहना चाहता था , मुझे जानते हो कहने लगा , उधर घर है फलां परिवार है , मैंने कहा मालूम है। फिर कोई बात कहने लगे किसी को लेकर भाषा सभ्य नहीं थी तो मैंने कहा मुझे इस भाषा में चर्चा करना पसंद नहीं है सुनते ही नौ दो ग्यारह हो गए। जानता था पहचाना कल रात उनको। 

किसी ने कोई बात लिख कर सवाल किया हज़ारों साल पहले लिखा हुआ है ये सच लगता है आप साफ बताओ। मैंने कहा नहीं जानता सच क्या है खुद आपको कोई किताब धर्म की पड़नी चाहिए फिर समझना होगा। धर्म कोई भी हो जो आपको प्यार मुहब्बत नहीं नफरत का सबक सिखलाता है धर्म नहीं हो सकता है। भगवान अल्लाह जो भी हो ऊपर वाले को न किसी से बैर है न किसी से लगाव सब बराबर हैं विधाता की नज़र में इतनी बात समझने को कोई उपदेश कोई किताब पढ़ना ज़रूरी नहीं है। पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोई , ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय। बस ढाई अक्षर समझना ज़रूरी है। कोई  पढ़ता नहीं तो भी मुझे संदेश भेजना है कोई विवशता नहीं किसी का मन हो पढ़ सकता है। मुझे हर उस जगह दीपक जलाना हैं जिस जिस जगह अंधकार छाया हुआ है। जहां समझते हैं बड़ी चकाचौंध रौशनी हैं उसी के पीछे अंधेरा देखा है लाल कालीन के नीचे गंदगी छिपी हुई और जो नेता अधिकारी जनकल्याण की बात करते हैं उन्हीं में अहंकार और कर्तव्य नहीं निभाने की वास्तविकता नज़र आती है। उन पर असर हो नहीं हो कहना मेरा काम है नाराज़ हो जाते हैं तो उनकी समझ की बात है। 

   लोग जलसे करते हैं जाने किस कारण जब दुष्यंत कुमार के शब्दों में यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं , खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा। यहां तक आते आते सूख जाती हैं सभी नदियां , मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। ठहरा हुआ पानी गंदला कीचड़ बनता जाता है ज़रूरत पानी को साफ करने की है तो पहले खराब पानी बाहर निकालना होगा। हम गांव के लोग किया करते थे यही मगर ये पढ़े लिखे गंदे पानी में साफ पानी मिला कर उसको भी खराब करते हैं। खुद को अच्छा साबित करना होता है किसी और को खराब साबित करने से आपकी अच्छाई नहीं सामने आती कभी भी , आपकी मानसिकता का पता चलता है। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा जाने से नहीं अपने भीतर झांकने से विधाता को जान सकते हैं। हम धर्म को या कोई जानकारी हो उसे समझने की कोशिश नहीं करते सुन कर रटते हैं बिना अर्थ जाने , ये तो अज्ञानता की बात है। चिंतन करना ज़रूरी है अन्यथा समय बर्बाद करने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला। अभी इतना ही और पहले खुद समझ कर आपसे चर्चा करनी है उपदेश नहीं देता हूं मैं कोई उपदेशक नहीं हूं चिंतन करना चाहता हूं।  

Sunday, 22 September 2019

खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया

   खिलौना नहीं इंसान हूं ( दास्तान ए ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया 

  हंसता रहा , मुस्कुराता रहा कभी आंसूं बहाता रहा ,
 जैसे कोई बेजान सामान सबकी दुनिया का मशीन सा। 
 
 चलता गया अजनबी अनजान राहों पर चाहे-अनचाहे ,
 कोई मंज़िल कोई मकसद कोई सपना नहीं था मेरा भी।

 फिर भी बहला नहीं पूरी तरह से किसी अपने बेगाने का ,
 मुझ से खेल कर भी दिल खिलौना टूटने बिखरने तक भी।

 अब तक गया हूं आखिर सदियों लंबे सफर पर चलते हुए ,
 नहीं चला जाता थोड़ा तक कर आराम करना चाहता हूं मैं।

 सभी अनचाहे खुद बना लिए बंधनों से मुक्त होकर अब ,
 बचे हुए कुछ पल जीना चाहता हूं अपनी मर्ज़ी से मैं भी।

 भगदौड़ से दुनिया की तक कर चूर हो कर परेशान होकर ,
 पल दो पल जीना चाहता हूं अपने साथ अपनी ख़ुशी से।

 किस किस को कैसे समझाऊं मैं नहीं बेजान खिलौना कोई ,
 दिल जज़्बात संवेदना और एहसास कुछ खालीपन का है।

 कुछ भी नहीं चाहत कोई गिला शिकवा आपस में नहीं है ,
 बस खुले आसमान में सांस लेना है घुट रहा है दम मेरा।

 नहीं आदत औरों की तरह हाथ जोड़ मांगना कुछ  कभी ,
 इतना चाहता हूं जैसा भी मैं हूं रहने दो मुझे अपनी तरह।

 और नहीं जिया जाता हर किसी को खुश रखने को मुझसे ,
 थोड़ी आरज़ू बची हुई है आखिरी पल चैन से रहना है अब।

 खामोश होकर शायद चिंतन करना चाहता हूं क्या है पास ,
 समझना नहीं सब को न ही किसी से कुछ कहना है अब।

Friday, 20 September 2019

मॉडलिंग के दीवाने लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        मॉडलिंग के दीवाने लोग ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  आज़ादी को सौ साल हो चुके हैं और शोधार्थी देश के पिछले इतिहास पर शोध कर रहे हैं। कोई तीस चालीस साल पहले के दस्तावेज़ और फोटो फिल्म वीडियो का अवलोकन कर हैरान हैं कि देश की जनता को सांसद विधायक चुनते समय जो लोग पसंद थे वो कोई नायक या देश सेवक अथवा देश की समस्याओं को हल करने के जानकार या कुछ भी बदलाव लाने के अनुभव और मकसद समझने वाले नहीं हुआ करते थे। लोग ऐसे लोगों को चुनकर सांसद विधायक बना उनको सत्ता सौंप देती थी जिनको मॉडलिंग करने वाले अभिनेताओं नायिकाओं की तरह अपने वास्तविक जीवन से बिल्कुल अलग डायलॉग और अभिनय करना आता था। मॉडलिंग की शुरुआत किसी मसाले बनाने बेचने वाले से अपनी तरह से हुई थी और उसके बाद योग करने वाले से लेकर साधु संत बने लोग मिलकर उसे और ऊंचाई पर ले गए थे। मगर इन सब को पीछे छोड़ किसी राजनेता ने हर दिन शानदार लिबास और फ़ोटोशूट करने का इक कीर्तिमान स्थापित किया था और सरकार का मुखिया बन अपनी मॉडलिंग की अदाओं से लोगों को दीवाना बना दिया था। शोध किया गया तब समझ आया उसने दिन में अठाहरह घंटे यही काम किया सजने संवरने और अलग अलग तरह के परिधान ताज पगड़ी और तन ढकने से मन की बात कहने तक किसी और काम की फुर्सत नहीं थी क्योंकि इतना सजने संवरना किस काम का अगर उसको देखने वाले लोग ही नहीं हों इसलिए हर दिन टीवी पर विज्ञापन देकर शान दिखाई सभाओं में देश विदेश में नित नये नये सैर सपाटे करते हुए शान का दिखावा किया।

      कुछ लोगों ने स्वर्ग नर्क की कहानियां सुनकर अपनी आजीवका का साधन यही बनाकर हलवा पूरी खाने और सबको रूखी सूखी खाकर खुश रहने की बात समझाई। सत्ता वालों ने भी आसमान चांद सितारे वाले सपने बेच का धरती को अपने अधिकार में लेने का काम किया। सरकारी आंकड़े वही आकाश हैं जो दिखाई देते हैं और लुभाते हैं मगर उनका कोई अस्तित्व नहीं होता है। चांद को छू लेने की आरज़ू ख्वाहिश नासमझ लोगों को कभी वास्तविकता से सरोकार नहीं करने देती है। मॉडलिंग वाले अभिनय के माहिर होते हैं और जो कभी खुद नहीं देखा सबको दिखाने का करिश्मा करते हैं बदले में करोड़ों की कमाई करते हैं। जिन्होंने खुद कोई नियम कोई कानून कोई सामाजिक नैतिकता के मूल्य की परवाह नहीं की जिसे चाहा विवाह कर अपनी बनाया जिसे चाहा छोड़ दिया किसी और संग मुहब्बत का खेल रचाया कोई और पसंद आई तो धर्म बदल विवाह करने का मार्ग तलाश किया मगर सब मनमर्ज़ी और मनमानी करने के बाद भी शान से धन दौलत और राजनीति की सत्ता को हासिल करते तमाम मर्यादाओं को पांव तले कुचलते रहे। देश की जनता को अपने गांव शहर की बदहाली दिखाई नहीं दी मगर टीवी पर दिखाई देने वाले झूठ को देख कर तालियां बजाते रहे। शिक्षा हासिल करने के बाद भी समझ नहीं आया कि सपना और हक़ीक़त का अंतर बहुत है। सपने में अपने छप्पन भोग खाये मगर पेट खाली रहा और भूख से मरते रहे। हर राजनैतिक दल का चुनावी घोषणापत्र बस यही था।

