Saturday, 31 March 2018

सबको करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) लोक सेतिया -भाग 2

सबको करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) लोक सेतिया 

                    सुनहरे रंग के चेक     {  भाग 2  }

  अच्छे दिन आने वाले थे और आये भी मगर उन्हीं के अच्छे दिन आये जिनकी किस्मत अच्छी थी। कुछ लोग ज़मीन से सीधे आसमान में पहुंच गए। कोई काबलियत नहीं कोई जनता से मतलब भी नहीं बस एक ही आधार था किसी व्यक्ति और उससे ही संबंधित संस्था का सदस्य होना। बाकी कोई भी सत्ता पर आसीन व्यक्ति को भरोसे के काबिल नहीं लगा। जो परिवारवाद को बुरा बताते थे उनको अपने घर से बाहर का कोई भी पसंद नहीं आया देश के सब बड़े बड़े पदों पर और राज्यों की सत्ता   पर बिठाने को। कठपुतलियां चुन चुन कर देश के संविधान और जनतंत्र को भुला दिया गया। इससे अच्छे दिन उनके कैसे हो सकते थे। नसीब बदलता है यही होता है। जनता की बदनसीबी कभी खत्म ही नहीं होती। जनता किसी शायर की ग़ज़ल का इक शेर दोहरा सकती है। 
    " तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।
लेकिन आप निराश नहीं हों , आखिर उनको याद आ ही गया है कि फिर से जनादेश लेने का समय अगले ही साल आने वाला है। अच्छे दिन की हांडी काठ की दोबारा नहीं चढ़ाई जा सकती। ऐसे में जनता को ही लालच देकर बहलाया फुसलाया जा सकता है और तीन साल और मांगे जा सकते हैं उन सब कामों के लिए जिनको पांच साल में पूरा करना था मगर शुरुआत तक नहीं हुई बल्कि ऐसे बुरे दिन आये हैं कि पहले वाले दिन भी लगता है ऐसे बुरे तो नहीं थे। इस बार अच्छे नहीं सुनहरे दिन लाने की बात की जा रही है और उन सुनहरे दिनों के सपने पर यकीन दिलवाने को करोड़ करोड़ रूपये का सुनहरी चमक वाला चेक सभी को तीन साल बाद भुगतान की तारीख डालकर बांटने की योजना है। 
           आप खुश हो सकते हैं कि अभी तक जनता का वोट शराब की बोतल या साड़ी और थोड़े नकद पैसों से खरीदते थे नेता अब उसी को और ढंग से किया जायगा ऊंचे दाम देने का वादा कर के। जिन लोगों के करोड़ों नए बैंक खाते खुलवाए गए थे और बाद में आधारहीन तरीके से उनको आधार देते रहे फिर उन्हीं पर ये आरोप भी उछालते रहे कि गरीबों के खातों में काला धन हो सकता है। ऐसे में वही लोग फिर से झांसे में आसानी से नहीं आने वाले और भारतीय रिज़र्व बैंक की लिखी इबारत पर विश्वास नहीं करेंगे ये समझ कर सुनहरे चेक विश्व बैंक एयर आईएमएफ से प्रमाणित होंगे। 
          जाल बुना जा चुका है और बिछाने की तैयारी है। कल सुबह पहली अप्रैल को नई योजना की घोषणा करने पर मंथन चल रहा है। कोई कह रहा है यही अवसर है ताकि बाद में कोई कुछ बोल भी नहीं सकेगा जब समझेगा कि अप्रैल फूल बनाया गया था। लोग मूर्ख बनते रहे हैं मगर कभी खुद को मूर्ख बनाने की बात मानते नहीं हैं। मगर दूसरे कुछ कहते हैं ऐसा करने पर लोग नहीं फंसे तो खुद हम ही फूल बन जायेंगे चुनाव में। और तीन साल गुज़रते पता नहीं चलता कुर्सी के मद में लेकिन किसी तरह लोग फिर से बहक भी गए लोभ में तब भी तीन साल बाद चेक का भुगतान कौन करेगा कैसे करेगा। जाल बुनने वाला मुस्कुराते हुए समझाता है यही तो राजनीति में चुनावी रणनीति होती है। अभी चुनाव जीतना लक्ष्य है आगे की बाद में देखते हैं। इतना चमकीला चेक वो भी करोड़ रूपये लिखा हुआ अच्छे अच्छों की मति मारी जाती है। पंछी दाना चुगने आएगा और जाल में फंस छटपटायेगा फिर पिंजरे में खैर मनाएगा। भोलेनाथ का बंदा कभी नहीं समझ पायेगा कि भविष्य क्या क्या नहीं दिखलायेगा। तीन साल तक संभाल कर रखेगा मगर ये सपने में भी नहीं सोच पायेगा कि जिस दिन भुगतान लेने को बैंक में जमा कराएगा बैंक अधिकारी ध्यान दिलवाएगा। किसी के हस्ताक्षर तो हैं ही नहीं चेक पर सुनकर घबराएगा। तब गलियों में शोर मचाएगा और सरकार की शरण में आएगा। सरकार बहलायेंगे कि गलती से खाता नंबर और हस्ताक्षर अंकित नहीं हुए मगर भूलसुधार किया जा सकता है। अपने चेक इक ख़ास ऐप पर बदल सकते हैं और नया सुनहरी चेक ऑनलाइन निकलवा सकते हैं। लोग सरकार की बात मान जायेंगे और जब नया चेक मिलेगा तो चकरायेंगे कि उस पर कई और साल बाद ब्याज सहित भुगतान की शर्त पाएंगे और उसे पहले ही स्वीकार कर लिया था भी पढ़कर सब जान जाएंगे। भागते चोर की लंगोटी को घर लेकर आएंगे और अपने वारिसों के नाम वसीयत लिख कर मर जायेंगे।
             कितने बाप दादा की बात भूल ही जायेंगे जो याद रख लेने भुगतान जाएंगे तब वास्तविकता जान पाएंगे। कोई बैंकवाले मरे हुए के हस्ताक्षर करवाने की बात से डरायेगा तो कोई राज़ की बात और रहस्य से पर्दा उठाएगा। जिस अधिकारी के हस्ताक्षर हैं विभाग ने कब का उनकी जगह नया अधिकृत किया था और समय पर उनसे हस्ताक्षर करवाने थे। अब इस चेक की उपयोगिकता केवल फ्रेम में जड़वा कर घर पर सजाने को टांगने की रह गई है। सभी सुनहरे फ्रेम में सुनहरी चेक जड़वा कर इतरायेंगे करोड़पति कहलायेंगे।
 
