Monday, 8 September 2014

सखी ( कहानी ) डा लोक सेतिया

सखी कहकर पुकारा था मैंने इक दिन किरन को। कुछ साल ही रहा हम दोनों का साथ। मगर मुझे मालूम था कि वो मुझसे कहीं ज़्यादा किसी और को चाहती थी वा सब से अधिक खुद को चाहती थी। खुद को चाहना बुरा भी नहीं होता है , भले कोई आपको प्यार करे न करे आप तो अपने आप से प्यार करो। मैं शायद किरन के लिये उन खिलौनो की तरह थी जिनसे वो खेला करती जब भी चाहती और जब मन भर जाये तब उनको छुपा कर अपनी अलमारी में रख देती थी। अपने खिलौनो से बहुत प्यार था किरन को , जाने क्यों उसको लगता था कोई उससे उसके खिलौने छीन लेगा। बस मुझपर विश्वास था कि मैं कभी उसके खिलौने नहीं छीन सकती , वो जानती थी मैं नहीं खेलती कभी भी खिलौनो के साथ। खिलौने क्या मुझे किसी के साथ भी खेलना पसंद नहीं था। मैं तो हमेशा खामोश रहती थी और जो भी कुछ कोई बोलता हो चुपचाप सुना करती थी। अकेले में यूं ही कुछ सोचती रहती और अपनी पसंद के गीत गुनगुनाती रहती थी। रेडियो पर रात दिन पुराने दर्द भरे गाने सुना करती और उन में खुद को महसूस किया करती थी। अक्सर किसी गीत को सुनते मेरी आंखे भर आती थी और मैं सब से छुप कर रोया करती थी। इक और पागलपन किया करती थी मैं , अपना रोता हुआ मुखड़ा दर्पण में देखती और उसको देख और भी अधिक रोना मुझे आ जाता था। मुझे याद है हॉस्टल में किरन के कमरे से बाहर निकल रही थी मैं और मेरी पसंद का गीत , दस्तक फिल्म का रेडियो पर आ गया था। हम हैं मताये कूचा ओ बाज़ार की तरह , उठती है हर निगाह खरीदार की तरह। वहीं बुत बनी खड़ी रह गई थी मैं , मेरी पलकें भर आई थी आंसुओं से , मुझे किरन ने पहली बार रोते हुए देखा था। हैरान थी , पूछने लगी क्या हुआ तुझे पगली , कुछ भी नहीं मैंने कहा था। जानती थी इक पागलपन था वो सपनों की दुनिया बना कर उसी में जीना , खो जाना। किरन जैसे कोई तितली जैसी थी , हमेशा उड़ती रहती इधर उधर , अभी यहां थी अब कहीं और पल भर में। सभी की दुलारी थी वो , बहुत प्यार करते थे सब उसको , हॉस्टल कॉलेज घर में हर जगह। मगर उसकी खुशनसीबी भी अधूरी थी , जिसको वो चाहती थी दिलोजान से वही किरन की ज़रा भी परवाह नहीं करता था। किरन को ये उसकी इक अदा लगती थी , शायद वो मान ही नहीं सकती थी कि कोई उसकी चाहत को भी ठुकरा सकता है। उसका साथ पाते वो सब को भूल जाती थी , भुला सकती थी। हम दोनों का नसीब एक सा था , मैं उसकी सखी थी , उसको अपनी सखी बनाना चाहती थी मगर उसको किसी दूसरे की सखी बनना पसंद था। कई बार मेरे मन में भी ये बात आती थी कि क्यों नहीं मैं किसी और को सहेली बना उससे घुल मिल कर रहती हूं। किया ये भी प्रयास मगर उसकी जगह किसी को नहीं रख सकी।
                     किरन की शादी की बात चल रही थी , उसको कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था। मां बाप की लाड़ली बेटी को हमेशा मिलता जो रहा था अपनी पसंद का सभी कुछ। वो लोगों को भी कपड़ों और खिलोनो की तरह रंग और चमक देख पसंद करती थी। उसको देखने जब कभी कोई लड़का और उसका परिवार आता तो मुझे पास बुला लिया करती थी , थोड़ी दूरी पर ही तो मेरा घर। शायद मेरे होने से उसे अपने सुंदर होने का , अच्छे पहनावे का , सब से खुल कर बातचीत करने का आत्मविश्वास बढ़ जाता