     लंका सोने की थी और देश भी सोने की चिड़िया कहलाता था। पुष्पक विमान रावण के पास था और राम को बनवास मिला था कथा पढ़ते रहे समझ नहीं पाए ये कैसे था और लंका में सीता अशोक वाटिका में रही मगर राम शासक बने तो अग्नि परीक्षा के बाद भी किसी धोबी के आरोप लगाने के आधार पर त्याग दिया गया सीता को बिना किसी अपराध किये ही। राजनीति का अर्थ अपने को उजला साबित करना है और हर सफल राजनेता ने विरोधी की कमीज़ को मैली दाग़दार साबित किया ताकि उसके सामने खुद अपनी चादर को साफ़ दिखाने का काम कर सके। जनता बेचारी अपनी चुनरी का दाग़ देख कर शर्माती रही कि जाकर बाबुल से अखियां मिलाऊं कैसे घर जाऊं कैसे। राजनेताओं को जांच आयोग का साबुन और अदालत की वाशिंग मशीन मिली थी जो सबको बरी कर देती थी। घोटाले हुए मगर किया नहीं किसी ने भी कोई घोटाला भी ये तो इक भयानक ख्वाब था जो भूलना चाहा सबने मगर जिनको उनकी राजनीति आती थी उन्होंने राख में कोई चिंगारी दबी संभाल के रखी ताकि फिर से हवा देकर शोला बनाया जा सके। सत्ता और सरकार का कोई दीन धर्म नहीं होता है उनको बदलते वक़्त नहीं लगता है। कोई पापी निर्दोष साबित हो जाता है दल में शामिल होकर तो कोई बिना अपराध सूली चढ़ा दिया जाता है। अच्छी हुआ करती थी पुरानी कथाएं कहानियां जो आखिर सब कुछ ठीक होता था उन में आजकल हर कथा हर कहानी अंत तक आते आते और भी खराब भयानक हो जाती है और खलनायक जैसे लोग भगवान होने का किरदार निभाते निभाते खुद को भगवान समझने लगते हैं और उनकी दहशत ऐसी होती है कि लोग समझ कर भी नहीं समझते और अपनी जान की खैर मनाने को तालियां बजाते हैं अभिनंदन करते हैं जय जयकार के उद्घोष करते हैं। अब यही कारोबार सबसे अच्छा है मॉडलिंग करने का और कोई नायिका गेंहूं की कटाई करती है हेलीकॉप्टर पर खेत में आती है सजी धजी बन संवर कर। किसान ख़ुदकुशी क्यों करते हैं ये व्यर्थ की बात है। सत्ता का खेल चल रहा है स्वर्ग पाना है तो मुझे जितवाना होगा अन्यथा आपको नर्क से कोई नहीं बचा सकता है। डायलॉग सुपर हिट अभिनय शानदार है लोग जादूगर की जादूगरी पर निहाल हैं। जादू की परियां बुला रही हैं।

                

Thursday, 19 September 2019

बदनाम है शोहरत बहुत है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बदनाम है शोहरत बहुत है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  हालत ऐसा है कोई कटाक्ष किसी और को लेकर करता है तब भी उनके चाहने वाले बवाल खड़ा कर देते हैं कि अपने हमारे आराध्य को लेकर कोई बात कही क्यों। मतलब उनको भगवान बताने या बनाने वाले भी स्वीकार करते हैं कि ये बात उनके लिए ही कही जा सकती है। बड़े बज़ुर्ग समझाया करते थे साथ कुछ भी नहीं जाना है नाम की कमाई बाकी रहती है। सच भी है दादा जी को गुज़रे पछास साल ताऊ जी को गुज़रे चालीस करीब और पिता जी को तीस साल होने को हैं गांव के लोग आज भी उनकी बात बड़े आदर से करते हैं। मुझे मालूम है मैंने कैसा नाम कमाया है सच बोलकर लिखकर दोस्तों को अपना दुश्मन बनाता रहा हूं। कभी कभी हैरान होता हूं साहित्य सृजन सच का आईना दिखाना तो होता है प्यार मुहब्बत का सबक पढ़ना पढ़ाना भी हुआ करता है। क्यों हमने मुहब्बत की ग़ज़ल कविता कहानी लिखना छोड़ खलनायक को नायक बना हिंसा को मनोरंजन का नाम दे दिया है। समाज का चेहरा इतना डरावना कब कैसे हो गया है कि हर साधु महात्मा नज़र आने वाला हमें नकली लगता है और हम दोगलेपन का शिकार हुए उनके पांव भी छूते हैं और मन ही मन उनको ढौंगी भी कहते हैं। यही विचार मन में आया था जो दो दिन पहले मैंने गुरु जी श्री आर पी महरिष जी का शेर सोशल मीडिया पर लिखा था आजकल के हाल पर , ये है वो शेर। 

ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी , आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह। 

    एक शिक्षित और सभ्य महिला जिनको मैं उनके आदर्श राजनेता का आलोचक लगता हूं ने सभ्य शब्दों में संदेश भेजा सब गलत वही करते हैं आपकी नज़र में। उनकी गलतफ़हमी जाती नहीं फिर भी बताया ये उनकी बात नहीं है हर शख़्स शब्द उपयोग किया गया है जिसका मतलब सभी से है और ये जब लिखा गया था पचास साल पहले तब आपके नेता जी की कोई पहचान नहीं थी मगर बात तब भी सच थी और लिखने वाले शायर के दुनिया छोड़ जाने के कुछ साल बाद अभी भी सच ही है। उनका निधन कुछ साल पहले सौ बरस की आयु के करीब होने पर हुआ था। अच्छी दोस्त हैं जो खुलकर बात कहती हैं समझ सकती हैं समझाया जा सकता है मगर कितने जो उन नेता जी को भगवान मानते हैं खुद भी भक्त नाम से बदनाम हैं अपनी भक्ति का दिखावा करते हुए अपशब्द गाली हिंसा पर उतर आते हैं जाने ये कैसी भावना है जो विवेक संयम खो देती है। उन्हें इतना भी समझ नहीं आता कि कोई कुछ भी कहता लिखता है आपको क्यों हर खराब बात अपने तथाकथित भगवान को लेकर लगती है इस का अर्थ तो यही है कि आप को भी बात सच लगती है मगर सच सुनना पसंद नहीं है। अर्थात आपको कोई कलयुगी अवतार लगता है और खुद भी आप भक्त हैं कलयुगी ही और आपकी भक्ति भी कुछ उसी तरह की है जैसे कोई अभिनेता नाटक फिल्म या टीवी  सीरियल में नेगेटिव रोल करता दर्शकों को भा जाता है। 

     शायद उनको भी पता है वो जो भी दावा करते हैं सच नहीं है उनको भगवान कहलाना है बनकर दिखाना नहीं है। और इतिहास भरा पड़ा है ऐसे शासक हुए हैं जो खुद को भगवान घोषित करते थे और कर्म विपरीत किया करते थे जो उनको भगवान नहीं मानता था उसको जान से मारने अन्याय करने में कोई कमी नहीं छोड़ते थे। मगर आखिर उनका असली रूप सामने आया भी ज़रूर था पढ़ा होगा अपने या भूल गए होलिका दहन की कथा रावण जलाने की बात हर साल दोहराते हैं फिर भी। ज्ञानी बलशाली था मगर अभिमानी अहंकारी और विवेक की बात को नहीं समझने के कारण अंजाम क्या हुआ। मगर अब लोग राम का नाम भी लेते हैं और किसी भी मर्यादा का पालन नहीं करना चाहते तभी उनको ऐसे ही भगवान अच्छे लगते हैं मगर उनकी ये भक्ति उनका कल्याण नहीं कर सकती है न देश समाज का कल्याण संभव है। सच और झूठ अच्छाई और बुराई वास्तविक आचरण और आडंबर ऐसे शब्दों की परिभाषाओं को बदलना उचित नहीं है। कैसी भक्ति है जिसने भक्त शब्द को बदनाम कर दिया है वास्तविक भगवान भी घबराते होंगे ये देख कर कि भक्त ऐसे भी हो सकते हैं। इक बात तो है कि लोग अच्छी बातों को याद नहीं रखते बुरी बातों को कभी भूलते नहीं हैं। बदनाम हैं तो भी नाम तो है मानने वाले लोग हमेशा रहे हैं। गब्बर सिंह सबको याद है ठाकुर किसी को याद नहीं रहता है शोले फिल्म की मिसाल सामने है। मगर किरदार निभाने वाले दोनों अभिनेता किसी और दुनिया में साथ बैठे ठहाके लगा रहे होंगे।

Wednesday, 18 September 2019

धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  धर्म की जनसेवा की गलत परिभाषा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  हमने अपने विवेक से काम लेना छोड़ दिया है अन्यथा हम ऐसे कर्मों को धार्मिक नहीं मानते कभी। जब भी किसी देश का शासक भले जिस भी व्यवस्था द्वारा सत्ता पर बैठा हुआ हो जनकल्याण का पैसा खुद अपने किसी भी मकसद पर खर्च करता है उसको अच्छा शासक क्या भलामानुष भी नहीं समझा जाना चाहिए। जब किसी राज्य की जनता किसी कुदरती आपदा से कष्ट में हो तब उनकी सहायता करने की बात भूलकर जब कोई अपने किसी तथाकथित धार्मिक आयोजन करने पर सरकारी लोगों को व्यस्त रखने का कार्य करता है तब वह वास्तव में इक अपराध मानवता के खिलाफ कर रहा होता है। और हम देखते हैं हर जगह कोई यही अधर्म कर रहा नज़र आता है। सौ पंडित मिलकर कोई पूजा पाठ करने से किसी का अपने कर्तव्य को भुलाकर अपने खुद के लिए कुछ भी करना कैसे किसी भगवान को खुश कर सकता है। 

   हैरानी हुई जब कुछ लोग धार्मिक आयोजन भी अपनी ताकत शोहरत को साबित करने को आयोजित करने लगे हैं। यहां पर शर्तें लगाई जाने लगी हैं मेरी कमीज़ उजली है उसकी मैली है , लगता है कोई फ़िल्मी नायक किसी डिटर्जेंट का विज्ञापन कर रहा है। आपको अमिताभ बच्चन का डिटर्जेंट भाता है या अक्षय कुमार का मर्ज़ी आपकी है। समझदार दोनों जगह हाज़िरी लगवा आये नासमझ हम किसी भी जगह नहीं जाना उचित लगा धर्म कोई बाज़ार नहीं है ये उपदेश सुनने की ज़रूरत नहीं थी। हद तब हुई जब डंका पीटने का काम किया गया ये बताया गया उनकी लंगर की थाली हज़ार दो हज़ार वाली थी। इतने ही धर्म कर्म वाले हो तो लाखों रुपया शानो शौकत दिखाने पर नहीं कुछ गरीबों का पेट भरने किसी की सहायता करने पर लगाते तो पुण्य का काम होता। 

   हमने एक तरफ आधुनिक विज्ञान और चांद पर जाने की बात की है दूसरी तरफ अभी भी अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं। भला किसी रोगी को कोई दवा ख़ास दिन अपने हाथ से देने पर असर होने की बात कोई खुद को आधुनिक शिक्षा विस्तार  और अंधविश्वास का अंत करने वाली बात कहने वाला किस तरह कह सकता है। मगर आजकल शिक्षा स्वास्थ्य समाज सेवा धर्म सभी का कारोबार है और सफल होने को ये सब करना अनुचित नहीं समझते लोग। लेकिन आप किसी से भी किसी विषय पर चर्चा भी चिंतन की तरह नहीं कर सकते हैं क्योंकि तर्क की कोई बात नहीं समझता और आपके सवाल का जवाब देने की जगह आपको अनाप शनाप बातें और जाने क्या क्या नहीं कहा जा सकता है। 