  

Friday, 30 March 2018

सब को करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया ( भाग एक )

 सब को करोड़पति बनाएगा गुलाबी धन ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

                            ( भाग एक )

सब मिलकर वही पुराना गीत गाया करेंगे , ऊपर वाले तेरी दुनिया में कभी जेब किसी की न खाली रहे। कोई न गरीब रहे जग में हर पॉकेट में हरियाली रहे। सच कहता हूं सुबह सवेरे उठते इस से अच्छा भजन मुझे कोई नहीं लगता। सब की भलाई मांगना , सब का साथ सब का विकास , सब लोग इक समान बराबर। यही आदर्श स्थिति है , कल ही अन्ना हज़ारे जी ने उपवास त्याग दिया इतनी जल्दी तो उसमें राज़ की बात यही है। जिस तरह से अचानक नोटेबंदी की घोषणा की गई थी उसी तरह से पहली अप्रैल को कालाधन और सफेदधन का भेदभाव खत्म कर दिया जायेगा। इंडिया में काले गोरे का भेद नहीं कर किसी से अपना नाता है , कुछ और न आता हो हमको हमें प्यार निभाना आता है। है प्रीत जहां की रीत सदा मैं गीत उसी के गाता हूं , भारत का रहने वाला हूं भारत की बात सुनाता हूं। गांधी जी से लेकर अभिनेता मनोज कुमार तक सभी महात्मा लोग हर देशवासी के लिए रोटी कपड़ा और मकान चाहते थे और उपकार की बात लालबहादुर शास्त्री और मनोजकुमार ने मिलकर समझी थी तभी जय जवान जय किसान का नारा पॉपुलर हुआ और देशभक्ति हमेशा हिट रही है। वास्तव में देशभक्ति से सुरक्षित कोई कारोबार नहीं है , जिस को इसका कारोबार समझ आ गया वही जनता के दिलों पर छा गया। 
        आपका सभी देशवासियों का इंतज़ार खत्म होने को है। पहली अप्रैल को भारत सरकार घोषणा करने वाली है कि उसी दिन से कालेधन और सफेदधन की बात करना भी मना होगा। उस अध्याय को ही बंद कर दिया जायेगा और सारा का सारा धन गुलाबी धन कहलायेगा। नया ज़माना आएगा नया ज़माना आएगा। फिर वही दृश्य सामने आएगा , अभिनेत्री हेमामालिनी गाती होगी और अभिनेता धर्मेंद्र सुन कर मुस्कुराएगा। उसकी किताब खलनायक ने अपने नाम छपवा ली तो क्या हुआ , अपनी चोरी की बात भूल खलनायक की बहन से इश्क़ लड़ायेगा। आप सब बेचैन थे असली आज़ादी समानता और सब लोगों की ज़िंदगी खुशहाल बनाने वाले सपनों जैसे अच्छे दिन क्यों नहीं आये हैं। चार साल से जिसकी चाहत सभी करते आये हैं। लो देखो जनाब आपके लिए क्या क्या नहीं लाये हैं। 
          सरकार अपना वादा निभाने जा रही है , इक सुनहरे रंग का लाखों का नहीं करोड़ करोड़ रूपये का चैक सब को भिजवा रही है। सदी के सब से बड़े महानायक कहलाने वाले के हस्ताक्षर वाला चैक छपवा सीधे सब के खाते में भिजवा रही है। देखो देश की जनता मध्यम सुर में गुनगुना रही है। गुलाबी धन की सुंदर करंसी घर घर आ रही है , बेटी नहीं पढ़ी लिखी तो क्या हुआ , चेहरे पर गुलाबी आभा छा रही है। वो देखो वो आ रही है ये देखो वो जा रही है। पूरी तैयारी हो चुकी है इस बार नोटेबंदी जैसी चूक नहीं होगी , किसी ज़माने में सरकार बांड के रूप में प्रमाणपत्र जारी किया करती थी , इधर उसका चलन नहीं रहा है , अब तो टीवी पर खेल खेलते खेलते महानायक आपका पैसा आपने खाते में भिजवा देते हैं। ये बहुत सुरक्षित है जल्दी हो जाता है और आसान भी है समझाते हैं। जिस तरह सिंगापूर की सरकार ने हर नागरिक को सौ डॉलर से तीन सौ डॉलर देने की घोषणा की है ठीक उसी तर्ज़ पर पहली अप्रैल से शुरू होने वाले वित वर्ष में सब करों को , जी बिल्कुल ठीक पढ़ा आपने सभी करों को , आयकर से जी एस टी तक सबको समाप्त करने का ऐलान करने जा रही है। सब को घर बैठे करोड़पति बनवा रही है इक सुनहरी रंग का चैक बंटवा रही है। 
       ( अभी इतना ही बाकी की रचना कल पहली अप्रैल को लिखी जाएगी )
शेष भाग कल के अंक में ,,,,,,, इंतज़ार करियेगा।

