Sunday, 15 December 2013

सत्ताशास्त्र ( व्यंग्य ) डा लोक सेतिया

किसी ज़माने में जो शिक्षा राज्य के राजकुमारों को दी जाती थी ताकि वो जब राजा बनें तो शासन करने के तौर तरीके ठीक से जानते हों। वही बातें इस किताब में विस्तार से समझाई गई हैं। यह पुस्तक एक अति गोपनीय दस्तावेज़ है , विकिलीक्स की तरह मैं बड़ा जोखिम लेकर इस में लिखी हुई सभी राज़ की बातें आपको बताने जा रहा हूं। मैंने इस पुस्तक की जानकारी किसी सरकारी वेबसाईट से हैक नहीं की है , वास्तव में इसके बारे में सरकारी उच्च पदों पर बैठे लोगों तक को कुछ भी पता नहीं है। इस पुस्तक की गिनी चुनी प्रतियां ही उपलब्ध हैं और इसके प्रकाशन या फोटोप्रति बनाने तक पर देश में प्रतिबंध है। जब भी कोई प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनता है तब शपथ लेने के बाद  उसको ये पुस्तक सीलबंद मिलती है ताकि उसको शासन करने के गुर पता चल सकें। और जब वो पदमुक्त हो जाता है तब वो इस पुस्तक को सीलबंद कर के रख जाता है अपने बाद आने वाले नये शासक को देने के लिये। इस पुस्तक की सुरक्षा का कड़ा प्रबंध रखा जाता रहा है हमेशा से , आम जनता का इस पुस्तक के बारे जानने का प्रयास तक बहुत संगीन अपराध है। आप तक इस पुस्तक की जानकारी पहुंचाने का वास्तविक श्रेय उस चोर को जाता है जिसने अपने मौसेरे भाई , सत्ताधारी शासक के पास से इस पुस्तक को चुराने का साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया है। क्योंकि वह चोर खुद अंगूठा छाप है और खुद पढ़ने में असमर्थ है इसलिये ये किताब मुझे दे गया है , इस ताकीद के साथ कि इसको ठीक प्रकार से पढ़ कर समझ कर उसको सत्ता के सभी गुर सिखला दूं। अब आगे उस पुस्तक की हर बात जस की तस।
               आज से आप शासन की बागडोर संभाल रहे हैं अर्थात आप शासक बन गये हैं , अब इस बात को पल भर को भी भुलाना नहीं है कि आज से आप राजा हैं और बाक़ी सब आपकी प्रजा। याद रखना है कि प्रजा को प्रजा ही बनाए रखना है कभी भी उसको अपनी बराबरी पर नहीं आने देना है अन्यथा आप राजा या शासक नहीं रह सकते हैं एक दिन को भी। आपका सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण कार्य है सदा राजा बन कर शासन करना। आपके लिये तमाम अधिकार आवश्यक हैं सरकार चलाने के लिये और सभी कर्तव्य आप बाकी लोगों के लिये छोड़ दें। जनता को , प्रशासन के अधिकारियों को , मंत्रियों , सचिवों और अपने सब सहायकों को बताते रहें कि उनका कर्त्तव्य है आपके हर आदेश का पालन करना। लेकिन आप खुद जो भी चाहें कर सकते हैं , कोई भी सीमारेखा आपके लिये नहीं है। कभी भी अगर कोई नियम कोई कानून कोई संविधान का प्रावधान आपकी राह में बाधा बने तो उसको तुरंत बदल डालें जनहित का नाम देकर।
         अब आपको किसी भी धर्म के लिये नहीं सोचना है , आज से सत्ता ही आपका धर्म है ईमान है भगवान है। पाप और पुण्य बाकी धर्म वालों के वास्ते हैं , आपका हर इक कर्म राज्य के हित में आवश्यक है। आपको नैतिक अनैतिक की चिंता को छोड़ हर प्रकार से मनमानी करनी है , अन्यथा शासन प्राप्त करने की क्या ज़रूरत थी। आपने चुनाव जीतने के लिये जो जो वादे जनता से किये थे उनको सदा याद रखना है और ये भी देखना है कि वो कभी भी पूरे नहीं हों। अगर शासक जनता की समस्याएं हल करने लगे और जनता को उसके सभी अधिकार देने लगे तो वो शासक नहीं रह जाएंगे बल्कि सेवक बन कर रह जाएंगे। लेकिन आपको भूल कर भी सेवक नहीं बनना है , आपको शासक बन कर राज करना है राजा बन कर , चाहे देश में लोकतंत्र हो। मगर आप जनता के सेवक हैं ऐसा प्रचार करना ज़रूरी है लोकशाही के नाम पर राजशाही कायम रखने के लिये।
   आप शासक जनता को कुछ भी देने के लिये नहीं बने हैं , आपको बार बार नये नये कर लगाने हैं अपने सरकारी खज़ाने को भर कर उसका उपयोग अपने लिये , अपने परिवार वालों के लिये , अपने प्रशासन के लोगों के लिये सभी सुःख सुविधायें उपलब्ध करवाने बेरहमी से करना है। जनता तक अपने बजट का बहुत छोटा सा भाग पहुंचने देना है ऊंठ के मुंह में जीरे के समान। लेकिन ऐसा करने को बहुत ही महान कल्याणकारी कदम घोषित करते रहना ज़रूरी है। आपको ऐसे हालात बनाने हैं कि जनता आपके सामने भिखारी की तरह भीख मांगने को मज़बूर रहे।
                 राज्य का प्रशासन , पुलिस ,न्यायपालिका आम जनता को इंसाफ देने के लिये नहीं बनाये गये हैं। इनको कभी भी ऐसा करने नहीं देना है। इन सब को अपने इशारों पर चलाने का काम करना है , इसलिये इन्हें भी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते रहने की अघोषित छूट देनी है और ज़रूरत पड़ने पर इनको बलि का बकरा बना कर अपनी खाल बचानी है। अपने अफसरों , मंत्रियों के अपकर्मों की जानकारी सबूत समेत अपने पास छुपा कर रखनी है ताकि इनमें से कोई अगर कभी आपकी राह में रुकावट डालने का कार्य करे तो उससे निपटने का काम बखूबी लिया जा सके। अब जब सत्ता आपके हाथ आ गई है तो ये कभी विचार नहीं करना है कि कभी आपको कुर्सी से हटना भी है या कोई आपको हटा सकता है। आपको यही मान लेना है कि अब कुर्सी आपकी अपनी विरासत बन गई है और आपने न केवल जीवन भर इस पर काबिज़ रहना है बल्कि आपके मरने के बाद भी इसको अपने बेटे , पत्नी या दामाद के लिये आरक्षित करने का कार्य करना है। हर सुबह आपने अपना एक आदर्श वाक्य दोहराते रहना है कि राजा कभी भी गलत नहीं होता है। आप जो भी कर रहे हैं वही सही है। यकीन माने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और देश का हर प्रधानमंत्री इस पुस्तक की हर बात पर पूरी तरह से अमल करते हैं करते रहे हैं और आगे भी करते ही रहेंगे।

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