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अगस्त 22, 2020

POST : 1367 काला धन से कोरोना तक ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   काला धन से कोरोना तक ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

        बात दो राक्षसों की कहानी की है कहानी की शुरुआत कुछ साल पहले हुई । हर तरफ काला धन की चर्चा थी ये कोई दैत्य था जो देवताओं की नगरी में भेस बदल कर निवास करता था । कोई उसकी सही पहचान नहीं बता सकता था मगर देश की जनता को उस नाम के राक्षस का डर दिखला कर राजनीति की पायदान पर कितने लोग चढ़ते रहते थे । ऐसे में उसने आकर काला धन को पकड़ने और उसकी बिरयानी बनाकर हर देशवासी को बांटने की घोषणा कर दी थी । सब के मुंह में पानी आ गया था बात लाखों रूपये बैंक खाते में जमा होने की जो थी । काला धन नाम के राक्षस को मिटाने को उसने बहुत कुछ किया और इस तरह से किया कि लोग बस करो बस करो कहने लगे । मगर उसने ठानी थी काला धन को सफ़ेद बनाने की और अपनी तिजोरी भरने की । खेल खेलता रहा खेलने के नियम अपनी साहूलियत से बदलते रहे लेकिन काला धन किसी को मिला नहीं बस उसने काला धन नाम के दैत्य को अपने बस में कर अपनी कैद में बंद कर लिया और उसका रंग रूप बदल कर खूबसूरत बना लिया ।

         उसको अपने मन की बात अच्छी लगती है मनमानी करता है । खेलना उसको पसंद है और उसकी मर्ज़ी है चाहे जिस से खेले दिल से भावनाओं से या नये नये ढंग से अपने खेल अपने मैदान अपने नियम बना कर । उसके पास शोले फिल्म वाला सिक्का है जिस में दोनों तरफ उसकी जीत तय है जो वो मांगता है दोनों तरफ वही अंकित है अभी तक कोई समझ नहीं पाया हर बार हर जगह उसकी जीत का अर्थ क्या है । अपने काला धन की तिजोरी से उसने विदेश से इक नया खिलौना मंगवा लिया कोरोना नाम का दैत्य की शक़्ल वाला । खबर सभी को पता चली और लोग भयभीत होने लगे इस आधुनिक राक्षस के नाम से । मगर उसने सबको कह दिया मुझे इस को बस में करना आता है चिंता मत करो जीत मेरी पक्की है । खेल शुरू हो गया खिलौना उसके हाथ नहीं आता था बस उसने सोच लिया ये कोरोना नाम का खिलौना क्या है मुझसे कभी कोई किसी खेल में जीता है न जीतने दूंगा किसी को । साम दाम दंड भेद हर नीति अपनाना आता है मगर मामला काला धन जैसा साफ नहीं था कोरोना को होना है नहीं होना है कुछ समझ नहीं आया मगर उसने भी खेल को समझा न सामने वाले खिलाड़ी को हराने का दम भरने लगे ।

  कोरोना हंसता उसकी नासमझी की बातों पर , ताली बजाओ थाली बजाओ अंधेरा करने के बाद टोर्च जलाओ जैसे काम देख उसको लगता मनसिक संतुलन बिगड़ गया है । कोरोना की चाल उसको समझ नहीं आती थी कभी सबको घर में बंद कभी खुद और ख़ास लोगों को सब करने की आज़ादी कभी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे बंद कभी मंदिर में पूजा पाठ कभी इधर कभी उधर । फिर सब बंद से सब खोलने तक की नादानी की की कसरत और सत्ता का गंदा खेल खेलने की आज़ादी । कोरोना को मनाने की कोशिश करते हुई समझौता वार्ता में उसको दिन भर की छूट देने की बात मगर वो भी ज़िद पर अड़ा रहा कोई बात मंज़ूर नहीं की । सप्ताह में इक दिन की दो दिन की छुट्टी भी कोरोना को स्वीकार नहीं हुई । उसने कितनी बार टीवी पर जनता से बात की और समझाया कि कोरोना को अवसर समझना चाहिए हमको इस से अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक करने को उपयोग करना होगा । बस किसी ढंग से कोरोना अपनी जकड़ पकड़ में आये तो सही फिर उसको दुनिया भर को महंगे ऊंचे दाम पर बेचकर मालामाल होना तय है ।

   देश नहीं बिकने देना की बात कहते कहते देश में जो भी नज़र आया उसको बेच दिया ये उसकी मॉडलिंग का करिश्मा ही है जो चाय से लेकर कुछ भी बेच सकता है । खरीदार मिलना चाहिए हर चीज़ बिकती है नेता क्या अभिनेता क्या अदालत क्या सियासत क्या ईबादत क्या तिजारत क्या कोरोना क्या हिफाज़त क्या । गांधी जी ने सत्य पर शोध किया जनाब ने झूठ पर शोध करने का कीर्तिमान स्थापित किया है । काला धन वाला राक्षस और कोरोना वाला महाराक्षस दोनों की नस्ल झूठ वाली है उनकी असलियत कोई नहीं जान पाया कोई जानना भी नहीं चाहता है ।   
 
 Corona काल में Swiss Bank में 3 गुना बढ़ा Indian का धन, जानकर हो जाएंगे  हैरान | वनइंडिया हिंदी

अगस्त 13, 2020

POST : 1363 आत्मनिर्भरता की पढ़ लो पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 आत्मनिर्भरता की पढ़ लो पढ़ाई ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       शहंशाह का मूड आज बदला बदला है आज खास बैठक में बात आत्मनिर्भर बनाने की है । शुरुआत करते हुए बोले कि कितना अच्छा है जो कभी सोचा नहीं था कोरोना के लॉक डाउन ने करवा दिया है । जो पुरुष घर के काम को आसान समझते थे खुद करना पड़ा तो होश ठिकाने आ गए । जिन महिलाओं ने खुद अपने हाथ से चाय क्या पानी का गलास नहीं उठाया था पकोड़े बनाना उनको आ गया । देश के आत्मनिर्भर बनने की ओर ये पहला कदम है । सभी समझते हैं शादी विवाह ज़रूरी है कोई भी घर और बाहर दोनों जगह एक साथ काम नहीं कर सकता है । पति पत्नी दोनों इक दूजे की ज़रूरत हैं मुहब्बत नहीं मज़बूरी है बस यही गलत है इस आधुनिक युग में कोई किसी पर निर्भर क्यों रहे । मेरे परिवार ने भी मुझे आत्मनिर्भर बनाने की जगह मेरा विवाह रचाया था और मुझे उसी जाल में फंसाया था जिसको परंपरा समझ बनवाया था । मगर जैसे ही मुझे समझ आया था मेरे मन का पंछी पिंजरा छोड़ आया था । रसोई का काम मुझे भी नहीं भाया था मगर मैंने आत्मनिर्भर होने का अपना ढंग अपनाया था । तीस साल तक मैंने कहीं कोई चूल्हा नहीं जलाया था भीख मांग कर खाया था और स्वयं सेवक कहलाया था । मुफ्त का माल खाकर बड़ा मज़ा आया था इस से अच्छा कोई कारोबार नहीं है दुनिया भर को समझाया था । 

     देश की शिक्षा नीति को बदलना ज़रूरी है सभी को सब सीखना करना ज़रूरी है । मेरी बात और है मेरी शिक्षा में पढ़ना लाज़मी नहीं उपदेश करना ज़रूरी है । नवयुवकों को खुद खाना बनाना सीखना होगा उसके बाद गंभीरता से सोचना होगा बंधन में बंधना है या आज़ाद रहना है आप सभी घर परिवार वाले हैं कहो जो भी कहना है । शादी का लड्डू सभी खाते हैं कुछ खाकर कुछ बिना खाये पछताते हैं मैंने भी ये लड्डू खाया था किसी को खिलाया किसी का भोग लगाया था । मगर मुझे उसका स्वाद समझ नहीं आया था दिल में कुछ ज़ुबान पर कुछ करना था कर नहीं पाया था सच सोचकर ही ये बात घबराया था जब उसने जन्म जन्म के बंधन का अर्थ समझाया था । कोई बात थी दिल उकताया था मैं भाग आया था । शादीशुदा ज़िंदगी अनसुलझी कोई पहेली है आपका कोई दोस्त है आपकी कोई सहेली है जिस किसी ने आपको ये राह बताई है मत पूछो किस जन्म की दुश्मनी निभाई है । शादी वो इम्तिहान है जिसमें कोई भी पास नहीं होता है ज़ीरो नंबर मिलने से बढ़कर कोई एहसास नहीं होता । हमने शिक्षा नीति में शादी का विषय शामिल किया है सोलह अध्याय की किताब लिखवाई है लेखक किसी का साला नहीं है जीजा है न बहनोई और न किसी का सगा या सौतेला भाई है । बस इकलौता है और घरजवाई है नहीं कोई ननद न कोई भोजाई है सास ससुर शहद हैं दुल्हन रसमलाई है । सबने झूठी कोई कसम भी खाई है छाछ है कौन कौन मक्खन कौन दूध मलाई है ।

  पहले अध्याय में गहराई है ऊंचाई है शादी की परंपरा कब किसने क्यों बनाई है । जाने किसने बेमेल जोड़ी बनाई है एक बकरा है एक कसाई है बारात है दूल्हा दुल्हन बजती शहनाई है । उलझन है हर किसी ने उलझन उलझाई है हर कोई कहता है तू बड़ा हरजाई है । भला कौन किसको खिलाता है हर कोई अपने नसीब का खाता है विधाता ही दाता है दुनिया भिखारी है कानून कितने हैं समाज के नियम हैं अदालत सरकारी है । ज़रा सी देर में अविवाहित विहाहित बन जाता है उसके बाद कोई रास्ता उधर नहीं जाता है । मुझे बस यही समझ आया है झूठे सभी बंधन झूठी मोह माया है । शादी से परेशान हैं भविष्य से अनजान हैं क्या किया क्यों किया सोचकर हैरान हैं । अलग होने का पूछते रास्ता बताओ अगर ज़रूरत है पास मेरे आओ तलाक की बात छोड़ो बंधन को तोड़ो भाग जाओ भूलकर फिर से नहीं शादी रचाओ जिओ उसको भी जीने दो का रास्ता आज़माओ । आत्मनिर्भरता की पढ़ना पढ़ाई उसके बाद सोचना क्यों करनी शादी क्यों करनी सगाई । मुझे देख लो मैं विवाहित नहीं न ही कुंवारा मुझे चाहिए क्यों किसी का सहारा । मैं ये बाज़ी खेला इस तरह से नहीं जीत पाया मगर नहीं फिर भी हारा । हर कश्ती को मिलता नहीं है किनारा नहीं सबको मांझी ने पार लगाया । ये दरिया है डूबकर पार कर लो मौत को ज़िंदगी मत समझना इसे छोड़ कोई और कारोबार कर लो ।

 सरकार विवाह कानून में बदलाव करने पर विचार कर रही है । लड़के-लड़की की आयु के साथ साथ शादी की पढ़ाई विषय में पचास फीसदी अंक पाने की शर्त अनिवार्य की जा सकती है । सरकारी इश्तिहार टीवी अख़बार में नियमित दे सकते हैं कि गठबंधन करने से पहले सावधान रहना है जांच लें कि दोनों में आत्मनिर्भरता की पढ़ाई की है और शादी के विषय काअध्यन किया है अच्छे अंक मिलने वाले को ही चयन करने का सुझाव और हिदायत जारी की जाएगी । शादी विषय का अध्यन करना सभी के लिए कल्याणकारी है यही ईलाज है ऐसी बिमारी है । शादी कहते हैं खाना-आबादी है मगर कभी बन जाती ये भी बर्बादी है । पढ़नी इस की पूरी तरह से समझकर पढ़ाई है सभी की इसी में भलाई है ।
 
 Let's wake up to self-sufficiency in life | Sudhanshu ji maharaj
 

अगस्त 09, 2020

POST : 1361 सुनो इक सच्ची कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     सुनो इक सच्ची कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मेरा नाम झूठ है ये सबसे बड़ा सच है , मुझसे सभी प्यार करते हैं सच कहता हूं सच से मुझे दुश्मनी हैं सभी लोग सच से डरते हैं। मेरा वजूद बहुत पुराना है मुझे याद हर प्यार का तराना है इश्क़ करने वालों से मेरा नाता पुराना है। कहानी मुहब्बत की मेरा फ़साना है हर आशिक़ से माशूक़ का जो भी झूठा बहाना है समझ लो मेरा किस्सा सदियों पुराना है। कभी झूठ बोलने से मौत मिल जाती थी कसम झूठी नहीं कोई खाती थी। फिर युग बदला लोग आधा सच बताने लगे जो कहना नहीं था उसको छिपाने लगे। शायद ये सच है दुमछल्ला लगाने लगे झूठ को इस तरह अपनाने लगे सच से दामन बचाने लगे झूठ से दिल लगाने लगे। आपने भी सुना और स्वीकार कर लिया कि ये दुनिया इक झूठा सपना है यहां कौन किसी का अपना है। जब ये संसार ही सच नहीं है झूठ है तब झूठ के इलावा बचा क्या है। झूठ है दुनिया और हमको जीना है यहीं झूठ को सच मानकर। आज कलयुग का ज़माना है आपके दिल में मेरा ठिकाना है बस यही आपको समझाना है मेरा आपका पक्का याराना है। हर किसी ने मुझे देवता माना है।

   ज़िंदगी में हर मोड़ पर कोई दोराहा आता है इक कठिन रास्ता सच की तरफ जाता है कोई सड़क नहीं है न कोई पगडंडी है कांटों भरी राह है खतरे ही खतरे हैं। मेरी तरफ आने को राजमार्ग बनाये हैं आसानी से हर मुश्किल से पार जाने को पुल बनवाये हैं झूठ ने सभी को लुभाया है गले से मुझे आपने भी लगाया है कितनी बार सभी ने आज़माया है यही पाया है सच है तपती धूप झूठ शीतल छाया है। नादान थे लोग जो झूठ से बचते थे सच की खातिर जीते थे बार बार मरते थे। सब लोग उनको ज़हर पिलाते थे सूली पर सच बोलने वाले को ही चढ़ाते थे सच का क़त्ल करने वाले मसीहा कहलाते थे। मुझसे कभी लोग नफरत किया करते थे जो भी झूठा हो पापी उसे कहते थे मगर वक़्त आने पर काम उनके झूठ ही आया सच कभी किसी का पेट नहीं भर पाया। झूठ हर समय सभी के काम आया झूठ को अपना जिस किसी ने बनाया खूब खाया सबको खिलाया झूठ की बुनियाद पर घर अपना बनाया बाहर घर के नाम सच लिखवाया। कुछ इस तरह झूठ को सच से महान बनाया। 

   देखो है झूठ का राज जब से आया सच दुनिया में कहीं भी नज़र नहीं आया। झूठ ही तेरा भगवान है बंदे चंगे लगते हैं जो लोग हैं मंदे। गंदे हैं फिर भी अच्छे हैं धंधें ये धर्म ये राजनीति ये सत्ता के हथकंडे। आपको मेरी चाहत का ऐतबार है जानते हैं झूठ ही सच्चा दिलदार है झूठ सभी का अपना है सच तो कोई टूटा हुआ सपना है अब सच का निशान नहीं है सच किसी के घर महमान नहीं है झूठ माई बाप है जिसका कोई एहसान नहीं है। मुझे खोजना है न देखना है न आज़माना है मैं रहता तुम्हारे अंदर मेरा ठिकाना है ये राज़ नहीं है पर फिर भी सबसे छुपाना है। इस युग इस जहां में रहने को झूठ को बचाना है ये रिश्ता अपना सबसे सुहाना है झूठ का अपना इक तराना है हमने मिलकर गाना गुनगुनाना है। सबको ये अब जाकर बताना है इक झूठ का मंदिर हमने बनाना है मिलकर झूठ को सबने मनाना है उस के दर से झोली भर भर के लाना है। झूठ ही आजकल भगवान बन गया है सच अनचाहा वरदान बन गया है सच को कभी अपना नहीं बनाना झूठ से नाता हमेशा निभाना। झूठ की नैया पार लगाएगी सच की दौलत नहीं किसी काम आएगी कोई बैरागन बिरहा का गीत जाएगी सच को खो गया है उसको बुलाएगी शहर गांव से बाहर अकेली भटकती रहेगी सुनसान वीराने में आधी रात को उसकी आवाज़ आएगी। 

आजकल इंसान में इंसान नहीं मिलते इंसान के भीतर ज़मीर आत्मा भगवान नहीं रहते। बस झूठ सभी के अंदर रहता है जो खुद को सच भी कहता है। पहचान सके तो पहचान लो खुद को झूठे हो मान लो मान लो खुद को। सच कभी मन में रहता था सभी के कहा करते थे झूठ कोई बोले उसको तुम हो झूठे कहीं के। मगर हुई जब झूठ से जान पहचान सभी की मुरादें मिलीं हुई पूरी हर हसरत सभी की। मन से सच को बाहर तब निकाला उसे ज़िंदा रहते ही क़त्ल कर डाला। दफ़्न सच को अपने अंदर कर दिया है होंटों के सच को सिल दिया है सच जाने कहां इक घुटन बन गया है सच पराजित नहीं हुआ शायद मर गया है। उठा कोई जनाज़ा न कोई मज़ार कहीं सच की बनी है करे कौन साबित है क़त्ल हुआ सच कैसे। झूठ है कानून झूठ है दौलत झूठ दुनिया झूठ पैसे झूठ की अदालत ने सुनाया है फैसला नहीं कोई गवाह हो जिसने सच को ज़िंदा भी देखा। कहीं अधमरा शायद रहता था कोई न कोई उसका वारिस न कोई वसीयत भी लावारिस की तरह सच का अंजाम होना था। सच क्या था लगता है मिट्टी का खिलौना था कभी न कभी चूर चूर होना था। सच फुटपाथ पर सोता था लगता है बिस्तर नहीं था न कोई बिछौना था। यही कभी होना था होना था।


Is God Lying about His Involvement in Violence?

मई 05, 2020

POST : 1284 सोमरस से कोरोना का ईलाज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  सोमरस से कोरोना का ईलाज ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

  जो काम पैसे से नहीं होता सिफारिश से नहीं होता शराब की इक बोतल से झटपट हो जाता है । ये राज़ हर कोई जानता है । आपके घर दामाद जीजा जी आएं उनको छपन्न भोग खुश नहीं कर सकते मगर उनकी पसंद की शराब पिलाओ तो उनकी ख़ुशी आसमान पर होती है । शराब पीने को लोग कितने फासले तय कर लेते हैं ये लॉक डाउन कोरोना उनको क्या रोक सकते हैं । जो पीते पिलाते थे सरकार उनको पीने का अधिकार दे रही है यही स्वर्णिम पल हैं जो कभी कभी मिलते हैं । मोक्ष मिलना आसान है इस युग में घर में बंद शराबी को शराब का वरदान मिलना बड़ी बात है ।  

    देर से ही  सही कोई शोध करने की कोशिश की जा रही है । ये जो बुद्धीजीवी तरह के लोग हैं उनको ताली थाली दिया जलाना फूल बरसाना मज़ाक लग रहा था मगर शराब की दुकानें खोलना कोई बिना सोचे समझे उठाया कदम नहीं है । सब देश अपने ढंग से दवा वैक्सीन बनाते रहें हम जानते हैं शराब सब दुःख दर्द मिटाने को ही कारगर नहीं है उस में अल्कोहल होता है जो हाथ धोने के सेनिटाइज़र में भी काम आता है और जिसको पीना भी खतरनाक नहीं अमेरिका के ट्रम्प के नीम हकीम जैसे नुस्खे की तरह । ये जांच करने को ही शराब के ठेके खोलने का निर्णय लिया गया है और उस को और महंगा करना भी उचित है दवा की तरह काम आने वाली हर चीज़ महंगी होनी लाज़मी है । अगले कुछ महीने में सरकार यही आंकड़े देखती रहेगी कि जैसे शराबी लोग सोचते हैं शराब कीटाणु नाशक है और उनके भीतर से सब जीवाणु कीटाणु का अंत कर देती है । शराबी को शराब को छोड़ कोई और नहीं मार सकता है । निडर होकर शराबखाने की कतार में बारिश धूप हर मौसम में खड़े होने का दम खम और हौसला रखने के बाद कोरोना खुद उनसे अपनी जान बचाने को दूर रहता है या नहीं । और फिर भी कोरोना उनको अपना शिकार नहीं बना सकता पाया जाता है तो हमारी बल्ले बल्ले है । जो अमेरिका इंगलैंड नहीं कर सकता भारत देश बड़ी आसानी से कर सकता है शराब बनाना यहां गांव क्या वीरान जगह रहने वाले तक जानते हैं और मानते हैं उनकी घर की बनाई शराब की बात ही और है । शराब पीने से आदमी का हौंसला बढ़ जाता है और चिंता दूर हो जाती है इसलिए भी जब लोग कोरोना से घबराए हुए हैं शराब सहायक बन सकती है ।

     कोरोना पर शराब का असर देखने क ये शोध सफल हुआ तो देश में शराब की नदियां भले नहीं बहाई जा सकती हैं मगर रसोई गैस और पानी की लाईन की तरह सप्लाई करने का काम किया जाना मुमकिन है । घर घर शराब को सोमरस नाम से उपलब्ध करवाया जा सकता है क्योंकि जिनको नहीं मालूम उनको बता देते हैं कि ऐसा न केवल आयुर्वेद में वर्णन है बल्कि 1978 तक या उस के भी कुछ समय बाद आयुर्वेदिक दवा की दुकानों पर ये बिकती रही है और वास्तव में इसका उपयोग दवा की तरह नहीं शराब की तरह किया जाता रहा है । दाम भी कम और जिस दिन ड्राई डे होता ठेके बंद तब भी आसानी से मिल जाती थी । तब मुझे ये बात मेरी क्लिनिक के सामने खुली इक दुकान से पता चली थी । आपने भी किसी जगह शराब की बोतल चढ़ाने की बात सुनी होगी । शराब को शराब की तरह पीना हर किसी को नहीं आता अन्यथा शराब खराब नहीं होती खराबी शराब पीने वाले में होती है जो मदहोश होने को नहीं होश खोने को पीते हैं । शराब का हल्का हल्का सुरूर काफी होता है होश में रहना मदहोशी भी । जब सोमरस का गलत उपयोग किया जाने लगा तब इसको बंद करवा दिया गया था ।