Thursday, 29 March 2018

शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे - डॉ लोक सेतिया

   शोर की ख़ामोशी , रौशनियों के अंधेरे -  डॉ लोक सेतिया 

    कोई अजनबी बाहर से आये तो ये सब देख कर समझेगा कि लोग बेहद खुश हैं जो इतना संगीत का शोर है नाच गाना और मंच से बहुत अच्छी लगती बातें सुनाई दे रही हैं। बीच बीच में मंच संचालक निवेदन करता रहता है अमुक के लिए ज़ोरदार तालियां हो जाएं। आपको क्या लग रहा है मैं कुछ सोच कर लिखने बैठा हूं , जी नहीं मैं आपको वही बतला रहा हूं जो मुझे सामने दिखाई और सुनाई दे रहा है। इस बीच पंजाबी भंगड़ा शुरू हो गया है , यहां बहुत कुछ एक साथ हो रहा है। बताया जा रहा है कि ये पुलिस प्रशासन जनता से सम्पर्क कर रहे हैं , मगर जनता कहां है कोई नहीं जनता क्योंकि मंच पर सरकारी अधिकारी और कुर्सियों पर कुछ सत्ता से जुड़े लोग शोभा बढ़ा रहे हैं। जनता है मगर सार्वजनिक पार्क में सैर करने आई इस सब को इस नज़र से देखती है जैसे ये भी गली से गुज़रती बारात हो चाहे कोई अर्थी निकल रही हो उसको देखती है बिना ख़ुशी बिना ग़म की भावना के। थोड़ी देर बाद यहां सब सामान्य सा हो जायेगा। कुछ भी नहीं बदलेगा , पहले भी ऐसा किया गया था यहीं बाहर सड़क पर पिछले साल इस बार सड़क से पार्क तक का फासला तय हुआ है। अभी नगरपरिषद के लोग केवल सामने दिखाई देती गंदगी को साफ़ कर रहे हैं , जो छुपी हुई है या थोड़ी दुरी पर ढेर लगे हैं गंदगी के उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। भंगड़ा हुआ तो कोई अधिकारी भाषण देने लगे हैं , ये वही हैं जो कल तक ही नहीं हर दिन अपने पास फरियाद करने और न्याय की आस लेकर आये नागरिक के साथ गाली गलौच की भाषा में ही बात करते हैं। कोई महिला भी पास हो तब भी इनको शर्म नहीं आती। आज जाने कहां से इतनी अच्छी भाषा सीख कर आये हैं , संचालक ज़ोरदार तालियां कहता है मगर तालियों की आवाज़ सुनाई देती नहीं है। सभाओं में तालियां बजाने को भाड़े पर नेता लाते हैं लोगों को , हर कोई ताली बजाना पसंद नहीं करता है। स्कूल के बच्चे क्या गीत सुना रहे हैं मालूम नहीं , उन्हें तो जो याद करवाया जाता है वही बालदिवस से लेकर सभी दिनों दोहराते हैं। ये सरकारी आयोजनों में मंगवाए जाते हैं बाकी सामान की तरह। इस से अजीब बात क्या हो सकती है कि जिन को कभी देश का भविष्य कहते थे उनको अपने हर आयोजन में इक वस्तु की तरह उपयोग किया जाता है। जी याद आया सर्वोच्च अदालत इस पर आपत्ति जता चुकी है मगर सरकारों और अधिकारीयों के कान पर जूं नहीं रेंगती है। बच्चे गए गीत सुना कर मगर मंच संचालक को तालियां बजवाना याद नहीं रहा। इधर जो महोदय बोल रहे हैं उनकी आवाज़ कानों को खटकती सी लगती है और कोई समझ नहीं पा रहा मतलब तक उनकी बात का। अभी इंतज़ार करने को कहा जा रहा है किसी मशहूर गायक का नाम लेकर। चलो इक मधुर स्वर कोई गायक का रिकॉर्डेड बजाया जा रहा साथ कोई नाच रहा है। गिध्धा हो रहा है , सब कुछ मिला जुला है। ये मनोरंजन भी अपनी तरह का है जो अपने मकसद को नहीं समझा पा रहा। 
        लो बीच में रोक दिया गया नाच गाना किसी ख़ास व्यक्ति के आने पर उनको आदर देने की बात और अब आते ही उन्हें अपनी बात कहनी है। ये सब अभी साथ साथ चल रहा जब मैं लिख रहा हूं , मुझे घर के सामने पार्क में होने वाली हर सभा का आनंद भी मिलता है और यही शोर और कोई काम भी नहीं करने देता। रात को ही पास में कोई जगराता था जिसने रात भर जगाये रखा या फिर सोने नहीं दिया। लेकिन इस बीच तालियों की मांग के साथ किसी का परिचय करवा रहे हैं। मुझे इक बात वास्तव में नहीं समझ आ रही कि इस तरह से पुलिस का आम लोगों से सीधा संवाद कैसे हो सकता है जिस का दावा सरकार और प्रशासन करते हैं। ये आसान रिवायत सी बन गई है जनसम्पर्कं का दिखावा करते हैं मगर जन से कोई वार्तालाप नहीं होता। अभी पहली अप्रैल दो दिन बाद है फिर अभी से मूर्ख बनाने का अभियान क्यों। दमा दम मस्त कलंदर गीत सुनाई दे रहा है , इतनी जल्दी दृश्य बदलता है कि समझना कठिन हो गया है क्या आगे होने वाला है। जिस तरह आजकल शादी में तमाम तरह के पकवान परोसे जाते हैं। स्टाल बदल रहा है और फिर हारमोनियम बज रहा है , मुस्कुराने की वजह तुम हो , कोई गा रहा है मधुर सुर में , ओ पिया रे , पिया जाने ना जाने ना। बस दो मिंट में कुछ और ये क्या हुआ , बहुत कुछ है मगर है कुछ भी नहीं। 
            शायद मंच संचालक को औपचरिकता निभानी है , सब को बताना है कौन कहां से आया हुआ है। इक तमाशा है केवल कोई संजीदा मकसद है ही नहीं , कोई इस पर हंसे कि रोये नहीं पता। शायद सब जानते हैं ये सब किसी मकसद हासिल करने को नहीं है विशेषकर जनसम्पर्क तो कतई नहीं है। जन से कोई मिलता ही नहीं बात करना तो दूर की बात। उपस्थित लोगों से निवेदन किया गया था अपने नाम लिखवा दें वहीं कोई यही काम कर रहा है। बस नाम जान लेने को संवाद नहीं कह सकते हैं। कुछ जलपान की भी बात होगी और कुछ और औपचरिकता स्मृति चिन्ह बांटने की और किसी इक संस्था का आभार जिस ने आयोजन का प्रबंध किया बदले में पैसे लेकर। ये आखिरी तालियां किसी के नाम की , अभी उबाऊ भाषण बाकी हैं। 
         अधूरी बात बाद में पूरी करनी है , घूमर नाच हो रहा है। ये क्या हरियाणा सरकार तो फिल्म पर रोक लगाने की बात करती थी। किसे याद है , तब का मतलब और था आज बिना मकसद है। समय का अभाव है घूमर नाच के बाद मंच संचालक कहते हैं। रुकिए मिलते बाद में। शोर में ख़ामोशी गुम हो गई है और रौशनियों ने आस पास अंधेरों को शायद और बढ़ा दिया है। जारी है कब से यही सब।

   

Wednesday, 28 March 2018

पंजीकरण मूर्खों का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        पंजीकरण मूर्खों का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        इस में कोई शक नहीं है कि पहली अप्रैल को मूर्ख बनाने वाले खुद भी साल भर मूर्खता करते ही रहते हैं। सब से महत्वपूर्ण बात ये भी है कि सभी दलों के नेता हमेशा से जनता को मूर्ख बनाते रहे हैं। लेकिन अब दावे से कहा जा सकता है कि देश की जनता को मूर्ख बनाने में इक नया कीर्तिमान जिस एक नेता न बनाया उसका नाम तक लेने की ज़रूरत नहीं है। जी नहीं डरने की कोई बात नहीं है जिस के सामने दूसरा कोई दिखाई ही नहीं देता और जिसको चुनाव से पहले ही विजेता घोषित किया जा चुका हो उसका मुकाबला किसी से करना उसकी तौहीन होगी और मैं ऐसा नहीं कर सकता। आप फिर गलत समझ रहे हैं भला मुझ लेखक को किसी मानहानि के मुकदमें की क्या चिंता हो सकती है। मैं किसी राज्य का मुख्यमंत्री भी नहीं जो पहले सब पर आरोप लगता रहूं और बाद में माफीनामा देकर पिंड छुड़ाता फिरूं। अब बात असली विषय की। जब सब से अधिक लोगों को मूर्ख बना ही चुका है तो उसको पहली अप्रैल को कोई उपाधि मिलनी ही चाहिए। अब ऐसी उपाधि कोई सरकार तो नहीं दे सकती है और कोई संस्था भी शायद ही मूर्ख बनने बनाने की बात पर ध्यान देने की चिंता क्यों करेगी , सब को तो खुद को समझदार और बाकी लोगों को महामूर्ख समझने का भरम रहता है। इसलिए पहली अप्रैल को इक सभा में सभी मूर्ख मिलकर देश की जनता को मूर्ख बनाने का कीर्तिमान स्थापित करने को उपाधि देनी है और उस सभा में शामिल होने के लिए खुद को मूर्ख घोषित करने को पंजीकरण करवाना लाज़मी है। आप उस के लिए काबिल हैं अथवा नहीं है इस बात का निर्णय खुद आप कर सकते हैं। लेकिन आपको थोड़ा बहुत मार्गदर्शन किया जा सकता है ताकि वास्तविक मूर्ख ही इस शुभ कार्य में शामिल हों और गलती से भी कोई समझदार इस का हिस्सा बनकर उल्लू नहीं बना सके। 
     सदियों से मूर्खताओं पर जानकारी मिलती आई है , ये काम करना पागलपन है , नासमझी है , मूर्खता है सब को बताया जाता रहा है। सच बोलना भी उस में शामिल है और ईमानदार होना भी। ऑफ दा रेकॉर्ड आजकल के नेता आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों को कुछ ऐसा ही बताते हैं , यूं सामने उनको महान बताते हुए भी सोचते हैं मज़बूरी है अन्यथा समझदार तो हम हैं और उन सभी से महान भी। चाह कर भी अपनी ऊंची ऊंची मूर्तियां बनवा नहीं सकते , जिस ने अपने चुनाव चिन्ह की पत्थर की मूर्तियां बनवाईं उसका हाल  भी सब जानते हैं। ये भी कोई  कम पागलपन नहीं है जो देश में लोग बेघर भूखे हैं और हम करोड़ों रूपये समाधियों और मूर्तियों पर बर्बाद करते हैं। लेकिन आप और हम क्या मूर्खता करते हैं या नहीं करते हैं आगे सब से अधिक महत्वपूर्ण विषय की बात करते हैं। 
