जुलाई 19, 2018

POST : 842 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग-5 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग-5 

                                           डॉ लोक सेतिया 

  कल की कहानी ने भी निराश किया और आज की कहानी ने भी। अच्छा लिखना काफी नहीं है सच्चा लिखना पहली शर्त है सार्थक लेखन की। आप दर्शकों को भटका रहे हैं , दस मिंट की कहानी के बाद सवाल करते हैं वो क्या करेगा या करेगी और क्या करना उचित होगा क्या अनुचित। लोग दो तरह से राय देते हैं , पहले ज़मीर और नैतिक मूल्यों की बात , और दूसरे साहूलियत और सुविधा के हिसाब से अनुचित को उचित ठहराते हैं। और अंत में आप अनुचित किये हुए को उचित साबित कर कहानी का सुखद अंत करते हैं मगर उसी के साथ सभी आदर्शों विचारों को कत्ल कर देते हैं। अगर यही कहानी सुनानी है तो फिर ऐसी कहानी कोई मार्गदर्शन नहीं कर सकती , राह दिखलानी थी मगर ये रास्ते से भटका देती है। माफ़ करें जो भी लिखने वाले हैं मगर ऐसा करना क्या इसलिए उचित है कि आपको समाज की वास्तविकता नहीं दर्शानी और केवल पैसा बनाना है। 

कल बुधवार 18 जुलाई की कहानी की बात :-

कोई पत्नी अपनी चाहत पूरी नहीं होने पर अपने पति की आमदनी कम होने के कारण अपशब्द बोलकर घायल करती रह सकती है। अंत में केवल तलाक की नौबत आने और तलाक के कागज़ फाड़ देने के बाद गलती मान लेना काफी है वो भी जब पति भविष्य में उसकी हर ख्वाहिश पूरी करने का वादा करे। इतना आसान है हर किसी का आमदनी बढ़ा लेना , फिर तो हर कोई अंबानी सलमान खान अमिताभ बच्चन या अक्षय कुमार बन जाता। उधर पुरुष भी पत्नी से नफरत और अपमान मिलने के बाद किसी महिला सहयोगी से साथ पाकर पत्नी को छोड़ उसके साथ विवाह की बात सोचता है जिसके विवाहित होने का पता ही नहीं। फिर जब वो भी इनकार कर देती है क्योंकि अपने अपाहिज पति को नहीं छोड़ना चाहती और केवल साथ चाहती है खुश रहने को। इतना काफी नहीं है घर वापस आने पर अपने दोस्त की अपनी पत्नी से बातें सुनता है जो उसे तलाक लेने के बाद अपनाने की बात कहता है और बताता है उसके पास वो सब है जो वो अपने पति से चाहती है। मगर जब वो उसको छूना चाहता है तो थप्पड़ मार कर बताती है कि उसे सब अपने पति से चाहिए किसी और से नहीं। माना पति के साथ ईमानदार है मगर वास्तविक प्यार कभी अपमानित नहीं करता है , जहां आदर नहीं वहां प्यार भी नहीं हो सकता। कहानी का संदेश कुछ भी नहीं। 

आज बृहस्पतिवार की कहानी की बात :-

गुरु अपना ईमान बेच देता है अपनी संस्था चलाने की खातिर और किसी गरीब को छोड़ अमीर के बेटे को आगे बढ़ाने का काम करता है। बाप की दौलत से ऊपर पहुंच वही अपने गुरु को आईना दिखाता है मगर खुद भी उसी की राह पर चलकर सौदेबाज़ी करता है। जो बोया वही काटना पड़ता है मगर अंत में आत्मग्लानि के चार डायलॉग बोलने से कुछ भी वास्तव में सही नहीं होता है जैसा दर्शकों को समझने को कहा जा रहा है। आज भी कम काबिल ऊंचे पायदान पर खड़ा है और अपने से अधिक काबिल को अवसर देने का काम कर कहना चाहता ही नहीं कह रहा है कि मैं तो हमेशा से उसे बढ़ावा देना चाहता था ये गुरु जी आपकी गलती है जो नहीं बढ़ सका। लेकिन गुरु को बिकने का दोषी समझने वाला खुद आज उसी व्यवस्था को दोहरा रहा है। 
शायद बाद में दर्शक सोचते होंगे इन सब बातों से सार क्या निकला। कभी जीवन में ऐसा दोराहा आये तो उनको किस तरफ जाना चाहिए किस तरफ नहीं। यहां तो कोई अंतर ही नहीं है , दोराहा घूम कर फिर इक दोराहे पर ला खड़ा करता है।


POST : 841 हर सवाल का जवाब है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       हर सवाल का जवाब है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

    जो अब तक होता रहा अब नहीं होगा। नहीं नहीं बिल्कुल नहीं। हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं। आप लोग कभी नहीं सुधर सकते जब हम नहीं सुधरे तो आपको ख़ाक सुधारेंगे। मगर हमारे पर हर समस्या का समाधान भी है। समस्या पैदा भी हम खुद करते हैं और हल भी हम ही कर सकते हैं। गब्बर सिंह से कम मत समझना। भीड़ के हिंसक होने का उपाय है कि भीड़ जमा ही नहीं होने दी जाये। हम भी खुली सभा में नहीं अपना भाषण बंद हालों में दिया करेंगे या किसी टीवी स्टुडिओ में सीधा प्रसारण या फिर रेडिओ पर। सोशल मीडिया से जितना फायदा उठाना था उठा लिया , अब हमारे लिए घाटे का सौदा है।  रोक लगानी तो है अगर अदालत कोई अड़चन नहीं खड़ी करे। नशा करने की आदत बढ़ती जा रही है और इस कारोबार में मुनाफा भी बहुत है , क्यों नहीं शराब सिगरेट की तरह बाकी नशे का भी लाइसेंस जारी किया जाये। जनता नशे में हो तो कुछ नहीं मांगती है कोई अधिकार नहीं रोटी नहीं घर नहीं कारोबार नौकरी नहीं। सरकार को नशे को बढ़ावा देना चाहिए , नशा करने वाले नशे के लिए पैसा खुद हासिल करना जानते हैं।  उनको बस नशा मिलना चाहिए। लोग छुप कर बुरे काम करते हैं , उनको सभी गंदे काम करने की सुविधा उपलब्ध करवाई जाये तो अपराध क्यों करेंगे। इशारा समझ लो। सरकारी कोठों पर सब मिल सकता है , पाकीज़गी की बात करना बेकार है। कलयुग की बात है कलयुग में आप बुराई को मिटा नहीं सकते , कलयुग को कलयुग रहने दो। कुछ परिभाषाएं बदली जा सकती हैं , झूठ बोलना कोई बुरी बात नहीं है।  जब बोलने वाला और सुनने वाला दोनों को पता हो झूठ बोल रहे झूठ कह रहे हैं तो वही सच है। मेरे भाषण की हर बात ऐसा ही सच है। किसी को उस पर विश्वास नहीं हुआ मगर किसी ने शक ज़ाहिर नहीं किया , मन ही मन हंसते रहे लोग। आजकल सब को इक ही बात की ज़रूरत है मनोरंजन की। सब यही कर रहे हैं , कितने डरावने वीडिओ देखते हैं और लुत्फ़ उठाते हैं और औरों को भी भेजते हैं। कोई हादिसा सामने होता है आप और कुछ नहीं करते बस वीडिओ बनाकर वायरल करते हैं अपना नाम रौशन करते हैं। हम संवेदना की बात क्यों करें संवेदना की कीमत क्या है संवेदनहीनता बिकती है। सर्वोच्च अदालत समझ चुकी है हम सभ्य समाज नहीं हैं। बाकी संसार की इक्कीसवीं सदी होगी हम सदियों पुराने युग में रहते हैं जिस में ताकतवर कमज़ोर को खाता है। हमने बाकी सभी को बेहद कमज़ोर कर दिया है , लोकतंत्र को लोकतान्त्रिक संस्थाओं को , अब जल्द विरोध करने वाला कोई नहीं बचेगा। बचे शरण जो होय। हमारी शरण में आने पर दाग़ी बेदाग़ हो जाते हैं , गंगा भले और मैली हुई है हम पापियों के पाप धोते धोते , पाप को पुण्य बना दिया है। हर गुनाह की इजाज़त है। किसी शायर की बात समझी है जिसने कहा था :-

                                इक फ़ुरसते गुनाह दी वो भी चार दिन ,

                                     देखे हैं हौंसले परवरदिगार के।

वैसे तो हमने देश को बर्बाद किया है , इल्ज़ाम किसी पुरानी सरकार पर जाए तो अच्छा। गीतकार से क्षमा चाहता हूं शब्दों की हेरा फेरी के लिए। हेरा फेरी कितनी अच्छी है इसी से समझ लो इस नाम की हर फिल्म सुपर हिट रहती है। जिस गीत में हेरा फेरी शब्द आया वही पॉपुलर हुआ है। समझ लो लोग क्या चाहते हैं।

जुलाई 18, 2018

POST : 840 ईश्वर मैं नास्तिक बन गया ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

  ईश्वर मैं नास्तिक बन गया ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

  हो नहीं हो की बहस से क्या हासिल। बस जितनी ईबादत करनी थी हो चुकी। इस उलझन से बाहर निकल आया हूं। होने नहीं होने से मुझे कोई अंतर नहीं पड़ता। की नहीं जाती अब तेरी पूजा अर्चना ईबादत परस्तिश। आज सोचा तो विचार करने लगा तुम क्या कर रहे हो। शहर शहर गांव गांव गली गली अपना ठिकाना बनवाते फिरते हो और जिनको इंसान बनाया उनका हाल कभी पूछा भी नहीं। मैंने बहुत पहले कहा था। 

        हाल पूछे आकर हमारा जो खुद , एक ऐसा भी कोई खुदा चाहिए।

     जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए , ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए। 

 तुम आये ही नहीं कभी , मैं ही जाता रहा तुझे मिलने तुझसे शिकायत करने तुझसे हाल ए दिल कहने। ये इश्क़ एकतरफा था , तुमने कभी इज़हार ए इश्क़ किया ही नहीं। मुझे प्यार करते तो क्या इतने दर्द देते इतनी परेशानियां इतनी सज़ाएं किस गुनाह की। नहीं मेरी भूल थी तुम खुश होते अगर मैं रात दिन तुम्हारा नाम रटता तुझे सुबह शाम मनाता आरती करता और अगर पास नहीं थी दौलत तो किसी भी तरह जमा करता औरों से छल कपट कर और तेरे को उसका कुछ हिस्सा देता रहता। तब दुनियादारी को समझ मैं भी अमीर कहलाता। गरीबों का कोई भगवान है ही नहीं। आलिशान भवन कितने और दौलत के अंबार और छप्पन भोग तेरे लिए हैं ऐसे में बेघर भूखों की चिंता क्यों करते। तेरे नाम पर क्या क्या नहीं होता अन्याय मगर तुम खामोश तमाशा देखते रहते हो। मरने के बाद क्या न्याय करोगे कौन जाने , देख लेंगे जब कभी सामने आया वो बही खाता वो धर्मराज की अदालत। चलो अपनी दुनिया का हाल सुन तो लो। चाहे कुछ भी मत करना। 
 
           ताकत धन दौलत शोहरत जिसे जितनी मिलती है उतना ही लोभी लालची और अहंकारी बन जाते हैं। जिस को जितना जनता सर पर बिठाती है वो उतना ही निरंकुश बन जाता है। कहते हैं अपने सिवा किसी को नहीं रहने देना , यही उनका लोकतंत्र है। सर्वोच्च न्यायालय केवल सलाह दे सकता है , सलाह मानता कौन है। उपदेश देने वाले हैं सभी पालन करने वाला कोई हो तो मूर्ख अज्ञानी कहलाता है। भीड़ बनकर जो मर्ज़ी करो भगवान भी तमाशाई है सरकार भी तमाशाई ही नहीं सहयोगी है। इसी भरोसे तो बढ़ रहा है भीड़ के न्याय का चलन। वह रे भक्त वह रे भगवान , क्या बढ़ रही है तेरी शान , हो गया कितना बदनाम। जानता हूं ये सब किसी सभा में कहूंगा तो क्या होगा , भीड़ मुझे नास्तिक होने की सज़ा देगी। जिसे वो मानते हैं सब को मानना होगा अन्यथा इस जहां को छोड़ना होगा। जितनी सत्ता की हद बढ़ती गई उतना अभिमान अपने पर बढ़ता गया और अपना हर काम महान लगने लगा। 
 
