Tuesday, 26 June 2018

मरने से डर रहे हो , रोज़ मर रहे हो - डॉ लोक सेतिया

     मरने से डर रहे हो , रोज़ मर रहे हो - डॉ लोक सेतिया 

  मुझे इक दोस्त ने कहा कि लोग आपकी फेसबुक पोस्ट पर लाइक और कमेंट करने से डरते हैं क्योंकि आप सत्ताधारी दल की आलोचना करते हैं। मुझे नहीं लगता आज़ाद भारत के लोग इतने कायर हो सकते हैं। कोई किसी की पोस्ट लाइक करता है या कमेंट लिखता है तो उसका लिखी बात से कोई नाता नहीं बनता कि लिखने वाले से लोग सहमत हैं अथवा नहीं हैं। हम उन महान शहीदों की संतान हैं जो गुलामी के समय भी विदेशी अत्याचारी शासकों से नहीं डरे। मुझे लोकहितकारी लेखन करते चालीस साल से अधिक समय हो गया है और मैंने सरकारों अधिकारियों अन्य तमाम लोगों यहां तक कि धर्म के कारोबार की आलोचना भी की है। आलोचक आपका दुश्मन नहीं होता है , विरोधी भी नहीं , आप का हितचिंतक बन सकता है। निंदक नियरे राखिये , आंगन कुटी छुवाये , बिन साबुन पानी बिना मैल साफ कर जाये। बिलकुल सच है कि ऐसा मानने वाले लोग कम क्या अब कहीं नहीं मिलते। मुझे बहुत बार गलत कार्य करने वाले लोगों ने बदले की भावना से परेशान करने या डराने धमकाने की कोशिश की है लेकिन उनसे मेरे इरादे कमज़ोर नहीं हुए कभी भी। 
    मैं अपने दादा जी से काफी प्रभावित रहा हूं। वो बेहद निडर थे , वो ही नहीं मैंने गांव में अधिकतर लोगों को निडरता पूर्वक अपनी बात कहते देखा है। खामोश रहना शहरी तहज़ीब कहलाती होगी मगर जब बोलना ज़रूरी हो तब चुप रहना अपराध होता है। इक घटना की बात याद आई है। हमारे घर से थोड़ी दूर एक और बड़ा सा घर हमारा हुआ करता था , जिस में गाय भैंस बांधी जाती थी और दो कमरे तूड़ी और जानवरों को छाया को और दो और उनकी देखभाल करने वालों के रहने को बनाये हुए थे। बहुत बड़ा आंगन था जिस में आस पड़ोस वाले भी अपने जानवर बांधते थे अनुमति लेकर। एक बार देखभाल करने वालों ने बताया कि जो नया पड़ोसी आया है वो आकर उसके पिछले तरफ के आंगन को फीता लगाकर पैमाईश कर कह रहा था कि ये मेरा है और वो इस तरफ अपने घर में से रास्ता बनाना चाहता है। मेरे ताया जी ने दादा जी से पूछा क्या हम गांव से कुछ लोगों को बुलाकर उसके बंधे जानवर खोल दें।  दादा जी बोले इस काम के लिए मैं अकेला काफी हूं किसी की भी ज़रूरत नहीं है। दादा जी के हाथ में इक छड़ी हमेशा रहती थी जिसे खूंडी कहते हैं। दादा जी गये उसको उसके घर से बुलाया और पूछा तुमने ऐसा क्यों किया। अभी अपना जानवर खोल कर ले जाओ वरना ठीक नहीं होगा , हम पड़ोसी हैं तुम्हें कोई ज़रूरत हो तो मुझसे मांगकर ले सकते हो मगर छीनकर कभी नहीं। माफ़ी मांगी थी पांव पकड़ कर। निडरता आपकी सच्चाई में निहित है डरते झूठे लोग हैं। 
   किसी शायर की ग़ज़ल का एक शेर पेश है :-

                     लोग हर मोड़ पर रुक रुक के संभलते क्यों हैं ,

                     इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।

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