   सबसे अच्छी बात है कि शायद एक धर्म को छोड़कर किसी भी धर्म में मदिरा पान की मनाही नहीं है । जिस धर्म में मना है उन को भी मरने के बाद शराब मिलने की चाहत रहती है क्योंकि उनको यही बताया जाता है । मेरा आशय किसी धर्म की बात पर कुछ भी कहना नहीं है बल्कि जान है तो जहान है ये सोचकर शायद जो हम जैसे नहीं पीते या पीना छोड़ चुके हैं वो भी इसका स्वाद चख सकते हैं । किसी ज़माने में परमिट मिला करते थे ताकि हर कोई निर्धारित सीमा में नशा सेवन कर सके वही व्यवस्था फिर से लागू करनी होगी या ये भी किया जा सकता है कि डॉक्टर की लिखी पर्ची से ही कौन सी और कितनी शराब पीनी है खरीद सकेंगे । डॉक्टर्स की मौज हो जाएगी उनको शराब बनाने वाली कंपनियां मुफ्त सैंपल देकर अपना धंधा बढ़ाने का काम करेंगी । दवा कंपनी वाले अभी भी यदा कड़ा डिनर मीटिंग में शराब परोसती हैं ।  यहां इक समस्या खड़ी हो सकती है क्योंकि आयुर्वेद में सोमरस का वर्णन है इसलिए युर्वेदिक डॉक्टर इस पर अपना अधिकार समझ सकते हैं । मगर वास्तव में ये उपचार संभव है भी या नहीं इस को लेकर कोई आयुर्वेदाचार्य भी विश्वास पूर्वक नहीं कह सकते दावा करना तो बहुत दूर की बात है ।

     ऐसे में ये उपाय आज़माने को किसी चिकत्सक ने नहीं बल्कि जब सभी भविष्यफल बताने वाले कोई भविष्वाणी नहीं कर सके तब किसी लाल किताब वाले ने कोशिश करने को ये गोपनीय संदेश भेजा होगा  कुछ ऐसा अनुमान लगाया जा सकता है । क्योंकि लाल किताब वालों के जितने भी उपाय होते हैं उनको बिना किसी की जानकारी करना ही सफलता की शर्त होता है । लाल किताब वाले बताया करते हैं कि कोई उपाय किस दिन किस समय और किस ढंग से किया जाना चाहिए । कभी बहते पानी में शराब की उनकी बताई संख्या की बोतलें उंडेलनी होती हैं कभी किस वीरान में ज़मीन में दबानी और कभी जो बहुत दिन से प्यासा हो उसकी प्यास बुझाना भी उपाय होता है । शायद चालीस दिन की प्यास की भी कोई शर्त रही हो सकती है । पता चला है कि लाल किताब वाले उनको जो शराब का सेवन नहीं करते हैं घर की अलमारी में इक बोतल रखने का उपाय बताया करते हैं ।

( ये सच है या अनुमान कोई नहीं जानता । मगर इक चेतावनी आपको अवश्य देनी है कि ये इक काल्पनिक रचना शुद्ध मनोरंजन के लिए है अंधविश्वास को बढ़ावा देने को नहीं , क्योंकि जैसा सुनते हैं बताया जाता है कि अगर किसी के पास सही में कोई लाल किताब होगी तब आपको खुद उसके पास जाकर अपना परिचय देने की ज़रूरत नहीं होगी क्योंकि विश्वास है कि उसको अपनी किताब से पहले से जानकारी होगी किस ने कब क्यों आना है । असली नकली की पहचान इस से भी हो जाएगी कि न तो वो कोई पैसे लेगा और आपको खुद कुछ भी लिख कर देगा बल्कि आपको अपने पेन से अपने हाथ से कागज़ पर लिखवाएगा जो जो भी उपाय करना है । और क्योंकि ऐसा कोई नहीं मिलेगा इसलिए जब कोई आपको लाल किताब होने की बात कहे तो इस को आज़मा कर देख सकते हैं । सोशल मीडिया पर ऐसे नकली लोग मिलते हैं सावधान । )


 
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अप्रैल 14, 2019

POST : 1050 कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया

      कलयुग की आत्मकथा ( व्यंग्य कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

     शानदार वातानुकूलित मॉल के हॉल में स्वयं कलयुग सफ़ेद रंग का चोला धारण कर बाकायदा भीतर आने की महंगी टिकट खरीदने वालों को अपनी आत्मकथा सुना और दिखला रहे हैं। मान लिया गया है कि ये इस युग के भगवान हैं और इनकी अराधना आरती पूजा पाठ सब कुछ दे सकता है। पहले अध्याय में बात सत्ययुग की बताई थी फिर कैसे युग बदलता गया विस्तार से समझाया था। यहां सभी देवी देवता रहा करते थे धर्म भी इक गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसका कोई अपना महल नहीं था मगर उसका ठिकाना हर दिल में हुआ करता था। माता पिता थोड़ा पढ़े लिखे होते थे मगर उनकी समझ ऊंची हुआ करती थी बच्चे माता पिता को गुरु भगवान से बढ़कर मानते थे और घर कितना छोटा भी होता दिल सभी के बड़े हुआ करते थे। तब घर में बच्चे भाई ताऊ चाची सब मिलकर रहते थे। घर में रौनक चहल पहल रहती थी मधुर वाणी सुनाई देती थी कोई शोर नहीं होता है धीमी आवाज़ भी सब को सुनाई देती थी। मन साफ थे और रूखी सूखी खा कर भी कोई कमी नहीं महसूस होती थी।

     अहंकार स्वार्थ जाने किधर से आकर सब के भीतर रहने लगे और भाई भाई अलग होने लगे बच्चे माता पिता से दूर जाने लगे सभी अपनी अपनी दुनिया बसाने लगे। घर बड़े और ऊंचे आसमान को छूने वाले बनते गए सामान बढ़ता गया घर में इंसान को रहने को दो गज़ जगह भी अपनी नहीं मिलती है। कभी जिन माता पिता के घर आंगन में सब बच्चे भाई बहन उनके साथी दोस्त सखी सहेली खेला करते थे उन्हीं माता पिता को बच्चों के घर में आकर समझौता कर वक़्त बिताना पड़ता है। पिता के घर अधिकार से सब रहते थे बच्चों के महल में रहना है तो बड़े बूढ़ों को सलीका सीखना होता था और जीने को सब सहना पड़ता है। आधुनिकता और तथाकथित सभ्यता के विकास ने बाग़ बगीचे छीन गमले की सीमा बना दी थी पेड़ पौधे सब का अपना सभी कुछ बदल गया है छांव तलाश करते हैं तो दरख्तों से आग बरसती लगती है। पत्थर के लोग क्या हुए जो देवी देवता हुआ करते थे सभी बेजान पत्थर के बन गए हैं। लोग इंसान को प्यार नहीं करते पत्थरों की पूजा का आडंबर करते हैं धर्म जिस गरीब की झौंपड़ी में रहा करता था उसे शासन ने हटवा दिया है और जगह जगह अधर्म को स्थपित कर उनको धर्मस्थल घोषित कर दिया है। अब किसी भी ऐसी जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता रहता नहीं है उनका भेस धारण कर मुझ कलयुग के अनुयायी मालामाल हो रहे हैं। सब मेरी इबादत पूजा करते हैं और पाप पुण्य का भेद बचा नहीं है। 

                युगों की दास्तान सुनाने में जितना समय लगेगा उतना जीवन बाकी नहीं है किसी के पास भी , सब सांसों की गिनती को जीना समझते हैं सांस सांस की कीमत चुकानी पड़ती है। बीती बातों को जानकर क्या होगा गुज़रा हुआ ज़माना वापस लौटता नहीं कभी। अपने जो खोया है बहुत मूलयवान था जो संजोया है कौड़ी का भी मोल नहीं है अभी आज की बात आज पर ही चर्चा करते हैं। कलयुग आया तो चोरी लूट डकैती अन्याय अत्याचार होने लगा ऐसे में इक चालाक आदमी ने कलयुग को सत्ययुग बनाने की बात की और सत्ता के शिखर पर चढ़ गया। उसने सभी को चोर अपराधी गुनहगार घोषित कर दिया और हर किसी पर पहरा लगाने का उपाय करने लगा। चोरी से बचने को सब को आदेश दिया अपना धन पैसा सोना चांदी हीरे मोती सभी कीमती सामान बैंक  में जमा करवाना है और सभी बैंकों की चाबी खुद अपने पास रख ली हैं। उसने घोषित किया है वही अकेला चौकीदार बनकर देश की रखवाली करेगा। और अपने काम में वह इधर उधर भागता फिरता है इस भरोसे पर कि जब हर खज़ाने की चाबी उसी के घर सुरक्षित हैं तो कोई चोर चोरी कैसे कर सकता है। मगर उसको इस बात का पता नहीं है कि घर घर में कोई महिला पत्नी बनकर घर की रखवाली किया करती है जबकि उसकी पत्नी घर में रह नहीं सकती है। अब ऐसे लोगों के घर यार दोस्त जब मर्ज़ी बिना रोक टोक घुसते रहते हैं घर की कोई मालकिन देखने को दरवाज़ा बंद करने को नहीं है। अब चौकीदार के घर से राज़ के दस्तावेज़ चोरी हो जाते हैं लोग बैंकों का खज़ाना लूट भाग जाते है मगर चाबियां सुरक्षित हैं इसलिए चौकीदार चोरी लूट को मानने से इनकार करता है। चौकीदार अब अपनी बिरादरी कुनबा बढ़ाना चाहता है और दावत देने लगा है आप भी चौकीदार बनने की घोषणा कर दो। हर कोई उनका रुतबा देख मैं भी चौकीदार घोषित कर रहा है। 

              आज की कथा का अंत इसी बात पर करते हैं कि जो देश करोड़ों देवी देवताओं का हुआ करता था क्या उसका भविष्य चौकीदारों का देश शहर बस्ती होना विकास की बात हो सकता है। क्या इस बात पर ताली बजाई जानी चाहिए आप सभी से वही इक दिन सवाल करेगा। चौकीदार होना क्या बुरी बात है क्या चौकीदार इंसान नहीं होते हैं उनको शासक नहीं बनाया जा सकता है। ऐसे में इक छोटे से शहर की अदालत ने जाने क्या समझ कर निर्णय सुनाया है चौकीदार से आठ घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता है और उसको छुट्टी भी मिलनी चाहिए। चौकीदार की छुट्टी की बात से कितनों को पसीने आने लगे हैं कोई छुट्टी नहीं चाहता है क्योंकि चौकीदारी ऐसा कर्म है जिस में जागते रहो की आवाज़ लगाने को छोड़ कोई काम नहीं करना होता है और आजकल गली गली चौकीदार की रिकार्डेड आवाज़ गूंजती रहती है और चौकीदार मज़े लूटता रहता है। त्याग की बात हो तो हर कोई ऐसा त्याग करने को व्याकुल है। हींग लगे न फटकरी और रंग भी चौखा इसी को कहते हैं।

           कलयुग में सच बोलना गुनाह और झूठ बोलना महानता घोषित किया गया है। झूठ सिंघासन पर विराजमान है उसकी महिमा का गुणगान होने लगा है। शासक बनने के बाद झूठ ने अपना रुतबा बढ़ा लिया है अब सेवक चौकीदार नहीं कहलाता मालिक बन गया है। जिनको बुरा बताते थे उनको झूठ अपने दल में शामिल कर अच्छा बताने लगता है। कलयुग को सबसे अच्छा बताया जाने लगा है मुक्ति का मार्ग और मोक्ष पाने की राह कलयुग से बेहतर कोई नहीं है। कलयुग रात को दिन दिन को अंधेरी रात साबित कर सकता है। सुशासन जिसको कहा जा रहा है उस से खराब शासन कभी किसी ने नहीं देखा है। सभी को को कलयुग का स्वागत करना ज़रूरी है ऐसा ऐलान किया गया है।
  