              माफ़ करना धर्म की किताबों को पढ़कर उकता गया हूं। आदमी को भाग्यवादी ही नहीं कायर बनाती हैं। अन्याय अत्याचार से खुद नहीं लड़ते भगवान के भरोसे रहते हैं , लोग पूजा आरती करते रहे और लूटने वाला सब लूट कर ले गया। इतना अंबार क्यों जमा कर लिया तुमने जिस को बचाने भी नहीं आ सकता। हम गीता का संदेश पढ़ते रहे , यदा यदा .....   आया नहीं कोई कृष्ण इस कलयुग में। अभी भी नहीं समझा तो क्या मरने के बाद मेरी लाश समझेगी वास्तविकता तेरी। भीड़ की भेड़चाल से घबरा कर भी तेरा नाम नहीं लूंगा। कोई मतभेद नहीं है हमारे बीच , जितनी निभ गई बहुत है , इक पंजाबी ग़ज़ल है , क्या कहते हो जितना साथ रहा काफी नहीं। अब अपने अपने रास्ते जाएं हम दोनों। ये ज़रूरी तो नहीं तुम मुझे प्यार करो , ये भी तो बंदिश नहीं कि मैं तेरे प्यार की खैरात मांगू। मुझे तो सरकार से भी हक चाहिएं अधिकार पूर्वक भीख या खैरात नहीं। मेरी ग़ज़ल सुनोगे , पिछली सरकार के वक़्त की कही हुई है जो आज भी सही है।

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे।

इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे।

रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे।

बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे।

जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे।



जुलाई 17, 2018

POST : 839 या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो( आलेख ) 

                                      डॉ लोक सेतिया 

  कहो भी क्या कहना है , अब बोलते क्यों नहीं।  नानी मर गई है क्या। ये हाल चाल पूछना है ये हालत खराब करना। माफ़ करना आपकी अदालत में आना बहुत बड़ी भूल थी। जाने आजकल की महफिलों को ये क्या हुआ है। शोर तो है वाह जनाब माशाआलहा का मगर आवाज़ है कि दबी दबी सी लगती है। दिन का उजाला है फिर भी दिखाई कुछ भी नहीं देता है। कितने आफ़ताब धरती पर चमकते हुए हैं पर अंधियारा है कि मिटने को राज़ी ही नहीं। सब ज्ञानी हैं सभी कुछ की जानकारी है राजनीति से लेकर धर्म तक और देश भक्ति से लेकर समाजसेवा तक हर किसी को खबर है। खबर नहीं फिर भी कौन हैं हम क्या हैं , किधर को जाना चाहते थे और आ गए किस जगह हैं। ज़ुबान है कि बोलती नहीं है , आंखें हैं लेकिन दिखाई कुछ भी नहीं देता है , कानों में शोर कितना है मगर सुनाई कुछ नहीं देता है। हाथ भी हैं मगर उन्हें कानों को ढकने तक की कोशिश करना बेकार है। बिना किसी हथकड़ी बंध गये हैं , ताली बजाने के इलावा हिलते भी नहीं हैं। आप कहते हो बताओ सब बढ़िया तो है। दिल भी क्या बुरा है दुश्मन ए जां पर फ़िदा है , इश्क़ की दास्तान है। ऐसे में कोई ग़ालिब नहीं दाग़ नहीं मीर तकी मीर नहीं। ग़ज़ल की बात कौन करे , दर्द को समझता है कौन , जाने ये किस तरह की शायरी है। हज़ारों सुनने वाले हैं सुनाने वालों को सलीका नहीं हो तो सुनने वालों को शऊर कैसे आये। मजमा लगाने जैसी बात है दिल से दिल में उतरने वाली कोई बात नहीं है। गद्य पद्य दोनों की दशा एक जैसी है। शोहरत तो बहुत है , दौलत भी बहुत है , नज़ाकत की बात खो गई है। ग़ज़ल गाई किसी ने तो ग़ज़ल छुपकर खड़ी थी ख़ामोशी से रो गई है। शायर को पता भी नहीं चला वो अपना दामन अश्कों से भिगो गई है। अजीब सी घुटन लग रही है ये कैसी बरसात हो गई है। अपने अश्कों में मेरी दुनिया डुबो गई है। मुंशी जी आपकी कहानी खो गई है मूंगा से पूछा यहां क्यों खड़ी है , भूल गई कहना था , तेरा लहू पीऊँगी। न उठूंगी। मुंशी ने पूछा कब तक पड़ी रहोगी। नहीं बोली जो कहना था , तेरा लहू पीकर जाऊंगी। गरीब की हाय लगती नहीं आजकल। नमक का दरोगा , दो बैलों की कथा। प्रेमचंद कोई नहीं है कहानियां कितनी बदनसीब हैं। परसाई श्रीलाल शुक्ल ये सभी व्यंग्यकार लिखते रहे मगर बदला क्या जो मेरे लिखने से बदलेगा। नींद क्यों रात भर नहीं आती। 
 
            यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिए , खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए। घर से चले थे हम तो ख़ुशी ( अच्छे दिन ) की तलाश में , ग़म राह में खड़े थे ( बदहाली ) वही साथ हो लिए। होटों को सी चुके तो ज़माने ने ये कहा , ये चुप सी क्यों लगी है अजी कुछ तो बोलिए। अब समझे आप सरकार ने सवाल किया है बोलते क्यों नहीं। आमदनी दुगनी हुई कि नहीं। इधर कुआं उधर खाई। जो बोलने को सिखाया छमिया बोल गई तो लोग पूछते हैं दिखा दोगुनी कमाई कहां छुपाई है। धान की फसल बर्बाद हुई तो जिस सीताफल की बात करती हो साथ की सभी महिलायें जो था वो भी लुटा बैठी हैं। ये गणित बहुत कठिन है अलजब्रा मुझे समझ नहीं आता किसी ने फेसबुक पर पोस्ट पर लिखा। थोड़ा इंतज़ार करो अभी जिओ का उत्कृष्ट संस्थान खुलेगा तो पढ़ाई करना , जो पहले पढ़ा लिखा सब फज़ूल था। आजकल यही अच्छा है हर किसी के पास स्मार्ट फोन है जो मर्ज़ी करो।  मगर रुकना आज सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है नफरत फ़ैलाने वालों पर कठोर कानून बनाओ। अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारो , सबसे अधिक नफरत किस ने फैलाई है। हम अच्छे बाकी सब बुरे यही उनका प्यार का सबक है। जो हमें अच्छा नहीं मानते देश की भलाई नहीं चाहते। किसी का विरोध अपराध ही नहीं क्या क्या नहीं हो गया। चुप रहो इस शहर में रहना है सच कहना है तो कोई और जगह तलाश करो। मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूं , जो कहते हैं उनको कहने दो। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो। 
 

 

जुलाई 15, 2018

POST : 838 वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है , हम कभी उनको कभी अपने घर को देखते हैं। 

 स्वागत है आपका मेरे शहर में महोदय। जब कोई घर आता है तो हंस कर अभिवादन करते हैं। ऐसे में अपने दुःख दर्द की बात नहीं करते। आंसू आने लगें तो छुपा लेते हैं रोक लेने चाहियें फिर भी छलकने लगें तो कहना चाहिए आंसू ख़ुशी के हैं। आंसू का कोई रंग नहीं होता जाति धर्म नहीं होता आंसू ही हैं जो सुख दुःख दोनों समय काम आते है। आज देश के राष्ट्रपति आ रहे हैं कई दिन से खबर पढ़ते रहे है क्या क्या प्रबंध किये जा रहे हैं। आज सुबह सैर पर गया तो देखा सड़कें धुली धुली हैं , फॉयर बिर्गेड की गाड़ियां खड़ी हैं कई तैयार और पुलिस की जिप्सियां वाहन दौड़ते फिर रहे हैं। अनाज मंडी के पीछे किसान विश्राम भवन की बंद दिखाई देने वाला गेट खुला हुआ है साफ सफाई की जा रही है चार पांच गाड़ियां पोर्च में खड़ी हैं जिन पर वीआईपी का लेबल चिपका हुआ है। मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं है आपकी शानो शौकत पर , आपके घर रौशनियां हों मगर हर गरीब के घर भी इक छोटा सा दिया भी जलता रहना चाहिए। सबको अपने हिस्से का आसमान मिले। मुझे नहीं लगता असली किसान उस भवन में आराम करना तो क्या कभी अंदर भी जा सके होंगे।  मगर सरकारी लोग किसान से लेकर कुछ भी होने का लाभ उठा सकते हैं।  उनकी मर्ज़ी।   
 
                          अभी कुछ शेर दुष्यंत कुमार के याद करते है। 
 
आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन , इस समय तो पांव कीचड़ में सने हैं। 
 
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में , हम नहीं हैं आदमी , हम झुनझुने हैं।
 
हरियाणा की सरकार चाहती है हम निराशा की बातें छोड़ आशावादी बातें करें। उनके आये दिन आयोजित तमाशों को देख कर आनंद लें खुश होकर ताली बजाएं। यथार्थ की बात करना निराशा नहीं होता है , अंधेरा है जब तक नहीं स्वीकार करोगे दिया कैसे जलाओगे। 
 
मत कहो आकाश में कुहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। 
 
दोस्तो ! अब मंच पर सुविधा नहीं है , आजकल नेपथ्य में सम्भावना है। 
 
आजकल सवाल करना जुर्म है। आपकी देशभक्ति कटघरे में खड़ी कर देते हैं। हम इतना तो कह सकते हैं दुष्यंत की तरह। 
 
इस अंधेरे में दिया रखना था , तू उजाले में ही बाल आया है। 
 
हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है।
 
बस दो शेर और दुष्यंत कुमार के सुनाकर फिर अपनी बात कहता हूं। नहीं कहूंगा तो खुद अपना ज़मीर मुझे मुजरिम ठहराएगा। घबरा गया सच लिखने से , डर गया डराने से। फिर ज़िंदा क्यों है। 
 
ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो। 
 
किसी भी कौम की तारीख़ के उजाले में , तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो। 

आज सब चाक चौबंद है राष्ट्रपति जी और उनकी धर्म पत्नी जी को आना है। हमेशा सब चाक चौबंद क्यों नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे आज ही हर बात हो सकती है सब उपाय करने चाहिएं। क्यों सब उपाय हमेशा नहीं हों कि केवल किसी वीवीआईपी के आने पर महीनों सब ठीक करना पड़े वो भी अगले दिन फिर से खराब होने देने के लिए। जब कोई किसी बड़े पद पर होता है तो अजीब अजीब ख्वाहिशें दिल की पूरी करता है , कोई सेना के लड़ाकू विमान की सैर करता है कोई समंदर में युद्धपोत पर जाता है। जब जंग हो क्या उनको करना है ये सब , रहीसाना शौक हैं जो देश का कितना धन खर्च कर पूरे किये जाते हैं। इनका अर्थ कुछ भी नहीं। मगर ये तमाम लोग गरीबी की बात ही नहीं करते बल्कि दावा करते हैं खुद इन्होने गरीबी देखी है। देखी थी माना मगर क्या आज गरीबी का दर्द याद है , वो भूख वो बेबसी वो मौत से बदतर जीना। अगर याद है तो आप राष्ट्रपति हों प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री या संसद विधायक या किसी भी बड़े पद पर आसीन लोग , किस तरह इतने संवेदनाहीन हो जाते हैं कि करोड़ों लोगों की भूख मिटा सकता है इतना खाते हैं और उससे ज़्यादा उड़ाते हैं। ये देश के गरीबों की रोटी से खेलने वाले कौन हैं , क्या देश सेवक हैं , देशभक्त हैं।




जुलाई 14, 2018

POST : 837 आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

          कितना आगे बढ़ गया अब देखो इंसान। मैं अभी तक किसी और ही दुनिया में था। ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। हम अपने माता पिता को उनके चले जाने के बाद सालों तक भुला नहीं पाते हैं। कभी कभी तो अजनबी लोग भी इतने अच्छे लगते हैं कि उनकी मौत की खबर पर यकीन नहीं होता है। कल ही तो देखा था भला आज कैसे हो गया ये सब। माना हादिसे होते हैं तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते कुदरत भी क्या क्या कहर ढाती है। दुर्घटना में बाढ़ में बिजली गिरने से मौत कब कैसे आती कोई कुछ नहीं कर सकता है। हर दिन शोकसभा में सुनते हैं ऊपर वाले की मर्ज़ी है क्या कर सकते हैं। दुआ मांगते हैं आत्मा को सद्गति दे ऊपर वाला और उसके प्रियजनों को दुःख सहने की शक्ति दे। सच कहूं अभी भी लिखने का साहस नहीं हो रहा है या फिर अभी भी यकीन नहीं हो रहा जो हुआ सच वही हुआ जो मुझे दिखाई दिया। नहीं भला ऐसे कैसे हो सकता है। या फिर कोई वास्तव में इतना ज्ञानी हो सकता है जो भगवान कृष्ण के अर्जुन को गीता के सन्देश की बात को समझ गया हो। मरना है सब को और इस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर खुद उसी ने शोकसभा आयोजित क्यों की और सब को सूचना भी दी। और लोग माना शोक प्रकट करने जाते हैं केवल नाम को ही मगर जिसका अपना नहीं रहा उसका दुःख अपना ही होता है हज़ार लोग बांटने को आएं संवेदना व्यक्त करें वास्तव में कम नहीं होता है। मगर कोई अपने माता पिता के आकस्मिक निधन को ऐसे स्वाभाविक घटना की तरह समझ इस तरह से बातें कर सकता है जैसी कुछ हुआ ही नहीं हो मेरे लिए समझना कठिन है। मेरी खुद की आयु साठ साल है , क्या मतलब उसकी अस्सी साल से अधिक होगी और कितना जीना चाहिए। पास बैठा कोई दूसरा साथ दे रहा था ये अच्छा है दो तीन दिन आई सी यू में रहा नहीं तो महीनों बिस्तर पर पड़े रहना बहुत खराब मौत होती है उसके बाद। आपस में बातें कर रहे थे कोई रोग नहीं था कोई परेशानी नहीं थी घर से निकले भले चंगे और अचानक ये असंभव सी बात हो गई। बहुत आराम से रहते थे पेंशन मिलती थी पचास हज़ार से अधिक हर महीने और इस आयु में खाना पीना क्या होता है दाल सब्ज़ी , रोग भी कैसे होते हैं तेज़ाब बनना या गैस या कब्ज़। 
 
               छोड़ यार अपनी बात बताओ किस किस देश में सैर की। और उसके बाद आधा घंटा तक विदेशों की बात होती रही। होटल की खाने पीने की और वहां के तौर तरीकों की। किसी पार्टी में जाकर जैसे चर्चा करते हैं। मुझे मौत से डर नहीं लगता मगर ये मौत मुझे डरावनी लगी।  क्योंकि अधिकतर लोग जीना चाहते ही नहीं या जीना जानते ही नहीं मगर शायद बहुत थोड़े लोग होंगे जो सच में हर हाल में ज़िंदा रहते हैं। ऐसे व्यक्ति का निधन विचलित करता है , उसे जीना था जीना जनता था जीता भी था और जीना चाहता भी था। नहीं उसे इस तरह नहीं जाना था , ये नहीं सोचा था उसने। उसकी ज़िंदगी में कितनी अनहोनी घटनाएं घटी फिर भी वो ज़िंदादिल ज़िंदगी से हारा नहीं कभी। हम तो कायर लोग हैं जो जीना जानते ही नहीं और मौत से भी डरते हैं इसलिए जीते हुए भी मरते हैं। मैंने बहुत कम लोग अपने सामने ऐसे देखे हैं जिनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखाई देती बेशक उनके भीतर कितने समंदर गहराई में दर्द वाले दबे रहते हैं। मैं तीस साल से जनता रहा हूं उनको अपने शहर में आकर आते जाते , फिर बसते हुए , और अब पता चला वो चले गए थे इस शहर से किसी और शहर , जहां से और और आगे चले गये हैं किसी दूसरी दुनिया में। जो मर गया उसे क्या फर्क पड़ता है कोई उसके जाने से दुखी है या नहीं।  सुनते रहे हैं कुछ लोग वसीयत मिलने पर खुश होते हैं , मगर यहां तो सब पहले दे दिया था उन्होंने। आदमी में और मशीन में एक ही अंतर है कि मशीन को सुख दुःख का एहसास नहीं होता है। आदमी की रगों में लहू बहता है जो लाल रंग का होता है , कहावत सुनी थी उसका लहू सफ़ेद हो गया है। शायद कुछ ऐसा ही लगा मुझे। 
 

 

जुलाई 12, 2018

POST : 836 जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 4 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -4 

                                   डॉ लोक सेतिया 

  आज की कहानी वास्तव में बेहद कठिन मोड़ की बात थी। इक पिता जो छोटी सी नौकरी में बेहद ईमानदारी से काम करता है , जिस जगह काम करता है जो मालिक था वो अब नहीं है और उसका बेटा उसे नौकरी से हटा नहीं सकता क्योंकि मरने से पहले उसे पिता ने ऐसा कहा था। ऐसे में जब वो अपने आज के मालिक से क़र्ज़ मांगता है तो खरी खोटी सुना मना कर देता है। मगर तभी शाम को उसे दस लाख रूपये बैंक में जमा करवाने को देकर भेजता है लेकिन बैंक पहुंचने पर बैंक बंद हो गया होता है। विवशता में इतनी बड़ी रकम उसे घर में रखनी पड़ती है , सुबह होने पर पता चलता है कि रात को घर में चोरी हो गई है। मालिक उसे पुलिस थाने ले जाता है और उसी पर शक जताता है कि तभी पुलिस का हवालदार इक चोर को पकड़ कर लाता है उसी बैग के साथ। मगर बैग में कोई पैसा नहीं होता और चोर स्वीकार करता है कि हां मैंने चोरी की है मगर इस बैग में कुछ भी नहीं था। पुलिस मानती है कि वो चोर से चोरी की राशि बरामद कर ही लेंगे , मगर घर आने पर उसे पता चलता है कि चोर की चोरी से पहले उनकी अपनी औलाद ने ही पैसे चुरा लिये थे अपनी अपनी ज़रूरत को पूरा करने की खातिर। इस बात की चिंता किये बगैर कि उनके ऐसा करने से पिता पर क्या क्या मुसीबत आ सकती है। अभी कहानी को यहीं रोक कर स्टुडिओ में बैठे लोगों की बातें करते हैं। 
 
     बेटे बेटी ने चोरी की बहुत लोग इसे उनकी मज़बूरी ही नहीं बता रहे थे बल्कि पिता को ही कटघरे में खड़ा कर कह रहे थे वो अच्छा पिता नहीं साबित हुआ क्योंकि बच्चों की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता था। अब उनकी मज़बूरी या ज़रूरत भी जानना ज़रूरी है। बेटी की ससुराल वालों की मांग और बेटे को नौकरी मिलने के लिए लाखों रूपये की ज़रूरत। अर्थात जो पिता संतान की उचित या अनुचित किसी भी तरह की मांग को पूरी नहीं कर सकता है उसकी ईमानदारी किस काम की। ये बेहद खेद की बात है जो ऐसे शो में भाग लेने वाले तथाकथित आधुनिक समाज के लोग ईमानदारी और नैतिकता को अनावश्यक समझते हैं। जब एंकर ने पूछा कि क्या पिता को अपने बच्चों की चोरी की बात पुलिस को बता देनी चाहिए तो ज़्यादातर लोग नहीं चाहते थे।  उनकी चोरी और गुनाह ही नहीं अपने ही पिता से धोखा करने को बच्चों की भूल बता बचाने की बात कर रहे थे। ये सब देखकर समझ सकते हैं अगर पकड़े जाने का डर नहीं हो तो इनमें से अधिकतर कोई भी अपराध कर सकते हैं। शायद उनको नहीं समझ आया हो कि जो लोग उनकी जान पहचान के हैं उनकी राय सुनकर और उनकी सोच जानकर उन पर भरोसा नहीं करेंगे अगर कोई ऐसी घटना घट जाये। 
 
        सोशल मीडिया पर आकर कुछ भी बोलने और समझाने की आदत का ये भी साइड इफ़ेक्ट है। जब कुछ भी कहना हो किसी घटना को लेकर या कोई राय देनी हो जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। थोड़ा संयम रखना सीखना चाहिए। अन्यथा बाद में पछताना पड़ता है। यही हुआ इस कहानी के आखिर में। पिता अपने बच्चों को पकड़वाने की जगह खुद पर चोरी का इल्ज़ाम ले कर बेगुनाह को बचा खुद हवालात में बंद हो जाता है। बेटा अपनी नौकरी पाकर खुश है और बेटी ससुराल जाने की बात से खुश है , अपने पिता की बात उनको मूर्खता लगती है। मगर जिस मालिक को सभी स्टुडिओ में बैठे दर्शक बुरा भला कह रहे थे , वही जब पता चलता है की वो इंसान चोर नहीं बल्कि उस के बच्चों ने चोरी की है तो उसे आकर छुड़वाता भी है और ये भी कहता है कि जब तक आप नहीं कहोगे आपके बच्चों पर कोई करवाई नहीं करेगा। उसे अपने पिता की कही बात अब समझ आती है और वो उनको आदर देता है बड़ों की तरह और अगले दिन से काम पर आने को कहता है। ये कहानी का सुखद अंत है मगर सवाल बाकी छोड़ जाती है ये कहानी भी , मुजरिम उस कहानी के पात्र नहीं हैं , वास्तव में हमारा समाज कटघरे में खड़ा है। क्या हम खुद वास्तविक जीवन में ईमानदार इंसान की कदर करते हैं ? शायद नहीं !!


POST : 835 अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया

   अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया 

सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाय , लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। 
ओ की मैं झूठ बोलिया , की मैं कुफर तोलिया। कोइना भाई कोइना। 
 
     पंजाबी बोलियां कहते हैं इसे। आज कुछ इसी अंदाज़ में सवाल जवाब। सवाल भी आपके ही हैं और जवाब भी अपने ही हैं। उनसे सवाल क्या , और उनके जवाब क्या , कब कौन कर रहा क्या व्यौपार मत लिखो। बेदर्द शासकों को यूं अवतार मत लिखो। झूठे बयान देती ये सरकार मत लिखो। उनके फरेब की बात सौ बार मत लिखो। उनके गुनाह सब माफ़ , बदकार मत लिखो। आईन देश का क्यों गया हार मत लिखो। 

पहला सवाल :-

आपने वादे बहुत किये देश की जनता के साथ , वास्तविकता में हुआ कुछ भी नहीं। क्या आप स्वीकार करते हैं आपने जो जो कहा सब झूठ साबित हुआ। आपने कहा था मेरा कोई कसूर कोई कमी निकले तो मुझे सज़ा देना। अब आप खुद बता दो क्या सज़ा मिलनी चाहिए आपके अपराधों की। 

जवाब हाज़िर है :-

मैंने कोई गलती नहीं की , कोई गुनहगार नहीं हूं मैं , मैंने तो कोई कमी नहीं छोड़ी। जिस खुदा पर भरोसा था कि वो मेरी हर इच्छा को पूरी करेगा। जैसे ऊंचे सिंघासन पर बिठाना। उसी पर छोड़ा था सब को अच्छे दिन दिखाना ज़रूर बेशक दूर से ही। शायद उसने दिखलाये भी होंगे मगर जब दिखा रहा तब लोग नहीं देख रहे थे। लोगों का ध्यान इधर उधर बहुत रहता है। कोई मंदिर कोई भगवान का दर नहीं बचा जिस चौखट पर झुकाया नहीं जाकर सर अपना। सब जानते हैं जो भी करता है वही करता है , उसने किसकी झोली भरी किसकी खाली रही ये उसी की मर्ज़ी है। अल्लाह जो करता है मंज़ूर करना पड़ता है , मेरे चाहने से क्या हो सकता है। 

दूसरा सवाल :-

आप अपनी नाकामी को ऐसे ढक नहीं सकते हैं। आपको अपने भगवान राम दोषी लगते हैं।  भगवान को राजनीति में लाना उचित नहीं है। अपने वादे आपको पूरे करने थे राम जी की मर्ज़ी नहीं आती आड़े इस में। 

जवाब हाज़िर है :-

आपने राम और रहीम को मिला दिया है जो सही नहीं है। राम जी ने अपने भक्तों की भलाई करनी थी , अल्लाह ने अपने बंदों की भलाई करनी थी। और जो हर किसी को मानते हैं उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। सबसे पहले आपकी आस्था एक में होनी चाहिए। हर किसी की चौखट पर जाने वाले खली हाथ रहते हैं। 

तीसरा सवाल :- 

संविधन देश को देश की सरकार को धर्म निरपेक्षता का सबक पढ़ाता है। आपको अपना काम करना है कोई खुदा कोई अल्लाह कोई यीशु मसीह कोई वाहेगुरु आपको रोकने नहीं आया होगा। राजधर्म को छोड़ आपने सब धर्मों की चिंता की , अपना वास्तविक धर्म निभाया ही नहीं। 

जवाब हाज़िर है :-

मुझे दोष देते हो अपना काम खुद नहीं करना ज़रूरी समझा और भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ दिया। मगर देश आजतक भगवान भरोसे ही चलता रहा है , मैंने मेरी सरकार ने भी वही किया जो पहले की सभी सरकारों ने किया है।  बड़ा गर्क देश का। जनता भी तो सब हरि इच्छा पर छोड़ती है। किसे क्यों चुनती है कभी सोचती ही नहीं। हम नेताओं के वादे सुनती है और लालच में आ जाती है। अगर खुद अपने बीच से अच्छे सच्चे और ईमानदार लोगों को चुन कर भेजती तो अपने आप सब ठीक हो जाता। आप बताओ 125 करोड़ की आबादी में क्या 543 लोग ऐसे नहीं हैं जिनको कोई वेतन सुविधा नहीं चाहिए देश की सेवा करने के बदले। खुद कांटों को बोती है स्वार्थी नेताओं को वोट देकर। 

अंतिम सवाल :-

आपको क्या लगता है देश में वास्तविक लोकतंत्र कैसे मज़बूत हो सकता है। कोई मसीहा तो आकर कुछ नहीं करेगा। भविष्य क्या है और कैसे बदल सकता है। 

