Thursday, 7 February 2019

गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

          गुनहगार की तरह ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

      ये हमारी व्यथा कथा है कि मुजरिम होने का कबूलनामा नहीं मालूम , पर झूठी कसम नहीं खाते सच सच बताते हैं कि हम देश के तीस फीसदी गरीब लोग वास्तव में रहते हैं भूखे नंगे बेबस होकर भी गुनहगार की तरह ही और मरने की राह देखते रहते हैं। जो दस बीस फीसदी बड़े लोग राज चलाते हैं और जो बीस तीस फीसदी उनके नीचे खुशहाल हैं और जो हमसे थोड़ा ऊपर बीस फीसदी जो जी लेते हैं किसी हाल में आप सब लगता है हमारी तरफ ऐसी नफरत भरी नज़र से देखते हैं जैसे हमने देश में जन्म लेकर इक अपराध किया है। बदसूरत लोग आपकी चमकती जगमग दुनिया पर मखमल में टाट का पैबंद की तरह हैं। आप सब लोग देश को बहुत कुछ देते हैं अपनी आमदनी से हर तरह से मगर हम पास होता ही नहीं कुछ भी देने को। इक फिल्म की कहानी में हम में ही कोई गरीब किसी होटल के बाहर भिखारी की तरह खड़ा देखता है बड़ी सी कार से उतरते हुए किसी अमीर की जेब से उसका बटुआ गिरते हुए और फिर उस नीचे पड़े बटुए को उठाकर लेकर होटल के भीतर जाकर उस अमीर को देता है। अमीर कहता है या पूछता है तुम्हारे पास खाली जेब कुछ भी नहीं है तुम चाहते तो रख सकते थे मिला बटुआ जिस में बहुत पैसा था तो गरीब कहता है जी मैं कोई चोर नहीं हूं किसी का बटुआ लेकर धनवान नहीं बनना है। तब वो अमीर होटल में पार्टी में नाचते झूमते हुए लोगों की तरफ इशारा कर बोलता है कि ये सभी कभी तुम्हारी तरह गरीब थे मगर इन्होने किसी का गिर गया पैसों से भरा बटुआ वापस नहीं किया और आज अमीर बन गये हैं। तब बात फ़िल्मी कहानी की थी मगर आज यही देश की वास्तविकता है बस ज़रा अंतर इस बात का है कि कोई बटुआ जेब से नहीं गिरा मिलता कोई रास्ता कोई छेद सरकारी गोदाम से या देशवासियों के घर की दिवार से बना हासिल करना सीख लोग ऊपर बढ़ते जाते हैं। महनत से ईमानदारी से किसी का गुज़र बसर होता ही नहीं है चोरी और सीनाज़ोरी यही देश की व्यवस्था बन गई या बना डाली है। 
                                 नसीब की बात नहीं मालूम मगर बदनसीबी की पता है , गरीब जिस पिता के घर जन्म लेता है गाली सुनकर बड़ा होता है और जब जीवन भर कोशिश कर अपने घर जन्म लेने वाली संतान को बड़े होकर गरीबी की दलदल से बाहर निकालता है तब भी खुद ही अपने को गाली देता महसूस करता है कि बाप भी अच्छा था बच्चे भी बड़े बन अच्छे हैं इक मैं ही बुरा और कमनसीब हूं। देश का हर गरीब जागते हुए सपना देखता है अमीर होने के नहीं केवल ख्वाब देखता है दो वक़्त रोटी के और किसी भी तरह थोड़ा हंसी ख़ुशी के चार पल मिलने के। सरकार भी कुछ लोग भी हम गरीबों को कोई खैरात देते हैं दया करने का दिखावा करते हुए मगर वास्तव में बदले को पुण्य पाना या हमारे पार जो अधिकार रहता है वोट देने का , उसको मांगना भी खरीदना भी और झूठे सपने दिखला छीन लेना भी मकसद रहता है। जब भी देश में चुनाव होता है तब लगता है हम भी देश के बराबर के मालिक हैं हमारा भी वोट बाकी लोगों के बराबर है। समझते हैं शायद इस बार सरकार बराबर बराबर सबको सब बांटेगी और हम भी अपना हिस्सा पाकर जीने के काबिल बन जाएंगे। अपना वोट कीमती वोट लगता है देश की हर संपत्ति पर समानता का हिस्सा पाने का साधन है। मगर हम सभी इक पल को राजा होने का वहम पाले जिस पल वोट डालते हैं अपना सब कुछ लुटवा आते हैं। बाद में फिर पांच साल इंतज़ार उस इक पल का और हमेशा अपने इक पल के अवसर को खोते रहते हैं। देश की राजनीति जाने क्या क्या शोर रहता है हर दिन गली गली नगर गांव हम भी सामने देखते रहते हैं पर नहीं समझ पाते उनका क्या मतलब है। 
