Saturday, 23 June 2018

25 जून 1975 से 25 जून 2018 तक 43 साल बाद ( विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

25 जून 1975 से 25 जून 2018 तक 43 साल बाद ( विडंबना )              

                                  डॉ लोक सेतिया 

         अभी अभी आज 24 जून की सुबह जब मैं सैर करने गया तो पुलिस के कुछ लोगों को 43 साल पहले जे पी के सन्देश की बात कही। 25 जून 1975 को मैं उपस्थित था रामलीला मैदान दिल्ली की सभा में। ये विडंबना ही है कि गांधी जी और जे पी जी से कोई सबक सीखा नहीं उन्हीं के अनुयाईओं ने। इतिहास को ध्यान से देखो तो लगता है हम अभी उसी मोड़ पर खड़े हैं। राहगीरी नाम से इक तमाशा जी टी रोड पर किया जा रहा है सड़क किनारे लोगों को रोककर बैरिकेड लगाकर मुख्यमंत्री के लिए। इसे कहा जा रहा हम जनता से सम्पर्क करना और वी आई पी कल्चर खत्म करना चाहते हैं। यही तो है वो कल्चर। ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए। एक नेता के आने पर इतना धन इतना सब बर्बाद झूठी शान दिखाने को , आम नगरिक को असुविधा देकर जनता की सेवा का दावा। जिनको मिलना हो भीख की तरह मांग पत्र देकर या फिर जनता के खुद के पैसे से कोई काम करने पर धन्यवाद करने को उन्हें पांच एकड़ बैंक्विट हल जाकर मिलना चाहिए पहले इजाज़त लेकर। सत्ताधारी दल वाले जब चाहे मिल सकते हैं। मैं अख़बार लेने गया था तमाशा देखना पसंद नहीं है। मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं , मैंने इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं। दुष्यंत कुमार के सिवा कैसे समझाई जाये बात। लोग खड़े थे ताली बजाने को। इक डॉक्टर दोस्त से बात की जे पी का सन्देश बताया तो हंसकर बोले , भाई आप तजुर्बेकार हो कथनी और करनी में अंतर होता ही है सरकार और नेताओं की। ये अपने दल की सरकार का बचाव नहीं था , ये बताता है सत्ताधारी दल में नेता और आगामी चुनाव में टिकट के दावेदार भी अपनी सरकार और उसकी नीतियों पर क्या राय रखते हैं। मुझे ख़ुशी है उनमें सच स्वीकार करने का साहस तो है। 
             कल रात ही मैंने खुला खत मेल से भेजा है सी एम और आला अधिकारीयों और सभी अख़बार वालों को , जिसमें कहा है कि आपका इम्तिहान है कि दो दिन पहले जिस गंदगी और गंदगी फ़ैलाने वालों को रोका गया राहगिरी में मुख्यमंत्री के आने पर क्या रविवार के बाद भी यही सब रहेगा साफ सुथरा। अगर नहीं तो फिर सरकार नहीं है भ्र्ष्टाचार का कारोबार है। जी ये बात भी जे पी की कही हुई लगती है। आज इनको जय प्रकाश नारायण याद नहीं हैं क्योंकि उनके नाम पर वोटों की राजनीति हो नहीं सकती अन्यथा इक बुत और बनाते करोड़ों रूपये खर्च कर। अच्छा है जो नहीं हुआ ऐसा , जिस जननायक ने कभी किसी भी देश के या विदेश में बड़े बड़े पदों की ऑफर को स्वीकार नहीं किया हो और जनता के बीच रहना पसंद किया हो उन्हें ये स्वीकार नहीं होता। काश आज कोई ऐसा जे पी जी जैसा बचा होता जो जनता की आवाज़ भी बनता और जो सैंकड़ों डाकुओं को भी शांति की राह पर लेकर आत्मसमर्पण करवा सकता।

1 comment:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, वीरांगना रानी दुर्गावती का ४५४ वां बलिदान दिवस “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !