Friday, 23 March 2018

मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        कब से सुनते आ रहे थे कि आजकल कलयुग है , लेकिन वास्तव में सब कुछ अगर अच्छा नहीं भी लगता था तो उतना भी बुरा नहीं लगता था। कुछ अच्छा कुछ बुरा भी वास्तविक जीवन में दिखाई देता था। फिल्मों की कहानियों में ही देखते थे कोई देवता है तो कोई दानव खलनायक है। मगर इसके बावजूद हमने उन से भी लगाव महसूस किया और पसंद किया जो खलनायक नज़र आते थे। अभिनय में तो नायक से अधिक शोहरत खलनायक को मिलती देखी है शायद इसका कारण हम सभी में इक खलनायक छुपा होना हो सकता है। लेकिन इक ख़ास बात होती थी कि लोग हमेशा पुराने ज़माने को बेहतर बताया करते थे , हम उस युग के लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन काल में बहुत बदलाव देखे हैं। गांव में मीलों तक पैदल चलते थे पगडंडी पर कोई सड़क नहीं होती थी , बैलगाड़ी से साईकिल तक लंबा सफर तय किया है हमने। इक प्राथमिक विद्यालय जिस में पांचवी तक एक ही अध्यापक शिक्षा देता था और आज तक भी उन मास्टरजी का नाम हर गांववासी आदर से लेता है। वहां से बिजली सड़क बस स्कूटर कार से हवाईजहाज़ तक सब को देखा है और रेडिओ से टेलीविज़न के बाद मोबाइल फोन और स्मार्ट फोन और कम्प्यूटर लैपटॉप तक ही नहीं अंतरिक्ष तक सब के गवाह हैं हम लोग। इन सब में शहरीकरण के हवा पानी ही नहीं इंसान की मानसिकता तक के प्रदूषित होने को भी सामने देखा है। सब से अच्छी बात ये है कि हमने देश के आज़ाद होने के बाद जन्म लिया और हमारी मानसिकता गुलामी की नहीं रही लेकिन देश में लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही परिवारवाद से जातिवाद तक सब हमने देखा है और झेला ही नहीं उसके साथ जंग भी लड़ते रहे हैं। 
       जब सालों तक सभी दलों की सरकारों को बनाकर बदलकर भी नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा तो जनता ने मान लिया था कि इस देश में कुछ नहीं हो सकता है। मगर तभी किसी ने घोषणा कर दी कि केवल उसको ही जहन्नुम को जन्नत बनाने का तरीका आता है और अगर उसको जनता ने अपना सेवक चुन लिया तो वह खुद शासक की तरह नहीं रहेगा पहले वाले नेताओं की तरह बल्कि सेवक बनकर इस देश को नर्क से स्वर्ग बना देगा। खुद उसको भी भरोसा नहीं था कि उसका हर जुमला लोगों पर जादू सा काम करेगा और उसको उम्मीद से बढ़कर बहुमत मिलेगा। मगर उसे याद ही नहीं रहा क्या क्या सपने दिखलाये थे देश की जनता को तो उन वादों को पूरा करने की बात ही क्यों होती। लेकिन फिर उस ने देश और जनता की भलाई के नाम पर वो सब और भी अधिक बढ़कर किया जिसकी पहले उसी ने आलोचना की थी। उसका हर बोला गया झूठ सत्य घोषित किया जाने लगा और जन्नत बनाने की बात तो इक उपहास बना दी गई। कुछ इस तरह से समझाया गया कि आप लोग इतनी सी बात नहीं जानते कि जन्नत मरने के बाद मिलती है। तब से कितने लोग किन किन हालात में मर गए या मरने को विवश हुए कोई हिसाब नहीं। जो सब के हिसाब पूछता था खुद उसको अपना हिसाब किसी को देना नहीं ज़रूरी लगा। 
                       पांच साल की अवधि मिली थी लेकिन आधी अवधि बीतने के बाद देश की जनता पहले से बहुत अधिक बदहाली में खुद को पा रही थी और तब उसको अगले चुनाव की चिंता सताने लगी। ऐसे में लोगों को समझाया जा रहा है कि अभी जो आपको दर्द लगता है बाद में वही आपकी दवा का काम करेगा। ये तो शायरी की बात हो गई , दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना। फिर ये और शोर उत्तपन पैदा किया गया कि अभी चार साल बाद सब बढ़िया होने वाला है , बस 2022 तक सब्र करो अगर ज़िंदा बचोगे तो यहीं अन्यथा और किसी जहान में जन्नत तो मिलनी ही है। कुछ उसी तरह जैसे गंगा तट पर पण्डे यजमान की जेब खाली कर उनके पूर्वजों का कल्याण करने की आड़ में खुद अपने लिए धरती पर स्वर्ग पाते हैं लेकिन उनकी संतान कभी किसी दूसरे को पूर्वजों के कल्याण करने को कुछ नहीं देती हैं। आपको यकीन नहीं तो जाकर पूछना कभी। मगर कुछ दिन पहले इन्हीं नेता जी को पूजा करवाते इक भोले पंडित ने गलती से पूछ ही लिया यजमान आप को क्या वास्तव में जहन्नम को जन्नत बनाने का तरीका आता है। तो जवाब मिला ये राज़ की बात है किसी और को नहीं बताना। अभी तक लोग सोचते थे कि कलयुग है मगर उन्होंने कभी कलयुग की कल्पना नहीं की थी। आजकल उनको समझ आ रहा है यही घोर कलयुग है , मगर उनको इतनी बात भी नहीं पता कि कलयुग में राज कलयुगी लोग ही करते हैं , तभी तो हमारी सरकार ने अभी अभी देश की सब से बड़ी अदालत में बताया है कि हमारा संविधान अपराधियों को राजनितिक दल बनाने ही नहीं किसी दल का अध्यक्ष बनने की भी इजाज़त देता है। जब दल का अध्यक्ष अपराधी होगा तो भले खुद चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हो तब भी अपने संगी साथी अपराधियों को टिकट तो वितरित कर सकता है। 
        इस कथा का अंत रोचक है। नेता सेवक हैं तो टीवी और अख़बार वाले खुद को लोकतंत्र का रक्षक या रखवाला अर्थात चौकीदार बताते हैं। ये जनाब भी खुद को चौकीदार बनाने की बात करते थे और बन बैठे मालिक और दाता भी कहलाने लगे , ऐसे में मीडिया के चौकीदारों को हिस्सा देकर भाई भाई बना लिया। मौसेरे भाई चोर चोर होते ही थे आजकल चैकीदारी थानेदारी बन गई है तो रिश्ता और गहरा हो गया है। 

                      हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ,

                     दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है।


1 comment:

sanjay dayalpuri said...

बहुत बढ़िया व्यंग्य👌👍