       समय सब से मूलयवान होता है। अपने वक़्त का हमेशा सार्थक उपयोग किया जाना ज़रूरी है अन्यथा समय बर्बाद करना बहुत बड़ी मूर्खता कहलाता है। क्या आप फेसबुक व्हाट्सऐप ट्विटर आदि पर दिन भर महानता की बातें करते लिखते हैं जिस का आपको पता है कोई भी असर खुद अपने पर ही नहीं होता है। हर दिन गूगल संख्या बताता है इतने करोड़ सोशल मीडिया पर हैं। आपने बहुत काम किये हैं पहले भी , हर बार आपको मालूम है कि इतने साल पढ़ाई की तो क्या क्या हासिल हुआ। कारोबार किया नौकरी की या घर का कोई काम किया सामने नतीजा दिखाई दिया क्या मिला। कभी विचार किया सोशल मीडिया से कुछ और तो छोडो दोस्ती की बात करते हैं कोई वास्तविक दोस्त मिला आज तक। फेसबुक के हज़ारों दोस्त इक संख्या भर हैं वास्तविकता नहीं। हद तो आजकल ये है कि लोग सोशल मीडिया पर आपस में शब्दों की जंग लड़ते हुए मिलते हैं। ये सब से बड़ी मूर्खता है किस के लिए आपस में लड़ते हैं जो किसी के भी नहीं होते हैं। ये राजनीती बड़ी गंदी चीज़ है जो किसी को आगे बढ़ाता है वही उसी को किनारे लगा देता है। राजनेताओं से और बाज़ारू पैसे से बिकने वाली वैश्याओं से वफादारी की अपेक्षा रखना भी मूर्खता ही है। 
         आजकल साधु सन्यासी लोग भी हर जगह हर किसी को कोई उपाधि देते मिलते हैं। हमारे कई नेता जाने क्या क्या उपाधि अपने और अपने बाप दादा के नाम से आगे लिखवाते रहते हैं। हर शहर में हर दो लाइनें लिखने वाला खुद को महान साहित्यकार घोषित करता है। मीडिया वालों की तो बात ही नहीं करो समझते हैं वास्तविक सत्य उन्हीं की दुकान में मिलता है। सब को दर्पण दिखलाते हैं मगर खुद को आईने में देखने का साहस नहीं है। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। आजकल इश्क़ भी नकली हो गया है और दो दिन तो क्या दो घंटे में नया आशिक नई महबूबा होती है। लेकिन वास्तव में इश्क़ भी मूर्ख लोग ही किया करते हैं , चलो अच्छा है देश की सर्वोच्च अदालत ने निर्णय दिया उनके पक्ष में कि खाप पंचायत को बालिग लड़के लड़की के विवाह को रोकने का कोई अधिकार नहीं है। 
            हम अधिकतर देशवासी अभिशप्त हैं मूर्ख बनने के लिए और कोई उपाय नहीं है बचने का भी। लेकिन जो सरकारें जो नेता जो अधिकारी सब को मूर्ख बनाते हैं उनकी मूर्खताएं भी कुछ कम नहीं हैं। हर दिन बेकार के आयोजन आडंबर और ऐसी ऐसी योजनाओं पर आये दिन सभाओं के आयोजन पर करोड़ों रूपये खर्च करते हैं जबकि जानते हैं इनका कोई लाभ नहीं होने वाला है। अपने खुद के इश्तिहार छपवाने और टीवी चैनलों पर दिखलाने पर जितना धन खर्च किया जाता है किया जाता रहा है और किया जाता रहेगा भी उस की राशि की कोई सीमा ही नहीं है। आप कभी हिसाब लगाना या हिसाब पूछना तो हैरान रह जाओगे कि अभी तलक हुए सभी घोटालों की राशि जोड़ने के बाद भी उतनी बड़ी धनराशि का घोटाला नहीं हुआ है जितना केवल सरकारी प्रचार के विज्ञापनों पर सत्तर साल में धन बर्बाद ही नहीं किया गया बल्कि कुछ ख़ास लोगों का मुंह बंद रखने को बेकार जनता का धन लूट की तरह बांटा गया है। अब कोई अख़बार कोई टीवी वाला खुद अपने पेट पर लात क्यों मारेगा। सभी शामिल हैं। हम मूर्ख हैं जो इतनी सी बात कभी नहीं समझे कि कौन कौन किस किस तरह किस किस ढंग से किस रूप में मूर्ख बनाते रहे हैं हमको। शायद मूर्ख दिवस पर थोड़ा चिंतन किसी को मूर्ख बनने से बचा सके। जी मेरा नाम मूर्खों में पंजीकृत है आप भी चाहें तो आवेदन भेज सकते हैं। हमारी शाखाएं नगर नगर गांव गांव ही नहीं गली गली में हैं , पधारें आपका हार्दिक अभिनंदन और स्वागत है।