था। इसलिये कि मैं साधारण नज़र आने वाली हरदम चुप रहने वाली , हमेशा बहुत ही आम से कपड़े पहनने वाली लड़की थी। जाने क्या देख कर किरन को सूरज पसंद आ गया था , मैंने देखा वो शरमा रहा था किसी लड़की की तरह , उसने किरन से कोई सवाल नहीं पूछा था। जैसे सूरज हम दोनों को कनखियों से देख रहा था उससे लगता था किरन का जादू उसपर चल गया था। जब दोनों से पसंद है का सवाल किया गया और हां हो चुकी तब किरन उसको अपने कमरे में लाई थी , और सूरज को मुझसे मिलवाते हुए कहा था ये मेरी सब से प्यारी सखी है। मैं यही जाने कब से सुनना चाहती थी , वो पल मेरे लिये ऐसे था जैसे मुझे पूरी दुनिया ही मिल गई है। मैंने उसको भावावेश में गले लगा लिया था और चूम कर बोली थी मेरी जान हो मेरी सखी , दुआ करती तुम यूं ही खुश रहना। किरन का परिवार इस बात को लेकर खुश था कि उनकी लाड़ली यहीं इसी शहर में रहेगी , सूरज की नौकरी यहीं लगी थी। मुझे भी ख़ुशी थी कि मैं जब भी चाहूंगी मिल सकूंगी उससे। किरन और मैं हमेशा हर नई फिल्म इक साथ देखते थे , किरन की सगाई के बाद आनन्द फिल्म रिजीज़ हुई थी वा मैंने उसको सूरज के साथ प्रोग्राम बनाने को कहा था , उसने मुझे तीन टिकट मंगवा लेने को कहा था , और सूरज को साथ लाने की बात की थी। किरन को घर से अनुमति मिल गई थी सूरज और मेरे साथ सिनेमा जाने की। जाने क्यों किरन के होने वाले दूल्हे के साथ फिल्म देखने को लेकर मैं बेहद उत्साहित थी , मैं खुद जाकर तीन टिकेट एडवांस बुकिंग से ले आई थी। किरन की बात फोन पर सूरज से हो गई थी , सिनेमा हाल पहुंच कर किरन ने बताया था कि उनके पास बॉक्स की टिकट हैं और वो दोनों अकेले बैठ कर उसमें फिल्म देखना चाहते हैं। मैं अलग अकेली ड्रेस सर्कल में बैठ देख लूं , और बाकी दोनों टिकट किसी को बेच दूं। शायद मुझे खुद समझना चाहिये था कि मुझे कवाब में हड्डी नहीं बनना चाहिये। मगर मैं उसकी बात से बहुत नाराज़ हो गई थी और जब वो दोनों अंदर चले गये थे तब मैंने वो तीनों टिकट फाड़ कर फैंक दी थी। दूसरे दिन मैंने किरन से अपनी नाराज़गी जता भी दी थी , उसको इतना ही बोली थी कि जब तुमको अलग बैठ कर फिल्म देखनी थी तो मुझे नहीं बुलाना चाहिये था। वो जान गई थी मैं बिना फिल्म देखे ही लौट आई हूं। किरन ने कहा था कि सच में ये फिल्म तो दोस्त बनाने के विषय पर है और ये उसको सूरज के साथ नहीं मेरे साथ ही देखनी चाहिये थी। उसने मुझसे वादा किया था मुझे खुद साथ ले जा कर आनन्द फिल्म दिखायेगी , मगर हमेशा की तरह वो भूल गई थी मुझसे किया हुआ वादा। मैंने कई साल तक वो फिल्म नहीं देखी थी , जब टीवी पर घर में अकेले बैठ सालों बाद देखी तब आनंद से खुद को मिला कर सोचती रही , लेकिन मेरी किस्मत में कोई बाबू-मोशाय जैसा दोस्त कहां था।
               किरन की शादी हो गई थी , वह बहुत खुश थी। अपने मायके वाले घर जब भी आती , मुझे झट बुला पास लिया करती। मुझे हर बार अपने घर आने को कहती थी , मगर मुझे संकोच होता था बिना कारण कैसे जाऊं। एक दिन अपनी कसम दे गई थी कि ज़रूर उसका घर देखने आऊं। जब किरन ने पूछा कब आओगी तब मैंने यूं ही सरप्राइज देने की बात कह दी थी। और एक दिन यही सोच किरन के घर चली गई थी उसकी ख़ुशी की खातिर। बैल देने पर दरवाज़ा सूरज ने खोला था , आओ अंदर आओ कहकर मुझे घर में प्रवेश करवाया था।  