Sunday, 22 December 2013

बाल की खाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

आखिर शर्मा जी का आप्रेशन हो ही गया। पांच साल से पेट दर्द का इलाज कराते कराते शर्मा जी जितना तंग आ चुके थे उससे ज़्यादा डॉ सिंह कोई आराम नहीं है की शिकायत सुनते सुनते। इसलिये उन्होंने ये आखिरी कोशिश करने का फैसला किया था कि पेट को चीर कर ही देखा जाये। अभी तक किसी भी टैस्ट से कुछ नहीं मिला था , शायद आप्रेशन से ही किसी रोग का पता चल सके। डॉ सिंह जब वार्ड का राउंड लेने आये तब शर्मा जी को होश आ चुका था , आते ही मुस्कुरा कर बोले लो शर्मा जी आपकी परेशानी का अंत हो गया है। आपकी आंतड़ियों में रुकावट थी उसको पूरी तरह दूर कर दिया है। बस अब किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। अब आप बिलकुल ठीक हैं , केवल दो तीन दिन तक कुछ भी खाना नहीं है , ग्लुकोज़ से ही खुराक देंगे। डॉ सिंह वापस जाने लगे तो शर्मा जी ने पूछ ही लिया डॉक्टर साहिब अब फिर से तो दर्द नहीं होगा कभी ! "नहीं अब कभी नहीं होगा वो दर्द लेकिन आपको एक बात का ख्याल रखना होगा खाना खाते समय कि खाने में बाल नहीं हों "। शर्मा जी को उनकी बात समझ नहीं आई इसलिये सवाल किया डॉ साहिब क्या मतलब। डॉ सिंह बोले , देखो शर्मा जी आपके पेट से बालों का गुच्छा निकला है उसी से सारी गड़बड़ थी , अब वो रुकावट फिर से नहीं हो इसके लिये एतिहात बरतनी होगी कि खाने के साथ बाल न खाओ। अच्छा ये बताओ शर्मा जी क्या श्रीमती शर्मा के बाल काफी लंबे हैं। "हां लंबे तो हैं "शर्मा जी ने जवाब दिया। डॉ सिंह बोले तब तो उनकी कटिंग करवा दो , आजकल फैशन भी है छोटे बालों का , न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। हंसते हुए डॉ साहिब तो सलाह दे गये लेकिन शर्मा को एक नई चिंता दे गये। अब तक शर्मा जी को पत्नी से ये शिकायत रहती थी कि वो खाने में मिर्च मसाले ज़्यादा डालती हैं और शायद दर्द का यही कारण है। मगर ऐसा तो कभी नहीं सोचा था शर्मा जी ने कि जिस नागिन सी चोटी पर वो फ़िदा थे वो इस कदर खतरनाक भी हो सकती है। कितनी बार उन्होंने रोटी से बाल निकाल कर फैंक दिये थे और बस इतना ही कहा था श्रीमती जी बालों को बांध कर रखा करो , यूं खुला न छोड़ा करो। वो भी मुस्कुरा भर देती थी , मगर उनसे बाल कटवाने को कहना एक बड़ी समस्या थी। वो कितनी बार घने लंबे और रेशमी बालों की प्रतियोगिताओं में प्रथम आ चुकी थी और अगर उनको अपने पति और बालों में से किसी एक को चुनना पड़े तो शायद वो अपने बालों को ही चुनेंगी , शर्मा जी को लगता था।
    फिर भी सहस बटोर कर शर्मा जी ने डॉ सिंह की कही बात अपनी पत्नी से कह ही दी जब वो मिलने को आई। एक बार तो थोड़ा परेशान और हैरान हुई वो फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद सोचते हुए कहने लगी ये सब डॉ सिंह कि मिसेज़ कि चाल लगती है। दो बार मुझसे प्रतियोगिता में मुझसे पीछे रही है तो ऐसे मेरा पत्ता साफ करवाना चाहती है। शर्मा जी को लगा कहीं वो बात का बतंगड़ न बना दे इसलिए समझा कर कहने लगे भला डॉ सिंह ऐसा क्यों करने लगे , वो जाने माने सर्जन हैं , कभी भी कोई गलत काम