Tuesday, 5 February 2019

झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया

    झूठ को सच बनाता आईना टीवी सिनेमा - डॉ लोक सेतिया 

    आजकल हर दिन एक रुपया रोज़ देकर टीवी चैनल का कोई न कोई पैक लेने का विज्ञापन दिखाई देता है। हम हवा पानी के प्रदूषण पर चिंता जताते हैं मिलावट की वस्तु और फल सब्ज़ी पर कीटनाशक की चर्चा करते हैं। सोशल मीडिया स्मार्ट फोन के समाज पर हो रहे बुरे असर की बात करते हैं फेसबुक व्हाट्सएप्प से बढ़ते अपराधों का भी विचार कभी कभी आता है मगर इन पर हम कोशिश कर अंकुश लगा सकते हैं। लेकिन टीवी चैनल के सीरियल की कहानी विज्ञापन की नग्नता और छल कपट और फिल्मों की कहानी संगीत किस तरह से किस पर क्या असर छोड़ते हैं शायद कोई सोचता ही नहीं है। फिल्म टीवी का बहुत शौक रहता था मुझे और उनसे बहुत जानकारी और समझ मिला करती थी लेकिन अब टीवी सीरियल फिल्म देख समझ नहीं आता कि उनके बनाने वालों का मकसद है क्या , क्या केवल पैसा कमाना समाज को गुमराह कर या बच्चों और युवा वर्ग को भटका कर इक अपराध नहीं है। कलाकार कला सृजन का मकसद समाज को भटकाना नहीं हो सकता है जो ऐसा कर रहे हैं सच्चे कलाकार नहीं पैसे के लालची लोग लिखने वालों फिल्म टीवी सीरियल बनाने वालों समाज के दुश्मन हैं। हर टीवी सीरियल की हर फिल्म की कहानी की बात करना संभव नहीं है मगर यहां अधिकांश जो परोसते हैं उसकी बात से समझ सकते हैं। 
          शायद टीवी सीरियल वालों को लगता है दर्शक के पास कोई दिमाग नाम की चीज़ नहीं है इसलिए अपनी कहानी में कितनी बार कोई मरता है ज़िंदा होता है , चेहरा बदल लेता है और अपराध कर बच जाता है। बार बार अजब इत्तेफाक होते रहते हैं और सबसे बुरी बात कोई भी किरदार सही दिशा नहीं दिखलाता है। छल कपट षड्यंत्र पुरुष महिला सभी निडरता से करते हैं कोई कानून का डर नहीं है और अधिकारी डॉक्टर जब जिस को जो करना हो रिश्वत देकर झूठी रपट बनवा लेते हैं। हर कोई असंभव लगने वाले कार्य किसी को बेहोश करना कोई फ़िल्मी खलनायक जैसे पहले फिल्म में अपने अड्डे पर किया करते थे टीवी सीरियल का हर किरदार करने को सक्षम है। नागिन बन औरत बन जाने किस युग में जीना चाहते हैं , अंधविश्वास जादू टोना तंत्र के नाम पर बलि की बात और बंधक बनाकर रखने और ऐसे समाज जिस में आज भी बच्चियों के लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं है और एक साथ आधुनिक होते हुए सदियों पिछड़े लोग वास्तविक समाज में जो कहीं नहीं मिलते टीवी सीरियल फिल्म में उनकी कहानी दिखाई देती है। फिल्म टीवी कला अगर वास्तविकता से परे कोरी कल्पना जो शायद उस पुराने युग में भी नहीं संभव था को आज की सच्चाई बताना चाहते हैं और विचारशीलता को नकारते हैं। 
                        कॉमेडी के नाम पर बेहूदा डॉयलॉग और घटिया निम्न स्तर के चुटकुले सुनकर लगता है इनको स्वस्थ्य हास्य की समझ नहीं है। हर शो में रियल्टी के नाम पर बनावट और लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया जाता है। सरकार का विभाग इसकी चिंता करता है कि लोग जिस चैनल को देखें उसकी ही कीमत चुकाएं मगर क्या इस पर पहले ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए कि मनोरंजन के नाम पर जो परोसा जा रहा है उस से समाज की मानसिकता खराब ही नहीं हो रही बल्कि नैतिकता और आदर्श का पतन हो रहा है। जो धर्म की समाज के मूल्यों की दुहाई देते हैं उनको ये सब क्यों नज़र नहीं आता है। कभी कभी किसी टीवी सीरियल को देखकर सोचता हूं कि कई साल बाद जब लोग इसको फिर से देख सकेंगे तो क्या उनको ऐसा नहीं लगेगा कि हम कितने ज़ाहिल नासमझ और दिमाग से काम नहीं लेने वाले लोग थे। एक साथ रहते हैं एक घर में मगर हर एपीसोड में कोई दोस्त दुश्मन कोई दुश्मन दोस्त हो जाता है। बार बार धोखा छल कपट फिर भी बार बार प्यार मुहब्बत करना लगता है पिछले दिन की कहानी आपको भूल जानी चाहिए अन्यथा आपको समझ नहीं आएगा कोई भी किरदार क्या है। हर कोई गुनहगार भी है और खुद को सही भी साबित करता है। सब चालाक भी हैं मगर नासमझ और मूर्ख भी हैं जो सामने होते हुए किसी बात को नहीं समझ पाते हैं।
      टीवी और फिल्म वालों ने भगवान को अपनी कठपुतली समझा हुआ है जैसे मन चाहा उपयोग कर लेते हैं। दुनिया भर के गलत कार्य करने वाला भगवान के सामने हाथ जोड़ अपने अनुचित कर्मों में भी साथ मांगता ही नहीं कथाकार दिखलाता है उसकी दुआ सुन ली भगवान ने। इक अजीब सी दुविधा दर्शक को रहती है कि किस बात को कब सही और कब गलत समझना होगा। समय के साथ तमाम चीज़ों में बदलाव आता है और हर चीज़ पहले से बेहतर बनते बनते और अच्छी बनती जाती है मगर हमारे देश का सोशल मीडिया टीवी चैनल सिनेमा हर दिन और बदतर हालत होती जाती रहती है। खराब होने को सफलता की निशानी जैसे मान लिया गया है , बेतुकी कहानी निरर्थक गीत के बोल और संगीत के नाम पर शोर के साथ अपशब्दों को भद्दे लगने वाले शब्दों को स्वीकार करना बताता है कि हम सभ्यता को त्याग असभ्य बनने को तरक्की कहने लगे हैं। जो बच्चे इस सब को देख कर बड़े होंगे उनको पहले युग के आदर सूचक शब्द बकवास लगेंगे और गाली देना गंदी भाषा का उच्चारण करना आधुनिकता लगेगा। कभी ये समझते थे कि अपनी कुरीतियों को गलत परंपराओं को छोड़ समय के साथ अच्छी बातों को अपनाना चाहिए मगर यहां तो जो हमारी अच्छी और कायम रखने के काबिल बातें थीं उनको छोड़ व्यर्थ की फालतू की गंदी और खराब बातों को अपना रहे हैं। ये सब टीवी सोशल मीडिया और फिल्मों तथा जाने माने नायक नायिकाओं से सीखा है हमने और सीख रहे हैं। पढ़ाते हैं हमको ये उल्टी पढ़ाई जो उल्टी पढ़ाई तो मैं क्या करूं।

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