   जिधर भी नज़र जाती है लोग समाज सेवा का आडंबर करने को कितने एनजीओ बना वास्तव में उनकी आड़ में क्या क्या नहीं करते हैं। समाज सेवा धार्मिक आयोजन दान करने को खुद की कमाई खर्च की जानी चाहिए ऐसा ही सभी धर्म बताते हैं। जब कोई सरकारी धन से अपने गुणगान ही नहीं राजनीतिक मकसद से दिखावा करने पर अनुदान लेकर बर्बाद करता है तो पुण्य नहीं मिल सकता ऐसा कर के। राजनेता अधिकारी ही नहीं बड़े बड़े धार्मिक स्थल दान चढ़ावे की राशि का उपयोग धर्म छोड़ तमाम बाकी कामों पर करते हैं तो खुद ही अपने धर्म और उपदेश को धोखा देते हैं। आपको उल्टी परिभाषा समझाई जा रही है धर्म पुण्य और जनसेवा की बात की जाती है करते जो हैं विपरीत आचरण है।

Friday, 13 September 2019

विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

    विद्या बेचारी हिंदी जैसी ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

 लिखते हुए मन में इक खालीपन लग रहा है बात हिंदी दिवस पर हिंदी के गौरव की करनी चाहिए मगर जो सामने है हिंदी का उपहास लगता है। बस हिंदी से उसका दर्द मिलता जुलता लगता है तभी किताबी हिंदी की बात छोड़ टीवी सीरियल की बात करने लगा हूं। दो चार कड़ियां दिखाई गई हैं विद्या नाम से धारावाहिक शुरू हुआ है। नायिका विधवा है ससुराल में चुपचाप सहमी हुई रहती है सब काम घर का करती है मेधावी है पंडित जी का बताया मंत्र इक बार याद हो जाता है। बचपन में पिता के पास एक के लिए किताब खरीदने को पैसे थे इसलिए बेटे को किताब लाकर स्कूल भेजते हैं और बेटी की ख़ुशी मां के साथ रसोई में हाथ बंटाने में है। विद्या बेटी जो है कोई शिकायत नहीं करती चुपचाप मान जाती है और जिस से परिवार गठबंधन करवाता है विवाह कर ससुराल चली जाती है। हिंदी भाषा की तरह बदनसीबी साथ रहती है और विधवा हो जाती है इक शहीद की विधवा को सरकार पचास लाख देती है मगर पैसे ससुराल वाले खा जाते हैं हिंदी दिवस के बजट की तरह सरकारी लोग क्या यही नहीं करते हैं। मगर रिश्वत की मेहरबानी से ससुराल वाले विद्या को सरकारी स्कूल में अध्यापिका नियुक्त करवा देते हैं बिना उसकी मर्ज़ी के ही और उसको आदेश देते हैं सुबह उठकर साइकिल पर दूर गांव जाकर अंग्रेजी पढ़ाने को क्योंकि सरकार ने टीवी वालों के विज्ञापन के शब्दों में जिसका अंग्रेजी का ए बी सी डी का डब्बा गोल है उसे बच्चों को अंग्रेजी पढ़ानी है। अब कौन कौन उसका शोषण करता है और कौन कौन उसको मूर्ख बनाता है कहानी लंबी है और बाकी है देखने को। मगर विद्या नाम से ही बेचारगी का एहसास होता है हिंदी की तरह। टीवी वाले उसका नाम भी हिंदी अंग्रेजी को मिला कर लिखते हैं जो उनकी मानसिकता है। अर्थात विद्या या हिंदी दया की पात्र हैं। 

   चलो टीवी सीरियल को छोड़ हिंदी की बात करते हैं। हिंदी लिखने वाले हर साल ख़ुशी मनाते हैं और गर्व करते हैं घोषणा करते हुए कि हिंदी जगत की भाषा बन गई है। मगर शिक्षा की बात होती है तो निजि विद्यालय अंग्रेजी स्कूल और सरकारी स्कूल हिंदी वाले का अंतर साफ लगता है। किसी को रूखी सूखी किसी को हलवा पूरी मिलने की बात है। मगर हिंदी लेखक हैं जो भूखे रहकर लिखते हैं और अपनी पूंजी खर्च कर किताबें छपवाते हैं और बिकती नहीं हैं तो उपहार में बांटने का काम करते हैं जबकि जिनको मुफ्त उपहार मिला पुस्तक को पढ़ना क्या देखते भी शायद हैं। किताब पढ़ने को फुर्सत किसे है जब दिन भर खाली समय मनोरंजन करना मकसद है और सोशल मीडिया पर उल्टी सीधी पढ़ाई पढ़ते हैं सबको ज्ञान देने की बात करते हैं। व्हाट्सएप्प फेसबुक स्मार्ट फोन की अनुकंपा है जो पढ़े लिखे और अंगूठा छाप एक समान हैं बल्कि अनपढ़ लगता है चार कदम आगे हैं। चलो शुभकानाओं का आदान प्रदान करते हैं हिंदी दिवस मनाते हैं और बाकी सब भूल जाते हैं। 

   हिंदी दिवस पर हिंदी का गुणगान करने की रचना पढ़ते हैं गीत गाते हैं कविता कहानी सुनाते हैं। अपनी किताब का विमोचन करवाते हैं बधाईयां पाते हैं इतराते हैं। कितने ईनाम पुरुस्कार मिले बतलाते हैं खुशियां मनाते हैं। क्या लिखा था साहित्य का मकसद क्या है भूल जाते हैं जाने किस दुनिया से आये हैं और किस दुनिया की तरफ चले जाते हैं। साहित्य कहते हैं सच का दर्पण है तो आईने को आईना दिखाते हैं। हम कहते हैं इक ऐसा समाज बनाते हैं जिस में छोटे बड़े का भेदभाव सब भूल जाते हैं मगर हम खुद को बड़ा किसी को छोटा भी समझते हैं समझाते हैं। राह कौन सी जाना है हम किस रास्ते बढ़ते जाते हैं। क्या समाज में बदलाव हुआ है साहित्य कर्म सार्थक है या कोशिश है अन्याय नहीं न्याय की बराबरी की बात हो ये चर्चा करते हुए घबराते हैं शर्माते हैं। अपना असली चेहरा ढकते हैं छुप जाते हैं। सरस्वती वंदना गाते हैं देवी को मनाते हैं मगर उसकी तस्वीर पर जमी धूल को इक ख़ास दिन साफ़ करते हैं सामने दीप जलाते हैं। अंधेरों से हम साल भर दोस्ती निभाते हैं किस का नाम लिया जाये कैसे कैसे लोगों के दरवाज़े पर सर झुकाते हैं झोली फैलाते हैं खैरात ले आते हैं अधिकार पाने की बात नहीं करते हैं डर जाते हैं। अपने हिंदी दिवस मनाने का निमंत्रण भिजवाया है क्या पता भूल गए गलत पते पर आकर घबराया है किसी नेता ने रद्दी की टोकरी में फिंकवाया है। देख कर किसी को दर्द आया है चुपके से रद्दी की टोकरी से उठाया है और सर माथे लगाया है क्योंकि ऊपर सरस्वती देवी की तस्वीर लगी थी सह नहीं पाया है। कैसे उस सभा में शामिल हो सकता है ये लेखक जिस में अंगूठा छाप को मुख्य अतिथि बनाया है। हिंदी के नाम पर इस साल भी दिल भर आया है।

Thursday, 12 September 2019

हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   हम सभी महात्मा हैं अब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       हम जब तक नौकरी व्यवसाय में रहे वो सब किया जो करना चाहा जो करना पड़ता था जो करना नहीं चाहिए था मगर करते रहे विवशता की आड़ लेकर अपने फायदे अपने स्वार्थ लोभ लालच जैसे कितने ही कारण बहाने गिनवा सकते हैं। लेकिन जैसे ही हम ने अपना काम व्यवसाय नौकरी से निजात पाई हम सभी को ज्ञान की अनुभूति हुई कि जो भी जीवन भर किया सब झूठ था व्यर्थ था और वास्तविक आनंद लोभ मोह को छोड़ धर्म कर्म के अच्छे कर्म करने से मिल सकता है। इस सब बताने का अर्थ कदापि ये नहीं है कि हम लोगों को अपने अनुचित आचरण करने कर्तव्य ईमानदारी पूर्वक नहीं निभाने से कोई पछतावा कोई ग्लानि है। हम आज भी गर्व करते हैं कि हम कितने बड़े पद पर रहे और कैसे कैसे हमने अपनी इच्छाओं की पूर्ति की और जो भी मन किया करते रहे हैं। जब कोई इंसान घर बार छोड़ सन्यासी बन जाता है तो उसके पिछले सभी किये अपकर्म भूल जाते हैं और धर्म चिंतन करने से पिछले पापों से मुक्त समझा जाता है। हम ने कोई लिबास बदला नहीं है और घर परिवार से बिछुड़ किसी जंगल में नहीं रहने लगे हैं फिर भी हमारे पिछले सभी बुरे कर्म सेवानिवृत होते ही अपने आप खत्म हो गए मान लिए जाते हैं। तब जो जो भी अनुचित किया हम ने नहीं किसी अधिकारी कर्मचारी व्यवसायी ने किये जो अब हम नहीं हैं और हम इंसान हैं पुरानी पहचान कोई झूठा सपना था और सपने में कोई भी अपराध किया गया गुनाह नहीं होता है।  मंच संचालक अपनी बात कह रहे थे और बारी बरी सभी सदस्य अपनी सच्ची कथा बता रहे थे।

    मैं इक सरकारी अधिकारी था कभी समय पर दफ्तर जाना ज़रूरी नहीं था सेवानिवृत होने के बाद इक संस्था ने शामिल होने और मंच पर विशेष बनकर बैठने का अधिकार दिया तो रविवार को भी सुबह सबसे पहले आना याद रहता है। मेरा कायाकल्प हो गया बहुत कुछ था कुछ भी नहीं रह गया तब पता चला आम ख़ास का अंतर कितना है। लोगों को कितना भटकाया फोन पर बात नहीं की मिलने आने पर मिलने से इनकार किया और अपनी ताकत का जमकर उपयोग किया। जो ख़ास लोग थे उनके लिए हाज़िर किया सब कुछ शासन का मज़ा लूटा जी भर कर और करना क्या चाहिए कभी विचार नहीं किया। अब सबको सीख देता हूं सही राह पर चलने की खुद कभी सही राह गया ही नहीं। सच तो ये है मैंने कभी भगवान खुदा के होने की नहीं होने की चिंता की ही नहीं  धर्म के नाम पर आडंबर किया है केवल जीवन भर मैंने।

