Thursday, 25 December 2014

नेताओं और मीडिया वालों का शोर ( आलेख ) डा लोक सेतिया

समझना होगा सच क्या है , वो जो टीवी पर अख़बारों में परोसा जा रहा है अथवा वो जो हमें अपने सामने दिखाई दे रहा है। स्वछता अभियान और सुसाशन अभियान क्या हैं। सालों से ऐसे जाने कितने अभियान आये और चले गये , कभी किसी ने नहीं सोचा उनका हासिल क्या रहा। क्या क्या संकल्प क्या क्या बातें होती रही , सब आडंबर को , जनता को बहलाने को। ये विचत्र बात है आजकल नेता अफ्सर हर काम जो उनको खुद करना चाहिये , कहते हैं जनता ये तुमको करना है। इनको क्या करना है ? मात्र अधिकारों का उपयोग। कर्तव्य की बात किसी को याद ही नहीं। जब तक ये लोग मानते ही नहीं कि हमने अपना फ़र्ज़ नहीं निभाया अभी तक इसलिये देश की दुर्दशा हुई है ,तब तक इनसे कर्तव्य बिभाने की आशा भी करें तो कैसे। लेकिन अब इनका ये खोटा सिक्का भी लोग समझते हैं चल जायेगा। बहुत शोर हुआ था मोदी सरकार के समय पर दफ्तर पहुंचने का , क्या हो गया सब , आज भी देख लो कोई भी अधिकारी समय पर तो क्या प्रतिदिन दफ्तर जाता भी है। अभी कुछ दिन पहले एक चैनेल के एक शो के इकीस वर्ष पूरे होने पर इक आयोजन हुआ जिसमें प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और तमाम मंत्री लोग शामिल हुए। क्या ऐसा ज़रूरी था , क्या उनके लिये ये जनता के कामों से अधिक ज़रूरी था। सच तो ये है कि ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये , मगर जब इन नेताओं को ये भी समझ नहीं हो कि इनको किसी के कारोबार से , अपने प्रचार से अधिक महत्व देश के प्रति अपने काम को देना चाहिये तब इनसे क्या उम्मीद रखें बदलाव की। और ये जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं वो खुद क्या हैं , विज्ञापनों और पैसे के लिये कुछ भी करने वाले व्योपारी। क्या क्या नहीं दिखाते , ये वही हैं जो पैसे लेकर किसी को गुरु बनाते हैं उसकी महिमा का गुणगान करते हैं और जब पोल खुलती तब उसको अपराधी भी बताते हैं , बिना ये स्वीकार किये कि खुद ये भी उसी का हिस्सा रहे हैं। ये बहस करते हैं और बताते हैं कैसे किसकी सरकार बन सकती है , बिना ये समझे कि ये उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है। इनको ये भी लगता है कि जो ये बताते उसका असर लोगों पर इतना अधिक होता है कि इनकी मर्ज़ी से सरकार बन सकती है। ये खुद को खुदा मान बैठे लोग जानते ही नहीं कि खुद ऊपर जाने की चाह में कितना नीचे पहुंच गये हैं। अब इनका हिसाब किताब कौन पूछे। सच तो ये है कि नेता और मीडिया वाले दोनों ही अपने हित को देश हित से अधिक महत्व देते हैं। तभी ये झूठा प्रचार आडंबर दोनों को उचित लगता है।
         पहले भी ये सब होता रहा है किसी न किसी रूप में। गरीबी हटाओ , बालमज़दूरी खत्म करो , भ्र्ष्टाचार बंद करो आदि आदि। क्या बदला , कुछ भी नहीं , सब भाषणों में , सरकारी आंकड़ों में होता रहा। वही फिर दोहराया जा रहा है , टीवी अख़बार पर नहीं वास्तव में सफाई और सुशासन चाहिये। मगर क्या ऐसा होगा , ये सब तो वही है जो कितनी बार आज़माया जाता रहा है , जनता को बहलाने को। ये शोर भी जो सुन रहे हैं इक दिन ख़ामोशी में बदल जायेगा , ऐसा अंदेशा है।
                                          

Sunday, 7 December 2014

रिश्तों की डोरी ( कविता ) 108 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी देखा है ,
धागे जब उलझ जाते हैं ,
बहुत कठिन हो जाता है ,
उनको बचाकर अलग करना ,
ज़रा सा खींचा कोई धागा ,
टूट जाता है पल भर में ,
इक थोड़ा सा खींचने मात्र से।
जीवन में रिश्ते नाते सभी ,
रहते हैं इक साथ ऐसे ही ,
हम सभी के अपने ही हाथों में ,
खोना नहीं चाहते हैं किसी को भी ,
मगर ज़रा सी भूल से हो जाता है ,
अक्सर ऐसा भी हम सभी से ,
कोई इक रिश्ता उलझ जाता है ,
अपने किसी दूसरे रिश्ते से अचानक ,
नहीं आता सभी को ये काम ,
हर रिश्ते नाते को बचाकर रखना।
मिलना जाकर किसी दिन इक बुनकर से ,
देखना उसको बुनते हुए धागों से ,
कितने रंग वाले ,
कैसे कैसे होते हैं ,
सब को अपनी जगह पर रखता ,
सब को उतना ही कसता जितना ज़रूरी ,
सभी में रखता है थोड़ी थोड़ी सी दूरी ,
कोई धागा नहीं उलझने देता वो ,
टूटने नहीं देता इक भी धागा ,
और कभी कोई टूट भी जाता है ,
थोड़ा अधिक खींचने से अचानक ,
तब उसको अलग रखता दूसरे धागों से ,
गांठ नहीं लगता है कभी बुनकर ,
प्यार से उसी धागे के दोनों सिरे ,
फिर से मिला देता उनको कैसे ,
कभी टूटा ही नहीं था वो जैसे।
दोस्तो सीखना सभी बुनकर से ,
प्यार मुहब्बत दोस्ती वाले सब रिश्ते ,
कैसे रखने हैं सभी हमने संभाल कर ,
और उस से बुनना है अपना जीवन ,
किसी खूबसूरत चादर की तरह ,
जिस में मिलकर हर धागा देता है ,
बहुत ही सुंदर शक्ल।