Sunday, 16 April 2017

कौन कौन है सच का कातिल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज इक फिल्म देखी जिस ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। नायक नायिका दोनों की आंखें नहीं हैं , खलनायक नायिका से अनाचार करते हैं और जिनको अपराधी को पकड़ना है वही शिकायत करने वालों को अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। नायिका ख़ुदकुशी कर लेती है और नायक बाद में बदला लेता है खुद अपराधियों को सज़ा देता है। मुझे तभी कुछ लोग याद आये जो यही करते हैं , सी एम विंडो हरियाणा की शिकायत की जगह से पुलिस प्रशासन विभाग के अधिकारी से विभाग के बड़े ऑफिस तक सभी। उपयुक्त को महीनों अपना कर्तव्य याद नहीं रहता , विभाग इक जूनियर इंजीनियर को बार बार पत्र भेजता जिसकी प्रति शिकायत करने वाले को मिलती रहती साल तक। फिर कभी शिकायत निपटा देने कभी करवाई की बात का एस एम एस भेजते इक साथ। ये जानते हैं कि जो कर रहे उसका अर्थ अनुचित कार्य करने वालों का पक्ष लेना और जनहित की बात करने वाले को प्रताड़ित करना है। इस तरह ये तथाकथित देशभक्त जनता के सेवक सच को अपराध बना देते हैं और जो सरकार को अवैध कार्यों की जानकारी दे उसको खलनायक बनाना चाहते हैं। कोई विवेक कोई अंतरात्मा इनको झकझोरती नहीं है , इनको पता है फिल्म की तरह वास्तविक जीवन में कोई अपराधियों से खुद नहीं लड़ सकता , न ही इनकी अकर्मण्यता को साबित किया जा सकता है। पर शायद किसी दिन ऊपरवाला इनका इंसाफ करेगा , क्योंकि इनकी मर्ज़ी से किसी की शिकायत जब चाहे बिना कुछ किये बंद की जा सकती है , और उसके बाद बड़े अधिकारी से मिलने वाले पत्रों को जिन में ये बताने को लिखा होता है कि अभी आपने भेजा नहीं क्या किया , जवाब बिना दिये फैंका जा सकता है , मगर भगवान की फाइल खुली हुई है और उसको ये बंद नहीं कर सकते। हां इन्होंने प्रशासन और अधिकारीयों पर से , न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा खत्म कर दिया है। जो एक बार इनकी असिलयत देख लेगा वो दोबारा कोई जनहित की अथवा देश की व्यवस्था की बदहाली की शिकायत कभी नहीं करेगा। ऐसे लोगों ने कितने अपराधियों को बचाया और कितने बेगुनाहों को अपमानित व प्रताड़ित किया इक दिन तो हिसाब होगा ही।

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