Saturday, 8 April 2017

शब्द वही हैं अर्थ बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बड़े बड़े पोस्टर सरकारी प्रचार के विज्ञापनों वाले दावा करते हैं आपका देश आपका शहर स्वच्छ हो रहा है , आपके शहर के अधिकारी को उत्कृष्ट कार्य का इनाम भी दिया जा चुका है। अब अगर आप अपने आस पास की बढ़ती गंदगी की तस्वीर उनको दिखाना चाहोगे तो उनको बुरा लगना ही है। आप आंखें बंद नहीं रखना जानते चुप रहना भी नहीं आता तो आप इन लोगों का नया शब्दकोष लेकर पढ़ लो नया अर्थ। इसी हर तरफ फैली गंदगी को आप स्वच्छ भारत अभियान नाम देकर देखो आपको कितनी ख़ुशी होगी। समझ जाओगे अच्छे दिन आ चुके हैं , आपको पता ही नहीं था अच्छे दिन शब्द का अर्थ क्या है। आपका दोष नहीं है आपने कभी देखे ही नहीं थे अच्छे दिन , अब बेशक सोचो इन अच्छे दिनों और उन खराब दिनों में फर्क कहां है। आपने सुना ये नया शासक दिन में अठाहर घंटे काम करता है , क्या काम करता है ये क्यों सोचते हो। अब आपको ये अधिकार थोड़ा है कि आप सूचना के अधिकार में ऐसे सवाल करो कि तीन साल के 1 0 9 5 दिनों में उन्होंने कितनी सभाओं में कितना समय भाषण देने में बिताया , कितने दिन किस किस देश की यात्रा की , किस किस धर्मस्थल क्या क्या दान किया क्या क्या पूजा पाठ किया। भला किस शासक को याद है दरिद्र नारायण की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और शासक अगर अपना फ़र्ज़ निभाता ईमानदारी से तो भगवान अपनी पूजा से कहीं अधिक खुश होता है। आपने तो पद ग्रहण करते देश के संविधान की शपथ ली थी , क्या उसकी याद रही , लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंता कभी की। आप औरों पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले सभी राज्यों में किसी भी तरह अपना शासन कायम करना ही नहीं अपितु हर राज्य में अपने द्वारा मनोनित व्यक्ति को ही सत्ता सौंपते हुए वही सब करने लगे जिस की आलोचना करते थे। शायद आपके शब्दकोश में इसी को संविधानिक मर्यादा का पालन करना कहते हैं। आंतकवाद और कालाधन क्या खत्म हो गया , कितना काला धन पकड़ा आपने , जब खुद राजनैतिक दलों को सब छूट देनी थी तब ये तमाशा किया ही किसलिये। आपके दल के अपराधी भी माननीय हो गये और आप उनका प्रचार उनकी बढ़ाई कर करते रहे। झूठ की परिभाषा तक बदल कर रख दी आपने , बहुत खुश हैं हर तरफ आपकी धूम है। ऐसे में किसी की भूख किसी की चीख आपको क्या सुनाई देगी ,
अब जो ख़ुदकुशी कर रहे या जिनकी हालत बद से बदतर होती गई आपके शासन में , उनको कौन बताये यही अच्छे दिन हैं जो आने वाले हैं का शोर मचाकर आप आये थे। शायद आप भी वही मानते हैं कि जनता कहां याद रखती है क्या वादा किया किस नेता ने , लेकिन आप अभी से दो साल बाद फिर से चुनाव जीतने की चिंता में डूबे हुए हैं। अर्थात सत्ता ही आपका एक मात्र मकसद है , अन्यथा आपको फ़िक्र होती कि तीन साल पहले जो जो करने का संकल्प किया था उसको कितना पूरा किया और कैसे बाकी भी पूरा करना है। अगर सोचते और हिसाब लगाते तो जान पाते अभी कुछ भी नहीं बदला है। आज भी प्रशासन पुलिस सब निरंकुश हैं , आम आदमी आज भी डरा सहमा है , निराश है। आपके सरकारी विज्ञापनों में असली किसानों को वो अभिनेता उपदेश देता है जो खुद किसान कहलाने का झूठा प्रमाणपत्र जालसाज़ी से बनवा लाया था। किसी ने उस से सवाल किया जब जिस प्रमाणपत्र को दिखला आपने लोनावला में ज़मीन खरीदी थी जिसको किसान ही खरीद सकते थे , वही अदालत में फर्जीवाड़ा साबित हुई तो आपकी खरीदी ज़मीन अवैध क्यों नहीं है। याद आया आप शासक जब चाहे किसी अनुचित काम को उचित घोषित कर सकते हो। जैसे कल जिस रिहायशी जगह कारोबार करना गैर कानूनी था आज आपने कुछ पैसे लेकर उसको उचित करार दे दिया। एक दिन देश को संबोधित करते आपने कहा अब कभी काले धन को घोषित करने का अवसर नहीं दिया जायेगा और उसके ठीक बीस दिन बाद इक नयी योजना आधा आधा की ले आये। ये कैसी नैतिकता है क्या मूल्य हैं , आप करो तो पुण्य और करें तो पाप। अच्छा अच्छा ये अच्छे दिनों की तरह बदली परिभाषा है। शिक्षक दुविधा में हैं किस शब्दकोश से बच्चों को अर्थ समझायें , क्या मालूम आपके बाद कोई और आप से बढ़कर निकले और शब्दों के अर्थ क्या शब्द ही नये रचने लगे। लगता है आपको भी कोई नया इतिहास रचना है , ऐसा इतिहास जिस में बस आप नायक बाकी सब खलनायक हों।  लेकिन ध्यान रखना इधर लोग खलनायकों को ही नायक बनाने लगे हैं , मिसाल आपके सामने है। सब फ़िल्मकार यही आदर्श स्थापित कर अमीर बन रहे हैं , जब भगवा धारण कर व्यापार किया जा सकता है तब कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता टीवी शो वाला भी आपका चाहने वाला है , मगर आपको मालूम तो है ना कि ऐसे दोस्त अच्छे नहीं होते जो आपको सच नहीं कह सकते हों। तब वास्तव में कभी भी कुछ भी हो सकता है। चलो शायद कभी नेता अधिकारी भी सच में बदल कर देशसेवक और ईमानदार बन जायें , कठिन तो है फिर भी उम्मीद करने में बुरा क्या है। हो सकता है अच्छे दिन सच को आ जायें , दिल को मज़बूत रखना कहीं ख़ुशी में जान ही नहीं चली जाये देखकर।

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