Friday, 29 June 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 3 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 3    

                                     डॉ लोक सेतिया 

   आज की कहानी जितनी आसान टीवी दर्शकों को लगी उतनी आसान नहीं है। इक डरावना सच है हमारे देश समाज और हम सभी की सोच को लेकर। पहले कहानी पूरी समझ कर फिर सवालों से जूझते हैं। इक महानगरीय सोसाइटी जिस में अच्छे खासे सुविधा संपन्न लोग रहते हैं उसका चौकीदार जो बहुत थोड़ा वेतन पाता है शायद सात हज़ार। ईमानदार है अपने काम में। मगर जब बिमार पड़ता है तो जो दो लड़के उसे लेकर अस्पताल जाते हैं और जब डॉक्टर बताता है कि अंतड़ियों में रुकावट है और ऑप्रेशन करने को दो लाख चाहिएं तब वो लड़के लाते हैं पैसे जमा करवा उसकी जान बचाने को। मगर कुछ दिन बाद वही ईमानदार चौकीदार उन दो लड़कों को नकाब उतारते और चोरी के पैसे लाते देखता है। टीवी पर खबर सुनता है एटीएम की चोरी के सीसी टीवी फुटेज देख समझ जाता है ये उनकी ही बात है। ऐसे में वो पुलिस को सूचना देकर उन्हें पकड़वा देता है। लेकिन जब पुलिस की हवालात में उनसे जाकर मिलता है तो वही लड़के उसे बताते हैं कि हम चोरी उन में से एक की मां के इलाज की खातिर कर रहे थे। और अपनी जान बचाने के उपकार का बदला चुकाने का रास्ता बताते हैं कि हमने वो सारा चुराया हुआ पैसा एक बंद फ्लैट की बॉलकनी में डाला हुआ है तुम वो पैसा उठाकर अस्पताल में देकर उस की मां का इलाज करवा बचाओ। और वो यही करता है। मगर जो ईमानदारी से दो लड़कों को चोरी करने पर पकड़वाता है खुद जब उस फ्लैट की चोरी की पूछताछ करने पुलिस आती है तो अपनी चोरी कबूल नहीं करता है। यहां कहानी खत्म नहीं  होती है।   सवाल खत्म नहीं होते हैं। 

                                 मानवता का सवाल

    क्या ये उचित है कि जब भी किसी को कोई रोग हो तो उसका उपचार बिना लाखों रूपये नहीं हो सकता है। इस का मतलब न केवल हमारे देश की सरकारें निर्दयी हैं जो गरीबों को स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध नहीं करवाती हैं बल्कि उनके साथ अस्पताल और डॉक्टर भी कोई इंसानियत का फ़र्ज़ नहीं निभाते और किसी गरीब का इलाज लाखों रूपये लिए बिना नहीं करते भले वो चोरी करे डाका डाले , और हम सभी बड़ी बड़ी समाजसेवा की बातें करने वाले धर्म की बातें करने वाले कोई सहायता नहीं करते। ये कैसा संदेश देती है कहानी , दो लड़कों ने जो किया चोरी के पैसों से चौकीदार की सहायता की उसका बदला उसने भी चोर बनकर ही चुकाया। जब वो लड़के हवालात में हैं दोषी हैं तो ईमानदार कहलाने वाला खुद बाहर है और कोई दोष उसके सर नहीं है। मेरी नज़र में उसका गुनाह अधिक बड़ा है। और की चोरी चोरी और आपकी की चोरी मज़बूरी , ये समझने लगे तो हर कोई अपराधी होने का अधिकारी बन सकता है। ईमान जान से बढ़कर होता है। ऐसी जान जीना तो मौत से बदतर है। ज़मीर ज़िंदा रहना ज़रूरी है।

                          पश्चाताप और प्रायश्चित 

 आगे दिखाया गया कि आत्मग्लानि के कारण चौकीदार अपनी नौकरी छोड़ जाता और मज़दूरी करने लगता है। वास्तव में कहानीकार अपने नायक को खलनायक नहीं बताना चाहता। अगर कोई वास्तव में ऐसा करेगा तो यही समझा जाएगा कि कहीं उसका फ्लैट से चोरी के पैसे चुराना सब को पता नहीं चल जाये इस डर में जीने से घबरा कर भाग गया। इधर लोग बैंक के पैसे को लूटने को जैसे बड़ा अपराध ही नहीं मानते। ये कहीं लेखक कोई और बात तो नहीं कहना चाहता इशारे  इशारे में। चौकीदार भी है जो पकड़ा नहीं गया है और बैंक को लूटने वाले भी लूट कर कहीं छुपे हुए हैं। आप उनकी मज़बूरी दिखला सकते हो कि क़र्ज़ चुकाने को पैसे नहीं थे बेचारे भाग गए तो क्या गुनाह किया। आपका मेरा पैसा तो नहीं था और बैंकों को भरपाई करने को सरकार और हमारा चौकीदार है ही। चौकीदार माल उड़ा रहे हैं वास्तव में मगर किसी मज़बूरी में नहीं। रोज़ पता चलता है चैन स्नैचिंग और कार छीन कर भागने वाले अपनी नशे की आदत और आपराधिक कार्यों की खातिर करते हैं ऐसा रोज़। ये कैसा ईमान कैसी ईमानदारी है , राजा हरीशचंद्र को भूल गये हो या उसे गलत साबित कर रहे हो। झूठ की महिमा का कैसा बखान है। बाहर सच लिखा है भीतर सब झूठ ही झूठ बंद कर बिकता है। 
   

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