                                          जीना मरना एक जैसा है ज़िंदगी मिलती नहीं मौत आती नहीं आसानी से। कोई हादिसा होता है तभी हमारी मौत को सरकार भी समाज भी सिक्कों से तोलते हैं और कुछ हज़ार का कभी अधिक मुआवज़ा मिलता है मरने के बाद उसके वारिस को जीते जी नहीं मिला जो लगता है मर कर पा लिया है। ऐसी मौत की चाहत रखते हैं कुछ लोग ये सोच कर जिस पिता को पत्नी को बच्चों को खुद जीते हुए नहीं दे पाए मरने से ही कुछ दे कर जाएंगे तो चैन से मर तो पाएंगे। सरकार चाहती है हमारी संख्या का अनुपात आंकड़ों में घटाना मगर कम नहीं होता संख्या बढ़ती जाती है। गरीबी का फीसदी आंकड़ा और गरीबों की जनसंख्या का आंकड़ा मिलता नहीं इक कम होता है दूजा बढ़ता जाता है। सालों पहले जब देश के बड़े नेता को गुज़रना होता था तब हम गरीबों की बस्ती को परदे कनातें लगाकर ढक देते थे जनाब को देख कर दुःख नहीं महसूस हो इसलिए। आजकल सड़कों की सजावट और आंखों को चुंधियाती रौशनी में हमारा अस्तित्व विलीन हो जाता है उनको पता होता है हम हैं मगर नज़र नहीं आते हैं। हम भी उसी तरह हैं जैसे देश में अपराध बढ़ रहे हैं मगर अपराधी किस बिल में छुपे हैं पता नहीं चलता मगर अपराधी हमारी तरह गरीब नहीं होते हैं मालदार होते हैं देश विदेश जाते हैं राजनीती में शामिल होकर शासक भी बन जाते हैं। उनके अपराध की जांच सरकार अपनी सुविधा के अनुसार करती है और निर्णय होते होते अपराधी का निशान बाकी रहता नहीं है। हम बेक़सूर हैं फिर भी गरीबी के गुनाह परे शर्मसार रहते हैं। हर किसी के सामने हाथ जोड़ कोई गुनाह किया नहीं मगर गुनाह की माफ़ी मांगते हैं। पुलिस से सरकारी अधिकारी से नेता से पूछना हम खुद गुनहगार होने का सबूत देते हैं। हर कोई इसी नज़र से देखता है हमको हर दिन।  गिला है इल्ज़ाम मान लेते हैं फिर भी सज़ा का फरमान जारी नहीं होता अक्सर सदियों तक सज़ा पाकर भी फरियादी कहलाये जाते हैं।
        इक शानदार भवन के बीच लंबे चौड़े फैले हॉल में मंच पर बहुत लोग हमीं गरीबों की बात सुना रहे हैं और सामने बैठे रईस लोग लुत्फ़ उठाते हुए तालियां बजा रहे हैं। नहीं मालूम उन्हीं में किस किस ने किस किस बेबस गरीब को कितना सताया होगा। गरीबी की बात कहने सुनने को कोई गरीब नहीं फिर भी भूले से भटकता हुआ मैं उधर चला आया। रहमदिल लोग हैं समझ गलती से पायदान चढ़ उनसे मुखातिब हुआ तो संचालक को हैरानी हुई बिना बुलाये किस तरह चला आया तुम्हारा काम बाहर दरवाज़े पर सलामी देना है कविता ग़ज़ल और बड़ी बड़ी गंभीर बातों की समझ कहां तुझ को। जो काम बताया गया करो चुपचाप ख़ामोशी से पानी चाय देने के बाद नज़र नहीं आना कैमरे की तरफ। गरीबी की बात मगर गरीब को धुत्कार करना जाने कितना अच्छा कितना खराब है। कोई ग़ज़ल आधी कोई शेर अकेला कोई चर्चा किसी विषय से शुरुआत करते और पहुंचती बात किसी और विषय पर। जाने क्यों लगा शायर की खुद अपनी ग़ज़ल घायल कराहती होगी उसे टुकड़ों टुकड़ों में सुनाते हुए। ये कोई अदब की पहली सी रिवायत नहीं लगती आधी आधी कितनी कविता ग़ज़ल और हर बार बीच में तालियों की भीख की बात आयोजकों की तारीफ की और बार बार उन्हीं के नाम कोई शेर कहने का ढंग लगा जैसे किसी राजदरबार के कवि शायर अपने आका का दिल बहलाने को खुश कर ईनामात पाने को बेताब हैं। गरीबी का दर्द नहीं समझते उसको उपयोग करते हैं और गरीब को मंच से ठोकर लगाकर नीचे उतार देते हैं। कोई साहित्यकार कहलाता है कोई राजनेता आयोजन का महत्वपूर्ण अंग है कोई और आयोजन के भागीदार हैं और सब के इश्तिहार लगे हैं कारोबार भी समाज की बात करने का दम भरने का दावा भी और कवियों शायरों कलाकारों के शुभचिंतक भी। किसी गरीब की कोई भलाई इस से नहीं होने वाली है। इंसानियत इंसानियत की बात मगर इंसानियत को भूलकर अपने अपने मकसद याद हैं। अपनी कहानी में अपना कोई किरदार नज़र नहीं आया मुझे।

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