Thursday, 22 August 2019

पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  पढ़नी-पढ़ानी है उल्टी पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

     अध्यापक जी शब्दों के नये अर्थ खोज लाये हैं और पढ़ने वाले बच्चों को जिनकी आयु पचास से कम क्या होगी समझा रहे हैं। बचपन की शिक्षा अब काम की नहीं है आधुनिक काल की उल्टी पढ़ाई पढ़नी लाज़मी है उनको जिनको राजनीति की दुकानदारी करने का चस्का लगा है। शरीफ और शराफत का थोड़ा अंतर है जब तक बदमाशी सामने नहीं आती है कोई शरीफ माना जाता है और शराफत इसी को कहते हैं कि आपकी बदमाशी की बात आपको छोड़ किसी को खबर नहीं हो। राज़ को राज़ रखने को कोई राज़दार नहीं बनाना चाहिए नहीं तो हमराज़ ही राज़ फ़ाश किया करते हैं। अपराध अपराध नहीं होता जब तक सबूत नहीं सामने आये और बेगुनाही गुनाह बन जाती है जब आप साबित नहीं कर देते कि गुनहगार नहीं हैं। सीधी सच्ची बात है हर कोई चोर है पकड़े जाने तक साहूकार कहलाता है। 

    सरकार और विपक्ष उसी सिक्के के दो पहलू हैं जीत हार  सिक्का उछाल कर होती है हेड या टेल। जो जीता वही सिकंदर कहलाता है हारी बाज़ी को जीतने वाला बाज़ीगर कहलाता है। सत्ता रहते जिसको लूटने का अधिकार कहते हैं विरोधी दल का हो जाने पर लूट का दोषी अपराधी हो जाता है , लूट की छूट इक विशेषाधिकार की तरह है। जुर्म और इंसाफ भी साथ साथ चलते हैं हाथ पकड़ एक दूजे का उनका नाता ही असली नाता है। जिनके खिलाफ मुकदमा दर्ज था हेरा फेरी की थी वक़्त बदला तो उनको सरकारी गवाह बना उनके ब्यान का ऐतबार कर किसी और को धर पकड़ते हैं जीना नाम ही पहले नहीं था फाइल में मगर जिनके खिलाफ मुकदमा था उन पर भरोसा किया जा सकता है क्या हुआ जो उन पर कोई और कत्ल का भी मुकदमा चल रहा है। गोलमाल है जी सब गोलमाल है सीधे रस्ते की ये टेढ़ी ही चाल है। शतरंज में वज़ीर की चाल इसी तरह की होती है राजा को बचाना है प्यादे की कोई औकात नहीं है सरकारी गवाह मुकरते हैं सालों बाद जांच एजेंसी साबित नहीं कर पटी गुनाह या करना नहीं चाहती बदले हालात में। ये जांच एजेंसी सरकार की कठपुतली है जैसे सत्ता चाहती है नचवाती है उसकी धुन पर नाचना होता है। सरकार की मर्ज़ी बिना बताये समझती है अदालत भी जानती है , देखो थोड़े दिन पहले न्यायधीश ने कहा था एजेंसी वाले लोगों से आप राजनीतिक मामले में बड़ी जल्दी करते हैं और मुकदमें लंबित पड़े रहते हैं। आज खुद अपनी कही बात को भुला दिया है। निज़ाम बदलता है तो न्याय का न्यायधीश का नज़रिया बदलते देर नहीं लगती है। 