Tuesday, 27 March 2018

उसकी इसकी आपकी हमारी सबकी बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

उसकी इसकी आपकी हमारी सबकी बात ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

ये कैसे दोहरे मापदंड हैं कि जो सत्ताधारी देश के हर नागरिक की निजता को अनावश्यक मानता है , वो अपनी हर बात को गोपनीय रखता है। आपकी ईमानदारी तब दिखाई नहीं देती जब आप अपने शासनकाल में अपने दल को मिले चंदे की बात देश विदेश से मिले धन की बात और देश भर में चार साल में आपके दल और आपके दल के नेताओं की बढ़ती सम्पति और आमदनी की बात नहीं बताते हैं। सत्ताधारी दल हो चाहे बाकी दल वाले अगर फेसबुक और सोशल मीडिया से डाटा खरीदते हैं तो ऐसे अपराध पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं होता किसी के भी खिलाफ। आपकी हर योजना स्वच्छ भारत अभियान , गंगा की सफाई , जाने किस किस नाम की मगर किसी भी काम की नहीं सरकारी ऐप्स की असलियत और सभी दावे झूठे साबित हुए हैं। फिर भी आपके दल को अगर लगता है कि इक आपके सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं है तो आपके दल के लिए ये कोई गौरव की बात नहीं है। लेकिन आपको ये शायद याद करना होगा कि जब भी कोई खुद को देश से अधिक महत्वपूर्ण समझने लगता है या ऐसा प्रचारित करने लगता है तो इस देश की सवा सौ करोड़ जनता विकल्प खुद ढूंढ लेती है। 1977 का इतिहास भूलना नहीं चाहिए। 
       शायद आज की सरकार को लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी का वो भाषण ध्यान नहीं है जिस में उन्होंने कहा था कि शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करना हर देशवासी का अधिकार है और अगर ऐसा करने पर कोई सत्ताधारी नेता या अधिकारी सुरक्षकर्मियों को दमन या बलप्रयोग का आदेश देता है तो वो अनुचित और असंवैधानिक होगा और सुरक्षाकर्मी देश के लिए निष्ठा रखें न कि सत्ता के लिए जनता का दमन करें। ये मेरी खुशनसीबी है जो मैं 25 जून 1975 को उनकी सभा में शामिल था और मैंने सुना था उनका भाषण। इस से अधिक विडंबना क्या हो सकती है कि मौजूदा सरकार आपत्काल में कैद में रहे लोगों को मुफ्त बस यात्रा और अन्य सुविधाएं देने की बात करने के साथ मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री की सभा में विरोध के लिए काले झंडे दिखाने के लोकतांत्रिक तरीके पर ही जेल में दाल आपराधिक धाराएं लगवा देती है। कोई सरकारी विभाग के अनुचित कार्यों को बढ़ावा देने की बात कहता है तो सच बोलने वाले को प्रताड़ित किया जाता है और अनुचित कार्य करने वालों पर कोई करवाई नहीं की जाती। 
       ये इस देश का दुर्भाग्य है कि अभी भी तमाम लोग गुलामी की मानसिकता से निकल नहीं पाये हैं। और कभी एक कभी दूसरे की चाटुकारिता में कभी किसी को देवी तो कभी किसी को भगवान समझने लगते हैं। सब से पहले तो आप खुद धर्म और भगवान की बातें करने वाले वास्तविक भगवान अल्हा खुदा यीसु या वाहेगुरु को ही इक नेता के बराबर खड़ा कर अपमानित करते हैं। भगवान को किसी से बैर नहीं न ही किसी का पक्षपात करता है और आप किसी को भी जो तमाम महान लोगों से दुर्भावना रखता है , हर किसी को अपमानित करने का प्रयास करता है जो वास्तव में अच्छे इंसान होने का आधार है और खुद अपना गुणगान करवाता है उसे भगवान या खुद को उसका भक्त बताकर कितना अनुचित उदारहरण प्रस्तुत करते हैं। 
       राजनीती में खुद को सौ परदों में छिपाना और विरोधियों को नंगा दिखलाना इक बेहद गंदी सोच को दर्शाता है। सब जानते हैं भगवान से कुछ भी छिपा नहीं है और भगवान चाहता तो बाकी तमाम तरह के चमत्कार करने की तरह ये भी कर सकता था कि सब की छुपाई बातें औरों को पता चल जाएं। मगर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि उसे मालूम था वो इंसान बना रहा है और कोई भी इंसान सब तरह से परिपूर्ण नहीं हो सकता है। इंसान की सब से बड़ी कमी ही यही है कि वो औरों में कमियां ढूंढता है मगर खुद की बड़ी से बड़ी कमी को भी नहीं देख सकता है। ये आजकल की राजनीती उस वैश्यावृति के धंधे से भी नीचे गिर चुकी है जिस के बारे हमेशा से कहते आये हैं ये दो दुनिया के सब से पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। मगर कोई वैश्या भी ऐसा नग्नता का नाच नहीं नाच सकती जिस तरह से आज की राजनीती नाच रही है।

