Thursday, 11 April 2019

अच्छे लोग हैं अच्छाई के बिना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अच्छे लोग हैं अच्छाई के बिना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

     कितना बदल गया है ज़माना कभी लोग खुद अपने आप में बुराईयां देखते थे अपने आप को छोटा समझते थे आजकल सब मानते हैं दावा करते हैं हम से अच्छा कोई नहीं है। चलो कुछ पुरानी यादों को दोहराते हैं। बुरा जो खोजन मैं चला बुरा न मिलिया कोय , जो मन खोजै आपना मुझ से बुरा न कोई। नानक नीच करे विचार वारिया न जावां एको वार जो तुध भावे साई भली कार। अब अपने भीतर कोई नहीं झांकता है सब अंदर से जो हैं उसको छुपाते हैं उस पर पर्दा डालते हैं उसको ढक देते हैं सफ़ेद चादर से या कोई खूबसूरत कालीन बिछाकर। लिबास सुंदर हैं बातें भी भली भली करते हैं बस आचरण और कर्म ही उस जैसे कोई नहीं करता है। बदल गई है परिभाषा , पहले मानते थे धन गया कुछ नहीं गया स्वास्थ्य गया कुछ खो गया और चरित्र नहीं बचा तो कुछ भी नहीं रहा सब खो बैठे हैं। अब उल्टी धारणा है चरित्र खोने को समझते हैं कुछ भी नहीं गया बेकार की चीज़ थी किसी काम की नहीं थी गई तो अच्छा हुआ और स्वस्थ्य जाने पर लगता है सभी तो रोगी हैं मैं अकेला तो नहीं फिर धन है तो डॉक्टर बड़े बड़े अस्पताल महंगी दवाएं हैं ही बस
धन पास रहना ज़रूरी है। जब नैतिकता के मापदंड बदल चुके हैं तो सत्यमेव जयते भी मिटा देना चाहिए और सत्य को इक मूर्ति की तरह किसी जगह सजाकर टांग देना चाहिए सूली पर चढ़ा हुआ ताकि लोग देख कर सबक सीखें कि सच बोलना मुसीबत को घर बुलाना है। चलो हर तरफ निगाह डालते हैं कौन क्या है क्या होना चाहता है और क्या होना चाहिए था।
    
         शुरुआत राजनीति से इसलिए करते हैं कि आजकल यही सब के सरों पर सवार है।  नीति की बात है नहीं बाकी अनीति राजनीति बन गई है देशसेवा की कोई बात नहीं बस हर कोई अपने बारे सोचता है सत्ता जाना लगता है जान जाती है। इतना मोह है सत्ता का कि अच्छा बुरा कुछ नहीं सूझता बस सत्ता पानी है किसी भी तरह से। ऊपर जाने को कितना नीचे गिरना पड़े सब तैयार हैं। माला फेरने से भगवान नहीं मिलते राम राम रटते रटते उल्टा मरा मरा कहने लगते हैं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास की बात है देश समाज को बदलना था बदल खुद ही गये हैं। आदर मान पाने की वास्तविकता है कि नेता शब्द सबसे गंदी गाली बन गया है फिर भी लोग खुश हैं गाली बनकर भी। अपमान जब आदर समझा जाने लगता है तब अच्छाई की राह चलता कौन है।

       आधुनिकता की दौड़ ने पागलपन को समझदारी नाम दे दिया है और हर कोई रेगिस्तान में भागता चला जा रहा है पानी कहीं नहीं है इक चमकती हुई रेत है जिसको पानी समझते हैं और प्यास है कि बुझती नहीं है। कितनी दौलत कितना सामान जुटा लिया व्यर्थ में ज़रूरत कितनी है नहीं समझते हैं। शिक्षा पाई थी डॉक्टर बनकर रोग का रोग उपचार करने से कमाई करने को मगर कमाई करने को रोगियों का उपचार करना ही मकसद नहीं बनाया बल्कि रोग और रोगी बढ़ाने और बनाने लगे हैं। दवा उपचार रोगमुक्त करने को नहीं पैसा बनाने को होने लगा है। किसी को नहीं खबर जाना किधर था जा रहे किधर हैं। शिक्षक विद्या का कारोबार करने लगे हैं और पढ़ा रहे हैं उल्टी पढ़ाई जिस में अच्छे इंसान और सेवा करने की बात नहीं है पढ़ाई को साधन बनाकर स्वार्थ सिद्ध करने का पाठ पढ़ाते हैं। अधिकारी देश समाज का कल्याण निर्माण नहीं पद का उपयोग क्या दुरूपयोग कर जो करना उसको छोड़ जो करना नहीं उसी को करने लगे हैं। कोई कारोबार करता है या कोई भी सेवा करता है मकसद ईमानदारी की कमाई नहीं अधिक से अधिक की लूट होने लगा है। उचित अनुचित की चिंता नहीं सही गलत मार्ग की चिंता नहीं सब राह से भटके हैं मगर चाहते हैं मंज़िल पाना। मंज़िल क्या है कोई नहीं समझता न जानना चाहता। लोग सभी कहते हैं किसी का बुरा नहीं करते हम पर जब सभी लोग अच्छे हैं शिक्षित हैं जानकर हैं ज्ञानी हैं विवेकशील होने का दावा करते हैं धर्म को मानते हैं तब अच्छाई कहीं आस पास नज़र आती क्यों नहीं है।

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