जवाब हाज़िर है :-

वोट देना काफी नहीं है लोकतंत्र को समझना होगा। राजनेता कभी मसीहा नहीं बन सकते हैं।  उनका मकसद सत्ता होता है। पांच साल इंतज़ार नहीं किया करती ज़िंदा कौमें याद रखना। जो सरकार मनमानी करती हो और सत्ता मिलते ही आम जनता की बातों को महत्व नहीं देती हो उसका विरोध करना चाहिए। मगर यहां जो बात सबसे महत्वपूर्ण है विरोध किसी भी नेता या सरकार की इजाज़त लेकर नहीं हो सकता है। अधिकार पाने को संघर्ष करना पड़ता है हर राज्य हर मुल्क की जनता को। कोई भी थाली में रखकर परोस कर आपको हक नहीं देता है।


जुलाई 11, 2018

POST : 834 एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया

  एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत  ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया 

     अमर्त्य सेन के नाम से दुनिया वाकिफ है , मगर भारत देश में बहुत थोड़े लोग जो अख़बार टीवी और शिक्षा अर्थशास्त्र से या फिर लेखन से जुड़े हैं परिचित हैं। अन्यथा आप किसी से पूछो तो जवाब मिलेगा नहीं जानते या फिर नाम सुना तो है कोई मीडिया से जुड़ा होगा। उनकी किताब आई है " एन अनसर्टेन ग्लोरी "  उस इंग्लिश नाम का उर्दू में अनुवाद है।  मगर ऐसा खुद उनकी बात हरगिज़ नहीं है क्योंकि उनकी शोहरत दुनिया मानती है। इंडिया जो भारत है उसकी सरकार जिनको देश में रहते नहीं पहचानती है उनको जब नोबेल  पुरुस्कार मिलता है तब सम्मानित करती है संसद में बुलाकर भी। मगर जिस कारण उनको नोबेल पुरुस्कार मिला उस अर्थशास्त्र की बात नहीं मानती है। अपनी इस नई किताब में उनका कहना है कि 2014 में इंडिया जो भारत है ने उल्टी दिशा में इक लंबी छलांग लगाई है। उधर इक उच्च अधिकारी वित्त मंत्रालय में हैं हंसमुख आधिया उनका कहना है कि जी एस टी की नाकामी की वजह इनफ़ोसिस का बनाया सॉफ्टवेयर है जो ठीक काम नहीं कर रहा है। हम इस सब को यहीं छोड़ देते हैं ये सियासत की बातें हैं अपनी समझ से बाहर हैं। दुनिया के दस्तूर निराले हैं नाम शोहरत वालों के पीछे दौड़ती है मगर जो वो कहते हैं सुनती ज़रूर है मानती कभी नहीं है। 
 
                इक पुलिस वाला आया कागज़ों का पुलिंदा लेकर , दूर किसी शहर में कब से कोई मुकदमा चल रहा है और आपकी लिखावट पाई गई है , आपको वहां की अदालत में जाकर गवाही देनी है। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्या है , मगर अदालती नोटिस है जाना तो होगा ही। अदालत जाने पर मालूम हुआ कि बहुत पहले इक रचना भेजी थी , मैंने ख़ुदकुशी नहीं की , मेरा कत्ल किया गया है। सच के कत्ल होने की बात थी मगर उस में अदालत पुलिस कहां से आ गये। पता चला कि डाकिया जब डाक को छांट रहा था इक लिफाफा खुल गया और उसने पढ़ भी लिया। उसने समझदारी दिखाते हुए जिनको भेजी गई थी रचना उनके बारे ये समझा कि किसी ने ख़ुदकुशी से पहले उनको दोषी बताया है। पुलिस ने करवाई की और उनको पकड़ लिया , इतना ही नहीं कागज़ों पर आदान प्रदान करते उस नाम के व्यक्ति की मौत की पुष्टि और जाने क्या क्या कर दिया। मैंने कहा न्यायधीश महोदय ऐसा कोई कत्ल वास्तव में नहीं हुआ और ये केवल इक व्यंग्य कहानी है सच के हो रहे कत्ल के बारे में। न्यायधीश बोले तुमसे जो सवाल पूछे जाएं उनके जवाब देने हैं। सच को कत्ल किया गया , तुम मानते हो। ये लोग भी सच को कत्ल करते हैं , आपको ये भी लगता है। लिखावट आपकी है इस से मुकर नहीं सकते। अभी तो आप सरकारी गवाह हैं आपको आने जाने का खर्चा भी मिलेगा , अगर बचाव पक्ष को बेगुनाह बताया तो तुम्हें भी उन्हीं में शामिल किया जा सकता है। भोजन अवकाश में पुलिस वाला समझाने लगा जैसा हम चाहते हैं वही बयान दो इस में तुम्हारी भलाई है। ये बड़े लोग हैं और टीवी मीडिया सब इस खबर को कवर कर रहे हैं। तुम्हारा नाम हो जायेगा और मश्हूर हो जाओगे। आप क्या सलाह देते हो सरकार और नेताओं की तरह झूठी शोहरत हासिल कर लूं। अपनी आत्मा अपने ज़मीर को मार कर खुद की खुदी को बेच कर ख़ास लोगों में शामिल कर इस मुकदमें पर टीवी अख़बार में बहस का हिस्सा बन धन दौलत जमा करने लग जाऊं इनकी तरह से। नहीं होगा मुझसे। अदालत को सब सच सच बताया और सबूत भी दिया कि ये रचना कई जगह छप चुकी है बहुत पहले ही और मेरे ब्लॉग पर भी लिखी हुई है। मुकदमा झूठा है बताना संभव नहीं था इसलिए अदालत ने निर्णय दे दिया है साक्ष्य नहीं मिलने और अभी तक सच की लाश बरामद नहीं हो पाने से सबूतों के आभाव में बरी किया जाता है।

POST ; 833 जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 

    आग को हवा देना उसमें मिट्टी का तेल डालना किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कना कोई भी कर सकता है। दूर से बैठे तमाशा देखने वालों की कमी नहीं है , आग लगी हो उसको बुझाने कोई नहीं जाता। सब अपना दामन बचाते हैं , किसी को नहीं मतलब कि आग बुझाई नहीं तो कभी अपना भी घर जला देगी। जो कभी खेत खलिहान नहीं गये धूप में हल नहीं चलाया सर्दी की बर्फीली रात को खेतों को पानी देने नहीं गये बरसात और तूफ़ान में खुले आसमान में अपनी फसलों को बचाने में अपनी जान का जोखिम उठाया नहीं। उनको अनाज की समर्थन मूल्य की कीमत कैसे समझ आएगी। लेकिन मुझे बात और करनी है देश की देश के सर की स्वाभिमान की। किसान की बात इसलिए की क्योंकि भले कभी मेरे पास खेती की ज़मीन थी मगर मैंने खुद कभी किसानी नहीं की , बहुत मेहनत का काम है। बस इसी तरह लोग देश की समस्याओं पर समझे बगैर बोलते हैं। आपने इश्क़ किया है कभी , नहीं किया तो आप क्या जानों ये क्या बला है। अभी भी आपको इश्क़ का मतलब आदमी औरत की मुहब्बत लगा हो तो हैरानी की बात नहीं है। इश्क़ मुहब्बत वतन से भी होता है और करने वाले खुदा से भी मुहब्बत करते हैं , मेरा जूनून है लिखना ये मेरा इश्क़ है। सच कहता हूं जब कोई बात विचलित करती है देश की समाज की तो नींद नहीं आती बेचैनी बढ़ती जाती है। आसान नहीं होता है किसी विषय पर लिखना , पहले सोचना समझना पड़ता है हर तरह से हर तरफ से। लोग पढ़ते हैं या नहीं मगर केवल शीर्षक देख कर अपनी राय बना लेते हैं। पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं। किसी ने अपने करीबी ने मुझे इक वीडियो भेजा जिस में बेहद खराब भाषा का उपयोग तो किया गया ही था साथ में महिलाओं को लेकर अपनी गंदी सोच को भी उजागर किया गया था। कश्मीर को इक बेवफा औरत बता रहे थे , और जो जो बोल रहे दोहराना भी अनुचित है। शायद इन्होंने ही कुछ समय पहले सेल्फी विद डॉटर की बात भी की हो जिसे आजकल शायद कम लोग करते हैं। उन्हें कुछ भी पता नहीं है , देश का बटवारा रियासतों का भारत पाकिस्तान में जिसे मर्ज़ी चुनना और कश्मीर के राजा का भारत में मिलने का निर्णय और उसके बाद बहुत कुछ जिसे इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता। उन्हें कुछ नहीं पता धारा 370 क्यों और कश्मीर को विशेष दर्जा देने का कारण क्या था। क्यों शेख अब्दुल्ला को सालों तक कैद रखा गया और किस ने उनसे समझौता किया ताकि कश्मीर के लोगों को भारत में शामिल होने को राज़ी किया जाये और उनके दिलों को जीत कर भरोसा दिलाया जाये उनकी कश्मीरियत को बचाये रखने का। ये जो लोग सवाल करते हैं कश्मीर से मिलता क्या है और उस पर खर्च कितना आता है , उन्होंने कभी विचार ही नहीं किया कि इस देश में जिस में भूख है गरीबी है एक राष्ट्रपति निवास जो 150 एकड़ में फैला हुआ है उसी के रखरखाव पर करोड़ रूपये तक हर दिन खर्च किये जाते हैं। देश में बहुत राज्य हैं जिनको अधिक सहायता की ज़रूरत होती है और खर्च  करने पड़ते हैं मगर ऐसा किसी का उपकार नहीं है संविधान सभी को बराबरी की बात करता है। इस तरह की बातें करने वाले शायद जानते ही नहीं कि देश की संसद ने संकल्प लिया था कोई। स्वाभिमान को सिक्कों से नहीं तोला जा सकता। कश्मीर सर के ताज की तरह है और आप कहते हैं उस पर मुकट की ज़रूरत क्या है। हम लोग शायद कभी नहीं समझना चाहते कि कुछ चीज़ें राजनीतिक फायदे नुकसान से ऊपर होती हैं , और जो लोग राम मंदिर समान नागरिक संहिता धारा 370 की बात करते हैं उनको सत्ता की चाहत थी उनका मकसद किसी समस्या का समाधान नहीं था। सत्ता मिली तो सत्ता को बनाये रखना ही ध्येय बन गया। आज वो किसी वादे की बात नहीं करते , अच्छे दिन कब आएंगे या आये तो किसके हिस्से में , या फिर यही जो आजकल हैं वही हैं अच्छे दिन। ऐसे सभी कठिन सवालों से बचने का ढंग है जनता को आपसी भेदभाव जाति धर्म क्षेत्रवाद के नाम पर बांटना। कश्मीर पर कितना धन खर्च होता है के साथ कभी पता करना दिल्ली पर कितना धन खर्च होता है , इससे भी आगे बाकी दिल्ली और लुटियन की दिल्ली में कितना अधिक अंतर है। हर बात पर बिना जाने समझे कुछ भी कहने से पहले समझना होगा वास्तविकता को। समझने को फुर्सत नहीं पढ़ने की आदत नहीं लिखने को वीडियो बनाने को स्मार्ट फोन है। तलवार हाथ में आना काफी नहीं है , तलवार सुरक्षा भी करती है और ज़ुल्म अत्याचार भी करती है। बोलने की आज़ादी दोधारी तलवार की तरह है। गांधी जी कहते हैं इंसान बोलना दो चार साल में सीख जाता है मगर जीवन गुज़र जाता है ये सीखने में बोलना क्या है और कैसे है। ग़ालिब का इक शेर है। इस विषय का अंत करना बेहद मुश्किल है।  सागर को गागर में भरना किसे आता है। ग़ालिब की बात को समझना ज़रूरी है :-

                      हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ,

                      तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ्तगू क्या है।

                     रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल ,

                     जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

जुलाई 09, 2018

POST : 832 कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

        शीर्षक कायरों की कायरता का इतिहास भी रखा जा सकता था मगर इतिहास लिखने वाले आजकल बचे नहीं हैं। इतिहास को तोड़ मोड़ कर अर्थ का अनर्थ होने लगा है। आजकल केवल झूठ का इतिहास लिखने का चलन है और उसे लिखने से अधिक घड़ा जा रहा है। लोग फेसबुक पर फॉलोवर्स की गिनती का इतिहास बनाने में लगे हैं अभी तक इसका हासिल क्या है कोई नहीं जानता है। खुद अपनी बढ़ाई करने की आदत ने आदमी को खिलौना बना दिया है। सच लापता है मिलता ही नहीं और झूठ हर गली चौराहे अपना शोरूम खोले हुए है। कायरता को अपनी साहूलियत से अच्छा सा कोई भी नाम दिया जाता है ताकि अपने भीतर की खीझ को ढका जा सके। सच ज़ुबान पर लाते ही नहीं हैं , झूठ बोलते ज़ुबां लड़खड़ाती भी नहीं। शर्म आना किसे कहते हैं अब शर्म से गाल लाल नहीं होते जब आशिक़ हुस्न की तारीफ करता है। नज़र झुकती नहीं न ही चार होती है , मुहब्बत भी तो कितनी बार होती है। ये राजनीति की दुकान है सौ टका की छूट है , फिर भी समाजसेवा में तगड़ी कमाई है , तरह तरह की लूट है। भाषणों में बहुत दहाड़ते हैं दो दिन बाद मुकर जाते हैं और पल्ला झाड़ते हैं। 
 
            खुद को मुखर बतलाता है , जब बोलना हो झूठ खुद जुबां पर आता है। सच कहता हूं बार बार दोहराता है सच कहने से मन घबराता है। राग दरबारी खूब गाता है सरकार से जो मांगता है सब पाता है। झोली सरकार के सामने हर दिन फैलाता है , भीख लेता है मगर दाता कहलाता है। पांव सत्ता की कुर्सी के दबाता है जितना नीचे झुकता उतना ऊपर उठता जाता है। तमगे सीने पर लगवाता है। ज़मीर को मार कर अमीर होता जाता है। कौन जाने किस किस से कैसा नाता है , हर गधे को अपना बाप बताता है। जाने को मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाता है मगर धर्म कर्म से नहीं दूर का भी रिश्ता नाता है। भगवान जाने भगवान को क्या चढ़ाता है आता है खाली हाथ खाली जेब मगर वापस कभी नहीं खाली जाता है। कोई नहीं जनता मकसद क्या उसको लाता है , भगवान खुश हुआ दिल को बहलाता है। याद कब रखता ऊपर वाले का भी अपना बही खाता है जो हिसाब किताब में नहीं चूक पाता है।

              अभी आपको समझ नहीं आया शायद कथा किस किस की है। अब समझाता हूं।  नारद जी बहुत आते जाते हैं धरती पर और हर बार भगवान को कुछ नया सुनाकर खुश कर देते हैं। नारद जी बोले भगवन आपने पता लगाने को कहा था आपके भारत में शराफत कितनी बची हुई है। ऊपर उसी पर विवरण बताया जो अभी आप भी नहीं समझे ऐसा लग रहा है। हर कोई राजनीति में घुसना चाहता है क्योंकि ऐसा करते ही आप शराफत की चादर ओढ़ कर बदमाशों से बड़े बदमाश बन सकते हैं। अधिकतर लोग जो शरीफ हैं बदमाश बनना चाहते हैं शराफत से पीछा छूटता ही नहीं है। जब सत्ताधारी दल के छोटे छोटे नेताओं से मिलकर अपनेपन से बात की तो पता चला वो अपने दल के बड़े नेताओं की गलतबयानी और मनमानी से परेशान ही नहीं हैं बल्कि उनको लगता है बड़े नेता उनका शोषण करते हैं। पाप ऊपर वाले करते हैं मगर पापी ये नीचे के लोग समझे जाते हैं , जब मतलब हो उनको बलि का बकरा बना देते हैं सूली चढ़ाते हैं। ये सभी खुद आज अपने लिए बोलने की आज़ादी से वंचित हैं लोकतंत्र की झूठी बातें करने वाले बड़े बड़े नेताओं द्वारा अनुशासन की तलवार के डर से। नाम भर को कहीं दूर दराज शहरीकरण से बचे लोग शराफत से रहते हैं। अन्यथा अधिकतर शहरी लोग मज़बूरी में शरीफ और ईमानदार हैं।

         वास्तव में अधिकतर लोग बुरे नहीं हैं मगर बुराई के साथ होते हैं कुछ पाने को कभी , तो कभी कुछ खोने के डर से। ये शायद विडंबना की बात है कि आज़ादी के इतने साल बाद भी लोग खुद किसी न किसी की गुलामी या चाटुकारिता के आदी हैं। उनको नहीं मालूम इतना भरोसा भगवान आप पर रखते और सच्चाई की राह चलते तो जो मिलता वो कितना अनमोल होता है। जिसे लोग समझते हैं बेहद शक्तिशाली है वो कितना कमज़ोर है और हर पल इक डर सताता है उसे सत्ता खोने का। अभी तक पुराने नेताओं को बुरा साबित करने में खुद को छोटा बनाने का काम करता आया है। जबकि उसे भी मालूम है कि उन लोगों ने ही लोकतंत्र को मज़बूती से स्थापित किया तभी आज उसके हाथ सत्ता है। मगर आज खुद वो सब से महान ही नहीं समझता बल्कि जैसे भी हो सत्ता पर काबिज़ रहना चाहता है। उसका मनसूबा देश की जनता को विवश कर केवल उसी के दल को वोट देने का ही नहीं साथ में दल में भी भीतरी लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म करने का है। आप उसकी मुस्कुराहट देख सोच ही नहीं सकते उसके भीतर क्या है। मन की बात करता है मन ही मन , जिसे लोग मन की बात समझते हैं वो क्या है खुद वो भी जनता नहीं। शराफत की बात करना आजकल दुश्वार है।


POST : 831 लाज का घूंघट उतार दिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     लाज का घूंघट उतार दिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        राज़ की बात खुलेआम कह दी। पहले एक दल का नाम लेते थे उस से देश को मुक्त करवाना है। अब बोलते हैं उस से मुक्त हो गया देश अब सभी विपक्षी दलों से भारत को मुक्त करवाने की तैयारी है। आगे आगे देखिये होता है क्या , अच्छे दिन देख लिए अब रोता है क्या। ये उन लोगों को आदर्श मानते हैं जिनको जब देश गुलाम था तब अंग्रेजी शासन से आज़ादी अच्छी नहीं लगती थी। गुलाम रहना नसीब नहीं हुआ तो देश को अपना गुलाम बनाने की राह चले हैं। याद नहीं किस ने कहा था सबका साथ सबका विकास। ये कैसा लोकतंत्र लाना चाहते हैं जिस में कोई विपक्ष ही नहीं हो। सब विपक्षी दल बुरे केवल आपका दल अच्छा। आपका सपना खुदा न करे सच हो गया तो उसके बाद किस से देश को मुक्ति दिलवाने की बात करोगे।  यकीनन अगली बारी विरोध करने वालों की होगी। न जाने ये देशभक्ति की कैसी परिभाषा गढ़ी है जिस में देश के संविधान को ही दरकिनार करना चाहते हैं। ये तो हद है 180 डिग्री घूम कर चाईना और रशिया , रूस और चीन की तरह का शासन लाने का इरादा है जिस में सत्ताधारी दल को ही चुनना होगा। अभी तक तोड़ने की बात करते रहे हैं जोड़ने की कब सीखोगे। बनाना कठिन है मिटाना आसान है। लोग आज भी आपके दल के उसी नेता की बात करते हैं जिस ने करिश्मा कर दिखाया था 24 दलों को साथ रखकर सरकार बनाने और चलाने का। लोग उनको महान समझते हैं जो अपने विरोधी को भी अपना बना सकते हैं। आप लगता है जो साथ दे उसी को खत्म करना चाहते हैं , ये किस धर्म में किस राजनीतिशास्त्र की किताब में लिखा है। जो लोग ये मानते हैं कि जो हमारे साथ नहीं वो दुश्मन के साथ है और हमारा दुश्मन है वो खुद ही आप अपने दुश्मन होते हैं। जिस दल में ऐसे बयान देने वाले नेता सत्ता में हों उनको बाहर किसी दुश्मन की क्या ज़रूरत है। आपको खतरा किसी भी और दल से नहीं है खुद अपने आप से है। आपका अहंकार आपका सबसे बड़ा दुश्मन है। 
 

 

जुलाई 08, 2018

POST : 830 मुझको यारो माफ़ करना मैं नशे में हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 मुझको यारो माफ़ करना मैं नशे में हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       दौलत का नशा उत्तर जाता है , शोहरत का नशा पागल कर देता है और हद से ज़्यादा नाम होने पर बदनामी कब मुकदर बन जाये पता नहीं चलता है। सत्ता का नशा जब चढ़ता है तो इंसान भगवान को भी चुनौती देने लगता है मगर जब सत्ता जाती है हाथ से तो फिर भगवान भी साथ नहीं देता है। महफ़िल में सभी मदहोश थे फिर भी हर कोई अपनी कहानी सुना रहा था कौन सुनता है कोई नहीं जानता। अगली सुबह किसी को रात की बात याद नहीं होती है। उनका भाषण जारी है , किसी ने इशारा किया सरकार आप आराम करो अभी आप नशे में हैं। डांट दिया मैं कभी कोई नशा नहीं करता तुम मुझे नशे में बताते हो। कनक कनक से सौ गुनी मादकता अधिकाय , वा खाये बौरात है ये पाये बौराय। सोने में धतूरे से सौ गुना नशा होता है , धतूरा खाने से नशा चढ़ता है सोना पाने से ही नशा हो जाता है। आप सत्ता के नशे में चूर हैं , अभी आपको मंज़िल तलाश करनी हैं पास हैं फिर भी दूर हैं। गाड़ी में बैठे लगता है सब पेड़ पौधे सड़कें पीछे की तरफ भागते जा रहे हैं। आप को शायद अनुभव नहीं है इतने लंबे सफर का जो दिन चढ़ते शुरू होता है और सब बहुत सुहाना लगता है , साथ कोई साथी अच्छा हो तो दिल करता है ये सफर हमेशा चलता ही रहे। मगर जब शाम ढलने लगती है और रौशनी कम हो रही होती है तब तेज़ चलाने लगते हैं गाड़ी को। मगर तब लगता है रास्ता और लंबा होता जा रहा है , अंधेरा बढ़ता जाता है तब गाड़ी में बैठे मुसाफिर को लगता है जैसे हम उल्टी तरफ को जा रहे हैं। आजकल वही हाल है आप सुबह से दोपहर बाद तक मस्ती में झूमते रहे , शाम होने लगी तो समझ आया कि अभी बहुत सफर बाकी है तय करना। मगर अब देर हो चुकी है। सौ साल की बात करते करते वादा करते हैं कुछ साल में सब बदलने का मगर समय कब बीत जाता है पता नहीं चलता। साल बाकी है अभी लगता है मगर हर दिन समय घटता जायेगा महीने गिनते गिनते दिन गिनने की नौबत आएगी। फिर वो घड़ी भी आनी है जब विदाई की बेला में समझ नहीं आता कौन सा गीत बजेगा। बाबुल मोरा नैहर छूटा जाये। या फिर लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊं कैसे। चदरिया जस की तस रखनी कब किसी को आती है। अब आप चाहते हैं जल्दी से सब करना या करने का दिखावा करना मगर सावधान , ऐसे में दुर्घटना की संभावना रहती है , लेकिन आपको धीरे चलना पसंद नहीं। अभी भी आप को इतनी सी बात नहीं समझ आई कि आप जहां से चले थे वहीं पर खड़े हैं। कोल्हू के बैल की तरह गोल गोल घुमते रहे मगर पहुंचे कहीं नहीं। दुनिया वास्तव में गोल है ये तो चार साल में आपने आकाश की सैर करते देखा ही होगा। मगर आसमान में घर नहीं बनता है रहने को ज़मीन की ज़रूरत होती है। अब जब ज़मीन खिसकने लगी तो पांव थरथरा रहे हैं। आपको मेरी बात नहीं समझ आई होगी , मैं तो शुरू से समझाता आया हूं। समझते कैसे जनाब आप नशे में हैं।

       आपको पता है हमारे राज्य का हाल क्या है , अपराध बढ़ते रहे और सरकार सोती रही। खूब इश्तिहार छपवाए ईमानदारी के मगर बात किसी की नहीं सुनी। कहते हैं मीडिया वालो मुझे तुम से ज़्यादा पता है , ये ही नहीं पता कि अधिकारी आपकी आंखों में धूल झौंकते रहते हैं।  आप जब जब किसी शहर जाते तब तब उसी शहर की सफाई उसी जगह की चार दिन करते हैं और फिर वही सब होने लगता है। दफ्तर में बैठे दर्ज हुई शिकयतों को गिनती घटाने का काम करते हैं। पुलिस को कानून व्यवस्था सुधारने की चिंता नहीं आये दिन तमाशे करते हैं नाच गाना ताकि लोगों का मनोरंजन हो सके। आप जाकर आशावादिता का सबक पढ़ाते हैं और अंधेरी रात को दिन समझने का ढंग बताते हैं। सावन के अंधे जैसे हमेशा सब तरफ हरियाली बताते हैं। थक गए हैं मगर थकते नहीं हैं चल रहे हैं चलते रहे जीवन भर भागते जाते हैं। जो कहानी खुद नहीं पढ़ी कभी जाने कैसे उस कहानी का किरदार निभाते हैं। ज़रा सी बात पर ताव खाते हैं और मीडिया वालों को तहज़ीब सीखने का उपदेश दे आते हैं। उपदेशक इसी में मार खाते हैं।



