Tuesday, 12 June 2018

एक ही काफी है शुभचिंतक ( ज़िंदगी का सबक ) डॉ लोक सेतिया

  एक ही काफी है शुभचिंतक ( ज़िंदगी का सबक ) डॉ लोक सेतिया

     ये मेरे आपके सभी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। जैसे पुरानी कहावत है एन एप्पल ऐ डे , कीप्स डॉक्टर अवे। अर्थात एक सेब हर दिन खाओ तो बिमार नहीं पड़ोगे। उसमें कितनी सच्चाई है नहीं पता मगर मुझे इतना पता है कि एक सच्चा शुभचिंतक आपको हज़ार समस्याओं से निजात दिलवा सकता है। मगर इस युग में एक सच्चा दोस्त एक सच्चा हमदर्द एक सच्चा हमसफ़र मिलना सब से कठिन है। आज जो बात या जो कहानी आपको बताने जा रहा हूं वो आजकल की ही नहीं है बल्कि उन दो भाइयों की है जिन से आप भी परिचित हैं। दूसरे शब्दों में बहुत बड़े जाने माने परिवार की बात है। ध्यान से सुनिए। 
      दौलत इतनी कि खुद उनको नहीं मालूम कितनी है। झगड़ा दो भाइयों का और झ्गड़े की वजह कुछ भी नहीं , केवल अहंकार। पचास पचास बड़े बड़े वकील दोनों ने कर रखे मगर अदालत को भी समझ नहीं आया कि फैसला कैसे हो। यहां इक बात बतानी ज़रूरी है कि हमारे देश में आम नागरिक को बेगुनाही में भी सज़ा देते जिन को ख़ास परवाह नहीं होती , उन्हें बड़े लोगों के मुकदमों का निर्णय करते बहुत चिंता रहती है कि किसी को भी नाराज़ नहीं करना है। ये सब से बड़ा सच है कि कोई भी अदालती निर्णय दोनों पक्ष को पसंद नहीं आ सकता है। बहुत सोच समझ कर अदालत ने उनका मुकदमा सहमति से समझौता करवाने वाले इक वरिष्ठ वकील के पास भेज दिया। बहुत कुछ दांव पर था , शेयर कंपनियां और अकूत दौलत भी। बहुत महीने तक दोनों की बातें उनके वकीलों की बातें सुन कर भी मध्यस्ता करने वाले वरिष्ठ वकील को समझ आया कि जीवन भर लड़ते रहेंगे दो भाई मगर कोई भी अदालत या पंचायत इनका समझौता नहीं करवा सकती न ही ऐसा फैसला ही कर सकती है जो दोनों को मंज़ूर हो। 
                  ऐसे में उस मध्यस्ता करने वाले वकील ने कहा मुझे नहीं लगता मैं इक गुत्थी को सुलझा सकूं इसलिए मुझे अदालत को सूचित करने से पहले इन दोनों भाइयों से अकेले में थोड़ी देर बात करनी है और सभी वकील बाहर चले जाएं। वो इक शीशे की दीवारों का बना हाल था और बाहर खड़े सौ वकील भीतर की आवाज़ नहीं सुन सकते थे , देख रहे थे कि क्या होने जा रहा है। उनकी धड़कन बढ़ी हुई थी क्योंकि दो भाइयों में आपसी समझौता होना उनको हर दिन मिलने वाले लाखों रूपये का बंद होना भी था , ये बात उस वरिष्ठ वकील को समझ आ चुकी थी कि सब वकीलों का मकसद निपटारा कभी नहीं होने देने और अपनी कमाई ही था और कोई भी उनका शुभचिंतक नहीं था। घोड़ा घास से यारी करेगा तो खायेगा क्या। दो घंटे दोनों भाइयों से एक साथ और अकेले अकेले बात करते मध्यथता करने वाले वकील को पता चला एक व्यक्ति है जिस पर दोनों भाई पूरा भरोसा करते हैं और उसका बहुत आदर करते हैं , मगर अभी तक वो सामने नहीं आया था। 
           वरिष्ठ वकील ने उसका फोन नंबर मांगा और तभी उस से फोन पर बात की। उसने बताया कि मैं हवाई अड्डे पर हूं और विदेश ज़रूरी काम से जा रहा हूं। वकील ने कहा कि क्या आप इन दो भाइयों के लिए अपने विदेश नहीं जाने से होने वाले नुकसान को भुला कर विदेश जाना छोड़ अभी आ सकते हैं। उस दोनों भाइयों के शुभचिंतक ने कहा कि अगर मेरे आने से ऐसा हो सकता है तो मैं अवश्य आ सकता हूं। मेरे लिए कारोबार में करोड़ों का फायदा नुकसान उतना महत्व नहीं रखता जितना इनकी भलाई। और वो व्यक्ति सीधा हवाई अड्डे से उस जगह चला आया था जहां ये सब चल रहा था। उसने दोनों भाइयों से आधा घंटा ही बात की और दोनों ही सहमत हो गए। सालों से जो काम सौ वकील और दोस्त रिश्तेदार नहीं करवा पाए थे पल भर में हो गया था। इस में कुछ भी झूठ या काल्पनिक नहीं है। आपका एक शुभचिंतक ऐसा हो जो आपकी भलाई के लिए अपना नुकसान भी बर्दाश्त कर सकता हो तो इस से अच्छा कुछ भी नहीं हो सकता। 
       अंत भी वास्तविक है। समझौता होने के बाद एक भाई ने दूसरे से कहा , हम क्या कर रहे थे कुछ समझ नहीं आया।  कोई लड़ाई की बात थी ही नहीं इतना किसी ने समझाया ही नहीं। वरिष्ठ वकील ने बताया , आप केवल वकीलों की वकालत देख रहे थे और कुछ भी नहीं।  मैं समझौते करवाने में माहिर हूं फिर भी मुझसे ये काम नहीं हो सकता था जो आपके एक सच्चे शुभचिंतक ने कर दिया है। वकीलों को आपकी लड़ाई से ही फायदा था समझौते से नहीं , बहुत लोगों के घर बिकते हैं अदालती झगड़ों में और उन्हीं से वकीलों की कोठियां बंगले बनते हैं। आप को कुछ समझ आया। एक शुभचिंतक तलाश करिये जीवन आसान हो जाएगा।

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