     मैं शामिल था पुलिस विभाग में खुद कोई नियम नहीं पालन किया और सीधे सादे इंसानों से ऐसी भाषा में और इस तरह व्यवहार किया करता था जैसे खुद मैं जुर्म और गुनाह से नफरत करता हूं। मगर अपराधी लोगों से खुद ही सम्पर्क भी करता रहा उनको सहयोग भी दिया उनसे डरता भी था। न्याय के साथ खिलवाड़ करना मेरी आदत थी और बड़े अधिकारी या सत्ताधारी नेताओं के गैर कानूनी अनुचित आदेश भी जी हज़ूर कह कर मानता रहा और बदले में सब सुख सुविधा पाता रहा। कभी गलत करता पकड़ा भी गया तो भी मुझे बचाने को अधिकारी नेता खुद आते थे अपनी ज़रूरत को अपनी चमड़ी बचाने को। पुलिस का कर्तव्य क्या है इस की फज़ूल की चिंता मुझे नहीं रही अब जिस संस्था से जुड़ा हूं मानवाधिकार की बात करती है। यू टर्न लिया नहीं है सड़क की गलत दिशा जाने की बात है आपको समझ नहीं आएगी शायद।

    मैंने  गरीबों का हक छीना , उनसे उचित काम करने की रिश्वत वसूल की , ईलाज करने को सरकारी अस्पताल की जगह अपने घर नर्सिंग होम बुलाता रहा। दवा कंपनियों से फायदा उठाकर लूट का भागीदार बना और दाखिल करने से ऑपरेशन करने के लिए अपनी फीस के नाम पर रिश्वत लेता रहा। आजकल समाज सेवा का काम करने का तमाशा करता हूं तो खुद पर हंसता हूं जब अवसर था नहीं किया सही ढंग से काम अब दिखावे को जाने कितना कुछ करता रहता हूं। नेता भी बना कारोबार भी किया और कोई अपराध नहीं जो मैंने किया नहीं। खूब नाम झूठी शान और दौलत जमा की है अब दानी बनकर सभाओं में शान से शोभा बढ़ाता हूं।

      और इस तरह सब ने सेवानिवृत होने के बाद अपनी बात सच सच बताई क्योंकि इक साधु महात्मा ने उनको कहा था ऐसा करने पर आपको फिर से अगले जन्म में जो चाहोगे अवश्य मिलेगा। अब आखिर में उनकी इच्छा की बात संक्षेप में सचिव पढ़कर सुना रहे हैं।  सभी ने अपनी आरज़ू लिख कर पेटी में डाली थी महात्मा जी के कहने पर। सार यही था ये सब कोई मोक्ष की चाहत नहीं करते हैं। स्वर्ग उनको लगता है वही था जो उनको मिला था ज़रूरत से बढ़कर बिना मांगे या छीनकर भी और ये मिला जिस जगह वही नर्क का शासन ही तो है। उनको इसी देश में सब अपकर्म करने की छूट और अधिकार स्वर्ग से भी ऊपर लगते हैं उन्हें यही फिर से दोबारा चाहिए। जी भरा नहीं मनमानी कर के भी और किसी स्वर्ग में भजन कीर्तन करने से अच्छा है यहां इस नर्क में शासक बनकर स्वर्ग से बढ़कर सुख सुविधा हासिल की जाये। सार की बात यही है महत्मा बन जाना वक़्त और हालात के कारण होता है कोई भी साधु संत महात्मा होना नहीं चाहता है। बन जाने के बाद भी मन चाहता है ये झूठ की नकाब छोड़ खुल कर मौज मस्ती करने को। हर महात्मा अपना चोला उतार कर फिर से ज़िंदगी के मज़े लेना चाहता है बुराई की राह लुभाती है अच्छाई सच्चाई की राह चलने से कोई ख़ुशी कोई चैन नहीं मिलता है क्योंकि हमने चुना नहीं है ये सब छोड़ना मज़बूरी थी छोड़ना पड़ा है। अब कोई महात्मा महात्मा बनकर रहना चाहता नहीं है। 

Wednesday, 11 September 2019

मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

        मदहोशी के आलम में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 जिस समय इक महिअलों की समानता के अधिकारों की पैरवी करने वाली महिला नेता जी के शासन को राम राज्य घोषित कर रही थी ठीक उसी समय नेता जी का गला काट दूंगा की धमकी का महान आदर्शवादी वाक्य उच्चारण करने वाला वीडियो सामने आया। ये कोई बोतल का नशा नहीं है जो आसानी से उतर जाये धतूरे से सोने का नशा सौ गुणा अधिक होता सुनते थे मगर सत्ता और पद का नशा उससे लाख गुणा बढ़कर सर चढ़ कर नाचता नचवाता है , उतरता है जब सत्ता नहीं रहती तभी। क्योंकि जब तक सत्ता है इक हजूम साथ रहता है जो उनकी पसीने की बदबू को भी गुलाब की खुशबू कहता है। अब ये इंसान की कमज़ोरी कुदरती है कि झूठी तारीफ सुनकर चेहरे पर खिसियानी हंसी आ जाती है। कितनी खूबसूरत लग रही हो किसी महिला से कहो तो काला रंग गुलाबी हो जाता है। मन उछलने लगता है और खुद पर काबू नहीं रहता , हंसी तो फंसी इस को ही कहते हैं सयाने। 

    हे राम गांधी जी ने आखिरी सांस लेते कहा था आजकल लोग जाने किस किस को राम घोषित करने लगे हैं। ये सारे राम सत्ता पर विराजमान होने से राम लगते हैं उस से पहले कोई इनको कुछ नहीं समझता और सत्ता जाने पर राम को मानने वाले खुद राम बनने की ताक में रहते हैं। राम होने की बात इतनी अजीब हुई है कि राम नाम सत्य है लोग कहते हैं जब अर्थी उठती है। राम नाम याद आखरी वक़्त आते हैं मगर जिसका वक़्त अंतिम सांस ले चुका वो बोल नहीं सकता सुन नहीं सकता बाकी लोग समझते नहीं इस का मतलब क्या है। भावना नहीं होती है बस समय बिताने को रास्ता काटने को इक साधन बन गया है। लोग जाने क्यों मुर्दे से घबराते हैं जबकि मरने के बाद कोई किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता है और जो मर गया उसको कोई मार नहीं सकता है। ये राजनीति काठ की तलवारों की जंग है सब सैनिक कठपुतलियां बनकर लड़ते हैं किसी के इशारे पर नाचते हुए। 

      जब कोई लगातार अनाप-शनाप बोलने लगता है समझते हैं मनसिक संतुलन बिगड़ गया है उसकी कही बात का बुरा नहीं मानने की बात की जाती है। सत्ता मदहोश कर देती है और मदहोशी में बहुत कुछ हो जाता है जो माफ़ करना नशे में था कहने से छोड़ने को कहते हैं। मगर कितनी बार कोई बार बार यही करता है जो उसकी जगह पागलखाना हो सकती है। आगरे का पागलखाना बरेली का मशहूर हुआ करता था आजकल पागलखाने को भला सा नाम दे देते हैं। कितने पागल खुद को शहंशाह बताते हैं ख़ामोशी फिल्म को देखा है पागल आशिक़ कभी ठीक नहीं होते हैं पागल बना सकते हैं जैसे ख़ामोशी की नायिका वहीदा रहमान अंत में खुद ही पागल हो जाती है पागल आशिकों का ईलाज करते करते। नेताओं की मुहब्बत सत्ता की कुर्सी होती है उनको बस उसी से इश्क़ होता है और ये सत्ता कब हमेशा किसी की हुई है। यही वफ़ा की कहानी है और इसकी बेवफ़ाई का दर्द हर किसी को झेलना पड़ता है। महबूबा का साथ छूटता लगता है तब खुद पर अपनी ज़ुबान पर काबू नहीं रहता है। ऐसे में ईलाज भी यही है सत्ता से बाहर होना और दर्द भी इसी का होता है। ये खुमार चढ़ा हो तो कोई किसी को संभाल नहीं सकता न संभलने को कहने का कोई असर होता है। जाने दो नशा उतरते ही बंदा अपनी औकात में चला आता है।

Monday, 9 September 2019

बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया

    बेक़सी हद से जब गुज़र जाये ( देश के हालात ) डॉ लोक सेतिया 

     किसी शायर ने कहा है। तू है सूरज तुझे मालूम कहां रात का दुःख , तू किसी रोज़ मेरे घर में उतर शाम के बाद। तूने देखा है कभी एक नज़र शाम के बाद , कितने चुपचाप से लगते हैं शजर शाम के बाद। इतने चुप-चाप कि  रस्ते भी रहेंगे ला-इल्म , छोड़ जाएंगे किसी रोज़ नगर शाम के बाद। लौट आती है मेरी शब की इबादत खाली , जाने किस अर्श पे रहता है खुदा शाम के बाद। ये जो कुछ लोग अपनी खातिर नहीं देश की समाज की खातिर बेचैन परेशान रहते हैं कहते हैं ऐसा क्यों है जबकि बहुत लोग उसी को देख कर भी अनदेखा करते हैं ये कहकर कि ये तो होता रहता है इन दोनों में अंतर संवेदना का है। कुछ अपने से हटकर सबकी बात करते हैं और बहुत लोग अपने मतलब से मतलब रखते हैं। भला किसी की ऐसी फितरत कैसे हो सकती है हम देखते हैं तो समझ नहीं आता है। कोई सरकारी अधिकारी सत्ताधारी नेता के तलवे चाटता नज़र आता है जबकि ऐसा करना उसकी मज़बूरी कदापि नहीं है होना तो ये चाहिए कि सरकारी कर्मचारी अधिकारी अपना कर्तव्य देश और जनता के लिए निष्ठा रखते हुए निभाते और राजनेताओं की मनमानी नहीं स्वीकार करते। संविधान कानून उनको सत्ता पर बैठे नेता की अनुचित बात नहीं मानने का अधिकार देता है इतना ही नहीं आईएएस आईपीएस अधिकारी नहीं चाहे तो बड़े पद पर बैठकर भी कोई नेता घोटाला नहीं कर सकता है। अर्थात आज तक हर घोटाला इन लोगों की मर्ज़ी और सहयोग से ही हुआ है। मगर इन पर कोई कठोर करवाई होती नहीं है क्योंकि अपने पर जांच से लेकर दंड तक देने का काम खुद इनको करने का चलन है। जैसे टीवी अख़बार सोशल मीडिया वाले सबको लताड़ते हैं खुद क्या करते हैं कोई उनसे नहीं पूछता। बिक चुके हैं और निष्पक्ष होकर जागरुकता की बात नहीं सत्ता का पैसे वालों का गुणगान करते हैं। 