             अब विपक्षी दलों से भारत को मुक्त करने की तैयारी

   8 जुलाई को फरीदाबाद में मनोहर लाल जी दो दिवसीय मंथन में उपरोक्त विचार व्यक्त करते हैं। भगवान न करे उनका ख्वाब सच हो मगर उनकी मंशा डराती है। जब विपक्ष नहीं होगा तो लोकतंत्र कैसे होगा , क्या रूस और चीन की तरह नाम को वोट डालने होंगे या फिर चुनाव आयोग की ज़रूरत ही नहीं होगी। खैर अच्छा किया लाज का घूंघट उतार दिया। पहले एक दल खराब बताते थे अब आपको छोड़ सभी खराब हैं की घोषणा कर रहे हैं। आगे आगे देखते हैं होता है क्या , देख कर  दिन अच्छे रोता है क्या। आपके आदर्श वो लोग हैं जो देश की आज़ादी के आंदोलन में साथ नहीं थे विदेशी शासक अच्छे लगते थे , गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में कुछ नहीं किया अब देश को गुलाम बनाना चाहते हैं। विपक्ष होना ज़रूरी है। एक वो भी नेता आप ही के दल के हैं जो 24 दलों को लेकर गठबंधन की सरकार चलाने का करिश्मा कर सकते थे और आप हैं कि मैं ही मैं की बात करते हैं। किसी शायर ने समझाया था , हमीं हम हैं तो क्या हम हैं , तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो। थोड़ा संविधान को समझ लो अच्छा है।  पुराने लोग समझते थे पहले सोचो , फिर तोलो फिर बोलो। अभी पॉज ले लो बाद में पछताना नहीं पड़ेगा। सलाह अच्छी कोई भी दे मान लेनी चाहिए। आगे आपकी मर्ज़ी। 

जुलाई 07, 2018

POST : 829 शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

            मुझे याद है मेरे इक जन्म दिन पर मेरे बेटे ने मुझे उपहार में एक डायरी दी थी , उस पर अंग्रेजी भाषा में लिखा था " शोहरत इक गुनाह बन जाती है जिस पल आप उसकी कामना करते हैं। ये आपके आचरण पर है कि आपको शोहरत नसीब होती है अथवा नहीं। " आज भी वो डायरी मेरी अलमारी में सुरक्षित है। मुझे नहीं पता बेटे ने जब लिखी ये बात तब उसके मन में क्या रहा होगा। जहां तक खुद को मैं जनता हूं मैंने कभी कोई काम शोहरत हासिल करने को नहीं किया। बहुत काम उल्टा ऐसे किये और करता रहता हूं जिस से मुझे शोहरत या नाम नहीं बदनामी मिल सकती है शायद फिर भी मेरा ज़मीर मुझे विवश करता है जनहित और अपने लेखन की ईमानदारी को कायम रखने को। अभी इक दोस्त ने कहा मेरी पोस्ट पर लोग लाइक या कमेंट करने से बचते हैं इस डर से कि उनको सरकार विरोधी नहीं समझा जाये। जबकि सच किसी के विरोध में नहीं होता है। 
 
                 आज नाम की बात नहीं करते , किस किस का नाम लिया जाये। सभी तो नाम शोहरत के पीछे भाग रहे हैं। जाने क्या क्या नहीं अपनाते ढंग , सोशल मीडिया पर अधिकतर को किसी भी तरह यही चाहिए।  लोग समाजिक संस्थाओं में शामिल होते हैं मगर उद्देश्य शोहरत होती है समाज की भलाई नहीं। आप का बहुत नाम है देश विदेश में शोर है आपके नाम के चर्चे हैं फिर भी आपको लगता है आपसे पहले के नेताओं से अच्छे हैं आप और लोग उनको अच्छा नहीं समझें और आपको उनसे अच्छा समझें। लोग किसी को टंगड़ी लगाकर गिरा कर उससे आगे जाना चाहते हैं। जिनका मकसद औरों को बुरा साबित करना होता है उनको अक्सर निराश होना पड़ता है। हम जिस समाज में रहते हैं वो हमेशा मुहब्बत बांटने वालों को याद करता है नफरत फ़ैलाने वालों को हम कभी नायक नहीं समझते हैं। उसने ये नहीं किया उसने वो गलत किया यही दोहराने से आपको शोहरत हासिल नहीं हो सकती , खुद आपने जो किया उसी से निर्धारित होगा आपको क्या जगह मिलती है। मुझे बहुत लोग नीचा दिखाने का जतन करते हैं मगर मैं कभी उनकी बातों का बुरा नहीं मानता हूं। निंदक नियरे राखिये। सबक सीखता हूं। पाना कुछ नहीं है न खोने को है कुछ भी। इसलिए अपना कर्म करता रहता हूं। मुझे मेरे बाद कोई याद रखे ऐसा ख्वाब नहीं देखता। किसी शायर का इक शेर उधार लेकर अपनी बात कहता हूं :-

             बाद ए फनाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र ,

                जब हमीं न रहे ,  तो रहेगा मज़ार क्या। 

      कल फिर राजस्थान में मोदी जी की अपने ही पसंद के बुलाये लोगों की जामातलाशी ली गई। दुष्यंत कुमार कह गए थे , फिरता है कैसे कैसे ख्यालों के साथ , उस शख्स की जामातलाशी तो लीजिये। ये ख्याल दिल वाले बहुत डराते हैं , हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर तो डरते थे अब मोदी जी की सभा में सुक्षाकर्मी लोगों की तलाशी ले रहे थे कि किस किस ने काले रंग का कुछ भी पहना हुआ तो नहीं है। काले झंडे काली पट्टियां दुनिया भर में विरोध का सभ्य शांतिपूर्वक ढंग समझे जाते हैं। ये कोई खतरे की चीज़ नहीं हैं , शायद फिर आपत्काल से पहले जयप्रकाश नारायण के भाषण की बात दोहराना ज़रूरी है। सुरक्षा कर्मी की निष्ठा देश के लिए होनी चाहिए किसी राजनेता या अधिकारी के लिए नहीं और अगर शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर कोई नेता या अधिकारी बलप्रयोग की बात करता है तो उनका हुक्म नहीं मानना है। जिसे जनता के कपड़ों के रंग पर भी ऐतराज़ है उसे जनता के बीच जाना ही नहीं चाहिए। ये आपका डर आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। मोदी जी के अंध समर्थक तो कहते हैं जब सभी किसी के विरोध में खड़े हों तो समझो आदमी बढ़िया है। मोदी जी विरोध भी शोहरत दिलाता है। मुझे याद है , मैं बंसी लाल जी का समर्थक नहीं हूं , उनकी बात याद आई तो बता रहा हूं , काली पट्टियां काले झंडे दिखाने वालों को लेकर उन्होंने कहा था मेरी मां 36 गज़ काले कपड़े का घाघरा पहनती है। जिनका रंग गोरा होता है उन पर काला रंग और निखार ले आता है। आप तो बेदाग़ होने का दम भरते हैं फिर काले रंग से क्यों इतना डरते हैं।
 

 

POST : 828 उसी राह पर उसी मोड़ पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     उसी राह पर उसी मोड़ पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     हो रहा है हूबहू , जैसा फिल्मों में होता है। गीत याद आया थरी इडियट फिल्म का। बात तब 1975 की और थी जस्टिस जगमोहन मिश्र ने फैसला सुना दिया था इंदिरा गांधी को गद्दी छोड़नी होगी उनका चुनाव अवैध घोषित किया जा चुका था। उनका बेटा बसों में भर भर कर हरियाणा यूपी से लोग ला रहा था दिल्ली में इक चौक पर नारे लगाने को। मैं तब दिल्ली में रहता था। भीतर से खुद को कमज़ोर और बेबस महसूस कर रही इंदिरा गांधी को खुद अपने समर्थको की भीड़ से अपनी जय के नारे लगवाना इक ढांढस की तरह था। आज जब वही बात मोदी जी को राजस्थान में दोहराते हुए अपनी ही राज्य सरकार द्वारा सात करोड़ ऐसे लाखों लोगों की भीड़ जुटाने को खर्च करवाने की खबर सुनी तो लगा बात अंदाज़ वही है। ये बेहद अजीब लगता है कि कोई देश का प्रधानमंत्री केवल उन्हीं लोगों को बुलाकर सभा में चर्चा करने की बात करे जो घोषित तौर पर उनकी चार साल की योजनाओं से लाभ उठा चुके हों ये तय हो। इतना काफी नहीं बल्कि ये भी खबर आई कि कुछ लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि आपने कैसे जवाब देने हैं और केवल साकारात्मक ढंग से बात करनी है। एक लड़की ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो पता चला उसे हटा दिया सवाल जवाब करने वाले लोगों की सूचि से। हास्यास्पद बात लगती है , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। ये राजा नंगा है कहानी दोबारा बार बार याद आ ही जाती है। शाबास उस देश की निडर बच्ची के साहस को। बेटियां वास्तव में इतिहास रचने लगी हैं।

              अभी मोदी जी की सरकार को कोई खतरा नहीं है , किसी अदालत ने भी कुछ नहीं कहा है। जनता की अदालत में जाना है साल बाद , अभी चार साल का जश्न मना रहे हो फिर क्यों ऐसी घबराहट। कोई नहीं कह रहा आप हार सकते हो , जीत का भरोसा कोई भी नहीं दे सकता किसी को। जीत हार चुनावी लोकतंत्र का हिस्सा है और देश की जनता हमेशा समझदारी दिखलाती रही है। अभी तो आपने साल पहले अपने गुणगान की खूबसूरत किताब बांटनी शुरू की है और हरियाणा में मुख्यमंत्री और पार्टी के नेता लोगों को समझने में लगे हैं आपने क्या क्या किया है। खटटर जी तो बाकयदा बैंक्विट हाल में मिलते हैं लोगों से या अभी दिन में कितनी जगह जाकर ख़ास जान पहचान वालों संग चाय की चुस्की लेते है। कोई मांगपत्र नहीं लेते साफ कहते हैं। सब उसी तरह चल रहा है जैसे आपने तय किया हुआ है। कभी कभी लगता है जैसे कंपनी के सीईओ अपने कर्मचारियों को कोई टारगेट सेट कर पूरा करने को कहते हैं। ऐसे में मुनाफा तय होता है फिर भी किसलिए घाटे की बात सोचकर दुबले होते हैं।

           टीवी वाले भी आजकल आत्मा की बात करने लगे हैं।  दिल्ली ही की बात है 11 लोग मर गए हैं तो ख़ुदकुशी की है यही पुलिस मानकर चल रही है। उनमें कोई एक नहीं पांच आत्माओं से संपर्क रखता था और सभी घर के सदस्य उसकी बात पर भरोसा कर जो वो कहता मानते थे और खुद लिखा करते थे इक रजिस्टर में। आपको हैरानी नहीं हुई आज भी कोई कागज़ कलम से लिखता है अपनी डायरी की तरह। लोग तो फेसबुक पर लाइव ख़ुदकुशी करने तक जा पहुंचे है मगर ये लोग अभी भी इतना पिछड़े हुए थे। लगता है आपकी ऑनलाइन योजनाओं और ऐप्स से अनजान थे। किसी ओझा से बात करो कहीं आपको भी किसी आत्मा का साया तो नहीं परेशान कर रहा। कभी नेहरू कभी इंदिरा की बात करते हैं। उनको बुरा भी बताते हैं और उनकी ही तरह उसी राह उसी मोड़ पर होने का एहसास होता है। कभी कभी किसी को लगता है मैं खड़ा हूं और रास्ता चलता जा रहा है। 

           उधर पड़ोसी देश में भ्र्ष्टाचार में पनामा दस्तावेज़ों में नाम आने पर शरीफ साहब को दस साल और उनकी बेटी को सात साल की सज़ा सुनाई गई मगर आपकी सरकार बनी ही भ्र्ष्ट लोगों को जेल भेजने के वादे पर थी फिर भी जिनके नाम ऐसे दस्तावेज़ों में सामने आये उनसे कोई सवाल तक नहीं पूछता है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और जैसी बात है। सब पापी गंगा स्नान कर के पावन हो चुके हैं शायद तभी वारणसी में गंगा और भी मैली हो गई है। कोई समझ नहीं पा रहा क्या क्यों कैसे है।  जब सब बढ़िया है तो चिंता क्यों है। साल भर बाकी है और शायद दुनिया के कुछ देश बचे होंगे , करिये सैर अभी।  चार साल में चर्टेड विमान पर 377 करोड़ खर्च करने पर बधाई गरीबों की तरफ से नज़राना समझो। हर दिन हर देशवासी की जेब से केवल 25 लाख ही तो खर्च हुए हैं। महान देश है जो अपने चौकीदार को इतना देता है। विकास इसी को कहते हैं और अच्छे दिन आये मगर केवल आपके खुद के लिए। 
 

 

जुलाई 06, 2018

POST : 827 मूर्खों की कमी नहीं है , मूर्खता की सीमा नहीं है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

     मूर्खों की कमी नहीं है , मूर्खता की सीमा नहीं है ( खरी-खरी ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

