Monday, 5 August 2019

चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        चलती फिरती लाशें हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 अब तो विज्ञान और डॉक्टर्स भी मानते हैं जब दिमाग़ काम नहीं करता तभी ज़िंदगी ख़त्म होती है। दिल की धड़कन सांसों का चलना किसी काम का नहीं रहता ऐसे लंबी मदहोशी में जाने के बाद जिस्म से जिगर गुर्दा निकाल लेने की बात की जाती है। बस कुछ ऐसा ही सोचने समझने की क्षमता के बगैर इंसान चलती फिरती लाश बन जाता है। तमाम ऐसे लोग हैं जो आपको सोचने समझने नहीं देना चाहते हैं शिक्षक बनकर आपको जो जैसे पढ़ाया यकीन करने या रटने को कहते हैं उस को लेकर विचार चिंतन करना उस जानकारी को वस्तविक्ता के तराज़ू पर तोलने की बात उनकी नागवार लगती है। धार्मिक किताबों को पढ़ कर सुनाते हैं और उनकी अपनी अपनी व्याख्या करते हैं पर आपको उस पर कुछ भी बोलने की छूट नहीं है अन्यथा आपको नास्तिक घोषित किया जा सकता है। नास्तिक होना कोई गुनाह नहीं है जिन किताबों की बात करते हैं उन की कथाओं में कितने सवाल किये गए होते हैं तभी उनके जवाब खोजने का काम होता है। मगर धर्म का कारोबार करने के लिए अंधभक्त हों लोग ये ज़रूरत है उनकी। कबीर होना सबसे कठिन है हर धर्म वालों को खरी खरी कहने का साहस करना बनारस में गंगा के तट पर खड़े होकर। ये जो आज धर्म को लेकर विवाद खड़े करते हैं जानते भी नहीं कबीर की जाति क्या थी धर्म क्या था उनकी बाणी हिन्दू मुस्लिम सिख सभी धर्मों के लोग सुनते हैं। 

        हम किसी न किसी को मसीहा बनाकर उसकी आरती पूजा ईबादत करने के आदी हैं। ईश्वर को पाना उसको समझना नहीं उसको मानते हैं बिना विचारे हुए। आज़ादी को भी हमने समझने की कोशिश नहीं की कोई हम सभी को कहता है देश की भलाई इसी में है कि आपको कैदी बनाकर रखा जाये और हम बेबस होकर स्वीकार कर लेते हैं। जो किसी और के आपत्काल की घोषणा को अक्षम्य अपराध बताते हैं खुद सत्ता मिलते उस से बढ़कर तानाशाही करने लगते हैं। हमारी गलती है भूल है या फिर कायरता है जो हम कभी भी सच और झूठ को परखने की बात नहीं करते। राजनेताओं की बातों से खुश हो जाते हैं उनका असली आचरण क्या है नहीं देखते समझते। अब तो लोग इस कदर पागलपन करने लगे हैं कि राजनीति का मोहरे बनकर भीड़ में शामिल होकर हैवान बन हैवानियत को अंजाम देने लगते हैं। कोई भी धर्म किसी को इस तरह घायल करने जान से मारने की बात नहीं उचित बताता। क्षमा की बात हर धर्म में है हमने माफ़ करना सीखा ही नहीं खुद न्यायधीश बनकर फैसला भी करते हैं सज़ा भी देते हैं और अपने पाप को अपराध को देश समाज के कायदे कानून को तोड़ने को देश के संविधान को अपमानित करने को महान कार्य घोषित कर और भी समाज विरोधी काम करते हैं। 

    कुलदीप सलिल जी की ग़ज़ल है :-

इस कदर कोई बड़ा हो मुझे मंज़ूर नहीं 
कोई बंदों में खुदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

रौशनी छीन के घर घर से चिराग़ों की अगर 
चांद बस्ती में उगा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

मुस्कुराते हुए कलियों को मसलते जाना 
आपकी एक अदा हो मुझे मंज़ूर नहीं। 

इस ग़ज़ल का सबसे ख़ास शेर ये है :-

आज मैं जो भी हूं हूं बदौलत उसकी 

मेरे दुश्मन का बुरा हो मुझे मंज़ूर नहीं।


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