नहीं कर सकते। ऐसे उनपर शक करना गलत है और बालों का गुच्छा निकला है ये वो नर्स भी जानती है जो तुम्हारी सहेली है और आप्रेशन में डॉ सिंह के साथ ही थी। लेकिन श्रीमती शर्मा कब मानने वाली थी , कहने लगी आप बताओ डॉ सिंह को क्या मालूम कि वो मेरे बाल हैं। शादी से पहले आप माता जी के हाथ की रोटी खाते रहे हैं उनके भी तो हो सकते हैं। फिर भी आपको मुझे ही दोष देना है तो लो आज से मैं रोटी नहीं बनाया करूंगी , आप घर के लिये एक नौकरानी का प्रबंध कर दो , ये कह श्रीमती जी ने गेंद उनके पाले में डाल दी थी।
                   शर्मा जी को आने वाले तूफान का एहसास होने लगा था , मगर ये सोच कर चुप हो गये थे कि अस्पताल से छुट्टी के बाद इसका कोई हल खोजेंगे। और बहुत विचार करने के बाद शर्मा जी को लगा कि श्रीमती जी को समझने से सरल काम है नौकरानी रख लेना। ऐसे थोड़ा प्रयास करने पर पांच सौ रूपये महीना पर एक नौकरानी मिल ही गई थी , मगर जब पहले ही दिन जब छमियां उलझे और बिखरे बाल लिये आई तो शर्मा जी से रहा नहीं गया और कह दिया ,छमियां ज़रा अपने बालों की ठीक से चोटी बना कर आया करो। लेकिन छमियां तो गर्ज ही पड़ी , साहब हमको ऐसी वैसी न समझियो हां … । वह तो श्रीमती जी ने बात संभाल ली वर्ना शर्मा जी तो घबरा गये थे कि जाने समझ बैठी छमियां। इसलिये शर्मा जी ने ये समस्या हल करने का काम श्रीमती जी को ही सौंप दिया था। अगले दिन श्रीमती शर्मा ने एक पुरानी साड़ी देकर और सौ रूपये पगार बढ़ा कर छमियां को मना ही लिया था उसके बाल कटवाने के लिये। मगर जब छमियां ने अपने बाल कटवाने पर पगार बढ़ने की बात कही तो उसका मर्द बिदक ही गया , तू वहां काम करना जा रही है कि साहब से शादी करने , बोल क्या सारी उम्र वहां रहना है तुझे।  छोड़ दो दिन की पगार और मत जाना कल से काम पर उनके घर। लगता है उनका मगज़ ही खराब है , छमियां ने भी इसी में अपनी भलाई समझी थी।
         दो महीने बीत गये लेकिन ऐसी किसी नौकरानी का प्रबंध नहीं हो सका जिसके बाल गिरने का खतरा न हो। इस बीच शर्मा जी के पुराने मित्र मल्होत्रा साहब घर आये तो उनको अपना दुखड़ा सुना ही दिया शर्मा जी ने। बस इतनी सी बात पर परेशान हो , मल्होत्रा जी बोले थे , याद है जब हम दोनों साथ रहते थे तब मैं सब्ज़ी बनाया करता था और तुम रोटी बनाते थे। अब मुझे भी रोटी बनाना आ गया है , तुम्हें भी थोड़ी प्रैक्टिस करने से फिर से रोटी बनाना आ जायेगा। सुन कर शर्मा जी कुछ दुविधा में पड़ गये तो मल्होत्रा जी कहने लगे यार क्या सोचने लग गये।  मैं बताऊं आपको मैंने खाना बनाना किसलिये शुरू किया था , मैंने एक सर्वेक्षण की बात पढ़ी थी अख़बार में कि जिनकी पत्नियां मज़ेदार खाना खिलाती हैं उनको बहुत सारी बिमारियां होने का खतरा होने और जल्दी मरने की संभावना अधिक होती है। फिर तुम्हारी समस्या का तो सब से बेहतररीन हल ही यही है। गंजे होने का ये फायदा तुम्हें अब समझ आयेगा , जब बाल ही नहीं तो गिरेंगे कैसे।  दोनों ने ठहाका लगाया था। मल्होत्रा जी के तर्क अचूक थे और शर्मा जी को अपनी समस्या का समाधान मिल गया था।  

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