  शायद ही कोई हो जो खुद को मूर्ख मानता हो , मगर शायद ही कोई हो जो कभी मूर्ख नहीं बनाया गया हो। हम लिखने वालों का हौसला है जो पहली अप्रैल को धूम धाम से मूर्खता दिवस मनाते हैं। बाहर लोग बुद्धीजीवी समझते हैं खुद अपने घर में मूर्ख होने की सबसे बड़ी उपाधि पाते हैं। आओ सभी समझदारो आज आपको ये सबक भी पढ़वाते हैं। आपकी नहीं अपनी कहानी दोहराते हैं। जो मूर्ख बनाने की कला जानते हैं वही पंडित जी कहलाते हैं। भगवान को भोग लगाने वाले खुद खाते हैं भक्त लोग नाम को ही प्रसाद पाते हैं। आपका भविष्य क्या है समझाते हैं। मैं तीस साल तक इस मोहजाल से बचा रहा , जो भी मिला उसी को मुकदर समझा। मगर फिर भविष्य बताने वालों की चौखट पर ऐसा गया कि सब समझ कर भी नहीं कुछ भी समझा। अच्छे दिन आने वाले हैं देश की जनता को चार साल पहले बताया गया होगा , मुझे हर साल यही राशिफल बताया जाता रहा। मुझे ज़िंदगी से नहीं कोई शिकवा गिला , अफ़सोस है जो कुंडली में लिखा हुआ बताया बस वही कभी नहीं मिला। मगर शराब नहीं पीता फिर भी उधर जाता रहा और साकी से यही कहा कभी कोई जाम मुझे भी तो पिला। थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे , मुझको बंगला कार दिला दे। कैसे केसों को दिया है , ऐसे वैसों को दिया है। सपने बेचने वालों की दुकान में सामान कुछ नहीं होता है। 
 
             अपने देश में भविष्यवक्ता गली गली हैं , सब कहते हैं जो भाग्य में लिखा वही मिलता है , मगर साथ साथ भाग्य बदलने की बात भी करते हैं। उपाय बताते हैं जाने क्या क्या नहीं करवाते हैं। सच ये है जेब खाली करवा हम खाली हाथ आते हैं। अगर वास्तव में इन सब से समस्याओं का निदान होता तो अपने देश में इतने लोग हर दिन यही करते  करवाते हैं , उस से सब ठीक हो जाता। सरकार नेता अधिकारी सभी हर काम का शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं ये पुल फिर भी गिर जाते हैं।  हम वो लोग हैं जो बच गए तो शुक्र मनाते हैं मरने वालों की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं।  मौत आई थी आनी है आएगी दोहराते हैं। चलो देखते हैं अच्छे दिन वाले अबके क्या ख्वाब बुनकर बहलाते हैं। आज आपको इक सच्ची कथा सुनाते हैं। 
 
                    घटना सच्ची है नाम नहीं बताना उचित। कोई अपने कारोबारी भागीदार को साथ लेकर मीलों दूर इक जाने माने ज्योतिषाचार्य की चौखट पर गया। साथ उसका परिवार भी था। इस कहानी का कल रात की ज़िंदगी के क्रॉस रोड्स से कोई संबंध नहीं है। हाथ की रेखाओं को देखकर पति को कष्ट की बात बताई और पत्नी को लंबी आयु की बात समझाई। वापस आने के महीने भर बाद पत्नी की अचानक बारी आई , उसकी मौत से भागीदार बहुत घबराई। उनसे सवाल पुछवाया ये पहले क्यों नहीं बताया भाई। तब ज्योतिष विज्ञान की परिभाषा गई समझाई। पति को कष्ट आना था तभी पत्नी को जाना था। महिला की लंबी आयु में दोष उसके पति की लंबी आयु को रखा उपवास सफल रहा खुद सदा सुहागिन रही पति को अकेला कर आई। 
 
         वास्तुशास्त्र वाले घर के द्वार पर धातु की बनी शेर की भाला लिए खड़े सुक्षाकर्मी की , कोई तलवार को दीवार पर टंगवा कर उपाय करता है सुरक्षा का। देश की सीमा पर वास्तुशास्त्रीय सुरक्षा होती तो आतंकवादी कैसे भीतर आते। राजनेता कभी पड़ोसी देश के साथ जंग नहीं करने की बात नहीं करते हैं , उनका मिलना इस बात को लेकर होता है कि कब ब्यानबाज़ी करनी है कब फूल भेजने हैं और कब सीमा पर लड़ाई और नफरत की बात करना फायदे की बात है। हर कोई दूसरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है , सब चाहते हैं कोई मिले जिसे बुद्धू बनाकर समझदार होने का प्रमाण हासिल किया जाये। मगर इक कहावत है कि आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते है लेकिन सब को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। आज़ादी के सत्तर साल बाद देश की जनता मूर्ख बनती रही है मगर हमें मूर्ख बनाने वाले लोग बदलते रहे हैं। कोई पांच साल तो कोई दस साल तक मूर्ख बनाने में कामयाब होता रहा है। हमारी जन्म कुंडली में कोई मंगल शनि राहु दोष नहीं है , दोष है मूर्खता काल में जन्म लिया है हमने। आपको शायद मालूम नहीं जब आज़ादी मिलनी थी तो पंडितों ने ज्योतिष वालों ने आधी रात का समय अशुभ बताया था। बस कुछ घंटे और गुलामी में रह लेते तो सुबह शुभ समय में आज़ादी मिलती और ये घना अंधेरा जो छाया हुआ है शायद नहीं होता। अंधकार को दूर किया जा सकता है मगर जब लोग गंधारी की तरह खुद अपनी आंखों पर किसी नेता या दल की निष्ठा की काली पट्टी बांध खुद ही सच नहीं देखना चाहते तो कोई रौशनी काम नहीं आ सकती है। 

 

जुलाई 05, 2018

POST : 826 भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या यही धर्मराज की अदालत है , आत्मा ने निडरता से सवाल किया।  चित्रगुप्त जी भी बही खाता छोड़ उसी तरफ देखने लगे। न्यायधीश की ऊंची कुर्सी पर बैठे धर्मराज को अपना अपमान सा लगा। आप कहना क्या चाहते हैं , आत्मा से पूछा। आत्मा ने कहा जनाब आपका परिचय ही जानना चाहा क्या ये भी गुनाह है इस अदालत में। धर्मराज को कहना पड़ा नहीं ऐसा नहीं है मगर आज तक किसी ने पूछा ही नहीं सब को मालूम होता है यहीं सब कुछ चुकाना है। आत्मा ने कहा चलो मान लिया , मुझे मेरा हिसाब मत बताओ मैं जानता हूं।  अपना फैसला सुना देना मान भी लूंगा बिना कोई सफाई दिए , मगर आपकी ही तरह मैंने भी हर दिन लिखा था भगवान और भगवान की अदालत का हर हिसाब किताब। मेरे पास कोई नर्क नहीं स्वर्ग नहीं मोक्ष नहीं देने को , मगर आपको आईना तो दिखला सकता हूं। क्या देखना चाहोगे आपके खुद के कर्मों की बात। अधिक समय नहीं लूंगा संक्षेप में सीधी सीधी बात करूंगा। अदालत में मौजूद आत्माओं ने ज़ोर ज़ोर से तालियां बजाईं तो धर्मराज भी घबरा गये। कहीं ये कोई लोकतंत्र की बात तो नहीं , मामला संगीन लगता है। साक्षात भगवान को आने को बुलवाया और ऊंचे सिंहासन पर बिठाकर आत्मा की बात सुन कर समझाने की विनती की। भगवान बोले कहो क्या समस्या है। आत्मा ने कहा सुनोगे ध्यान से मेरी बात पूरी की पूरी बिना बीच में कोई बाधा उतपन्न किये। भगवान मान गये मगर समय की सीमा का ध्यान रखने की बात भी जोड़ दी टीवी वालों की तरह। ठीक है मगर कोई छोटा सा ब्रेक लेने की बात मत कहना जब जवाब देते नहीं बनता हो। ओके फाइन।
 
                      भगवान आपने सभी के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किताब करने का प्रबंध किया मगर खुद आपका हिसाब किताब किसी को देने की व्यवस्था नहीं की। अन्यथा हमारी सरकारों की तरह सी ए जी जैसे संस्थाएं सरकारी योजनाओं की पोल खोल देती हैं। पिछली सरकार इतनी बदनाम हुई कि पूछो मत। पांच साल बाद बदल देते हैं सभी को जब वास्तव में वादे निभाते नहीं हैं। आप पर कोई सवाल ही नहीं करता कि जिस दुनिया को बनाया उसकी हालत को कभी देखा भी है। अपने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाने क्या क्या बनवा कर पत्थर की मूरत बनकर या किसी और तरह अपना गुणगान सुनते रहते हो और समझते हो सब ठीक ठाक है। कहीं कुछ भी ठीक नहीं है मगर आपको चिंता ही नहीं। बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई देती ही नहीं कहीं , बुराई है जो सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। सच को सूली चढ़ाया जाता है और झूठ की जय जयकार होती है। आपकी कोई अदालत ऐसी है जो आपको भी कटघरे में खड़ा करे और आपको भी दोषी ठहरा सज़ा का एलान करे। हमारे देश की व्यवस्था में लाख खामियां हैं फिर भी हमारे देश की अदालतों के न्यायधीश इतिहास रचते रहे हैं देश की प्रधानमंत्री को अदालत में बुलाकर दोषी ठहराने का फैसला देकर। ये आपके नियुक्त किये धर्मराज आपसे आपका हिसाब मांग सकते हैं। आपने इस बात पर कभी विचार ही नहीं किया आपके नाम पर क्या नहीं हो रहा , आप उसके लिए उत्तरदाई कैसे नहीं हैं। क्या आपका नाम जपना और आपकी अर्चना करना ही धर्म है या वास्तविक धर्म मानवता की रक्षा करना है। आप सब से बड़े जमाखोर हो कितनी ज़मीन कितने आलिशान महलनुमा घर अकेले आपकी खातिर जब करोड़ों लोग भूखे हैं बेघर हैं। लिखवा दिया पापियों का अंत करने आओगे मगर कब आओगे। सरकारी अच्छे दिनों के झूठे वादे में और आपके किये वायदे में अंतर क्या है। सोचोगे तो समझोगे कितनी बड़ी भूल की है अपनी दुनिया की व्यवस्था करना नहीं आता तो नहीं बनाई होती। हम सभी को खिलौना समझ खेलते रहे मगर कभी नहीं सोचा इंसानों पर क्या बीती है।
 
          आदमी को कहा जाता सब से अच्छा है सब से उत्तम योनि है। सब से खराब आदमी ही है। छल कपट झूठ धोखा अन्याय अत्याचार हर बुराई में सब से आगे है। खुश कभी नहीं होता बेशक भगवान ही समझने लगें लोग , तब भी इंसानियत नहीं याद रखता। मुझे तो लगता है भगवान तुम अच्छे लोगों और सच्चे लोगों का कभी साथ नहीं देते , तभी अधर्मी पापी फलते फूलते हैं और ईमानदारी का जीना दूभर है। मुझे बेशक जो चाहो सज़ा दे दो , आपके बारे भी साफ साफ सच्ची बात मन की लिखता रहा हूं। चाहो तो धरती से मंगवा कर पढ़ लेना कुछ भी कल्पना से नहीं लिखा है। आपकी दुनिया की असलियत ही लिखी है। नर्क तो देखा है कोई चिंता नहीं नर्क भेज दो भले , स्वर्ग की चाह कभी की नहीं , मिलेगा भी नहीं और मिल भी जाये तो नहीं रहना मुझे। नेता लोग होते हैं जो खुद स्वर्ग की सुविधाएं पाना चाहते हैं और जनता को नर्क के सिवा कुछ नहीं देते। फिर से जन्म देना तो इंसान नहीं बनाना , इंसानों में इंसानियत बची ही नहीं। पंछी बना देना चाहे मगर पिंजरे में कैद नहीं होना , पेड़ पौधे में भी जीवन होता है कोई सुंगध बांटने वाला साफ हवा छायादार और फलदार पेड़ भी बना सकते हो। कोई रास्ता जिसे लोग कुचलकर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ते जाएं उसकी धूल बनकर भी रहना मंज़ूर है मगर पत्थर नहीं बन सकता तुम्हारी तरह संवेदनहीन नहीं बनना चाहता। अभी फैसला अटक गया है भगवान को मेरा लिखा पढ़ने में जाने कितना वक़्त लगेगा , मैं अभी भी कटघरे में खड़ा हूं और आरोप उस पर लगा है जो कहते है उस से बड़ी अदालत कोई नहीं है। इंसाफ तो करना ही होगा चाहे फैसला खुद भगवान के खिलाफ हो या फिर मेरे। बहुत गहरी ख़ामोशी छाई हुई है। 
 

 

