Friday, 10 October 2014

सच हुए सपने ( कविता ) 107 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

सच हुए सपने ( कविता )
सपने तो सपने होते हैं ,
देखते हैं सभी सपने ,
मैंने भी देखे थे कुछ ,
प्यार वाले सपने ,
कोई अपना हो ,
हमराज़ भी हो ,
हमसफ़र भी हो ,
हमज़ुबां भी हो ,
चाहे पास हो ,
चाहे कहीं दूर हो ,
हो मगर दिल के ,
बहत ही करीब ,
जिसको पाकर ,
संवर जाये मेरा ,
बिगड़ा हुआ नसीब।
सब दुनिया वाले ,
यही कहते थे ,
किस दुनिया में ,
रहता हूं मैं अब तक ,
और किस दुनिया को ,
ढूंढता फिरता हूं ,
ऐसी दुनिया जहां ,
कोई स्वार्थ न हो ,
कोई बंधन न हो ,
और हो सच्चा प्यार ,
अपनापन , भरोसा ,
अटूट विश्वास इक दूजे पर।
मगर मेरा विश्वास ,
मेरा सपना सच किया है ,
तुमने ऐ दोस्त ऐ हमदम ,
जी उठा हूं जैसे फिर से ,
निकल कर जीवन की निराशाओं से ,
तैर रहा आशाओं के समंदर में ,
तुम्हारा हाथ थाम कर ,
मिलेगी अब ज़रूर ,
उस पार मेरी मंज़िल ,
इक सपनों का होगा ,
महल वहीं कहीं ,
जहां होगा अपना हर कोई ,
मुहब्बत वाला इक घर ,
जिसकी खिड़की दरवाज़े ,
दीवारें और छत भी ,
बने होंगे प्यार से ,
स्वर्ग सा सुंदर होगा ,
अपना छोटा सा आशियाना।

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