Saturday, 22 April 2017

झूठ सब का दीन-धर्म है ( आज का समाज ) डॉ लोक सेतिया

अख़बार में इश्तिहार मिला जिस में दावा किया गया है श्री श्री आयुर्वेदा द्वारा नाड़ी परीक्षण और आयुर्वेद चिकित्सा "आर्ट ऑफ लिविंग " बैंगलोर आश्रम से प्रशिक्षित अमुक आयुर्वेदिक चिकत्स्क बिना किसी जांच मात्र दो मिंट में हर रोग का निदान और उपचार इक दवा की दुकान पर आकर करेंगे। इक विज्ञापन टीवी पर आता है बाबा रामदेव का फोटो दिखाते जिस में करोड़ों लोगों पर सफल प्रयोग करने और तमाम देसी जड़ी बूटियों को खोजने की बात की जाती है। बहुत महान कार्य कर रहे हैं ये सौंदर्य प्रसाधन बनाकर महिलाओं को खूबसूरत बनाने में सहयोग कर के। क्योंकि असली रोग तो सब पहले ही योग और दो घूंट पीने से ठीक हो गये हैं। रोज़ नया शोर सरकार का सुनाई देता है , स्वच्छता अभियान तीन साल में वास्तविकता तो कहीं नहीं दिखाई देती। और भ्र्ष्टाचार आज भी कोई सरकारी काम बिना सिफारिश या रिश्वत होता नहीं , कोई अधिकारी आज भी आम नागरिक की परेशानी समझता ही नहीं , आज भी अफ्सर चाटुकारिता कर तरक्की पाते हैं। हर विभाग और अधिक धन जनता से वसूल करने में लगा हुआ है। देश में आम जनता आज भी त्रस्त है बदहाल है और शासक जनता के खून पसीने की कमाई अपने ऐशो-आराम पर खर्च कर गर्व महसूस करते हैं। आम लोग हमेशा की तरह चढ़ते सूरज को प्रणाम करते हैं , बिना समझे कि वास्तव में उसने सत्ता पाकर किया क्या है। क्या देश की जनता की हालत सुधरी है , कोई सवाल नहीं करता , कोई सोचता तक नहीं। सब को अपने अपने अनुचित कार्य उचित लगते हैं , सब की कथनी और है करनी कुछ और। नियम कानून सही गलत और नैतिक अनैतिक की परवाह किसी को नहीं है। अपने आप को कोई नहीं देखता कि मैं जो कर रहा वो मेरा कर्तव्य है अधिकार है अथवा केवल स्वार्थ है। धर्म वाले उपदेश कुछ देते हैं खुद कुछ करते हैं। शिक्षा को भी लूट का धंधा बना लिया है और ज्ञान नहीं देते शिक्षा को बेचते हैं। बड़े बड़े अस्पताल स्वास्थ्य सेवा नहीं किसी भी तरह अधिक से अधिक धन कमाने में रोगियों का शोषण करते हैं अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हैं। हज़ारों रूपये के टेस्ट कमीशन की खातिर , बिना ज़रूरत दवायें लिखना , जो कभी नीम हकीम किया करते थे आज उच्च चिकिस्या की शिक्षा हासिल किये लोग उस से बढ़कर आपराधिक ढंग से उपचार के नाम पर करते हैं। लोग हर सरकार की तरह आज की सरकार की कमियों को नाकामियों को अनदेखा कर उस के प्रचार को सच समझ मानते हैं सब ठीक होने वाला है। नहीं हो रहा ये कहने का साहस कोई आम नागरिक क्या तथाकथित समाज का दर्पण कहलाने वाला मीडिया और साहित्य भी नहीं कर रहा। सब को अपने अपने हित की चिंता है , जब खुद ईमानदार नहीं हैं अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं तब दूसरे की कमी देख भी कैसे सकते हैं। हर तरफ हर कोई खुद को मसीहा साबित करने को व्याकुल है , मगर किसी की भलाई कोई नहीं करना चाहता। सब अपने पापों को पुण्य कहलाना चाहते हैं। झूठ आज का धर्म है आदर्श है ईमान है। झूठ की जयजयकार करना सभी की आदत बन चुकी है। सच की पहचान किसी को नहीं है , सच घायल हुआ कराहता रहता है , उसकी पुकार किसी को सुनाई नहीं देती है।

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