मार्च 16, 2019

POST : 1027 आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      आदर्श आचार संहिता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     मैं जनता की भलाई को ध्यान रखते हुए निर्वाचन आयोग से इक निवेदन इक विनती करना चाहता हूं। बस बहुत लागू कर के देख चुके अब आदर्श आचार संहिता को तुरंत वापस ले ले। न तो मुझे कोई चुनाव लड़ना है न ही राजनीति से कोई मतलब है मुझे फिर भी तमाम कारण हैं जिन पर विचार करने के बाद समझ आया है कि इस से जिनको मुश्किल होनी चाहिए ऐसा समझते हैं उनको नहीं वास्तव में बाकि जनता को मुश्किल होती है। सबसे पहली बात अपने चुनाव आचार संहिता बनाते समय आम जनता की कोई सलाह ली ही नहीं। जबकि इसका असर पड़ता जनता जनार्दन पर ही है। राजनैतिक दलों से मशवरा करने का क्या औचित्य है ये उस तरह की बात है जैसे खेल के नियम खिलाडियों से राय से बनाये जाएं। राजनीति का मतलब राजनेताओं से नहीं बाकी सभी लोगों से अधिक होता है क्या जनता बस खेल की तमाशाई है तालियां बजाने भर को। सब को मालूम है ऐसी किसी संहिता का पालन होता नहीं है और इसको मानकर चुनाव जीतना क्या लड़ना भी संभव नहीं है। जब शुरुआत पर्चा दाखिल करते समय ही बात झूठा शपथ पत्र देने से की जाती है तो आगे भगवान ही मालिक है। जनता पर इसका कितना खराब असर होता है इसकी व्याख्या करना ज़रूरी है तभी आयोग को भूलसुधार करने की बात समझाई जा सकती है।

    इस देश में अधिकारी आदी हैं कोई काम बिना ऊपरी आदेश नहीं करने की आदत के। खुद ब खुद अगर उचित कार्य करने की रिवायत होती तो विनती करने को अर्ज़ी देने दफ्तर जाकर कतार में खड़े होने की नौबत नहीं आती। खुला दरबार लगाने की परंपरा का अर्थ भी शासक का दाता बनकर अनुकंपा करना है जबकि वास्तव में लोग जाते हैं उचित कार्य नहीं किये जाने की शिकायत लेकर। सत्ता को शिकायत सुनना पसंद नहीं है और अधिकारी अगर रिश्वत लेने का लालच नहीं हो तो कोई काम करने की ज़हमत उठाते ही तभी हैं जब कोई सत्ताधारी दल का नेता सिफारिश करता है। चुनाव से पहले इस सब को रोकने से क्या मतलब यही है कि आपको बाकी पांच साल तक उचित काम भी मनमानी पूर्वक करने की खुली छूट मिली हुई है। जैसे उपवास के दिन खाने पीने पर कोई रोक या ऐतिहात की बात हो। नेता अपने ख़ास लोगों और धनवान चंदा देने वालों के सभी काम हमेशा करने को तत्पर रहते हैं यही अकेला अवसर जनता के लिए था वोट मांगने आने वाले नेताओं से अपने काम करवाने की बात करने का उसे भी आयोग ने छीन लिया। नेताओं की मंशा कभी नागरिक के उचित काम बिना फायदा उठाये करने की होती नहीं है इस तरह उनको बहाना मिल गया है नहीं करने का।

     चुनाव होने के बाद नेताओं को सरकार बनाने गिराने से अधिक महत्व किसी बात का नहीं होता है। आम नागरिक से मिलने को फुर्सत नहीं होती न ही मिलना चाहते हैं। आम जनता से मुलाक़ात कभी संभव हो तब भी टरकाने को सौ ढंग हैं अर्ज़ी ले लेना विभाग को आगे भेजने की बात कहना या फिर दिखावे को भेज भी देते हैं लेकिन वास्तव में काम किस का करना है हिदायत देने पर ही होता है वर्ना अर्ज़ियां रद्दी की टोकरी में चली जाती हैं। आम जनता के लिए हिदायत चुनाव के वक़्त दी जाती थी उसी को बंद करवा दिया आपने। क्या संविधान उचित काम चुनाव के दिन नहीं करने को कहता है , नेताओं को सिफारिश से रोकना है तो हमेशा को बंद करना चाहिए। सब जानते हैं नेताओं की सिफारिश बिना काम जायज़ ढंग से होते ही नहीं ये कुछ दिन की पाबंदी नौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज पर जाने की चुटकुले जैसी बात है।

   दूसरा नियम चुनवों में खर्च पर सीमा को लेकर है हर बार जो हमुमान जी की पूंछ की तरह बढ़ता जाता है। सीमा में खर्च का शपथ देना कोई चुनावी उपहास जैसा है। पांच साल नेता हज़ार तरह से कल्याण राशि के नाम पर कोई और तरीका अपना कर देश के खज़ाने और जनता से चंदा रिश्वत किसी रूप में वसूल कर लूट का व्यवसाय करते हैं और पता चलता है उनके कुछ हज़ार करोड़ों बन चुके हैं ऐसा जादू का करिश्मा अन्य कोई नहीं जनता देश में। देश की संपत्ति का बड़ा हिस्सा इन पास है अगर इनको सीमा से कम नहीं बल्कि ऐसा नियम होता कि आपको दो करोड़ से अधिक खर्च करना लाज़मी है अन्यथा आपका चुनाव रद्द हो जाएगा तब जितना काला सफ़ेद धन इनकी तिजोरी में सड़ता है उसको हवा लगती और देश की अर्थव्यवस्था में इतना पैसा आने से कितने लोगों को थोड़ा हिस्सा मिल जाता। वैसे भी कोई शरीफ और ईमानदार आदमी चुनाव लड़ने की बात सोच भी नहीं सकता है।  चुनाव  लड़ने जीतने को गुंडागर्दी बदमाशी अपराधी होना ज़रूरी शर्त जैसा है आधा सदन इनकी बदौलत है।

          आखिर में सार की बात समझने को कई ढंग हो सकते हैं मगर कई बातें सुनने को अच्छी लगती हैं वास्तव में अच्छी साबित नहीं होती हैं। कितने राज्य शरब बंदी लागू करते हैं मगर शराब बिकनी बंद नहीं होती। शराब के दाम कई गुणा बढ़ जाते हैं और शराब माफिया घर घर बोतल पहुंचाता है। अभी कितने लाख करोड़ हर दल चुनाव पर खर्च करने को लिए बैठा है सब जानते हैं। उनको खर्च करना है जाने किस किस ढंग से कोई रास्ता तलाश कर के या फिर खर्च करने का नाम और तरीका बदल कर। आयोग आचार सहिंता की भूल को सुधार सकता है या बेशक इसका स्वादिष्ट अचार डाल कर सबको खाने खिलाने की बात कर मालामाल हो सकता है। जैसे हर सरकारी विभाग आयकर विभाग अकेले नहीं कई तरह से कुछ फीसदी जुर्माना या कर वसूल कर अनुंचित उचित का अंतर खत्म कर देता है। हर उम्मीदवार से खर्च का बीस तीस फीसदी लेकर छूट दे सकता है। मिल बांट कर खाना अच्छी बात है , न खुद खाऊंगा न किसी को खाने दूंगा का सच कौन नहीं जानता है आपको भी अभी की सी ए जी की रिपोर्ट को देख जान लिया होगा। सत्ता की भूख से बढ़कर कोई हवस नहीं दुनिया में। गागर में सागर भरने जैसे बात कही है थोड़े लिखे को बहुत समझना।

POST : 1026 ईमानदार उम्मीदवार की खोज ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      ईमानदार उम्मीदवार की खोज ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     चिंताराम जी को चिंता का नामुराद रोग लगा ही रहता है। हर दिन किसी चिंता में डूबे रहते हैं और चिंतन करते रहते हैं। उनका नाम चिंताराम शहर वालों का दिया हुआ है। कभी शहर की बदहाली की कभी सफाई व्यवस्था की कभी शिक्षा की कभी स्वास्थ्य सेवाओं की खराब दशा की कभी पुलिस और अधिकारियों की कथनी और आचरण की तमाम तरह की मुसीबत उनके सर है। सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है। पिछले चुनाव में राजनीति के अपराधीकरण की चिंता में दुबले हुए फिरते थे और कितने दिन इसी जानकारी जुटाने का काम करते रहे कि किस किस नेता पर कितने मुकदमें चल रहे हैं। कितने हैं जिनके गुनाह गंभीर हैं मगर गवाही नहीं मिली तो साबित नहीं हुए और उन्होंने अपनी बेगुनाही और रिहाई का जश्न भी धूमधाम से मनाया और आलाकमान भी उनको क्लीन चिट देकर बहुत खुस हुआ। सरदार खुश हुआ की तरह। जिस  दल को सत्ताधारी दाग़ी लगते रहे चुनाव के समय अपने दल में शामिल कर सारे दाग़ धो डाले तो समझ आया दाग़ अच्छे हैं। कुछ बेकार के बुद्धीजीवी टाइप लोग मिलकर इक संस्था बनाई और अपराधी घोषित नेताओं को जाकर मिल कर इक सभा में आने का बुलावा दे आये सवाल जवाब देने को। नेताओं ने समझाया कि अभी मामला अदालत में है इसलिए कुछ कहना उचित नहीं मगर आप इंतज़ार करें जल्दी ही पाक साफ़ होकर निकलने का भरोसा अदालत पर है। अदालत राजनेताओं को उनकी पसंद का न्याय देने में कभी संकोच नहीं करती जानते हैं चिंताराम जी भी। उसके बाद नेताओं के सहयोगी आये और चेतावनी दे गये इस पचड़े से दूर रहो अन्यथा नेताजी को क्या है इक मुकदमा और सही आपके ऊपर हमले का। पागल हैं फिर भी नहीं समझे और सभा की बात बीच में अटकी रही मगर अपनी धुन के पक्के हैं जो बात दिमाग में घुसी निकलती नहीं है। 

    अपनी समस्या को लेकर चले आये मेरे घर पर , चाय पीते पीते आह भर कर बोले चुपचाप बैठने से क्या होगा। आपको क्या समाज की चिंता नहीं होती है कलम घिसाने से ज़रूरी काम और भी हैं , थोड़ा परेशान लगे। हुआ क्या पूछा तो धमकी मिलने की बात बताई और अख़बार वाले दोस्त भी कन्नी काटने लगे हैं जिस से उनकी चिंता और बढ़ गई थी। हमने बिना कोई विचार किये कह दिया आप कोई और दूसरा तरीका क्यों नहीं अपनाते हैं। बदमाश नेताओं के साथ शराफत की बात करने जाने की जगह किसी शरीफ और ईमानदार नेता के पास जाते और उनको अपनी सभा में बुलाते तो पॉज़िटिव अप्रोच होती। यूं उनको किसी की बात जचती नहीं है मगर मेरी ये बात उनको उचित लगी और उन्होंने तलाश किये कुछ शरीफ और ईमानदार लोग राजनीति की गंदगी में रहते हुए भी बेदाग़ रहने वाले। जब उनको जाकर मिले तो पता चला उन में किसी को भी अपने दल ने टिकट देकर खड़ा किया ही नहीं था। इसके बवजूद भी कुछ उनकी सभा में इस विषय पर बात कहने से बचना चाहते थे इस डर से कि कहीं इसको आलाकमान बगावत नहीं समझ ले। असंतुष्ट भी बाग़ी कहलाने को राज़ी नहीं थे अनुशासनात्मक करवाई की जा सकती है। शरीफ आदमी नेता होकर भी डरपोक रहता है। 
     