      अख़बार में कभी पाठकनामा कॉलम छपता था लोग अपनी समस्या लिखते थे और सरकारी विभाग को जवाब देना लाज़मी लगता था। शायद ही कोई अख़बार अब वो करता है। इधर सोशल मीडिया पर कितनी तरह से उनकी असलियत सामने लाने का काम किया जाता है जो कनून के रखवाले बनकर कानून से खिलवाड़ करते हैं पुलिस की वर्दी पहन अपराधी की तरह आचरण करते हैं। मगर ऐसे अधिकारी नेताओं का नाम एक दिन चर्चा में होता है उसके बाद हुआ क्या किसे मतलब है। जब सभी चोर चोर मौसेरे भाई हैं तो कौन किसे दंडित कर सकता है। इक रिवायत या आदत हो गई है सत्ताधारी शासक नेता उनके दल के लोगों के आदेश पर सब उचित अनुचित करने की। सोचता हूं अब लिखना बेकार है कुछ भी कहने से कोई असर नहीं होता सरकार नेता अधिकारी सब चिकने घड़े बन गए हैं मगर क्या उनकी वास्तविकता को उजागर नहीं करना भी उनके कर्तव्य नहीं निभाने और जब जो जैसे जहां मनमानी करने को बढ़ावा देना नहीं होगा। ऐसा पहले तो नहीं होता था जब भी कोई शिकायत करता या ध्यान दिलाता कहीं कोई अनुचित बात को लेकर अथवा उचित काम नहीं करने की बात करता तो कुछ न कुछ असर किसी न किसी पर अवश्व होता था। लेकिन आजकल जैसे कर्तव्य की बात क्या समाज की चिंता की बात क्या सरकार उसके अधिकारी नेता सभी अपने मतलब को जैसे भी मनमानी पूर्वक समाज की अनदेखी कर अपने हित साधने को नियम कानून ताक पर रख अनुचित आचरण करते संकोच नहीं करते हैं।

        आजकल सत्ताधारी दल राज्य भर में रोज़ किसी शहर में सभाओं का आयोजन अलग अलग नाम से कर रहा है। नेताओं की खातिर खूब सजावट और शोर दिखावा किया जाता है और स्थानीय नेता भी अपने नाम इश्तिहार और अपनी राजनीति करने में कोई कमी नहीं छोड़ते हैं। शहर में एक नहीं कितनी जगह अपने मकसद को भीड़ जमा की जाती है और खूब पैसा खर्च किया जाता है शानो शौकत पर। अधिकारी और सरकारी विभाग भी उचित अनुचित की चिंता छोड़ ख़ास लोगों को सब उपलब्ध करवाने में आम नागरिक की आपराधिक अनदेखी करते हैं और रास्ते बंद कर देते हैं अवरोध खड़े कर देते हैं। कुछ घंटे के राजनीतिक आयोजन की खातिर सरकारी विभाग कितने दिन लगा रहता है और सत्ताधारी दल के नेता भी अपनी मर्ज़ी से जो चाहते करवाते हैं। लेकिन उनका काम हो जाने के बाद जिस जगह को शानदार ढंग से सजाया गया था उस को गंदगी सड़क पर रुकावट से लेकर तमाम समस्याएं पैदा कर छोड़ जाते हैं। जैसे कोई मेला लगता है और मेले के खत्म होने के बाद हर रतफ मंज़र हैरान करने वाला हो जाता है। रौशनियों की जगह घना अंधेरा छाया नज़र आता है। ये नेता ये अधिकारी सरकार दावे करती है जनता की भलाई के मगर वास्तव में आम नागरिक की परेशानी के लिए उदासीन रवैया होता है। जो भी सड़क पर रुकावट या अन्य गंदगी उनके आयोजन से हुई उसको खुद ठीक करने की बात छोड़ बार बार बताने पर भी कोई कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं होता है। कोई किसी और पर करने का फ़र्ज़ बताकर पल्ला झाड़ता है तो कोई करने को कहने के बाद करता नहीं है। 

       जिस देश में इतनी गरीबी है कुछ लोग कैसे इतना पैसा सरकारी खज़ाने से या खुद सत्ता की आड़ में चंदे के नाम पर जमा कर ऐसे हर दिन शानो शौकत दिखाने को सभाओं की सजावट पर बर्बाद करते हैं। अपनी गंदी स्वार्थ की राजनीति की खातिर भीड़ जमा करने को हथकंडे अपनाते हैं फिर भी तमाम जगह पंडाल खाली नज़र आ ही जाते हैं। मगर उनको क्या उनकी कोई ईमानदारी की मेहनत की कमाई नहीं थी जो बेकार हुई। किसी न किसी तरह उन्हीं गरीब लोगों से ये वसूली होती है। जितने भी नियम हैं जनता पर कड़ाई से लागू करने वाले खुद उनको तोड़ने में हिचकिचाहट नहीं महसूस करते हैं उनको ये याद ही कहां रहते हैं। शासक अधिकारी खुद पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं तभी देश की जनता बदहाल है गरीब है। जब हर दिन इनके आयोजन समारोह सरकारी विभाग के भी और राजनीतिक दलों के भी आयोजित किये जाते हैं जीना हासिल वास्तव में कुछ भी नहीं होता सिवा उनके शोर और खुद अपने गुणगान करने के ताकि उनकी वास्तविकता की बात कोई नहीं करे , तब आम नगरिक देख कर सोचता है काश इतना पैसा गरीब लोगों की हालत ठीक करने को खर्च किया जाता तो बहुत कुछ बदल सकता था। चांद की बात पर जश्न मनाने से देश की धरती की बदहाली की बात को अनदेखा करना क्या देशभक्ति है। देशभक्ति देशसेवा की बात करते जाने से आपका अपने खुद पर करोड़ों रूपये ऐश आराम सुख सुविधा और मनमाने ढंग से दुरूपयोग करना कोई हद नहीं बची है। सपने देखने से कि सब बढ़िया हो जाएगा कुछ होता नहीं है खुस परस्ती की आदत ने नेताओं और अधिकारीयों ही नहीं टीवी अख़बार वालों से धनवान लोगों तक को स्वार्थ में अंधा कर दिया है ये सब किसी बेरहम शासक की शानदार महल में गुलछर्रे उड़ाना चाहते हैं जब महल से बाहर मंज़र बदहाली का हो।

Saturday, 7 September 2019

क्या से क्या हो गया ( समाज सरकार भटक गये ) डॉ लोक सेतिया

 क्या से क्या हो गया ( समाज सरकार भटक गये ) डॉ लोक सेतिया 

  पढ़ाई लिखाई शिक्षा इंसान को सभ्य बनाने को थी हम जितना अधिक शिक्षित हुए उतने ही असभ्य होते गए तो बेहतर था अनपढ़ रहते। जो संस्थाएं संसाधन ज्ञान देने को थे अज्ञानता का पाठ वही पढ़ाने लगे। टीवी अख़बार रेडियो जैसे सिनेमा थिएटर जागरूकता लाने को थे भटकाने को नहीं बने थे। मनोरंजन ही इनका मकसद नहीं होना चाहिए और वो भी घटिया अनैतिकता को नग्नता को बेशर्मी को बढ़ावा देने लगा तो वही हुआ आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। चलो देश समाज की वास्तविक तस्वीर को देख कर समझते हैं कि क्या से क्या हो गया है। 

  हम तथाकथित सभ्य कहलाने वाले लोग जिस किसी संस्था संगठन पर काबिज़ हैं उनको चलाने बढ़ाने को नियम संविधान को दरकिनार कर सब करने को उचित ठहराते हैं। धर्मशाला संस्थाओं के स्कूल अस्पताल समाज की भलाई छोड़ व्यौपार करने लगे हैं कहने को समाजिक कार्य मगर वास्तव में लूट ही है। यही करना था तो इनकी ज़रूरत ही क्या थी बनाने की। शिक्षा स्वास्थ्य सेवा भी धर्म का चोला पहन कर कारोबारी ढंग से करते हैं तो उसको समाज सेवा का नाम मत दो। 

 सरकार कितना कुछ सामान बना कर रखती है जनता की सुविधा देने के नाम पर मगर वास्तव में तमाम ऐसी चीज़ें उन्हीं के उपयोग की खातिर रखी रहती हैं। जब भी शासक अथवा अधिकारी लोग आएं तब सब ठीक भी और मुहैया भी करवाते हैं मगर उनका आयोजन खत्म होते ही सब फिर किसी गोदाम में जमा हो जाता है या कई बार ख़ास लोगों के काम आने को उनके हवाले करते हैं। नेता जो भी सत्ता मिलते ही सरकारी अधिकारियों संसाधनों और भवन से लेकर जनसुविधाओं का सामान तक निजि उपयोग को इस्तेमाल करने में लज्जा अनुभव नहीं करते हैं। 

   पर उपदेश कुशल बहुतेरे की बात है। सबको कायदे कानून बताने वाले खुद किसी नियम कानून की रत्ती भर भी परवाह नहीं करते हैं। सत्ता है तो उनको अधिकार है जो उनको पसंद हासिल करें नागरिक की परेशानी की चिंता छोड़कर। खुद जनता का धन अपनी सुविधाओं पर बर्बाद करना उनको अधिकार लगता है। धर्म का पाठ पढ़ाने वाले शिक्षा लोभ मोह लालच को छोड़ने और सादगी से जीने की देकर खुद ये सब करते हैं। इक बात घर परिवार समाज सरकार सभी जगह नज़र आती है कि सब औरों से अपने निर्देश का पालन करने की अपेक्षा रखते हैं जैसे हम चाहें सबको करना होगा जब भी अधिकार है औरों की आज़ादी का हनन करते सोचते नहीं हैं। सब को अपनी आज़ादी पसंद है बाकी लोग भी आज़ाद हैं ये कोई समझता नहीं है। आप अपने बड़े अधिकारी की अनुचित बात से असहमत नहीं हो सकते विरोध की बात ही क्या। यही हर राजनीतिक दल का अलिखित संविधान है कि आपको दल की दल के नेता की अनुचित देश हित विरुद्ध बात को भी अच्छा बताना होगा। अन्यथा किसी भी दल में आपकी जगह नहीं है। साफ समझा जाये तो हम गुलामी पसंद हैं गुलामी करते हुए शर्मिंदा नहीं होते और किसी को गुलाम बनाते कोई अपराधबोध नहीं महसूस करते हैं। 

