Friday, 25 December 2015

अंधेर नगरी चौपट राजा ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कुछ समझ नहीं आता हम किस तरफ जाना चाहते हैं। देश का राष्ट्रीय चरित्र क्या है। क्या सरकार का काम कानून का शासन कायम करना है अथवा अपनी सुविधा के अनुसार नियम कायदे कानून बदलना। जनहित का नाम लेकर लूट का कारोबार कब तलक चलेगा। बहुत पहले की बात है मेरे शहर फतेहाबाद में दुकानों की बोली होनी थी , लोग खरीदने को  आये हुए थे , मगर तभी मुख्यमंत्री से मिलकर कुछ लोगों ने वो मार्किट की जगह अपनी बिरादरी की धर्मशाला बनाने को देने को कहा था और बोली रद हो गई थी। ये तब मुख्यमंत्री भी जानते थे की नियमानुसार कमर्सियल जगह नहीं दी जा सकती। मगर कानून को ठेंगा दिखाने का काम हर नेता हर सरकार करती रही है। कम्युनिटी सेंटर की जगह किसी विभाग को देना कैसे सही हो सकता है , जब सरकार ,नेता प्रशासन खुद ही कानून का पालन नहीं होने देना चाहते , न्यायलय कहता रहे आप रिहायशी कोठियों में कारोबार होने देते हैं , तब कुछ भी सही भला कैसे हो सकता है।
         हरियाणा में पिछली सरकार ने सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा किये बैठे लोगों को ज़मीन का मालिकाना हक दे दिया था , अंधा बांटे रेवड़ियां की तरह। अब नई सरकार ने ऐलान किया है जो कई सालों से किराये पर बैठे हैं उनको दुकानों की मलकियत दे दी जाएगी। शायद आपको लगे की ऐसा गरीबों की भलाई करना होगा , जो वास्तव में नहीं है। इतने सालों में दुकान जाने कितने लोगों से कितने लोगों में बदलती रही और कभी एक ही के नाम पर चलती रही कागज़ों में और धंधा कोई और ही करता रहा , जाने कितने लोग पगड़ी का पैसा लेकर जाते रहे और बहुत लोग हैं जिनको उन दुकानों की ज़रूरत ही नहीं काम करने को , उनकी खुद की कितनी ही दुकानें हैं , असलियत कुछ और ही है। नेता लोग रिश्वत खाकर ये सारे काम करते हैं रिश्वत देने वालों को फायदा पहुंचाने के लिए।
                  कौन देखता है वास्तव में किसको ज़रूरत है सहायता की और सरकार किन लोगों की सहायता करती है , बस इक कहावत है चोरी का माल हो तो बांसों के गज होते हैं। मेरे इक भाई जो ठेकेदारी करते थे कहते थे की सरकार और माँ से जितना ले सको लेना उचित है , सरकारी घी मुफ्त मिलता हो तो पास बर्तन नहीं भी हो औंगौछे में डलवा लेते हैं , चाहे रिस जाये फिर भी जो चिकनाई बच जाएगी वही सही। ऐसे हो हो रहा है और जिनके पास है उनको ही और और मिलता जाता है , जिनके पास कुछ नहीं वो हमेशा खाली हाथ रहते हैं। ये देख कर लगता है गरीबों की गरीबी तब तक नहीं मिटेगी जब तक उनको सरकारी गोदामों में कोई रास्ता तलाश करना नहीं आता। अंधेर नगरी चौपट राजा , टके सेर भाजी टके सेर खाजा।

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