Tuesday, 31 May 2016

ये किन लोगों की बात है ( मानवाधिकारों की बात ) डॉ लोक सेतिया

आज जैसे मेरे अंदर सोया हुआ कोई फिर से जाग गया। बहुत दिन से अखबारों में चर्चा थी 3 1 मई को फतेहाबाद में मानव अधिकार आयोग की सभा आयोजित होनी है। सोचा चलो चल कर देखते हैं शायद कुछ विशेष मिल जाये जो सार्थक हो। पता चला कि सैमीनार आलीशान बैंकट हाल में होना है क्योंकि सरकारी सभी इमारतों के हाल वातानुकूलित नहीं है , और बड़े बड़े लोग आने हैं भाषण देने को। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा प्रवेश के मुख्य द्वार पर बैठे पुलिस वाले आम लोगों को दूसरे रास्ते से भेज रहे हैं। मैंने पूछा क्या सभा उधर हो रही है , तो बताया गया कि नहीं सभा तो यहीं ही है मगर , मैंने कहा , क्या ये दरवाज़ा ख़ास लोगों के प्रवेश के लिये सुरक्षित है। तब इक पुलिस वाले ने इशारा किया दूसरे को कि मुझे यहीं से अंदर जाने दे , और मैं भीतर चला गया। हाल भरा हुआ था और अधिकतर सरकारी लोग , पंचायतों के सदस्य , और तमाम बड़े तबके के लोग या संस्थाओं से जुड़े लोग ही नज़र आ रहे थे। जिन गरीबों मज़दूरों , घरों में दुकानों में काम करने वाले बच्चों को कोई अधिकार नहीं मिलता , उन में से कोई भी वहां नहीं दिखाई दिया मुझे। देखते ही किसी शानदार पार्टी का आयोजन जैसा प्रतीत हो रहा था। सभा शुरू हुई तो बात मानवाधिकारों की हालत पर चिंता की नहीं थी , संचालक अधिकारीयों की महिमा का गुणगान करने लगा था। मुझे इक मुल्तानी कहावत याद आई , तू मैनू महता आख मैं तैनूं महता अखेसां। उसके बाद आयोग के लोग बताते रहे कि दो तीन साल में ही हरियाणा का मानव आयोग एक कमरे से शुरू होकर आज एक पूरे भवन में काम कर रहा है। बिलकुल सरकारी विकास के आंकड़ों की तरह , जिसमें ये बात पीछे रह जाती है कि जिस मकसद से संस्था गठित हुई वो कितना पूरा हुआ या नहीं हुआ। बस कुछ सेवानिवृत लोगों को रोज़गार मिल गया , यही अधिकतर अर्ध सरकारी संस्थाओं में होता है जहां करोड़ों का बजट किसी तरह उपयोग किया जाता है , साहित्य अकादमी भी ऐसी ही एक जगह है।
भाषण होते रहे और अधिकतर मानवाधिकारों के हनन की बात से इत्तर की ही बातें हुई। लगता ही नहीं कोई समस्या भी है किसी को मानवाधिकार नहीं मिलने की। अच्छा हुआ कोई पीड़ित खुद नहीं आया वहां वरना निराश ही होता , जो कुछ लोग थोड़ी समस्याएं लेकर गये उनको भी पुराने सरकारी ढंग से स्थानीय अधिकारियों से मिलने की राय दी गई। और जिनकी शिकायत उन्हीं को हल निकालने की बात कह कर समस्या का उपहास किया गया जैसे। तीन चार घंटे चले कार्यक्रम में कहीं भी चिंता या मानवाधिकारों की बदहाली पर अफसोस जैसा कुछ नहीं था , मानों कोई दिल बहलाने को मनोरंजन का आयोजन हो। बार बार संवेदना शब्द का उच्चारण भले हुआ , संवेदना किसी में कहीं नज़र नहीं  आई। वास्तव में ये सभी वो लोग थे जिनको कभी जीवन में अनुभव ही नहीं हुआ होगा कि जब कोई आपको इंसान ही नहीं समझे तब क्या होता है।