 देखा जाये तो हम दिखाई अच्छे देते हैं अच्छाई की बात को छोड़कर आचरण खराब करते हैं। हमने अपने चेहरे किसी नकाब से छुपा रखे हैं असली शक्ल सूरत बड़ी बदसूरत है बस मेकअप से सजते संवरते हैं।

Friday, 6 September 2019

उससे पहले और उसके बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   उससे पहले और उसके बाद ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      उन्होंने अपनी पसंद के इक लेखक को बुलाया है और लिखवाना चाहते हैं कुर्सी की व्यथा कथा इस तरह से जैसे ईस्वी से पहले और ईस्वी के बाद बांटकर इतिहास लिखते हैं। चलते चलते बात देश की अर्थव्यवस्था की होने लगी तो समझाने लगे राज़ की बात है फिर भी आपको बताने में कोई हर्ज़ नहीं है मेरे पास हर मर्ज़ की दवा है। बस जल्दी ही देश का सारा उधार चुकता कर देना है वो भी नकद भुगतान कर के। जिस जिस ने देश की संस्था या कोई विदेशी सरकार हो बकाया लेना है उनको बुलावा भेजा जाएगा कि जितना भी हिसाब बकाया है आकर नकद ले जाओ अन्यथा उस तारीख के बाद सब क़र्ज़ बही खाते से मिटा दिए जाएंगे। लालजी की गद्दी की तरह अपने बैंक की तिजोरी खोल कर जो जो आता गया थैला भरकर पैसे देकर विदा किया जाएगा। क्या अभी भी इतना पैसा बचा हुआ बाकी रखा है बैंक की तिजोरी में पूछा तो कहने लगे बेशक। मगर खबर तो थी सब आपने हथिया लिया है और तिजोरी नाम को है। अभी थोड़ा इंतज़ार करो सब आपके सामने ही होगा हंसते हुए बताया गया। 

       ऐलान किया गया अमुक तारीख को सभी लेनदार आकर भुगतान ले जाएं बाद में कोई उधार नहीं बाकी का इश्तिहार छपवा देंगे। कितने पुराने क़र्ज़ वसूली करने को चले आये और सभी ने अपना अपना हिसाब का कागज़ का पन्ना दे दिया। जिस जिस ने जितना लेना बताया था उसको बंद थैले में उतना पैसा बाहर लिखा हुआ भीतर कितना पैसा है देकर रसीद लिखवा ली गई। सरकारी मोहर लगी थी विश्वास करना था किसी को भी गिनती करने या थैला खोलने की ज़रूरत नहीं थी। सब चले गए अपने अपने देश या देश के लोग अपने शहर में। ये कमाल कोई और नहीं कर सकता था नामुमकिन को मुमकिन करना उन्हीं को आता है। 

    अभी भी उनको कुछ और करना था देश के लोगों को वादा किया था उनके खाते में धन जमा करवाने का उसको भी निभाना था। ऐलान किया अगले दिन बैंक के सामने पहले की तरह कतार में लगकर जिसे जितना चाहिए नकद ले जा सकता है। और हर कोई धनवान गरीब अपने अपने हिस्से का थैला लेकर खुश था। मगर देश विदेश के सभी लोग ये देख कर दंग रह गए कि जो थैले मिले थे सभी पुराने हज़ार रूपये और पांच सौ रूपये के चलन से बाहर किये जा चुके नोटों से भरे थे। सब ने पूछा क्या ये नोट दोबारा बाज़ार में चलने लगेंगे सरकार फिर  आदेश दे रही है। समझाया गया देश में नहीं चल सकते तो क्या हुआ विदेश वाले अपने देश में जारी कर सकते हैं अभी भी उस पर लिखा हुआ है धारक को देने का वादा करता हूं। वादा है और विश्वास पर दुनिया चलती है। मगर जिनको देश में नकद मिला वो इसका क्या करेंगे सवाल किया गया। नहीं जानते जो पुरानी करंसी उपलब्ध नहीं होती है चलती नहीं बाज़ार में फिर भी उसकी कीमत कई गुणा हुआ करती है। मुझसे पहले की कीमत रूपये की ऊंची समझी जाएगी ही और मेरे बाद रूपये की कीमत क्या होगी मत पूछना। लोग पुराने हज़ार रूपये और पांच सौ रूपये के नोट शीशे के फ्रेम में जड़वा कर सजाकर रखा करेंगे ताकि आने वाली पीढ़ियां देख सकें उनसे पहले और उनके बाद की करंसी की खनक कितनी अलग है। उनसे ये सब सुनता रहा लेखक और कल्पना कर देखने की कोशिश करता रहा फिर भी ऐसे लिखना खुद अपने आप और लिखवाने वाले का भी उपहास करवाना होगा।

  विचार करने के बाद उनको याद आया इक फिल्म में सलमान खान को अमिताभ बच्चन भगवान बनकर कुछ दिन को अपनी शक्ति दे देते हैं ताकि दुनिया को अपने हिसाब से चलाये क्योंकि उस फिल्म में अभिनेता सलमान खान को ऊपर वाले से शिकायत रहती है कि दुनिया को ढंग से नहीं चला पाए हैं। ऊपर वाले को कहते हैं सलमान कि तुम से तो बेहतर चला सकता हूं मैं दुनिया को। लेकिन मिले हुए दिन बीत जाते हैं और सलमान खान जो चाहता होता रहता है मगर समय समाप्त होते होते अभिनेता सलमान खान अपने ही बुने जाल में उलझ जाता है और भगवान से विनती करता है सब पहले जैसा कर दो। और भगवान समय का पहिया वापस घुमा कर पीछे ले जाते हैं और सब पहले की तरह हो जाता है बीच के दिन गायब हो जाते हैं। अब कैसे कोई भगवान ऐसा करिश्मा दिखला सकता है जिस से 8 नवंबर 2016 से लेकर आज तक जो जो भी हुआ वापस पहले जैसा हो जाये। देश की अर्थव्यवस्था को पहले की तरह बनाने का कोई और उपाय उनको सूझता नहीं है। चांद पर जाकर भी हासिल कुछ भी नहीं होगा जो देश की अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर वापस ले जा सकता हो। उनकी उलझन यही है कि कैसे इतिहास और दुनिया की जानकारी से नोटबंदी की याद तक को मिटाया जा सके। बस पुरानी बंद की करंसी हज़ार पांच सौ के नोटों के बंडल फिर उपयोग करने से बात बन सकती है।

Thursday, 5 September 2019

शिक्षक दिवस पर मन की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 शिक्षक दिवस पर मन की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      पिछले साल मैंने शिक्षक दिवस पर अपने गांव के मास्टरजी गुलाबराय जी और शहर के बचपन के अध्यापकों की बात लिखी थी। उनका आदर आज भी सभी लोग करते हैं जिन्होंने बिना कोई सुविधा होते हुए भी सरकारी स्कूल खोला था बड़े जतन से और शिक्षा देकर हम सभी को इंसान बनाने की कोशिश की थी। मैंने बताया था उनके पास बड़े शहर में घर था और सरकारी स्कूल की नौकरी कोई मज़बूरी नहीं थी उनका उद्देश्य था शिक्षा का विस्तार करना और उन्होंने जो किया कहीं दर्ज भी नहीं बस उन बच्चों और उनके माता पिता की मधुर स्मृति में हमेशा रहते हैं। मगर कल मुझे कुछ और अनुभव हुआ जिसको कल लिखना उचित नहीं था मगर लिखना ज़रूरी है। अब जो कल लिखा था उस से पहले जो नहीं लिखा गया उसी से शुरुआत करता हूं। कल से इक बेचैनी सी है मन उदास है। जो हुआ आपको बताता हूं अक्षर दर अक्षर सत्य केवल सत्य। 

      महिला दिवस पर भी ऐसी महिलाओं को शुभकामना संदेश भेजना आदत है और शिक्षक दिवस पर जो भी अध्यापक फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट में हैं उनको फोन करता हूं भले उनसे मैंने कभी शिक्षा नहीं पाई मगर कितने और लोग हैं जिनको उन्होंने पढ़ाया है। बीस तीस लोगों से बात की और तमाम लोग खुश हुए ये जानकर कि कोई उनकी समाज को दी शिक्षा की कीमत को समझता है आदर देता है। चार पांच लोग थे जो शिक्षा देने का काम छोड़ चुके हैं और किसी भी और मकसद को जी रहे हैं , फिर भी सभी शिक्षक होने पर गर्व करते हैं और दो लोगों का कहना था अगले जन्म भी शिक्षक बनना चाहते हैं। मगर अचरज हुआ इक महिला की बात सुनकर जो अध्यापिका रही और अच्छी शिक्षा देने को राष्ट्रपति से पुरुस्कार भी मिला जाने कैसे पर आज उनको शिक्षक दिवस की शुभकामना देने पर शिक्षा को लेकर बात करना ही पसंद नहीं था क्योंकि उन्होंने अपने ससुर की मौत के बाद उनकी राजनीति की विरासत को लेकर शायद जो पढ़ा पढ़ाया भूलकर अपनी महत्वाकाँक्षा को महत्व देना और सत्ता का उपयोग करना ज़रूरी समझा। ससुर की जगह विधायक बन किसी दल के बदनाम हो चुके नेताओं के करीब रहने के बाद समय बदलते ही दलबदल कर सत्ताधारी दल का दमन थाम लिया। कल उनको अपने दल के नेता को शहर के बाकी कई नेताओं की तरह खुश करना मनाना था अगले चुनाव में टिकट पाने को। जब मैंने कहा मुझे उनकी या किसी की राजनीति या विचारधारा से मतलब नहीं है और केवल आलेख इक रचना लिखना चाहता हूं शिक्षक दिवस पर उस पर विचार जानना चाहता हूं आपकी राजनैतिक सभा की बात से हटकर। वो जैसे नराज़ हुईं कह दिया आप उचित नहीं कर रहे हैं , जी यही कहा था , शिक्षक दिवस पर शिक्षा की बात करना किसी स्कूल की मुख्य अध्यापिका रही महिला से जिनसे अच्छा परिचय रहा है खट्टे मीठे अनुभव को छोड़ केवल शिक्षक से लेखक की बात इस विषय पर कैसे गलत हो सकती है। मगर शायद अपने राजनैतिक हित के सामने उनको बाकी कुछ भी दिखाई नहीं दिया और मैंने आखिर उनसे बेबाक कह दिया कि आज आपको फुर्सत नहीं बात करने की तो कल टिकट मिलने के बाद आप किस तरह वोट मांगने मेरे पास आ सकोगी। राजनीति करनी है मगर पहचान के लोगों से ऐसा व्यवहार करते हैं तो आम अजनबी लोगों से जाने किस भाषा में बात करती होंगी। ये अनुभव भी इक शिक्षा की तरह है तभी जो लिखा कल की पोस्ट से ऊपर शुरुआत इसी से की है।
     अब कल लिखी बात। युग बदल गया है आजकल सरकार स्कूल कॉलेज पढ़ाई की बात ही नहीं करती है। आपके पास स्मार्ट फोन है हर काम के लिए ऐप्स हैं सदी के महानायक तक इधर उधर जाने से मना करते हैं। पास बैठे नादान युवक से फोन लेकर सब को डिलीट कर इक वही ऐप इनस्टॉल कर देते हैं जो उनको विज्ञापन करने को ढेर सारा पैसा देती है। टीवी वीडियो कॉल के युग में कोई रेडियो पर मन की बात सुनाता है आपको वापस किसी पिछली दुनिया में जे जाता है। पढ़ कर बेरोज़गार बनोगे क्या मिलेगा पकोड़े बेचने का सबक सिखाता है बरसात का मौसम आता है जाता है पकोड़े वाला हर शहर में मशहूर है जो करोड़ों कमाता है। कौन पकोड़े नहीं खाता है कौन जलेबी खाने से घबराता है। शिक्षक दिवस पर संबोधन कोई और पढ़कर बताता है क्या पढ़ना है कैसे पढ़ना है समझता नहीं खुद आपको जो समझाता है। पहला सवाल हर साल पांच सितंबर क्यों आता है। 