जुलाई 04, 2018

POST : 825 संवाद लेखक कौन है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         संवाद लेखक कौन है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  संवाद लेखक , नहीं समझते तो डायलॉग राइटर समझते होंगे। शोले फिल्म के डायलॉग अभी तक याद हैं। कितने आदमी थे। जब तक तेरे पांव चलेंगे बसंती तब तक तेरे आशिक की सांस चलेगी। बसंती इन कुत्तों के सामने नहीं नाचना।  होली कब है कब है होली। पचास कोस तक जब बच्चा रोता है तो मां कहती है सो जा सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा। इक बच्चा पूछता है ये गब्बर अंकल कौन हैं। 1973 की बात 2014 में उस से भी हिट डायलॉग याद करो। मैं नहीं आया मुझे गंगा मईया ने बुलाया है। गंगा पछताती होगी ये क्या और मैली हो गई। डायलॉग कमाल का था।  बताओ भाइयो होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए। क्या अभिनय क्या डायलॉग का अंदाज़ देश की जनता को यही तो पसंद आता है। मुझे उस लिखने वाले की ज़रूरत है जिस ने लिखे थे  डायलॉग उनकी खातिर। नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं , मुझे राजनीति में नहीं आना है न कोई चुनाव लड़ना है। मुझे अपनी लिखी कहानी " हिलती हुई दिवारें " के डायलॉग लिखवाने हैं। 
 
      2010 की बात है ऑनर किलिंग पर लिखी मेरी कहानी छपी थी। एक फ़िल्मकार ने सम्पर्क किया फिल्म बनाने को सभी अधिकार हासिल करना चाहते थे। जब कारण पूछा तो बोले कि इस पर बहुत मेहनत करनी है और आपका सिर्फ कांसेप्ट होगा रॉयल्टी डायलॉग लिखने वाले को मिलेगी। फिर भाषा की बात करते हुए बोले कि हिंदी नहीं अंग्रेजी भाषा में डायलॉग लिखवाने हैं क्या लिख सकते हो। मेरे इक दोस्त इंग्लिश के
अध्यापक हैं उनसे लिखवा भेजी कहानी अनुवाद की हुई मगर उनको मज़ा नहीं आया। तब से कोई और निगाह में नहीं आया जो सुपरहिट डायलॉग लिख सकता हो। अचानक मन की बात याद आई तो उनका ख्याल आया है। अभी तक मालूम  नहीं ये सारे डायलॉग किसने लिखकर दिए थे। आपको पता हो तो मुझे बता दो जो भी फायदा हुआ फिफ्टी फिफ्टी । 
 

 

POST : 824 इश्क़ पर गुफ़्तगू ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           इश्क़ पर गुफ़्तगू ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   छात्र सवाल पूछता है शिक्षक से , सर ये आशिक़ी का रोग कैसी बिमारी होती है। शिक्षक बताता है आजकल ये रोग नहीं होता है इसका अंत कभी का हो चुका है। फिर भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ये बेहद बुरा रोग हुआ करता था और इसकी कोई दवा भी नहीं मिलती थी। कहते थे मरीज़े इश्क़ पर लानत खुदा की , मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। कब किसी को किस से इश्क़ का नामुराद रोग हो जाये कोई नहीं जानता था। बचाव के टोटके किये जाते थे तरह तरह के मगर रोग पर असर होता नहीं था। इस रोग में किसी का दिल किसी पर आ जाता था और दिल तो पागल है दीवाना है कहलाता था। बस उसी सूरत को हर  तरफ सामने पाता था , बिना देखे नहीं चैन आता था , मिलने पर भी दिल घबराता था। आदमी किसी काम का नहीं रह जाता था। खुद भी रोता रहता था महबूब को भी रुलाता था। आशिकों का मिलन कभी नहीं हो पाता था। लैला लैला गाता रहता और पत्थर खाता था। कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को लैला की बात किसी को समझ नहीं आई वो क्या कहना चाहती है , पत्थर से नहीं मारें तो फिर किस से मारना है। बचाना नहीं चाहती बस पत्थर की जगह जूते होते तो अच्छा होता शायद यही सोचती थी। बीसवीं सदी आते आते इश्क़ एक से नहीं अनेक से होने लगा ये रोग भयानक था एक साथ कितनों को अपने चपेट में लेने लगा था। मगर सच्चा प्यार उसी को माना जाता जो जब तक पहली वाली महबूबा की शादी किसी और से नहीं हो जाती तब तक दूसरी की तरफ आंख उठाकर भी आशिक़ नहीं देखता था। पारो नहीं मिली तभी चंद्रमुखी पास जाता था देवदास। आशिकों की दास्तान अधूरी रहती थी कभी पूरी नहीं होती थी।

              गुरूजी ये भी बताओ उस रोग का खात्मा कब और किस दवा  बचाव के टीके से हुआ। क्या पोलियो की तरह दो बूंद पिलाई जाती थी। नहीं बच्चा आज तक कोई दवा कोई इलाज नहीं मिला है इस का। पहले फोन का ज़माना आया तो पिया रंगून से फोन करता तुम्हारी याद आती है जिया में आग लगाती है। मोबाइल फोन आया तो बातें महंगी और आशिक सस्ते होने से एस एम एस ही से काम चलाते थे आशिक। लड़कियों को आशिक से फोन रिचार्ज के इलावा कुछ भी नहीं चाहिए था , मगर आशिकों को मलाल रहता था रिचार्ज वो करवाते हैं मगर बात माशूका औरों से अधिक करती है , आशिक की याद रिचार्ज खत्म होने पर ही आती थी। तभी स्मार्ट फोन किसी देवता की तरह आया और सब कुछ बदल गया। अब सभी को रोटी कपड़ा मकान के साथ इक कार और इक स्मार्ट फोन की चाहत होती थी। मोक्ष मिलना इसी को कहते हैं जब कुछ भी पाने को नहीं बचा हो। दुनिया में स्मार्ट फोन से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं है।  नारद जी ने भगवान को जाकर आधुनिक ज्ञान की कथा सुनाई।

         भगवान अब किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं है सब अपने अपने स्मार्ट फोन पर व्यस्त हैं। भगवान आपको भी लोग स्मार्टली याद करते हैं हर सुबह अलग अलग संदेश मंडे तो संडे सातों दिन शुभ सौम मंगल बुध वीर शुक्र शनि रविवार। खुश अब आप भी। मनोरंजन बन गया है सब कुछ ज्ञान विज्ञान क्या धर्म कारोबार क्या , मिलना जुलना नहीं ज़रूरी बस ऑनलाइन दिखाई दिया तो सब कुशल मंगल है। शोकसभा की खबर भी व्हाट्सएप्प से मिलती है और त्यौहार की शुभकामना भी। रामबाण औषधि की तरह हर काम एक स्मार्ट फोन से। सरकार भी स्मार्ट हो गई है लोग भी बेकार के काम में सब कुछ भूल गए हैं। इक महिला , पुरुष भी हो सकता है , स्मार्ट फोन पर बिज़ी देख यमराज को आया देख भी घबराते नहीं।  रुको भाई चलते हैं ये सोशल मीडिया पर आखिरी स्टेटस तो लिखने दो प्लीज़। पता ही नहीं चलता समय अच्छा बुरा दोनों बीत जाते हैं। यमराज को समझाया ये कितने काम का है और यमराज भी मुफ्त उपहार लेने से इनकार नहीं कर सके। आत्मा के साथ कुछ भी जाता मगर यमराज भी मान गये स्मार्ट फोन साथ होगा तो सफर में सहूलियत होगी। गूगल से रास्ता तक मालूम हो जाता है , यमराज से भी गलती हो जाती थी किसी और को ऊपर उठाकर लाने के बाद बड़ी कठिनाई होती थी। झुक गया आसमान की बात अभी भूली नहीं है। आखिरी वक़्त जो भी दिल में होता है वही आत्मा को आगे मिलता है , आजकल आखिरी वक़्त भी किसी को स्मार्ट फोन को छोड़ कुछ भी याद नहीं रहता , भगवान को भी बगैर फोन याद कैसे करें। भगवान से भी हर आत्मा मुफ्त स्मार्टफोन और मुफ्त डाटा वाला सिमकार्ड मांगती है अपने अच्छे कर्मों के बदले में। इक भक्त ने अपनी कंपनी का अनुबंध ईश्वर से कर लिया है। भगवान ने पुराने आशिकों को भी यही सोचकर स्मार्ट फोन दे दिया ताकि वो चाहे जहां कहीं भी हों बात कर सकें। मगर ये क्या उनमें कोई भी पहले प्यार से बात करने को तैयार नहीं। कितना बदल गया इंसान , भगवान भी देख बड़ा हैरान। नारद जी ने समझाया कि ये रोग खत्म नहीं हुआ है बदल गया है। आधुनिक युग का इश्क़ फरवरी महीने में ज्वर की तरह चढ़ता है एक सप्ताह को। बाकी साल कितने और काम रहते हैं करने को। 
 

 

जुलाई 03, 2018

POST : 823 दुनिया का पहला ऐसा मंदिर फतेहाबाद में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया का पहला ऐसा मंदिर फतेहाबाद में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       तय कर लिया है मुझे ही बनाना है और अपने ही शहर में ही। शहर वालों को कुछ तो नया मिलेगा और लोग गूगल पर सर्च किया करंगें कहां बना है इकलौता ऐसे देवता का मंदिर। पहली बात मैं ही क्यों बनाऊं , आखिर झूठ के देवता को दूसरा कोई क्यों नहीं मिला। झूठों की कमी नहीं है मगर शायद मुझ पर झूठ के देवता को ऐतबार है तभी मुझे साक्षात दर्शन देकर अपना मंदिर बनाने को कहा । दीपक जलाने की ज़रूरत उसी जगह होती है जिस जगह अंधेरा छाया हो , झूठ का मंदिर यहां बनाना उचित होगा क्योंकि इस शहर में सच की दुकान गली गली खुली हुई है । सच के झंडाबरदार अख़बार टीवी वाले देश दुनिया को चौबीस घंटे सच बता बता कर परेशान किये हुए हैं । झूठ मिलता ही नहीं जब ज़रूरत हो सब परेशान होते हैं। एक नेता जी को किसी स्वर्गवासी नेता का भूत परेशान किये है , सब उसी की गलती है दोहराते हैं , कभी वाराणसी में कभी मुंबई में पुल गिरता है तो समझते हैं उसी की चाल होगी कि जब मेरा शासन होगा तभी विनाश होगा । अगर भगवान राम की तरह नल नील से बनवाते पुल तो कभी नहीं गिरते । बात झूठों की नहीं झूठ के देवता की हो रही है । सब से पहले सभी को जानकारी देना ज़रूरी है कि इस तरह के मंदिर का कॉपीराइट हासिल कर लिया है मैंने इसलिए कोई दूसरा नहीं बना सकता है । 
 
        फतेहाबाद शहर ही नहीं हरियाणा राज्य को भी गर्व होना चाहिए कि केवल हमारे यहां ऐसा मंदिर है । शायद पर्यटन को बढ़ावा देने को रेल मंत्री यहां रेल की पटरी बिछवा दें। बुलेट ट्रैन न सही आम यात्रा गाड़ी ही सही , हम उसी से काम चला लेंगे छत पर बैठ सफर करने का लुत्फ़ उठा सकेंगे । जिनको भरोसा है झूठ आजकल सबसे महत्वपूर्ण बन चुका है उनको मेरा साथ देना चाहिए । आपको झूठ को आसमानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना है । सच बोलने से आफत आती है झूठ बोलने से दौलत । किसे क्या चाहिए खुद तय करो । झूठ की महिमा को समझना ज़रूरी है । झूठ से लोग खुश ही नहीं होते बल्कि ख़ुशी से पागल होकर सत्ता सौंप देते हैं और झूठ की जय जयकार करने लगते हैं। कलयुग में झूठ ही सब से बलशाली है , सच को तो पीलिया रोग हो गया है । फतेहाबाद सचिवालय में उपयुक्त पुलिस अधीक्षक सहित तमाम दफ्तरों में डेंगू रोग का लारवा मिला है । वाटरकूलर नहीं ऐसी हैं सब के ऑफिस में , लारवा को शरण फिर भी उन्हीं से मिलती है । ये सभी रोग बढ़ाने में योगदान नहीं देते तो रोग क्या योग भी नहीं बचता और सभी डॉक्टर खाली बैठे मिलते । झूठ के मंदिर में इन सभी का योगदान मिलना चाहिए , झूठ से बचकर इनका गुज़ारा नहीं हो सकता है । आप निसंकोच आकर मुझे मिल सकते हैं , अगर चाहोगे तो आपका नाम किसी को पता नहीं चलेगा । मेरे पास कोई सीसी टीवी कैमरे नहीं हैं और न ही झूठ के देवता के मंदिर में लगाए जाएंगे कभी भी । सहयोग जिस तरह भी चाहो दे सकते हैं । सोचना नहीं इस को लेकर , झूठ पर मगज़मारी नहीं करते हैं । सच किसी काम का नहीं है सिर्फ झूठ ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकता है । झूठ को गुणगान की आवश्यकता नहीं हर तरफ उसी के चाहने वाले झूठ पर झूठ बोलकर बहुत खुश हैं सच से लोग घबराते हैं झूठ को गले लगाते हैं ।