  सवाल मुश्किल था क्योंकि चुनाव में खड़े हुए बिना लोग किसी को वोट दे ही नहीं सकते हैं। शरीफ लोग लड़ने से डरते हैं भले बात चुनाव लड़ने की ही हो। अब राजनीति का मतलब विचारों की मतभेद की बात नहीं रही सत्ता की जंग है जिस में जीतने को सब करना जायज़ है। शांति पूर्वक चुनाव लड़ना संभव ही नहीं है। लेकिन उनकी हिम्मत रंग लाई और उन्होंने इक ऐसा नेता खोज ही लिया जो बेदाग़ था ईमानदार और शरीफ होने के बाद भी एक दल ने जिसे टिकट देकर उम्मीदवार बनाया हुआ था। बहुत खुश होकर उनके पास गये चिंताराम जी और निवेदन किया कि बहुत अच्छी बात है जो आप जैसे लोग भी राजनीति में हैं। हमारी संस्था आपको सभा में लोगों से रूबरू करवा कर सम्मानित करना चाहती है। राजनीति के अपराधीकरण पर आपके साथ सवाल जवाब करना चाहती है। उनके सच्चे आश्वासन के बाद सभा की तैयारी में जुट गये। अचानक उनको ख्याल आया पहले उन्होंने जो जो सवाल बना रखे थे वो अपराधी नेताओं से पूछने थे , इस ईमानदार नेता  बुला लिया मगर उनसे सवाल क्या करेंगे ये सोचा ही नहीं। समस्या लेकर मेरे पास चले आये कि अपने सुझाव दिया था अब सवाल भी आप ही बनाओ। मैंने उनकी समस्या का समाधान किया और ये सवाल पूछने को लिखवा दिए। ईमानदार होकर राजनीति में कैसे बने हुए हैं बताओ। पार्टी से टिकट कैसे मिला इसका कोई राज़ है तो बताओ। ईमानदारी से नियम पर चलकर चुनाव जीत कैसे सकेंगे। चुनाव का खर्च कैसे संभव होगा। क्या जनता ने जितवा दिया तो कोई पद मिलने की उम्मीद है और बिना मंत्री बने जनता को किये आश्वासन पूरे कर सकेंगे। जब ये सब सवाल उनको पहले लिखकर देने गए तो उनका कहना था ईमानदारी की बात है मैं इन सवालों के जवाब नहीं दे सकूंगा अतः मुझे क्षमा करें। 
      
उनके घर से निराश होकर लौटते चिंताराम जी को इक उम्मीदवार खुद मिल गए। और कहा चिंताराम जी आपकी समस्या हम जानते हैं और हम जानते हैं आप कब से किसलिए भटकते फिरते हैं। वो ईमानदार नेता हमारी धमकी से डर गए हैं कि अगर आपकी सभा में गये तो उनके ऊपर ऐसा केस बनवा देंगे कि नानी याद आ जाएगी। आप बताओ ऐसे डरपोक क्या करेंगे ईमानदारी और शराफत का। आप हमें बुलाएं और अवसर दें , आपके सभी सवाल हम जानते हैं। कोई केस किसी थाने में दर्ज नहीं हमारे खिलाफ। किसी थानेदार की मज़ाल नहीं कोई रपट भी लिखने की हमारे विरुद्ध। चिन्तराम जी के तैयार सभी सवाल उनकी तेज़ आंधी में उड़ते चले गए और उन्होंने सभा बुलाने का इरादा छोड़ दिया है। आजकल की राजनीती का वाक्य है बेदाग़ ढूंढते रह जाओगे।

फ़रवरी 18, 2019

POST : 1017 बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        बिक रहा है आतंकवाद ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 आजकल आतंकवाद का मौसम है । अख़बार टीवी चैनल से सोशल मीडिया तक सब जगह आतंकवाद की धूम मची हुई है । कभी अमेरिका और लादेन को लेकर अफ़ग़ानिस्तान पर हमले की बात होती थी आजकल कितने नाम सामने आते जाते रहते हैं पलक झपकते ही कहीं गुम भी हो जाते हैं । विश्व में शांति की बात करने वाले तमाम देश हथियारों के सौदागर भी हैं उनकी अर्थव्यवस्था निर्भर है जंग पर । उन से हथियार कोई भी खरीदे उनको सामान बेचना है और मौत का सामान सस्ता महंगा नहीं देखा जाता जिनको मौत का खेल खेलना है हर मोल देने को तैयार हैं । टीवी अख़बार वाले नई स्टोरी नया शीर्षक ढूंढते रहते हैं हम हादसे की जगह से सीधा दिखा रहे हैं सबसे पहले और सच्ची तस्वीरें । पर्दे के पीछे इस सब की भी कीमत ली जाती है चुकाई जाती है । हम शोर मचाते रहते हैं आतंकवाद पीड़ित हैं सभी देश हमारे साथ खड़े हो जाओ मगर हर देश को हर घटना अपनी सुविधा से आतंकवादी लगती है अथवा कुछ और लगती है । राजनेताओं को आतंकवादी घटना खुद को देशभक्त बताने का अवसर लगती है ।
 
         कोई घर पर पत्नी के आतंकवाद की बात करता है तो कोई लिखने वाला इस विषय पर दो अलग अलग लेख लिखता है और दो जगह भेजता है दोनों जगह छपती है रचना और मानदेय मिलता है । लिखने वालों को हर बात विषय नज़र आती है और टीवी चैनल पर कई लोग विशेषज्ञ बनकर चर्चा करते हैं तभी उनका गुज़र बसर होता है । स्कूल का संचालक बच्चों की उदंडता से परेशान है अध्यापक से अनुशासन की बात कहता है , अध्यापक बच्चों की मां से शिकायत करते हैं आपका बच्चा पढ़ाई पर नहीं लड़ाई पर ध्यान देता है । पत्नी अपने पति से गिला करती है अपने बिगाड़ा हुआ है बच्चों को , तंग आ चुकी हूं इनकी शरारतों से । कब किस ने क्या तोड़ फोड़ दिया पता नहीं चलता है , पिता बच्चों को धमकाते हैं सुधर जाओ वर्ना अध्यापक से शिकायत कर देंगे । सुनकर बच्चे मन ही मन मुस्कुराते हैं आतंक की बात हास्य की सिथ्ति बन गई है । देश में भी सरकार विपक्ष बाकी लोग गेंद दूसरे के पाले में डालते हैं सरकार पड़ोसी देश पर आरोप लगाती है । खुद अपनी गलती किसी को समझ नहीं आती है । मामला समझ से परे है दो गायक एक सुर में गा रहे हैं , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है ।
 
             अब उनकी याद बाकी है कभी व्यंग्य में सबसे बड़ा नाम था उनका । पत्नी पर व्यंग्य लिख लिख कर खूब पैसा कमाया था उन्होंने । ओसामा बिन लादेन पर लिखते हुए अपने घर पर बंब डालने का न्यौता तक देने की बात की थी अपनी पत्नी को सबसे खतरनाक आंतकवादी कह डाला था । पत्नी पर हास परिहास चुटकुले पहले भी कम नहीं थे मगर ये तो हद पार करना हो गया था । मामला हत्या का और धारा 307 का बनता था कत्ल की योजना खुद बनाते हैं और कविता में किसी महबूबा की कातिल अदा की बात कर तालियां बटोरते हैं । व्यंग्यकार की पत्नी होना कितना दुश्वार है कोई मेरी पत्नी से पूछे कभी , मगर हाय री नारी अपने पति की इस खराबी की बात नहीं करती जबकि थाने में रपट लिखवाना बनता है महिला को मानसिक परेशानी देना अपराध है । कब तक अबला की सहनशीलता का इम्तिहान लिया जाता रहेगा , वास्तव में पत्नी का आतंक होता तो क्या भरी सभा में ये बार बार कहने का साहस करते । ऐसे लिखने वाले उन पतियों के दर्द से वाक़िफ़ नहीं हैं जो पत्नी की तानशाही की बात ज़ुबान पर लाने का सपना भी नहीं देख सकते । ऐसे व्यंग्य पढ़कर उनके ज़ख्म फिर से हरे हो जाते हैं । ज़ख्मों पर नमक छिड़कना व्यंग्य वालों को खूब आता है । दर्द में हास्य ऐसे ही नहीं पैदा होता है । अमेरिका बाकी देशों में आतंकी खेल खेलता रहा था , इसकी शुरुआत उसी की की हुई है जब खुद उसी के सीने में दर्द उठा तब कराह उठा और आजकल सभी देश उसी से मसीहाई की गुहार लगाते हैं । तुम्हीं ने दर्द दिया है तुम्हीं दवा देना ।
 
          आंतकवाद के सामने घुटने टेकने का काम किस ने नहीं किया और कौन है जिसने मानवता के कातिलों से बात करने और समझौता करने की वकालत नहीं की । बीच का कोई रास्ता सही नहीं होता है आतंकवाद को नामंज़ूर करना है तो उसके रंग की बात नहीं की जानी चाहिए । जिनकी राजनीति ही उन्माद फैला कर विध्वंस कर वोट पाने की रही हो उनको आतंकवाद भी देशभक्त होने का सबूत देकर सत्ता पाने की सीढ़ी लगता हो तो अचरज नहीं है । कोई संगठन भीड़ बनकर दंगे करता है तो क्या उस आतंक को अच्छा वाला आतंकवाद मान सकते हैं अपने अपने गिरेबान में झांकना होगा । नेताओं का भी आतंक है जो लोग सच बोलने से डरते हैं सत्ता और सरकारी विभाग खुद जो मर्ज़ी करते हैं मगर आम नागरिक पर नियम कानून का डंडा चलाते हैं आतंक पैदा कर रिश्वत या जुर्माना वसूल करने को उचित मानते हैं । ध्यान से देखना कोई बॉस अपने कर्मचारी के साथ मनचाहा काम लेने और उसकी महनत से कमाई करने के बाद भी नौकरी से निकालने का भय देकर मानसिक डर किसी आतंकी से बढ़कर देता है । आतंकवाद के चेहरे कई हैं जिन पर विस्तार से बात फिर कभी की जाएगी । 
 
  आतंकवाद पर क्या नहीं हो सकता है , आजकल टीवी चैनल ऐमीनेशन फिल्मों का उपयोग कर दर्शकों को भड़काने उकसाने को बहस का आयोजन कर आतंकवाद को मनोरंजन का साधन समझ बेच कर खूब पैसा बना रहे हैं । सत्ता की राजनीति का शांति और ख़ुशहाली से कोई मकसद पूरा नहीं होता राजनीति का काम ही बांटना भेदभाव बढ़ाकर जनता को उलझाना है । सरकार और सरकारी विभाग साधारण नागरिक के लिए भय और आतंक का प्रतीक हैं , गब्बर सिंह की तरह वसूली अपने आप चंदा समझ देना शर्त है बचने की अन्यथा सरकारी चाबुक हमेशा तैयार है । आतंकवाद का कोई चेहरा नहीं होता फिर भी राजनेता उसको कोई शक़्ल देकर अपनी राजनीति चमकाते हैं । आतंकवाद के जनक से मिलते हैं हाथ मिलाते हैं ज़ोर शोर से भाषण में उसको ख़ाक़ में मिलाने की शपथ उठाते हैं ।  आतंकवाद कुछ नहीं है सरकारों ने मिलकर इक जाल बिछाया है ये सभी कुछ लोगों की माया है जिन्होंने पाखंड को इक औज़ार बनाकर हम सभी को आपस में लड़वाया है । सत्ता उसकी जननी है आतंकवाद उसका जाया है उसी ने पाला पोसा है बढ़ाया है ।

हमें 'आपके आतंकवादी' और 'मेरे आतंकवादी' के युग में नहीं लौटना चाहिए: UN में  भारत ने दिया सख्त संदेश | Jansatta