पढ़ना लिखना आपका काम नहीं है पोथी पढ़कर जो सुनाते हैं उपदेशक कहलाते हैं स्कूल क्या लेने जाते हैं जो समझदार बच्चे हैं कीर्तन सुनते हैं ताली बजाते हैं। हाथ जोड़ मांगते हैं और पाते हैं भीख लेने की बात क्यों भूल जाते हैं। दाता एक राम है भिखारी सारी दुनिया और भीख मांगना अपराध नहीं है मज़बूरी है ये बात खुद न्यायधीश बतलाते हैं। मन की बात कहने वाले भीख मांग कर जीवन भर रहे आजकल शहंशाह कहलाते हैं। कोई भिखारी मर गया आयकर वाले फुटपाथ पर नोट गिनते हैं गिनते जाते हैं। भीख की महिमा सबको बताते हैं। कौन कहता है सरकारी लोग रिश्वत खाते हैं चढ़ावा लेकर ऊपर पहुंचाते हैं अपने मंदिर जाकर देखा नहीं भोग कैसे लगवाते हैं। भगवान को पर्दे के पीछे खिलाने की रस्म निभाते हैं आपको थोड़ा देते हैं बाकी रखते जाते हैं धर्म की दुकान की शान बढ़ाते हैं। 

मन की बात वाले जानते हैं विश्वगुरु इसी तरह कहलाते हैं विदेशी ज्ञान हासिल करने आते थे आजकल लोग विदेश पढ़ने ईलाज करवाने जाते हैं। शिक्षा आम होने से बेरोज़गारी की समस्या है अनपढ़ लोग दिहाड़ी मज़दूरी कर लेते हैं राजनैतिक सभा में भीड़ बनकर ताली बजाने को काम मिलता है साल में सौ दिन नहीं जितने दिन भी चाहो मिल सकता है थोड़े दिन ही कर गुज़र बसर हो जाता है। ज़िंदाबाद कहना किसको नहीं भाता है अनपढ़ भी बोलना सीख जाता है। पढ़ लिख कर डॉक्टर इंजीनयर बन ख़ाक छानोगे या गाली खाओगे जान से जाओगे इस तरह पैसा कमा कर चैन से रह पाओगे। अनपढ़ रहोगे मौज उड़ाओगे और लंबी आयु तक नहीं जी पाओगे , अस्पताल स्वास्थ्य सेवा से आयु बढ़ जाने का काम करते हैं देश की आबादी को कितना बढ़ाओगे। ये जीना कोई जीना है ज़िंदा कैसे रहते हैं नहीं जान पाओगे हर दिन ज़िंदगी पर पछताओगे। खाओ कसम कभी स्कूल कॉलेज नहीं जाओगे बच्चों को शिक्षक के पास नहीं लेकर जाओगे , खेलना कूदना मज़दूरी करना पकोड़े तलना चाय बनाना काबिल बन कर बोझ अपना खुद उठाओगे। कमाई हो नहीं भी हो कर फिर भी चुकाओगे। चिंता की कोई बात नहीं है जैसे जिओगे उसी तरह मर भी जाओगे खाली हाथ आये थे क्या साथ लेकर जाओगे।

Tuesday, 3 September 2019

ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) डॉ लोक सेतिया

       ग़म है बर्बादी का क्यों चर्चा हुआ ( अजीब दास्तां है ये ) 

                                          डॉ लोक सेतिया 

चलो इस तरह हमने दिखला दिया कि हम संवेनशील समाज हैं। साल में दो चार बार ऐसा होता है जब हमारे बीच किसी की संवेदना जाग उठती है और कोई खबर की सुर्ख़ियों में आकर सोशल मीडिया पर छा जाता है। जैसा अभी रानू मरिया मंडल के कोलकात्ता की रेलगाड़ी में इक प्यार का नग़्मा है गीत गाने को लेकर हुआ। हर दिन हादसे का शिकार हो रहे लोगों का वीडियो बनाने वाले किसी भूखे बच्चे और गिद्ध की तस्वीर लेने वाले संवेदनारहित लोग नाम कमा लेते हैं। कोई नहीं सोचता ये किस दुनिया में हम रहते हैं जहां ऐसे हज़ारों लाखों नहीं करोड़ों लोग हुनर क़ाबलियत होते हुए भी जाने कहां कहां अंधेरी दुनिया में घुट घुट कर जीते हैं मर जाते हैं। टीवी चैनल पर किसी रियल्टी शो में मंच पर बैठे और देखने वाले दर्शक दो पल को पलकें भिगो कर इंसानियत का दिखावा करते नज़र आते हैं। और इस के पीछे इक सच छुपा रह जाता है कि उस के इलावा और कितने गुमनामी में बेबसी भरा जीवन जीते हैं क्योंकि यहां काबलियत को नाम पहचान यूं ही नहीं मिलती है मिलती है किसी बड़े की ख़ास शख्सीयत की निगाह ए रहमदिली पड़ने के बाद। और कौन बनेगा करोड़पति जैसे शो में कितनी तरह से कैसे भी कमाई करने वाले लोग दयालु बनकर उभरते हैं और उनके पास धन दौलत के अंबार कैसे जमा हुए इसकी बात कोई नहीं करता है। आपको ख़ुशी होती है किसी एक की भलाई हुए जानकर मगर कितने नहीं आये सामने कोई नहीं सोचता है। हम जिसे संवेदनशीलता समझते हैं वास्तव में वो हमारी समाज की और उच्च वर्ग की बेहरमी को दिखाता आईना हो सकता था जिसको शोषण करने वाले वर्ग ने ही तमाशा बना दिया है। 

  ये समाज रहमदिल नहीं रहा है हम अपने आस पास बेबस लोगों से कोई सहानुभूति नहीं रखते हैं कोई किसी को सहारा नहीं देता है कोई गरीब भूखे को खाना खिलाना इंसानियत नहीं समझता है। हम जाकर किसी दिन किसी को पैसे भोजन देते हैं औपचारिकता निभाने को रस्म अदायगी को अमावस को किसी त्यौहार के दिन। हमारी सरकार भी यही करती है मतलब और शोहरत की खातिर कोई ऐलान करती है और साथ साथ कोई और ढंग अपना कर अपनी तिजौरी भरती जाती है। दान का चर्चा घर घर पहुंचे लूट की दौलत छुपी  रहे , नकली चेहरा सामने आये असली सूरत छुपी  रहे। क्या मिलिए ऐसे लोगों से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे।  इज़्ज़त फ़िल्म का ये गीत बड़े लोगों की असलियत को ब्यान करता है। फिर बार बार दोहराना पड़ता है अपने नाम शोहरत या कोई मकसद हासिल करने को कितना पैसा बर्बाद करते हैं रईस लोग राजनेता अमीर लोग और सरकारी विभाग भी इश्तिहार छपवाने लगवाने पर क्या उस से कोई समाज की भलाई करने की बात सोचता है। दान भी देते हैं तो नाम लिखवा कर अपनी दयाशीलता का दिखावा करने को। अधिकांश लोग उन्हें दान देते हैं जिनको शायद सहायता की ज़रूरत नहीं होती और उन्होंने इस को धर्म का नाम देकर अपने लिए सुख सुविधा का उपाय कर लिया है। वास्तविक धर्म ये नहीं कहता है सच्चा दान वो है जो आप किसी अपने पहचान वाले की तसल्ली को नाम को दिखावे को नहीं देते जब किसी को असहाय देखते हैं तो चुपचाप दे देते हैं। सच बताओ अब किस किस धर्म की जगह भूखे की भूख मिटाने का धर्म निभाया जाता है किस जगह कोई मुसाफिर या बेघर आसरा पा सकता है। 

     हम सब की अपनी चाहत और अधिक पाने की और शानो शौकत दिखाने की हमको किसी और की मज़बूरी किसी की तकलीफ़ दर्द मुसीबत समझने देती ही नहीं है। हमारा समाज अजीब है जो आडंबर पर जितना बर्बाद करता है उतने से बहुत सार्थक भलाई का काम किया जा सकता है। हर दिन समाज सरकार कितना धन खर्च करती है अनावश्यक आयोजन करने आदि पर और नेता अधिकारी अपने खुद पर। जितना खाते हैं उस से अधिक फैंकते भी हैं किसी कचरे के डिब्बे में या कभी गटर में भी जाता है भोजन। अपने कितने ऐसे दाग़ को ढकने को कभी कभी ऐसा कुछ करते हैं तो भी अपने नाम का डंका पीटते हैं। हमारा देश और समाज कुछ और हुआ करता था जैसे कोई चमन हो अब तो इक सहरा बन गया है किसी रेगिस्तान की तरह है और ये जो हम समझते हैं पानी है सबकी प्यास बुझाएगा वास्तव में इक मृगतृष्णा है। ये चमक झूठी है भटका रही है।

