Thursday, 12 April 2018

उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

          उपवास भी उपहास भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  सरकार भी उपवास पर , विपक्षी दल भी उपवास पर। जनता का उपवास हमेशा से रहा है। ज़रूर किसी डॉक्टर या वैद ने सलाह दी होगी। बहुत खा चुके पहले वाले भी छप्पन भोग अब छोले भठूरे खा रहे हैं। आप भी न खाऊंगा न खाने दूंगा कहकर आये थे , और कितना खाओगे चार साल में जनता के धन पर खूब ऐश आराम किया अब एक दिन तो उपवास रख लो। सेहत के लिए अच्छा है। उपवास की परिभाषा कभी किसी को समझ नहीं आई। कोई फलाहार करता है कोई नमक नहीं खाता तो कोई पानी की एक बूंद तक नहीं पीता है। पंडित जी बताया करते हैं किस दिन का उपवास क्या फल देता है। इक बात पक्की तरह तय है कि हर उपवास फलदायी होता है। मैंने भी कभी मंगलवार के उपवास रखे थे और जब शाम को एक बार खाना होता था तो परांठे और मलाई में शक़्कर मिलाकर खूब पसंद से भरपेट खाता था , नतीजा मेरा वज़न और अधिक हो गया तो बंद करना पड़ा। मुझे समझाया गया कि हर दिन थोड़ा खाना उचित है , न एक दिन अधिक खाना सही है न ही एक दिन उपवास रखना ही। लोग उपवास अकारण नहीं रखते हैं। महिलाएं पति की लंबी आयु चाहती हैं ताकि खुद सदा सुहागिन रहें। सत्ता की कुर्सी की बात अलग है वो कभी विधवा नहीं रहती , इक शासक जाता है तो दूसरा उस पर बैठ कुर्सीपति हो जाता है।
     नेता कभी भूखे नहीं रहते मगर उनकी भूख कभी खत्म भी नहीं होती है। इनकी भूख रोटी की नहीं होती है सत्ता की शासन की भूख होती है। सत्ता मिलते ही सब कुछ खा जाते हैं चारा खाते हैं दलाली खाते हैं और इंसान और इंसानियत तक को बिना डकार लिए हज़्म कर जाते हैं। सब से पहले सच को खा जाते हैं ज़िंदा ही। कोई भी उपवास हो उस में सत्य का आचरण और झूठ नहीं बोलना ज़रूरी होता है। सत्ताधारी दल में सभी को इस बात की चिंता है कि उनका महान नेता कहीं उपवास में अपनी झूठ बोलने की कला को छोड़ सच नहीं बोलने लगे। इसी डर से इक मुंहलगे ने चेतावनी की तरह कह ही दिया सरकार आप उपवास नहीं रखें तो चलेगा क्योंकि सब जानते हैं आप कितने बड़े झूठे हैं और उपवास में झूठ नहीं बोलना होता है। हंस दिये नेता जी , कहने लगे तुम लोग हर बात को सीरियसली ले लेते हो। हमारा उपवास खुद ही झूठा है तो झूठ बोलने नहीं बोलने से क्या अंतर होगा। आज लोकतंत्र को खतरे की बात हम कर रहे हैं जबकि लोकतंत्र को खतरा कभी विपक्षी दलों से नहीं होता है। सत्ताधारी सत्ता नहीं छोड़ना चाहता तभी खतरा होता है। मुंहलगे ने कहा मुझे यही तो डर था जो सच होता लग रहा है जो आप सच बोल रहे हैं कि डेमोक्रेसी को खतरा आपसे है। नेता जी फिर हंस दिए , बोले तुम को इतना भी नहीं मालूम मैं जनता हूं किस जगह झूठ को सच कैसे साबित करना है। उपवास राजनीति में छल ही होता है , हमारे लिए वास्तविक उपवास तभी होता है जब हम सत्ता के भूखे होते हैं। तुमने स्वच्छ भारत अभियान नहीं देखा , हम झाड़ू लेकर सफाई करते दिखाई दिए थे तो क्या हम वास्तव में गंदगी साफ करने लगे थे। हमारी हर योजना यही है बिना कुछ किये सब कर दिया दिखलाने वाली।
               अभी जनता को समझाना है उसे भी भूखे रहने का मज़ा लेना चाहिए हमारी तरह। अभी हमारी ऐप बनी नहीं है जिस से सभी को रोटी स्मार्ट फोन पर खुद डाउनलोड करते मिल सकेगी। तब तक लोग उपवास रख सकते हैं। मैंने पहले भूल से पचास दिन मांगे थे सब ठीक करने को , मगर इस बार पचास साल की बात कहनी है। पहले दूसरे दल को पचास साल मिले अब हमारी बारी है। मुंहबोले का मुंह खुला रह गया। कल तक 2022 की बात करते थे अब पचास साल की करते हैं , जाने क्या इरादा है जनाब का। शायद आधे घंटे के उपवास में भूख ने सोचने समझने का संतुलन बिगाड़ दिया है। उसकी मन की बात समझ गए मन की बात करने वाले , कहने लगे ये सब तो हंसी मज़ाक की बात है तुम चिंता नहीं करो। ये उपवास भी उपहास है जान कर वो खिसिया कर हंसने लगे।

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