जनवरी 23, 2019

POST : 1004 काला धन मिल गया है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      काला धन मिल गया है ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       सही समय पर उसका पता चल गया है। जाने क्यों तमाम लोग चिंतित थे कि वो कहां गायब हो गया। किसी ने पिछले चुनाव के समय उसको खोज कर लाने का वादा किया था। तब समझा जा रहा था किसी और देश में जाकर छुप गया है। तमाम दुनिया को छान मारा फिर भी मिल नहीं सका था और लोग सवाल करने लगे थे इस बार चुनाव में कैसे जवाब देंगे जनाब। मगर मिला भी तो उस जगह जहां सब जानते थे फिर भी किसी को ख्याल ही नहीं आया कि उसका असली ठिकाना तो राजनीतिक दल ही हैं उनसे अधिक काला धन किसी और के पास होना संभव ही नहीं है। चिंता होने लगी थी चुनावी जंग बिना वास्तविक हथियार कैसे लड़ेंगे सभी दल वाले। हिसाब लगाया जा रहा है काला धन पहले किस दल की तिजोरी में अधिक था और अब किस दल के खज़ाने में ज़्यादा है। काले धन का धन्यवाद जो जब उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी खुद ही सामने चला आया है। देखा तो पूछना ही पड़ा कहां खो गया था भाई लोग जाने क्या क्या वहम करने लगे थे कि शायद तुम खत्म ही हो गये हो। हंस दिया काला धन , कहने लगा मुझे पता था ढूंढने वाले सभी लोग हर घर की तलाशी लेंगे मगर खुद अपने घर की कोई तलाशी नहीं लेगा। दल कोई भी हो और कितना भी विरोध आपस में भले हो भाईचारा कायम रखना सबको महत्वपूर्ण लगता है। कोई भी दल सत्ता में हो किसी भी दल को काले धन को लेकर कोई चिंता नहीं रहती है। आम जनता के माथे पर काला धन दाग़ की तरह होता है मगर राजनेताओं के चेहरे पर काले टीके जैसा नज़र लगने से बचाने को लगा प्यार की निशानी जैसा।
 
    जिनको भी काला धन मिलने पर हिस्सा पाने की ललक रही उनको भरोसा रखना होगा बस कुछ दिन बाकी हैं। चुनाव आयोग अदालत जांच करने वाले सब ख़ामोशी से काले धन को फिर से नाचता खेलता और सब को नचवाता नज़र आएगा चुनावी जंग उसी से लड़ी जीती हारी जाएगी। कोई भी जीते कोई भी हारे इक यही काला धन है जो विजयी रहेगा और जिसकी जयजयकार हमेशा की तरह होगी ही। काला धन गुनगुना रहा है हम काले हैं तो क्या हुआ दल वाले हैं हम इस दल उस दल दल दल वाले हैं। काला धन सीना चौड़ा कर छाती ठोक खुले आम कह रहा है कोई है माई का लाल जो बिना उसके चुनाव लड़ भी सकता है। ये सभी नेता तो अपने हाथ की उंगलियों पर नाचने वाली कठपुतलियां हैं असली जीत हमेशा मुझ काले धन की हुई है और होती रहेगी। मेरी सुरक्षा को कोई खतरा नहीं है सरकारी अधिकारी से लेकर जाने माने तमाम लोग मेरे चाहने वाले हैं उनके घर दफ्तर मेरा बसेरा है। कोई लाख कोशिश कर ले काला रंग पक्का होता है जिस पर चढ़ता है उतरता नहीं है। राजनीति काजल की कोठरी है उस में कालिख लगती सभी को है मगर अपनी कालिख को दाग़ कोई नहीं मानता है सब उसको तिलक समझते हैं।
 
            हमने काला धन की बात जाकर टीवी चैनल वाले और अख़बार वाले को बताई और कहा आपको यकीन नहीं तो चलो मिलवा देते हैं। अचानक वही अट्टहास फिर सुनाई दिया और देखा जनाब वहां भी चले आये हैं , क्या साक्षात्कार देने को बुलाया है कह दिया। बोला हर दल जो भी विज्ञापन देता है मेरी बदौलत ही तो है मगर यहां आकर काला सफ़ेद का भेद बाकी नहीं रहता है रंगीन होते ही सभी रंग मिलने से चमक बढ़ जाती है। मीडिया वालों के पास काला धन होने की बात कोई नहीं कर सकता है क्योंकि फिर सुनाई कैसे देगी उसकी आवाज़। मीडिया के शोर में बाकी सभी की आवाज़ दब जाती है मार दी जाती है कुचल दी जाती है। जिस देश में हर धार्मिक स्थल दो नंबर के पैसे से दान लेकर या फिर किसी भी ढंग से ज़मीन मुफ्त में या नाम भर की सस्ती कीमत चुकाकर बनते हों उस जगह कोई खुदा कोई भगवान कोई देवी देवता चढ़ावे को काले सफ़ेद धन का होने की चिंता करता होगा। भूल गये नानक को खाने को रोटी किसी भी अमीर के घर से नहीं मिली थी और उन सभी को निचोड़ा तो खून निकला था दूध निकला था इक गरीब मज़दूर की घर की रोटी से ही। अब कोई नानक कोई कबीर जैसा संत है जो सब को खरी खरी सुनाता है। लिखने वाले तक भी आधा अधूरा सच लिखते हैं और इस तरह कि जब मर्ज़ी उसका अर्थ बदल कर समझा सकें। काला धन मिल भी गया है और अब उसका हौसला भी पहले से कई गुणा अधिक बढ़ा हुआ है। देखना आपके आस पास भी होगा खड़ा हुआ मस्ती में झूमता गाता शान से कदम रखता हुआ।

      काला धन वास्तव में काला कलूटा नहीं दिखाई देता है बस उसको किसी की नज़र नहीं लगे तभी नाम रख दिया है काला लगता बहुत प्यारा है श्याम सलोना है। काला धन पाकर कुछ नहीं खोना है गोरेपन का बेकार का रोना धोना है काला धन कोई जादू है कोई टोना है आपके पास सुरक्षित खरा सोना है। सच है काला धन बड़े काम आता है इंसान का घर नहीं बनता भगवान का मंदिर बन जाता है। सत्ता वालों का जितना फैला आसमान है किस्मत बलवान है गधा पहलवान है हुआ पूरा उनका हर इक अरमान है नहीं समझ सका इक वही नादान है काले धन से सारी शान है आखिर पैसा ही उनका भगवान है। सुनो साधो काले धन की कहानी है दूध कितना मिला कितना पानी लगे देखने याद आएगी नानी। सुनाई उसी ने अपनी कहानी कदर उसकी जिस किसी ने है जानी शराबी बोतल नशा झूमते लोग बहता हुआ खून बदलते रंग कितने लब्ज़ों के बदले हैं मानी। सिंहासन बनाया है सोने चांदी से है काले धन की सब मेहरबानी हर मुश्किल की है बड़ी आसानी। बरसात आ गई तो दरकने लगी ज़मीन , सूखा मचा रही है ये बारिश तो देखिए। दुष्यंत कुमार कहते हैं मगर कमर जलालवी फ़रमाते हैं , रहा बरसात में ऐ शैख़ मैं सूखा न तू सूखा , यहां तो जिस कदर बारिश
हुई उतना लहू सूखा। ये काले धन की झमझम बारिश उन पर हुई जिनके आलीशान दफ़्तर और महल जैसे घर बन गए गरीबों का लहू बहता रहा सूखता रहा है सत्ता के गलियारों में। खबर नहीं छपती है सच की झूठे सब अखबारों में आंसू आहें खो जाती हैं महफ़िल की झंकारों में।

नवंबर 18, 2018

POST : 961 क़यामत आ रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         क़यामत आ रही है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आखिर उसको आना ही पड़ा , साल पहले देश में चुनाव से पहले दहशत का माहौल बना हुआ था टीवी मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प सभी पर लगता था 2019 चुनाव नहीं कोई क़यामत आने वाली है। और उस क़यामत से बचने का उपाय बस वही केवल एक वही है जिसके लिए सब मुमकिन है। मगर अब साल बाद वास्तव में क़यामत सामने है तो जो कुछ भी कर सकता है समझते थे वो कुछ भी करना क्या समझ भी नहीं पा रहा है। कयामत आने वाली है जैसे ऐसा शोर है जैसे देश में पहले कभी चुनाव ही नहीं हुए हों। मगर ये शोर मचा वो रहे हैं जिनके लब सिले हुए हैं आंखों पर स्वार्थ की काली पट्टी बंधी हुई है। कहते हैं उनके पास कभी सच बोलने वाली ज़ुबान भी हुआ करती थी और समाज की बात समझने समझाने को ज़मीर नाम का भी कुछ हुआ करता था। विज्ञापन और कारोबार व ताकत हासिल करने को ये दोनों चीज़ें गिरवी रख दी सरकार नेताओं उद्योगपतियों धर्म का धंधा करने वालों और मनोरंजन के नाम पर देश की जनता और दर्शकों को गुमराह करने वालों की टकसालों पर। अब उन सभी का झूठ ऊंचे दाम पर बेचते हैं और मालामाल हो रहे हैं चोर भी और रखवाले भी। चौकीदार शब्द का उपयोग नहीं किया क्योंकि इधर उसका पेटेंट किसी के नाम किया जा चुका है जो वास्तव में चौकीदार है नहीं बनना चाहता भी नहीं था मगर कहलाना चाहता था। अख़बार कभी जागरूकता लाने और देश समाज को आईना दिखाने को निकाला करते थे और पत्रकार खुद को चौकीदार ही मानते थे और जो चोरी घोटाला करता उसका पता लगाना और देश की जनता को सूचना देना अपना फ़र्ज़ समझते थे। आजकल ये खुद को सबसे ऊपर समझते हैं और अपने लिए कोई बंधन कोई नियम नहीं मानते है। इनको भरोसा है या वहम है कि यही सब जानते हैं और कुछ भी कर सकते हैं। रात को दिन दिन को रात बना सकते हैं इनका दावा है। कभी नियम था कि किसी मकसद या स्वार्थ के लिए खबर छापना या छुपाना पीत पत्रकारिता होता है और इक गुनाह है। मगर आज फेक न्यूज़ या इस तरह से तमाम बहस कहानियां बनाकर झूठ को सच बताना इन्हें अनुचित नहीं लगता है। पीलिया रोगी बन चुके हैं और सही गलत की बात छोड़ इक अंधी दौड़ में भाग रहे हैं। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास।

           लोग हर किसी को जो कोई कहता है नाम दे देते हैं मैं शरीफ आदमी हूं जो कहता है उसको शराफत का तमगा दे देते हैं जबकि शरीफ समझा जाना अर्थात बिना अपराध गुनाह मानने वाला और सज़ा कबूल करने वाला आदमी। ठीक जैसे घर में अधिकतर पति शरीफ होते हैं मगर बाहर निकलते ही शराफत छोड़ बदमाशी करना चाहते हैं। मगर बदमाशी करना सब के बस की बात नहीं होती है इसलिए ज़्यादातर शरीफ चाहकर भी शराफत का लबादा उतार नहीं पाते हैं। अब बात चुनाव की कयामत की। ये अफवाह जाने कब से उड़ चुकी है कि अख़बार टीवी चैनल और सोशल मीडिया पर ज्ञान बघारने वाले बेकार लोग और कुछ राजनीतिक दलों के भाड़े पर लगाए लोग जिसे चाहे चुनाव जितवा सकते हैं। हर दल की नज़र इसी पर है इनको खुश करने से जीत हासिल हो जाएगी मानते हैं। कहने को सभी कहते हैं देश की जनता समझदार है मगर समझते हैं जनता नासमझ बच्चा है जो उनकी समझाई किताब पढ़कर उस पर अमल करेगा। वास्तविकता सब जानते हैं कि हमेशा देश की जनता ने समझदारी का परिचय दिया है। इनको लगता है जो हम लिखेंगे जो भी हम दिखाएंगे लोग उसी को सच मानेंगे। लोग यही मानेंगे कि देश की वास्तविक समस्याएं वो हैं जो मीडिया बताता है और जो खुद जनता की समस्याएं हैं वो कोई समस्या हैं ही नहीं। और लोग अन्याय अत्याचार भेदभाव  शिक्षा रोज़गार स्वास्थ्य की चिंता छोड़ धर्म और मूर्तियों तथा राजनीतिक दलों की सत्ता की चाहत को साम दाम दंड भेद भाव की अनीति को उचित समझ अपना मत देंगे। सभी दल सब नेता टीवी चैनल अख़बार चुनाव को ऐसे देख रहे हैं जैसे कोई कयामत आने वाली है। इन को और कोई चिंता ही नहीं है , कुवें के मेंढक को लगता है उसका समंदर विशाल है। जो लोग आज़ादी चाहिए रौशनी चाहिए का शोर मचाते हैं कैफ़ी आज़मी की कविता की तरह उनको केवल सत्ता की चाहत है और चुनाव संपन्न होते ही वापस अंधे कुंवे में कूद जाते हैं फिर से नारे लगाने को।
 