Sunday, 22 May 2016

हैं कहां ऐसे भले लोग ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

समझ नहीं आता सच क्या है बनावट क्या है। अभी देखा इक टीवी शो में भाई भाई से बेइंतेहा प्यार करते हैं , बहन से दोस्तों से माता पिता से। देखते हैं किसी की दुःख भरी दास्तान सुन कर  सभी भावुक हो जाते हैं , आंखें हमारी भी नम हो जाती हैं। मगर यही सब अपने आस पास जीवन में नहीं दिखाई देता , किसी को किसी से कोई मतलब ही नहीं है। हमें क्या बस यही नज़र आता हर किसी की निगाह में। नतीजे घोषित हुए और हर प्रथम द्वितीय रहने वाले लड़के लड़की का यही बयान था कि डॉक्टर शिक्षक आई ए एस , आई पी एस बन देश की सेवा करना चाहते हैं। उम्र भर यही सुनता आया हूं और फिर तलाश करता रहा कि वो कहां गये जिनका ऐसा ईरादा था। नेता भी देखे सभी दलों के बड़ी बड़ी बातें करते हुए मगर जब सत्ता मिली तब केवल अपनी सत्ता को स्थापित रखने या विस्तार देने की ही बात करते रहे या फिर आये दिन नये नये तमाशे जनता को बहलाने को दिखाते रहे। कुछ भी बदलना किसी की प्राथमिकता नहीं था। आज तक किसी भी नेता को ये बात अनुचित नहीं लगी कि जिस देश के करोड़ों लोग भूख और बदहाली के शिकार हों उस देश के जनप्रतिनिधि को खुद पर इतना धन खर्च करना किसी संगीन अपराध से कम नहीं है। ये कैसा लोकतंत्र है जिसमें लोक को तंत्र खाये जा रहा है। ऐसे देश का राष्ट्रपति इक ऐसे महल में रहे जिसके सैंकड़ों कमरे हों और उस के रख रखाव पर करोड़ों रूपये मासिक अथवा लाखों रूपये हर दिन खर्च किये जाते हों , जितने पैसे से हज़ारों भूखे लोगों का पेट भर सकता हो। अर्थशास्त्र के अनुसार जब एक को इतना अधिक मिलता है तब लाखों करोड़ों से किसी तरह छीन कर ही मिलता है। आज जितने भी तथाकथित बड़े लोग महानायक समझे जाते हैं वो केवल अपनी मेहनत से नहीं बल्कि तमाम हथकंडे अपना कर और किसी भी तरह सफल होकर केवल अपने लिये और अधिक पाने की कोशिश से शिखर पर पहुंचे हैं , और खुद उनको भी नहीं पता कि कितने इसलिये पीछे या वंचित रह गये क्योंकि उनको कुछ भी नहीं मिला तभी हमें ज़रूरत से अधिक मिला है।  और ये तकदीर की बात नहीं है , सभी को समानता के अधिकार नहीं मिलने की बात है। जब ऐसे धनवान लोग आडंबर करते हैं गरीबों की सहायता का तब ये इक क्रूर मज़ाक होता है गरीबों के साथ। हम ये सब अपने मुनाफे के लिये नहीं समाज सेवा के लिये कर रहे हैं , ऐसा दावा करने वालों की हवस कभी पूरी नहीं होती , उनको सभी कुछ बेचना है जो भी बिक सके।
धर्म के नाम पर संचय क्या धर्म यही सिखाता है , आपके मंदिर मठ आश्रम दौलतों के अम्बार जमा करते हैं जबकि लोग दाने दाने को तरसते हैं , बेघर हैं बेइलाज मरते हैं। ऐसे धर्म ऐसे भगवान किस काम के। शिक्षा के मंदिर कहलाने वाले शिक्षा को बेच रहे हैं तो उनसे कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है , चिक्तित्स्या के नाम पर भी यही होने लगा है , क्या शिक्षा और उपचार केवल धनवानों के लिये है। जब सरकार इन बातों की अनदेखी करे तब देश की भलाई कैसे हो सकती है। इक अंग्रेज़ी कहानी " हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स " याद आती है ,
गांधी जी ने भी कहा था देश में सभी की ज़रूरत पूरी करने को बहुत है मगर किसी की हवस को पूरी करने को काफी नहीं है। बस कुछ लोगों की हवस कभी नहीं मिटती तभी बाकी लोग भूखे प्यासे हैं। आपने देवता और दैत्यों की कथायें सुनी होंगी मगर इनकी परिभाषा शायद ही समझी हो। जो अपने पास जितना है औरों को बांटते हैं वो देवता कहलाते हैं , और जो बाकी लोगों से उनका सभी कुछ छीन लेना चाहते हैं वो दैत्य कहलाते हैं। विश्व में अधुक्त्र दानव ही शासन करते रहे हैं , देवताओं को कभी शासन की चाह ही नहीं होती है। राजनीति में सज्जन पुरुष बेहद कम हुए हैं और वो कभी शासन की गद्दी पर नहीं आसीन हुए हैं।