मैंने किरन को बुलाने को कहा था तो सूरज ने बताया कि वो घर के बाकी लोगों के साथ बाज़ार तक गई है आती ही होगी। मैं उठ कर वापस जाने लगी तो सूरज ने रोक लिया था ये बोलकर कि पहली बार आई हैं अपनी सखी के घर बिना कुछ लिये नहीं जा सकती। मैंने कहा था दोबारा फिर आउंगी , तो सूरज ने कहा की आप कोल्ड ड्रिंक पियें इतने में शायद आ ही जाये किरन। मुझे कोल्ड ड्रिंक देकर सूरज अपनी और किरन की शादी की एलबम्ब दिखाने का बहाना बना मेरे करीब आकर बैठ गया था। उसने बार बार मुझे जानबूझकर छूने का प्रयास किया था तो मुझे डर लगने लगा था , मेरी धड़कने बढ़ गई थी और मैं भाग जाना चाहती थी। उठ कर चलने लगी तो सूरज ने मेरा हाथ पकड़ लिया था। उसकी आंखो में वासना देख मैं घबरा गई थी , मगर जाने कैसे साहस कर सूरज को बोली थी आपको ऐसा सोचते हुए भी शर्म आनी चाहिये थी , आपकी बीवी की सहेली आपके लिये बहन जैसी होनी चाहिये। और अपना हाथ छुड़ा बाहर चली गई थी। ये मेरे साथ कभी नहीं हुआ था , मेरा बदन गुस्से से कांप रहा था व ये बात मैं किसी को नहीं बता सकती थी , किरन को बता कर पति पत्नी के नये नये रिश्ते में दरार नहीं डाल सकती थी। मुझे किरन पर गुस्सा आ रहा था कि क्यों मुझे अपनी कसम दी थी बुलाने को , जबकि इसमें उसका कोई दोष नहीं था। दूसरे दिन किरन अपने मायके वाले घर आई हुई थी , मुझे संदेशा भेजा था आने को , इनकार कर दिया था मैंने। कुछ ही देर में वो खुद चली आई थी , मस्ती के मुड़ में थी , उसको नहीं बताया था सूरज ने कि मैं उसको मिलने गई थी उसके घर। मुझे तब लगा किरन को उसके पति की उस हरकत के बारे बताना ही चाहिये , और मैंने उसको सब बता दिया था। बेचैन सी हो गई थी किरन और उसका चेहरा तमतमाया हुआ था , अचानक उसको जाने क्या हुआ कि उसने मुझे कई थपड़ जड़ दिये थे , और बुरा भला कह कर चली गई थी। मैं सन्न रह गई थी , समझ नहीं पा रही थी कि उसको बताना सही था या गल्त। मगर ये सोच लिया था अब कभी मिलना नहीं होगा किरन से ज़िंदगी भर।
              लेकिन अगले ही दिन जब मुझे किरन के नर्वस ब्रेकडाउन होने और अस्पताल में दाखिल होने का पता चला तब मैं खुद को रोक नहीं पाई थी। मुझे देखते ही मुझसे लिपट कर फूट फूट कर रोते हुए अपनी गलती की माफी मांगने लगी , मुझे बिना बात थपड़ मारने की और शायद अपने पति की गलती की भी। मेरे मुंह से अचानक निकल गया था सब भूल जाओ तुम , छोड़ो उस के लिये खुद को दोषी न समझो। जब मैं निकल रही थी कमरे से तब सूरज आया था मेरे पास और बोला था आई एम वेरी सॉरी , मुझसे अपराध बहुत बड़ा हुआ है फिर भी मुझे कर सको तो अपनी प्यारी सखी के लिये माफ कर देना। मुझे कुछ भी कहना ज़रूरी नहीं लगा था। बहुत दिन तक उस एक घटना ने मुझे बेचैन रखा था , लाख कोशिश करके भी उसे भुला नहीं पा रही थी। मुझे दूर अपने शहर से महानगर में जॉब मिली तो शायद इस सब से बचने के लिये मैंने नौकरी कर ली थी। कुछ दिन में मैंने खुद को संभाल लिया था , अपने काम में रात दिन जुटी रहती थी। मुझे पहले भी तनहाई पसंद थी और उस एक घटना के बाद तो किसी से जान पहचान बढ़ाना अच्छा नहीं लगता था। मगर समय के साथ मैं परिपक्व होती गई थी और अब सब से बेझिझक बात कर सकती थी। वो भय मिट गया था कि कोई मुझसे बदतमीज़ी कर सकता है।