Monday, 2 September 2019

पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ - ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   पाप अधर्म लूट अनैतिक असंवैधानिक अनुचित शब्दों के अर्थ

                           ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

नहीं मैं कोई धर्मों का जानकर नहीं संविधान का विशेषज्ञ नहीं पढ़ाई लिखाई भी साधारण सी है और दुनिया की सैर या ज़माने भर का अनुभव भी मुझे नहीं है। किसी गुरु से सीखा नहीं किसी साधु संत का अनुयाई नहीं कोई विशेष लगाव किसी एक धर्म से भी नहीं है। फिर भी चिंतन मनन से अनुभव से जीवन के जो भी समझ पाया हूं उस से इन शब्दों का सही अर्थ समझ सकता हूं। जैसे भी हो आजकल राजनीति में शामिल नहीं होकर भी कोई भी अछूता नहीं रह सकता देश राज्य की राजनीति के असर से। बेशक यहां बात समाज की है मगर राजनीति को अलग रखकर संभव नहीं है इसलिए उद्दाहरण वहां से लेना ज़रूरी है। 

शासक हैं सत्ताधारी नेता या विपक्षी दल से नेता हैं अथवा अधिकारी हैं जन सेवक कहलाते हैं अगर आप देश की बदहाली की चिंता नहीं करते और केवल अपने स्वार्थ की बात सोचते हैं तो अपना कर्तव्य अपना धर्म नहीं निभाते हैं फिर चाहे आप कितनी पूजा अर्चना धर्म की किताब की पढ़ाई या धार्मिक कार्य करते रहें। 

देश में लोग बेघर हैं भूखे मरते हैं और आप नेता बनकर बड़े ओहदे पर राजसी शान से रहकर देश का पैसा अपने ऐशो-आराम अपनी इच्छाओं की पूर्ति या मौज मस्ती करने पर सज धज कर महल में रहने पर खर्च करते हैं तो संविधान की भावना का अनादर करने वाले गुनहगार हैं। 

अपने भाषण दिए सभाएं आयोजित की अपनी महत्वआकंक्षा की खातिर सत्ता का दुरूपयोग किया अपनी झूठी शोहरत की खातिर देश के खज़ाने को कुछ ख़ास लोगों को देने का पाप किया और आपकी बात में अधिकांश बेमतलब की बात थी या सच नहीं झूठ बताने का जतन किया या सच पर पर्दा डालने का काम किया तो लोग कितनी भी तालियां बजाते रहें कुदरत उसको अनैतिक आचरण समझेगी और वास्तविकता सामने आने पर आपकी सारी शान बेकार जाएगी। 

राजनैतिक मकसद से जो लोग अपने नाम और पहचान का दिखावा करने पर बेतहाशा धन खर्च करते हैं और दावा करते हैं समाज सेवा और ईमानदार होने का उनका स्वार्थ की खातिर अपने पैसे का ऐसा दुरूपयोग चाहे वो पैसा किसी भी ढंग से कमाया गया हो धर्म के ख़िलाफ़ है। शायद उतने पैसे से कितना कुछ किया जा सकता था कितने गरीबों को रोटी रहने को घर या शिक्षा स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध करवाई जा सकती थी। और जिस जिस ने वास्तविक धार्मिक और सामाजिक कार्य की जगह ऐसा किया उसने देने वाले दाता की अनुकंपा का अपमान किया है। क्योंकि हर धर्म अधिक धन होने पर असहाय लोगों की सहायता करना कर्तव्य बताया है। 

सरकारी अधिकारिओं को देश और जनता की सेवा निष्ठा से करनी चाहिए न कि शासक दल या नेताओं की ख़ुशी और मर्ज़ी को देख उनके राजनीतिक मकसद पर ध्यान देना चाहिए और जो ऐसा करते हैं देश समाज और संविधान के गुनहगार हैं। अपने जो अनुचित किया उसका दायित्व किसी और का नहीं है और उस का फल आपको मिलना ही है। 

हम आम लोग भी इतने नासमझ नहीं हैं जो इन सब बातों को नहीं समझ सकते फिर भी जानकर भी अनुचित को उचित ठहराना या झूठ को सच समझना मूर्खता से बढ़कर अज्ञानता है। और सच नहीं बोलना या झूठ की महिमा का गुणगान करना तो कायरता है ऐसा करने के बाद अपने पूर्वजों की महानता की कथाओं की बात करना आडंबर ही नहीं छल है खुद अपनी आत्मा से भी। आपको कोई जंग नहीं लड़नी है मगर इतना अवश्य कर सकते हैं कि जो जो भी इस तरह से पाप अधर्म लूट अनैतिक कर्म असंवैधानिक और अनुचित काम करते हैं उनका आदर सम्मान नहीं करें उनको मंच पर फूलमाला नहीं पहनाएं। अधर्म का साथ नहीं देकर भी अच्छा कर्म किया जा सकता है।

Sunday, 1 September 2019

वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया

  वक़्त के साथ न बदलने वाले ( पुराने चावल ) डॉ लोक सेतिया 

आधुनिकता से जी घबराता है तो हम पुरानी बातों को याद करते हैं। क्या दिन थे क्या ज़माना था वो भी बहुत कुछ नहीं था फिर भी कोई कमी नहीं लगती थी और आजकल कितना कुछ है फिर भी महसूस होता है कुछ भी नहीं है जैसे। किस बात की कमी है या हर बात की कमी है। चलो आज देखते हैं हम कितना बदले लोग कितने बदले हैं ये नया दौर का लाया है और पिछले दौर का हमने क्या खोया है आधुनिक बन क्या पाया है। 

कल शाम खूब झमाझम बरसात हुई सावन का महीना पानी को तरसते बीता तो पहली बार बारिश ने सब भिगोया। तन भीगे मन भीगे नहीं शायद क्योंकि हर कोई सोशल मीडिया पर घबराया हुआ लग रहा था। किसी बिरहन ने याद पिया की आये नहीं लिखा। खबर शहर से राजधानी पहुंच गई फोन आने लगे सब ठीक है , बरसात नहीं हो जैसे मुसीबत हो। ये टीवी चैनल वालों की शरारत है जो हर मौसम का मज़ा खराब कर दिया है अजीब अजीब भयानक शीर्षक देकर खबर के। बारिश के मौसम में बरसात नहीं होगी तो क्या लू चलेगी कुदरत को इल्ज़ाम देना अच्छी बात नहीं है। 

बरसात में कभी गरीब की झौंपड़ी को घबराहट हुआ करती थी , कोई सजनी साजन से लिपट जाती थी बिजली से डरने के बहाने। अब हैप्पी रैन से लगता है बारिश की नहीं रात की बात है बुरा हो इस नामुराद सोशल मीडिया का व्हाट्सएप्प पर संदेश लिखा कुछ पढ़ा कुछ जाता है। आई लव यू इतना सस्ता हो गया है कि पढ़ कर धड़कन बढ़ना तो दूर की बात लगता है रस्म निभाने की बात है। ऐसे में कोई आशिक़ पहले की तरह हाले दिल लिख बैठे तो उधर बिना पढ़े ही डिलीट कर ट्रैश के कूड़ेदान से भी बाहर कर देता है कोई। बारिश ने अमीर लोगों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। होटल जाने का मन था मगर घर पर ही ऑनलाइन मंगवा खाना पड़ा है। आशिक़ बादल को चाहते हैं महबूबा को धूप से डर लगता है चेहरा ढक कर रखते हैं रंग काला नहीं पड़ जाये या मेकअप ही धुल गया पसीने में तो मुसीबत होगी कोई पहचान नहीं सकेगा। 

कितना अच्छा था अख़बार कम पढ़ने वाले कई होते थे चौपाल में मिल बैठते इक पढ़ा लिखा पढ़ कर बताया करता ताज़ा खबर और बाकी लोग सुनते रहते। अब हर कोई पढ़ लिख कर नासमझी का शिकार है खबर क्या है कोई नहीं जानता और अफ़वाह से लेकर बकवास तक को समाचार समझने लगे हैं। शिक्षित होने से समझ नहीं आती है और चिंतन मनन की आदत नहीं रही फुर्सत भी किसे है। यार मुझे क्या किधर क्या हादिसा हुआ लोग दुर्घटना को मनोरंजन समझने लगे हैं। सामाजिकता निभाने को दिन बना लिए हैं स्मार्ट फोन पर संदेश भेज औपचारिकता निभाई जाती है। हंसते हैं खुश नहीं होते और आंसू बहाते हैं दुःख दर्द का एहसास नहीं करते हैं। लगता है इंसान मशीन बन गया है जिस में हलचल होती है शोर भी सुनाई देता है संवेदना नहीं होती है। बाहर शीतल पवन चलती है और मैं मूर्खता कर रहा बंद कमरे में ये फालतू बात लिख रहा जिस को कोई पढ़ेगा भी नहीं। फेसबुक पर कभी लोग पढ़ते थे अब लाइक करने तक उपकार करते हैं शीर्षक से ही मान लेते हैं जो हम समझते हैं वही लिखा होगा। 

पुराने चावल की खुशबू हुआ करती है मगर अब बाज़ार में सब नकली है पुराने चावल खरीद लाए उस पर पिछले महीने की तारीख लिखी थी। चावल पुराने नहीं हैं बेचने वाली दुकान कितनी पुरानी है ये कहते हैं। ऐसे में कोई ढाबे वाला सौ साल पुरानी दाल खिलाता है कमाल की बात है। नदी से पानी बहता रहता है तो कोई उसको बता सकेगा ये कितनी सदियों से बहकर समंदर में जाता रहा है। समंदर जिस का नाम है सबसे प्यासा वही है उसकी प्यास बुझती नहीं कभी भी। उलझन ऊपर से नीचे तक वही है चलना सबको है राहें कितनी हैं मगर मंज़िल का अता पता किसी को नहीं है। मैं भी कब से खड़ा हूं वहीं पर जहां से चला था दुनिया बदल रही थी मैं देखता रह गया।