Sunday, 8 May 2016

मुझे सज़ा दे दो ( मंथन ) 118 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कब से खड़ा हूं कटघरे में ,
सुन रहा हूं इल्ज़ाम सभी के ,
सर झुकाये खड़ा हुआ हूं ,
नहीं है कोई भी जवाब देने  को ,
मानता हूं नहीं पूरे कर पाया ,
सभी अपनों के अरमानों को ,
हो नहीं सका कभी भी जीवन में सफल ,
टूट गये सभी ख्वाब मेरे।
कभी कभी सुनता हूं ,
किसी को हर कदम ,
किसी ने दिया प्रोत्साहन ,
कुछ भी करने को देकर बढ़ावा ,
किया भरोसा ,
उसकी काबलियत पर ,
लगता है तब मुझे कि
शायद कोई तो कभी ,
मुझे भी कह देता प्यार से ,
बेशक सारी दुनिया
तुमको समझती है ,
नासमझ और नाकाबिल ,
मुझे विश्वास है
तुम्हारी लगन ,
और कभी हार नहीं मानने की आदत पर।
बस इतना ही मिल जाता
तो शायद मैं कभी भी ,
नहीं होता नाकामयाब ,
कैसे समझाता किसी को
किसलिये हमेशा रहा ,
डरा सहमा उम्र भर ,
मेरा आत्मविश्वास
बचपन से ही कभी ,
उठ नहीं सका ऊपर ,
खुद को समझता रहा मैं
अवांछित हर दिन हर जगह हमेशा।
इक ऐसा पौधा ,
जो शायद उग आया
अनचाहे किसी वीरान जगह पर ,
जहां कोई नहीं था ,
देखभाल करने वाला ,
बचाने वाला आंधी तूफान से ,
हर कोई कुचलता रहा ,
रौंदता रहा मुझे ,
बेदर्दी से कदमों तले ,
कोई बाड़ नहीं थी ,
मुझे बचाने को ,
बेरहम ज़माने की ठोकरों से ,
बार बार उजड़ता रहा
फिर फिर पनपता ही रहा ,
अपनी बाकी जड़ों से ,
और बहुत बौना बन कर रह गया ,
इक पौधा जिस पर थे सूखे पत्ते ही।
कभी ऐसा भी हुआ ,
जिनको मुझ से ,
कोई सरोकार ही नहीं ,
किसी तरह का ,
उनकी नज़रों में भी
मुझे नज़र आती रही हिकारत
छिपी मीठी बातों में भी ,
किसलिये लोग अकारण ही
किया करते हैं मुझ जैसों को प्रताड़ित ,
जाने क्या मिलता उनको
औरों का दिल दुखा कर हमेशा।
चाहता था मैं भी सफल होना ,
सभी की उम्मीदों पर ,
खरा साबित होना ,
शायद ज़रूर हो जाता कामयाब
जीवन में अगर ,
कोई एक होता जो ,
मुझे समझता ,
मुझे परोत्साहित करता ,
मेरा यकीन करता ,
और मैं कर सकता
हर वो काम जो ,
कभी नहीं कर पाया आज तक।
मगर आज मुझे नहीं देनी
कोई भी सफाई ,
अपनी बेगुनाही की ,
खड़ा हूं बना मुजरिम
सभी की अदालत में ,
कटघरे में सर झुकाये।
मांगता हूं सज़ा
अपने सभी किये अनकिये ,
अपराधों की खुद ही ,
मुझे सज़ा दो जो भी
चाहो मुझे मंज़ूर है ,
आपकी हर सज़ा मगर ,
बस अब ,
अंतिम पहर है जीवन का ,
बंद कर दो ,
और आरोप लगाना ,
गुनहगार हूं मैं ,
मुझे नहीं मालूम ,
क्या अपराध है मेरा ,
शायद जीना।