Friday, 23 March 2018

मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मैं जहन्नुम में बहुत खुश था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        कब से सुनते आ रहे थे कि आजकल कलयुग है , लेकिन वास्तव में सब कुछ अगर अच्छा नहीं भी लगता था तो उतना भी बुरा नहीं लगता था। कुछ अच्छा कुछ बुरा भी वास्तविक जीवन में दिखाई देता था। फिल्मों की कहानियों में ही देखते थे कोई देवता है तो कोई दानव खलनायक है। मगर इसके बावजूद हमने उन से भी लगाव महसूस किया और पसंद किया जो खलनायक नज़र आते थे। अभिनय में तो नायक से अधिक शोहरत खलनायक को मिलती देखी है शायद इसका कारण हम सभी में इक खलनायक छुपा होना हो सकता है। लेकिन इक ख़ास बात होती थी कि लोग हमेशा पुराने ज़माने को बेहतर बताया करते थे , हम उस युग के लोग हैं जिन्होंने अपने जीवन काल में बहुत बदलाव देखे हैं। गांव में मीलों तक पैदल चलते थे पगडंडी पर कोई सड़क नहीं होती थी , बैलगाड़ी से साईकिल तक लंबा सफर तय किया है हमने। इक प्राथमिक विद्यालय जिस में पांचवी तक एक ही अध्यापक शिक्षा देता था और आज तक भी उन मास्टरजी का नाम हर गांववासी आदर से लेता है। वहां से बिजली सड़क बस स्कूटर कार से हवाईजहाज़ तक सब को देखा है और रेडिओ से टेलीविज़न के बाद मोबाइल फोन और स्मार्ट फोन और कम्प्यूटर लैपटॉप तक ही नहीं अंतरिक्ष तक सब के गवाह हैं हम लोग। इन सब में शहरीकरण के हवा पानी ही नहीं इंसान की मानसिकता तक के प्रदूषित होने को भी सामने देखा है। सब से अच्छी बात ये है कि हमने देश के आज़ाद होने के बाद जन्म लिया और हमारी मानसिकता गुलामी की नहीं रही लेकिन देश में लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही परिवारवाद से जातिवाद तक सब हमने देखा है और झेला ही नहीं उसके साथ जंग भी लड़ते रहे हैं। 
       जब सालों तक सभी दलों की सरकारों को बनाकर बदलकर भी नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला रहा तो जनता ने मान लिया था कि इस देश में कुछ नहीं हो सकता है। मगर तभी किसी ने घोषणा कर दी कि केवल उसको ही जहन्नुम को जन्नत बनाने का तरीका आता है और अगर उसको जनता ने अपना सेवक चुन लिया तो वह खुद शासक की तरह नहीं रहेगा पहले वाले नेताओं की तरह बल्कि सेवक बनकर इस देश को नर्क से स्वर्ग बना देगा। खुद उसको भी भरोसा नहीं था कि उसका हर जुमला लोगों पर जादू सा काम करेगा और उसको उम्मीद से बढ़कर बहुमत मिलेगा। मगर उसे याद ही नहीं रहा क्या क्या सपने दिखलाये थे देश की जनता को तो उन वादों को पूरा करने की बात ही क्यों होती। लेकिन फिर उस ने देश और जनता की भलाई के नाम पर वो सब और भी अधिक बढ़कर किया जिसकी पहले उसी ने आलोचना की थी। उसका हर बोला गया झूठ सत्य घोषित किया जाने लगा और जन्नत बनाने की बात तो इक उपहास बना दी गई। कुछ इस तरह से समझाया गया कि आप लोग इतनी सी बात नहीं जानते कि जन्नत मरने के बाद मिलती है। तब से कितने लोग किन किन हालात में मर गए या मरने को विवश हुए कोई हिसाब नहीं। जो सब के हिसाब पूछता था खुद उसको अपना हिसाब किसी को देना नहीं ज़रूरी लगा। 
                       पांच साल की अवधि मिली थी लेकिन आधी अवधि बीतने के बाद देश की जनता पहले से बहुत अधिक बदहाली में खुद को पा रही थी और तब उसको अगले चुनाव की चिंता सताने लगी। ऐसे में लोगों को समझाया जा रहा है कि अभी जो आपको दर्द लगता है बाद में वही आपकी दवा का काम करेगा। ये तो शायरी की बात हो गई , दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना। फिर ये और शोर उत्तपन पैदा किया गया कि अभी चार साल बाद सब बढ़िया होने वाला है , बस 2022 तक सब्र करो अगर ज़िंदा बचोगे तो यहीं अन्यथा और किसी जहान में जन्नत तो मिलनी ही है। कुछ उसी तरह जैसे गंगा तट पर पण्डे यजमान की जेब खाली कर उनके पूर्वजों का कल्याण करने की आड़ में खुद अपने लिए धरती पर स्वर्ग पाते हैं लेकिन उनकी संतान कभी किसी दूसरे को पूर्वजों के कल्याण करने को कुछ नहीं देती हैं। आपको यकीन नहीं तो जाकर पूछना कभी। मगर कुछ दिन पहले इन्हीं नेता जी को पूजा करवाते इक भोले पंडित ने गलती से पूछ ही लिया यजमान आप को क्या वास्तव में जहन्नम को जन्नत बनाने का तरीका आता है। तो जवाब मिला ये राज़ की बात है किसी और को नहीं बताना। अभी तक लोग सोचते थे कि कलयुग है मगर उन्होंने कभी कलयुग की कल्पना नहीं की थी। आजकल उनको समझ आ रहा है यही घोर कलयुग है , मगर उनको इतनी बात भी नहीं पता कि कलयुग में राज कलयुगी लोग ही करते हैं , तभी तो हमारी सरकार ने अभी अभी देश की सब से बड़ी अदालत में बताया है कि हमारा संविधान अपराधियों को राजनितिक दल बनाने ही नहीं किसी दल का अध्यक्ष बनने की भी इजाज़त देता है। जब दल का अध्यक्ष अपराधी होगा तो भले खुद चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हो तब भी अपने संगी साथी अपराधियों को टिकट तो वितरित कर सकता है। 
        इस कथा का अंत रोचक है। नेता सेवक हैं तो टीवी और अख़बार वाले खुद को लोकतंत्र का रक्षक या रखवाला अर्थात चौकीदार बताते हैं। ये जनाब भी खुद को चौकीदार बनाने की बात करते थे और बन बैठे मालिक और दाता भी कहलाने लगे , ऐसे में मीडिया के चौकीदारों को हिस्सा देकर भाई भाई बना लिया। मौसेरे भाई चोर चोर होते ही थे आजकल चैकीदारी थानेदारी बन गई है तो रिश्ता और गहरा हो गया है। 