   अदालत का काम न्याय करना होता है मगर देश की सबसे बड़ी अदालत बार बार मिल बैठ कर आपसी समझौता करने को कहती रहती है। इंसाफ इंसाफ होता है और समझौता कभी इंसाफ नहीं होता क्योंकि उस का मकसद ही सभी को खुश करने को थोड़ा थोड़ा न्याय थोड़ा थोड़ा फायदा भी नुकसान भी मंज़ूर करना होता है। लोग जब अदालती तौर तरीकों से तंग आ जाते हैं तभी मिलकर समझौता करते हैं। अदालत जब कहे आपस में समझौता कर लो तब अर्थ होता है अदालत को इंसाफ नहीं करना ज़रूरी लगता है। हमारे देश में इंसाफ जीते जी नहीं मरने के बाद मिलने की उम्मीद होती है मरना आपकी मर्ज़ी नहीं है और परेशान हो कर ख़ुदकुशी की तो इक अपराध और शामिल हो जाता है। कत्ल करने पर सज़ा मिले नहीं मिले ख़ुदकुशी की तो अदालत आपको छोड़ेगी नहीं। जो नेता कभी देश की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था के रक्षक थे अब अकूत संपत्ति और अनुचित ढंग से आमदनी करने के आरोपी हैं , अगर उनके दल की सरकार होती तो जांच एजेंसी कानून अदालत बेबस होते जैसे उन लोगों के अपराधों को लेकर हैं जो अपराधी हैं मगर सत्ताधारी दल में शामिल हैं। यहां वक़्त बदलते ही खलनायक को नायक नायक को खलनायक बना दिया जाता है। देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से कौन उम्मीद करता है कभी उसको ऐसे भी हिरासत में लेने का ढंग अपनाया जा सकता है। चाहे किसी भी दल के नेता हों संविधान की पालना की उनसे अपेक्षा की जानी चाहिए। विडंबना है कोई ऐसे पद पर रहा है जिसको आज जकड़ा गया है और कोई जो पहले इसी तरह कानून से जांच एजेंसी से भागता रहा आंख मिचोली खेलता रहा तब पकड़ा गया आज पद पर है।

      मगर ये टिप ऑफ़ दी आइसबर्ग ,  हिमशैल का शीर्ष है। कोई नहीं जो इन सभी धनपशुओं की वास्तविकता को उजागर करने का साहस करे। हम्माम में नंगे राजनेता ही नहीं धर्मगुरु ही नहीं जाने कितने अधिकारी कितने इंसाफ के रक्षक और अधिकांश बड़े बड़े उद्योगपति कारोबारी हैं जिन्होंने देश की संपदा का अधिकांश इस तरह से हथिया रखा है कानूनी हथकंडों से सत्ता की मिलीभगत और दुरूपयोग से। इन की कथनी महान है आचरण बेहद निम्न स्तर का चोरों से भी बढ़कर डाका डालने वालों का है। देश सेवा की ओट में यही चलता रहा और चल रहा है मगर हम देख कर भी सोचते नहीं करोड़ों रूपये चुनावी खर्च का अर्थ यही है। जो टीवी अख़बार मीडिया कभी सच बताया करता था सरकारी विज्ञापन के रूप में चोरी के माल का भागीदार बनकर शामिल है इस लूट के खेल में। सब का अपना हिस्सा है और नतीजा देश की जनता को बदहाली के रूप में मिलता है।  कुमार विश्वास की इक कविता याद आई है सुनते हैं।



      आपको याद है कि भूल गए ये वही सीबीआई है जो अपने ही दफ्तर में आधी रात को छापा डालने जैसा काम करती है। सीबीआई की अदालत में सीबीआई के अधिकारी सीबीआई के अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करते हैं और आधी रात को जो किसी सीबीआई अधिकारी की जांच करवा रहा था उसको बदल दिया जाता है और जिस पर आरोप लगा था उसको जांच करने वाले की जगह नियुक्त कर न्यायधीश बनाने का काम किया जाता है। हम रोज़ अध्याय पढ़ते हैं भूल जाते हैं मगर राजनेता अधिकारी आपस में कुश्ती लड़ते रहते हैं। उनका ये अजब खेल हमने बचपन में खेला था , चोर सिपाही का। बारी बारी चोर सिपाही बनते हैं। मगर बच्चे भोले होते हैं उनको चोरी आती है न चोर को पकड़ना ही। मगर देश की सत्ता पर आसीन लोग जाने कब से यही खेलते हैं भरी सभा में भाषण देते हुए कितनी बार देखा है नेताओं को ये धमकी देते हुए कि सबके कच्चे चिट्ठे उनके पास हैं। उनको केवल अवसर आने पर उपयोग करना है कोई सच की न्याय की बात नहीं करनी है। 

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