                  इस देश की जनता की आदत आज भी सदियों पुरानी हैं चुप रहती है सब समझती है मगर बोलती नहीं है मगर सही समय पर अच्छे अच्छों को असली औकात दिखला देती है। किताबी ज्ञान वालों को ये समझना आसान नहीं है कि बड़े बूढ़े और तजुर्बे से बहुत सबक लोग सीखते हैं और जीवन के अनुभव से बढ़कर कोई स्कूल कोई कॉलेज कोई विश्वविद्यालय ज्ञान नहीं दे सकता है। बंद कमरों में बैठ कर देश को समझना संभव नहीं है। शायद कोई ये विचार नहीं करता है कि ये कितनी बड़ी मूर्खता है कि पहले इसकी चर्चा करना कि कौन किसे वोट देगा कौन जीतेगा कौन हारेगा और उसके बाद क्यों कोई जीता कोई हारा की बात की चर्चा करना। कभी पढ़ना यही काम सब से अधिक मूर्खता वाला बताया गया है तमाम महान ऐसे लोगों द्वारा जिन्होंने इसकी चिंता नहीं की और वास्तविक कार्य किया। गांधी भगत सिंह सुभाष जैसे लोग अगर इन बातों की चर्चा में उलझे रहते या नानक बुद्ध केवल यही करते अथवा अब्दुल कलाम ऐसी बहस में लगे रहते तो कुछ भी हुआ नहीं होता। विडंबना की बात है गीता की बात करने वाले कभी समझ नहीं पाए कि जंग लड़ क्यों रहे हैं और जीत हार से अधिक महत्व किस बात का है। समझदार लोग खामोश रहते हैं और दो कौड़ी के लोग शोर मचाकर अपनी बोली लगवा रहे होते हैं। देश की अधिकांश जनता खामोश रहती है और आज भी चुप है समय पर निर्णय देने को मगर ये राजनेता और मीडिया वाले कुछ तथाकथित जानकर विशेषज्ञ कहलाने वाले लोगों के साथ शोर मचाए हुए हैं कि कयामत आने वाली है। हम शरीफ लोगों की शराफत को कमज़ोरी या नासमझी नहीं समझो जिस दिन ये दबे कुचले लोग बोलने लगे आप सभी खुद को सब जानने वाले समझने वाले दंग रह जाओगे मगर घबराना नहीं कोई आफत कोई कयामत नहीं आएगी।

               शायद आज भी बहुत लोगों को याद होगा कि देश में चुनाव कभी नफरत और बदले की भावना से नहीं विचारों की विभिन्नता को लेकर लड़े जाते थे और जनता को इक पर्व की तरह उत्साह होता था। राजनीतिक दलों की सत्ता की भूख के कारण अपराधी और धनवान और सरकार का दुरूपयोग करने वाले लोग देश को बर्बाद करने में सफल होते होते सरकार पर वर्चस्व स्थपित कर सके हैं। आज कोई भी दल देश और समाज की भलाई नहीं चाहता ये सब उस गंदे पानी के तालाब की तरह हैं जिस में जितना साफ पानी बाहर से मिलाओ उस को भी गंदा कर देते हैं। सवाल इस गंदी राजनीति के पूरे पानी को बदलने का है। शायद कुछ कमी है जो हम किसी न किसी को मसीहा समझ उसकी बंदगी करने लगते हैं जो वास्तव में गुलामी की निशानी है। भारत हो या कोई भी देश कोई भी राजनेता देवता नहीं होता है और जनता जो उनको चुनती है उसे सर झुकाने की आदत छोड़ अपने अधिकार मांगने  और उनको कर्तव्य निभाने की बात करनी होगी। जो भी नेता कहता हो उसने आपको कुछ भी दिया है उसको कहना होगा कि आपने दिया नहीं है हमारा है हमें मिलना चाहिए था। किसी भी अधिकारी से बात करते हुए सर जी कहना इस देश के पत्रकार और बुद्धीजीवी ही किया करते है अन्य किसी देश में नहीं होता है ऐसा। वास्तविक मालिक देश की जनता है और शासन करने वालों की अकर्मण्यता का सबूत है कि खुद सुख सुविधा से रहते हैं मगर जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करवा सके आज तक। दो शेर आखिर में अपनी ग़ज़ल के अलग अलग। 

बोलने जब लगे पामाल लोग , 

कुछ नहीं कर सके वाचाल लोग। 

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,

देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।


नवंबर 08, 2018

POST : 953 खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        खज़ाना मिल गया ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     आज ही का दिन था जब खुदाई शुरू की थी कुबेर का खज़ाना दबा हुआ है काले बक्से में इसका शोर बहुत था। सबको कहा था उसने पचास दिन लगेंगे खुदाई में बस उसके बाद इतना बड़ा खज़ाना हाथ आएगा कि सब को सभी कुछ मिल जाएगा और बुरे दिन इक सपना बनकर रह जाएंगे , अच्छे दिन जब आएंगे। मौज उड़ाएंगे झूमेंगे गाएंगे जाम से जाम टकराएंगे। खाज़ना किस जगह है कोई नहीं जनता था शक था विदेश में अधिकांश धन गढ़ा हुआ है पर खुदाई देश से करनी थी और घर घर से करनी थी। किसी न किसी घर से कोई न कोई सुरंग जाती होगी स्विस बैंक तक और वापस उधर से देश के किस बैंक तक आती है पता लगाना ज़रूरी था। खुदाई हुई खज़ाना कितना मिला अभी तक हिसाब ही नहीं लगाया जा सका है मगर है ज़रूर खज़ाना। खुदाई करने वालों को पता है मगर खज़ाना मिलते ही खुदाई करने वालों की नीयत खराब हो जाती है। सब आपस में हिस्सा बांट लेते हैं और खज़ाना मिलने की बात खुदाई की जगह ही दफ़्न कर दी जाती है। लोग समझते हैं किसी की सनक थी कोई खज़ाना नहीं मिला बेकार खुदाई से बर्बादी की गई। मगर उनकी मर्ज़ी है सच्चाई बताएं या छुपाएं। खज़ाना उनका चौकीदार खुद सरकार है। आज भी रात आठ बजते सबकी धड़कन बढ़ जाएगी सोच कर। अली बाबा चालीस चोर बनानी थी मगर बना दी ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान और आज ही रिलीज़ कर दी है। सीने में ऐसी बात मैं दबा के चली आई , खुल जाए वही राज़ तो दुहाई है दुहाई। राज़ की बात पता चली है सरकार की तिजोरी खाली हो चुकी है और अब इरादा रिज़र्व बैंक में सेंध लगाने का है।
 
     कुबेर जी ऊपर बैठे भगवान से विचार विमर्श कर रहे हैं। देवी लक्ष्मी जी इस बार भारत की धरती पर दीपावली की रात गईं तो साथ धन नहीं लेकर गईं इस डर से कि कहीं चौकीदार का आयकर विभाग हिसाब पूछने लगा तो बांटने से पहले ही ज़ब्त कर अपना खज़ाना भर लेगा। ऊपर से ज़हरीली हवा और शोर के साथ नकली रौशनी की चकाचौंध में भटकने का भी खतरा था। ऐसे में अमीरों के महलों की रौशनियों में गरीबों की अंधेरी बस्तियां अपनी तरफ देखने को विवश करती हैं। भगवान हैरान है उसके नाम पर इतनी बर्बादी धन की कैसे की जा रही है जब देश की आधी आबादी बदहाली में रहती है। अधर्म है आडंबरों पर देश का धन लुटाना या भगवान के नाम की आड़ में राजनीति की रोटियां सेंकना। देखो ऐ दीवानों तुम ये काम न करो , राम का नाम बदनाम न करो। ऐसे में नारद जी भी चिंता बढ़ा गये हैं ये जानकारी देकर कि किसी ने सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प पर करोड़ों को पैसे देकर गुणगान को रख रखा है और हर महीना नकद राशि लेकर भक्ति हो रही है। भगवान का अपना एक भी अकाउंट किसी साईट पर नहीं है। नकली भगवान भरे पड़े हैं जिनकी गिनती ही नहीं।
 
              टीवी चैनल वालों के भी अपने अपने भगवान हैं जो झूठे विज्ञापन करते हैं कमाई करने को मगर अख़बार टीवी वालों की आमदनी विज्ञापनों से ही होती है इसलिए उनके भगवान वही हैं। महात्मा जूदेव की बात भूली नहीं है उन्होंने सालों पहले घोषित किया था स्टिंग ऑपरेशन में कि पैसा खुदा तो नहीं मगर खुदा की कसम खुदा से कम भी नहीं। खज़ाने की बात उनसे बेहतर भला कौन जनता होगा मगर अब सरकार उनके दल की है पर उनका कोई अता पता ही नहीं है। भगवान को अभी कोई ये नहीं बता सकता कि इधर भारत देश में लोग भगवान से कई गुणा अधिक नाम किसी नेता का लेते हैं। भगवान को भी लोग लालच की खातिर रटते हैं या डर से और उस नेता को भी इसी तरह लालच या डर से लोग नाम लेते हैं। खुश है वो भी दहशत ही सही डंका बजना चाहिए। खज़ाने का क्या हुआ इस पर सभी चुप हैं सरकार खुदाई को बेकार नहीं मानती और लोगों को अभी भी बुरे दिनों से कोई राहत मिली नहीं है। घोटालों की पुरानी बात है हुए मगर साबित नहीं हुए और चोर चोर का शोर आज भी जारी है मगर पकड़ा नहीं जाता कोई भी चोर। चोर दिन दहाड़े लूट लेते हैं साधु बनकर। राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट , ये लो फिर नारद जी चले आये हैं गाते हुए। नारद जी को कौन समझाए सभी अपनी खैर मनाते हैं।

        खुदाई में खज़ाना मिला या नहीं मगर कोई नक़्शा हाथ लगा है जिस पर शोध किया जाना है। ऐसे ज़मीन में दबे गढ़े नक़्शे मिलने पर पाने वाले नाचने झूमने लगते हैं उनको जैसे स्वर्ग जाने का ही नहीं स्वर्ग का शासन हासिल करने का तरीका नक़्शे पर खुदा हो। खुदाई वाले नक़्शे को समझते रह गए और कोई ठग उनके चले जाने की राह देखता रहा ताकि उनके जाने के बाद छुपे खज़ाने को बाहर निकाल उस पर अपना क़ब्ज़ा जमा ले। खज़ाना हाथ नहीं आया खज़ाने का राज़ समझ आ गया है।

