Monday, 29 October 2018

अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो - जीने का सलीका - डॉ लोक सेतिया

        अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो - 

                               जीने का सलीका - डॉ लोक सेतिया

      आज अपने अनुभव की बात , ज़िंदगी जीने का ढंग। जैसे सबको किसी की तलाश होती है कोई अपना जो समझे जो प्यार करे जो अपनाये जो दुनिया के ग़म दुःख दर्द भुला दे। हैं ऐसे लोग मगर आस पास मिलते नहीं हैं जिनको मिलते हैं बहुत खुशनसीब होते हैं। अधिकतर नाते रिश्ते शर्तों से बंधे होते हैं और शर्तों पर जीना तो बार बार मरना होता है। समझाते समझाते ज़िंदगी बीत जाती है। मुझे नहीं मिला कोई अपना जो समझता मगर मुझे फिर भी अगर किसी ने संबल बनकर ज़िंदा रखा है तो सबसे पहले संगीत ने और उसके बाद साहित्य लिखने पढ़ने ने। किताबों में आपकी हर समस्या का हल है हर सवाल का जवाब है कभी तलाश कर के देखना। सोचना जब भी आप वास्तव में अकेले होते हैं आपकी तनहाई का साथी हमेशा किताबें या संगीत हो सकते हैं। शीर्षक ही इक गीत से लिया हुआ है पूरा अंतरा यूं है। 

               ज़माने वालों किताबे ग़म में ख़ुशी का कोई फ़साना ढूंढो ,

                अगर जीना है ज़माने में तो हंसी का कोई बहाना ढूंढो। 


  जीने की राह , फिल्म का नाम भी यही है। ऐसा भी नहीं कि आशावादी गीत ही आपको जीना सिखा सकते हैं , अक्सर दर्द भरे गीत भी इक सुकून थोड़ी राहत का अनुभव ही नहीं देते अपितु आपको समझ आता है कि शायद आपसे अधिक दुःख दर्द और लोग भी झेलते हैं सहते हैं। मैंने हमेशा उदासी निराशा अकेलेपन में पुराने गीत सुने हैं गुनगुनाए हैं और मुझे जैसे इक नई आशा इक उमंग मिलती रही है। मरने का सलीका आते ही जीने का शऊर आ जाता है। एक लाइन कितना कुछ कह जाती है। इक दिन तो समझ लेगी दुनिया तेरा अफसाना , ऐ मेरे दिले नादां तू ग़म से न घबराना। हमने उन किताबों को पढ़ना छोड़ दिया है जो जीने का पाठ पढ़ाया करती थीं या फिर आज भी पढ़ा सकती हैं। किसी ने समझाया ही नहीं कि महीने में ही सही एक किताब साहित्य की खरीदी जाये और अच्छी तरह उसे पढ़ा जाए। शिक्षित होने का अर्थ पढ़ना लिखना छोड़ देना तो नहीं हो सकता , और जिनको पढ़ना उकताता है उन्होंने पढ़ा जितना भी समझा नहीं है। पढ़ने का मज़ा ही तभी आता है जब आप समझते हैं। यही संगीत की बात है जब तक शब्दों के भावार्थ आपको भीतर तक महसूस नहीं होते संगीत और शोर एक जैसे हैं। मुझे जिन फ़िल्मी गीतों से चैन मिलता है वो कुछ इस तरह हैं। 
           ओ माझी चल , रात भर का है महमां अंधेरा , किस तरह जीते हैं ये लोग , अपने लिए जिए तो क्या जिए , किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार , कोई जब राह न पाए मेरे संग आये की पग पग दीप जलाये मेरी दोस्ती मेरा प्यार। मुझसे नाराज़ हो तो हो जाओ , आप अपने से तुम खफ़ा न रहो। न सर झुका के जिओ और न मुंह छिपा के जिओ। साहित्य कला संगीत वास्तव में रंग भरते हैं ज़िंदगी में बेरंग जीवन किसी अभागिन महिला की तरह होता है। इक बात को समझना ज़रूरी है कोई भी किसी का साथ हमेशा नहीं निभा सकता है , कभी न कभी किसी न किसी मोड़ से रास्ते बदलते रहते हैं। जब तक हम इस जीवन की वास्तविकता को स्वीकार नहीं करते हैं हम दुःख दर्द को खुद जकड़े रहते हैं। जिस का साथ जितना रहा उसी को बहुत समझना ज़रूरी है कोई जब अनचाहे साथ निभाता है तो बनावटीपन होता है जीवन में वास्तविकता बचती नहीं। सब से पहले खुद अपने आपको तलाश करना और अपने संग रहना आना चाहिए। चल अकेला चल अकेला चल अकेला , तेरा मेला पीछे छूटा रही चल अकेला। सब से महत्वपूर्ण बात इक ग़ज़ल से समझी जा सकती है। 

जब किसी से कोई गिला रखना , सामने अपने आईना रखना। 

मिलना जुलना जहां ज़रूरी हो , मिलने जुलने का हौसला रखना। 

घर की तामीर चाहे जैसी हो , उस में रोने की इक जगह रखना। 

और भी ग़ज़लें हैं जो आपके काम आती हैं जब कोई आपके साथ नहीं होता है। 
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये , घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये।

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