Wednesday, 20 May 2015

बिटिया रानी को लिखी इक चिट्ठी ( डॉ लोक सेतिया ) 110 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

बिटिया रानी ,
कभी नहीं बुलाया ऐसे तो तुझे मैंने ,
हां अक्सर तेरी मां बुलाती है तुझको ,
जाने कितने प्यारे प्यारे नामों से ,
पर दिल चाहता है मैं भी बुलाता ,
तुझको कोई ऐसा ही प्यार भरा ,
सम्बोधन दे कर बेटी-पिता के नाते का।
अभी तो बीता नहीं इक महीना भी ,
बिदा किया तुझको बिठा कर डोली में ,
कितने चाव से कतने अरमानों से ,
हज़ारों दुआएं देकर तेरे भविष्य की ,
जाने कितनी खुशियों की उम्मीदों ,
कितने रंग बिरंगे सपनों के साथ।
अभी तो गुज़रे हैं दिन पंद्रह ही ,
जब दो पल को ही सही तू घर आई थी ,
पगफेरे की रस्म निभाने को संग लिये ,
अपने जीवन साथी को अपने ससुराल के परिवार को।
याद आती रहती हैं हम सभी को पल पल ,
बातें तेरी क्या बतायें कैसी कैसी ,
कह देती मुझे पापा आप फिर लिख दोगे ,
हर बात पर कोई कविता-कहानी ,
मुझे नहीं है सुननी ,
नहीं मुझे भी बेटी सुनानी।
पर आज नींद नहीं आई मुझे रात भर ,
करते करते तेरे फोन का इंतज़ार ,
लगता है कब से नहीं हो पाई खुल के ,
तुझसे तेरे मेरे सबके बारे में बात ,
 दिल करता है अभी मिलने को तुझे ,
बुला लूं तुझे या चला जाऊं तेरे पास।
याद है जब भी कभी होता था कुछ भी ,
तेरे मन में कहने को ख़ुशी का चाहे ,
छोटी छोटी आये दिन की परेशानियों का ,
करती थी फोन पर हर इक अपनी बात ,
क्या क्या बता देती थी कुछ ही पल में ,
चाहे रही हो कितनी भी दूर घर से ,
यूं लगता था होती हर दिन थी मुलाकात।
जानते हैं हम सभी खुश हो तुम बहुत ,
अपने जीवन में आये इस सुहाने मोड़ से ,
बहुत कुछ नया सजाना है जीवन में ,
समझना है निभाने है रिश्ते नाते सभी ,
नहीं खेल बचपन का गुड्डे गुड़ियों का विवाह ,
खिलने फूल मुस्कुराहटों के तेरे चमन में।
तुझे नहीं मालूम आज तबीयत मेरी ज़रा ,
लगती है कुछ कुछ बिगड़ी हुई सी ,
यूं ही ख्याल आया कभी ऐसे में ,
मुझे प्यार से डांट देती थी तुम कितना ,
और अधिक की होगी लापरवाही ,
बदपरहेज़ी ,
ख्याल रखते नहीं आप अपना पापा ,
मुझे देनी पड़ती थी कितनी सफाई ,
बताता था कब से आईसक्रीम नहीं खाई।
कहने को मन में हज़ारों हैं बातें ,
यही चाहता मिल के खुशियों को बांटे ,
तुझे बुलाना है तेरे अपने ही इस घर में ,
कितनी ही तेरी अपनी चीज़ें हमने ,
वहीं पे सजा कर रखी हैं जहां रखी तुमने ,
सभी कुछ वही है ,
तेरा था जैसा घर में ,
नहीं है वो रौनक जो होती बेटियों से ,
तरसती है छत ,
तेरे कदमों की आहट को ,
तू ही फूल हो जो खिला इस आंगन में।
समझना वो भी जो लिख नहीं पाया ,
ये खत नहीं है ,
नहीं है पाती ,
मुझे याद है वो जो तुम हो गुनगुनाती ,
सुना तुझसे था खुद भी साथ गाया ,
कभी भी नहीं धूप तुमको लगे बेटी ,
रहे प्यार का खुशियों का तुझपे साया।