                      हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन ,

                     दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है।


बात सवदेशी की और विदेशी दखल की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

बात सवदेशी की और विदेशी दखल की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  आज शहीदी दिवस है , भगतसिंह राजगुरु सुखदेव को याद करते हुए , महात्मा गांधी के विदेशी सामान को जलाने को भी याद रखते हुए आज फिर से विचार करना होगा क्योंकि इधर हमारी ज़िंदगी ही नहीं हमारी सोच पर भी विदेशी लोग मनचाहे तरीके से प्रभाव डालते हैं। फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने माना ही नहीं बल्कि उस बात की माफ़ी भी मांगी है कि उन्होंने डाटा चोरी या लीक होने दिया या फिर किया। ये कोई छोटी बात नहीं है। पिछले कुछ सालों से सोशल मीडिया पर तमाम लोग किसी नेता या दल की विचारधारा की बात करते हुए अभद्रता की हद तक पहुंच जाते हैं। कोई किसी को चाहता है किसी का समर्थक है तो उसको ये अधिकार नहीं मिलता कि जो कोई उसकी बात से असहमत हो उसको बुरा भला कहे। लेकिन जब बड़े बड़े राजनेता और राजनैतिक दल धनबल से भाड़े के लोगों से सोशल मीडिया पर अपना गुणगान और दूसरों को अपमानित करने का घटिया और निम्न स्तर का खेल करवाते हों तब उनकी निजी महत्वांकाक्षा देश के लोकतंत्र को अपमानित करती है जिस में सत्ता पक्ष को विपक्ष की असहमति का आदर करना ज़रूरी है। आज शायद गांधी जी और भगतसिंह जी दोनों ही एकमत होते कि इक विदेशी को हमारे देश की आज़ादी के साथ खिलवाड़ या छेड़ छाड़ करने पर उसपर रोक लगा दी जाये। 
         आज फेसबुक पर बड़ी बड़ी देशभक्ति की बातें लिखने वाले क्या वास्तव में देश हित को समझ फेसबुक और व्हाट्सऐप का विरोध कर सकते हैं। ऐसा करने में कोई भी कठिनाई नहीं है क्योंकि अधिकतर लोग इनका उपयोग किसी सार्थक काम के लिए नहीं करते हैं और उनके लिए ये केवल समय बिताने और घटिया तरह का मनोरंजन करने का साधन है। विचार किया जाये तो ये सब एकतरफा संवाद है जहां आप जो भी लिखते हैं कोई अपनी असहमति नहीं जता सकता , कोई लाइक कर सकता है मगर कमेंट आपकी अनुमति से ही किया जा सकता है। भारत में बीस करोड़ लोग घंटों अपना समय हर दिन और पैसा भी बर्बाद तो करते ही हैं साथ ही कभी कभी मानसिक रूप से भी असामान्य आचरण करते हैं। जिस तरह दवाओं के दुष्प्रभाव होने पर उसकी ज़रूरत है या नहीं और उपयोग करनी है तो किस मात्रा तक ये देखना होता है उसी तरह इन सभी सोशल मीडिया के माध्यमों पर विचार किया जाना चाहिए।