      कई सालों बाद अचानक एक दिन मुझे पत्र मिला अपनी सखी किरन का। सूरज को यहां सुपर स्पेशलिस्ट को दिखाना था , मुझे अस्पताल से डॉक्टर की अपॉइंटमेंट लेनी थी और किरन को सूचित करना था। फिर एक बार मुझे पुरानी घटना याद आ गई थी जिससे मेरी दिमाग की नसें तनाव महसूस कर रही थी। मगर किरन को मैं मना नहीं कर सकती थी कभी भी , अब जब वो किसी परेशानी में थी तब तो हर हाल में उसका साथ देना ज़रूरी था। डॉक्टर से समय लेकर सूचित कर दिया था मैंने। किरन और सूरज अपने दो बच्चों को लेकर जब आये थे तब लगा जैसे वो सब भुला चुके हैं , मुझे भी यही करना था तभी साथ रह सकते थे इक परिवार की तरह। उनको अपने दो कमरों के छोटे से घर में रखना थोड़ा मुश्किल तो था मगर सब समझते थे वक़्त की नज़ाकत को। सदा की तरह किरन जो भी मुझसे चाहिये पूरे अधिकार पूर्वक लेती थी , ये भी बातों बातों में बता दिया था कि सूरज की बिमारी पर बहुत पैसा खर्च होने से वो आर्थिक तंगी में है। ऐसे में उनसे स्वाभाविक ही मुझे सहानुभूति हो गई थी। मैंने किरन को कह दिया था कि मेरे पास जो भी राशि जमा है वो जब भी चाहे ले सकती है। कई महीने तक सूरज का ईलाज चलता रहा और जितना भी मुमकिन था मैं खुद ही अस्पताल और दवाओं का खर्च करती रही , लेकिन सूरज की दशा में कोई सुधार नहीं हो सका था। डाक्टरों ने सूरज के दोनों गुर्दे खराब होने की बात बताई थी और किसी अपने को सूरज को अपना एक गुर्दा देकर उसकी जान बचाने की सलाह दी थी। सूरज के परिवार के लोग अलग अलग रहते थे और कोई भी गुर्दा देने को तैयार नहीं हुआ था। किरन चाहती थी किसी भी तरह अपने पति की जान को बचाना मगर उसका गुर्दा सूरज से मैच नहीं हो सकता था। जाने क्यों मैंने अपना गुर्दा देने पर विचार ही नहीं किया था , मुझे ये सोच कर ही अजीब लगा था कि मैं अपने शरीर का कोई अंग उसको दे दूं जिसने मुझे बुरी भावना से छुआ था।
              किरन की उम्मीद टूट रही थी हर दिन , मुझे उसका बुझा बुझा सा चेहरा देख कर घबराहट होने लगती थी , सूरज अस्पताल में दाखिल था , बच्चों को दादा दादी ले गये थे।  मैं और किरन अकेली थी घर में। किरन ने तब मुझे अपने गुज़रे हुए जीवन के बारे बहुत बातें बताई थी। कैसे सब अपनों के होते भी वो अकेली थी। अब भी उसको भरोसा था केवल बचपन की इस सखी पर तभी सूरज को लेकर मेरे पास आई थी। मैंने तभी निर्णय ले लिया था कि अपनी सखी को निराश नहीं होने दूंगी , और अगले ही दिन डॉक्टर से बात कर मैंने अपने सभी टेस्ट करवा लिये थे। सूरज को मेरा गुर्दा मैच कर गया था , हम दोनों का सफल ऑपरेशन हो गया और सूरज को डॉक्टर्स ने पूरी तरह सवस्थ घोषित कर दिया था। कुछ दिन आराम करने के बाद जब वापस जाने लगे तब किरन और सूरज दोनों की आंखों में आंसू छलक आये थे , सूरज की पलकों से पश्चाताप के आंसू और किरन की आंखों से कृतिज्ञता के। मेरी भी आंखें भर आई थी सखी भाव से। जाते जाते सूरज ने कहा था कि क्या मुझे अपना भाई समझ सकती हैं , मैं आपको दीदी बुला सकता हूं। मैंने भी मन से इस पवित्र रिश्ते को स्वीकार कर लिया था और अब मुझे जल्द ही अपनी सखी ही नहीं अपने भाई के घर भी जाना है। 

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