अगस्त 13, 2018

POST : 871 चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 चौकीदारों का एक समान वेतन और रैंक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

         आपको फिर से याद दिलवाता हूं देश में गधों के भी अधिकार हैं। कवि लोग तो कहते हैं गधों के ही अधिकार हैं , घोड़ों को मिलती नहीं है घास , गधे खा रहे हैं चववनप्राश। मगर नहीं गधों के लिए नियम हैं , गधों को रात अंधेरे में बरसात और उमस के मौसम में काम पर लगाना अपराध है। उनको दिन में भोजन अवकाश और आराम करने देने का भी हक है। जॉनी वॉकर जी तो दिल्ली जाने की भी बात करते थे अपने गधे की जो सब गधों का लीडर था। उस पर दो रचनाएं लिखी जा चुकी हैं मुझे खेद है अभी तक मुझे चौकीदारों की बात पर लिखने की बात कैसे ध्यान में नहीं आई जबकि चार साल से चौकीदार का युग ही जारी है। इस देश में सब से अच्छा काम केवल और केवल चौकीदारी है। अबकी बारी उनकी बारी है।

      देश के चौकीदारों का भी एक संगठन है मुझे पता नहीं था जब तक टीवी चैनल पर हाथ में लाठी और टोर्च लिये चौकीदार की फोटो वाले बैनर उठाये लोगों को अपनी उचित मांगे मनवाने दिल्ली जाने की खबर सुनी और देखी नहीं थी। आप क्या चाहते हैं पूछने पर जवाब देते हैं बराबरी का वेतन और अधिकार। हर चौकीदार को संविधान समानता का हक देता है। अब चौकीदार कोई भी कहीं का भी हो , गांव का हो चाहे शहर का या बेशक आधुनिक आवासीय सोसाइटी का हो , किसी दुकान का हो या कंपनी की मिल का। कुछ भी और नहीं चाहते केवल बराबरी की बात कहते हैं। एंकर नहीं समझा माजरा क्या है। कहने लगा आपको अपने अपने मालिक से बात करनी चाहिए। चौकीदार बोले बड़े नासमझ हो मालिक कौन होते हैं हमारा वेतन सुविधा और क्या करना क्या नहीं करना तय करने वाले। देश का चौकीदार जो है उसने कब जनता से इजाज़त ली किसी बात की। क्या शान से रहता है कितने देशों में घूमता फिरता है संसद या पीएमओ दफ्तर कितनी बार गया कोई पूछता है। क्या वादा किया था जब बना था देश का चौकीदार निभाया कब है। वही चौकिदार बताएगा उसका वेतन क्या हो हमारा भी उतना ही होना चाहिए। हम धन्यवाद करना चाहते हैं कि किसी ने तो हमारे काम को महान कार्य समझा , मगर इक ज़रा सी शिकायत भी है कि हमारे नाम को बदनाम भी किया और सागर की गहराई में डुबोया भी है जो हमें कदापि मंज़ूर नहीं। चौकीदार को झूठ नहीं बताना चाहिए और ये कैसा चौकीदार है जिसका संसद में दिया भाषण भी संसदीय करवाई से निकालने की नौबत आ गई।

         जैसे संगीत कला कारोबार वकील डॉक्टर अध्यापक अभिनेता तक खानदानी लोग होने का दम भरते हैं , उसी तरह से हमारा चौकीदारी का खानदान भी ऊंचा समझा जाता है। चुपके-चुपके फिल्म का नायक खुद शिक्षित है घास फूस का डॉक्टर भी है मगर नायिका को भाता है चौकीदार भेस का धर्मेंदर ही। नकली ही सही उसने चौकीदार बनकर चोरी करने वालों को भगाया तो नहीं। चौकीदार बनना है तो ईमानदारी पहली शर्त है , सच बोलना पड़ता है भले चोर कोई भी हो। अपने ही घर में चोरी करने वाले लोग बदनाम चौकीदार को किया करते हैं। कोई चौकीदार ही चौकीदार की कठिनाई समझ सकता है। ये कैसा चौकीदार है जो रात भर गहरी नींद में सोया रहता है और चार साल बाद जगता है तो घर का सभी सामान चोरी हो चुका है। ऐसे चौकीदार को कौन सज़ा दे जिसका थानेदार अपना हो वकील अपना हो अदालत खुद की और न्यायधीश भी वही हो।

        इस 15 अगस्त पर चौकीदार को युवा वर्ग को रोज़गार हासिल करने को अपना आज़माया नुस्खा बताना चाहिए। सब को पकोड़े बनाने नहीं आते चाय भी सब उन जैसी नहीं बनाते मगर उनकी डिगरियों से बेहतर शिक्षा बहुत युवकों ने पाई है उन्हें चौकीदार बनने से कोई परहेज़ नहीं है। दुनिया देख कर स्तब्ध है जिस देश में चौकीदार की ऐसी निराली शान है उसके मालिक कितने दौलमंद हैं। कोई नहीं यकीन करेगा भारत में गरीबी है भूख है या लोग बेइलाज मरते हैं और शिक्षा भी इतनी महंगी है कि पढ़ने जाना मुमकिन नहीं।

            तू इधर उधर की न बात कर , ये बता कि काफिला क्यों लुटा ,

                हमें रहजनों से गर्ज़ नहीं , तेरी रहबरी का सवाल है।

       दिल का खिलौना हाय टूट गया , कोई लुटेरा आके लूट गया।  चौकीदार जागते रहो कहने की जगह सोते रहो समझाता रहा ताकि चोर चोरी कर सकें। बात मौसेरे भाइयों तक आ ही गई है। ये राफेल विमान की खरीदारी है या चौकीदार की बटमारी है। चौकीदार रखवाली करने को होते हैं इधर खरीदारी करते करते बिकवाली करने लग गए हैं। चौकीदार मालिक बन बैठे मालिक को भिखारी बना दो किलो चावल एक किलो दाल की भीख देने का ऐलान करते हैं। 

जुलाई 05, 2018

POST : 826 भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या यही धर्मराज की अदालत है , आत्मा ने निडरता से सवाल किया।  चित्रगुप्त जी भी बही खाता छोड़ उसी तरफ देखने लगे। न्यायधीश की ऊंची कुर्सी पर बैठे धर्मराज को अपना अपमान सा लगा। आप कहना क्या चाहते हैं , आत्मा से पूछा। आत्मा ने कहा जनाब आपका परिचय ही जानना चाहा क्या ये भी गुनाह है इस अदालत में। धर्मराज को कहना पड़ा नहीं ऐसा नहीं है मगर आज तक किसी ने पूछा ही नहीं सब को मालूम होता है यहीं सब कुछ चुकाना है। आत्मा ने कहा चलो मान लिया , मुझे मेरा हिसाब मत बताओ मैं जानता हूं।  अपना फैसला सुना देना मान भी लूंगा बिना कोई सफाई दिए , मगर आपकी ही तरह मैंने भी हर दिन लिखा था भगवान और भगवान की अदालत का हर हिसाब किताब। मेरे पास कोई नर्क नहीं स्वर्ग नहीं मोक्ष नहीं देने को , मगर आपको आईना तो दिखला सकता हूं। क्या देखना चाहोगे आपके खुद के कर्मों की बात। अधिक समय नहीं लूंगा संक्षेप में सीधी सीधी बात करूंगा। अदालत में मौजूद आत्माओं ने ज़ोर ज़ोर से तालियां बजाईं तो धर्मराज भी घबरा गये। कहीं ये कोई लोकतंत्र की बात तो नहीं , मामला संगीन लगता है। साक्षात भगवान को आने को बुलवाया और ऊंचे सिंहासन पर बिठाकर आत्मा की बात सुन कर समझाने की विनती की। भगवान बोले कहो क्या समस्या है। आत्मा ने कहा सुनोगे ध्यान से मेरी बात पूरी की पूरी बिना बीच में कोई बाधा उतपन्न किये। भगवान मान गये मगर समय की सीमा का ध्यान रखने की बात भी जोड़ दी टीवी वालों की तरह। ठीक है मगर कोई छोटा सा ब्रेक लेने की बात मत कहना जब जवाब देते नहीं बनता हो। ओके फाइन।
 
                      भगवान आपने सभी के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किताब करने का प्रबंध किया मगर खुद आपका हिसाब किताब किसी को देने की व्यवस्था नहीं की। अन्यथा हमारी सरकारों की तरह सी ए जी जैसे संस्थाएं सरकारी योजनाओं की पोल खोल देती हैं। पिछली सरकार इतनी बदनाम हुई कि पूछो मत। पांच साल बाद बदल देते हैं सभी को जब वास्तव में वादे निभाते नहीं हैं। आप पर कोई सवाल ही नहीं करता कि जिस दुनिया को बनाया उसकी हालत को कभी देखा भी है। अपने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाने क्या क्या बनवा कर पत्थर की मूरत बनकर या किसी और तरह अपना गुणगान सुनते रहते हो और समझते हो सब ठीक ठाक है। कहीं कुछ भी ठीक नहीं है मगर आपको चिंता ही नहीं। बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई देती ही नहीं कहीं , बुराई है जो सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। सच को सूली चढ़ाया जाता है और झूठ की जय जयकार होती है। आपकी कोई अदालत ऐसी है जो आपको भी कटघरे में खड़ा करे और आपको भी दोषी ठहरा सज़ा का एलान करे। हमारे देश की व्यवस्था में लाख खामियां हैं फिर भी हमारे देश की अदालतों के न्यायधीश इतिहास रचते रहे हैं देश की प्रधानमंत्री को अदालत में बुलाकर दोषी ठहराने का फैसला देकर। ये आपके नियुक्त किये धर्मराज आपसे आपका हिसाब मांग सकते हैं। आपने इस बात पर कभी विचार ही नहीं किया आपके नाम पर क्या नहीं हो रहा , आप उसके लिए उत्तरदाई कैसे नहीं हैं। क्या आपका नाम जपना और आपकी अर्चना करना ही धर्म है या वास्तविक धर्म मानवता की रक्षा करना है। आप सब से बड़े जमाखोर हो कितनी ज़मीन कितने आलिशान महलनुमा घर अकेले आपकी खातिर जब करोड़ों लोग भूखे हैं बेघर हैं। लिखवा दिया पापियों का अंत करने आओगे मगर कब आओगे। सरकारी अच्छे दिनों के झूठे वादे में और आपके किये वायदे में अंतर क्या है। सोचोगे तो समझोगे कितनी बड़ी भूल की है अपनी दुनिया की व्यवस्था करना नहीं आता तो नहीं बनाई होती। हम सभी को खिलौना समझ खेलते रहे मगर कभी नहीं सोचा इंसानों पर क्या बीती है।
 
          आदमी को कहा जाता सब से अच्छा है सब से उत्तम योनि है। सब से खराब आदमी ही है। छल कपट झूठ धोखा अन्याय अत्याचार हर बुराई में सब से आगे है। खुश कभी नहीं होता बेशक भगवान ही समझने लगें लोग , तब भी इंसानियत नहीं याद रखता। मुझे तो लगता है भगवान तुम अच्छे लोगों और सच्चे लोगों का कभी साथ नहीं देते , तभी अधर्मी पापी फलते फूलते हैं और ईमानदारी का जीना दूभर है। मुझे बेशक जो चाहो सज़ा दे दो , आपके बारे भी साफ साफ सच्ची बात मन की लिखता रहा हूं। चाहो तो धरती से मंगवा कर पढ़ लेना कुछ भी कल्पना से नहीं लिखा है। आपकी दुनिया की असलियत ही लिखी है। नर्क तो देखा है कोई चिंता नहीं नर्क भेज दो भले , स्वर्ग की चाह कभी की नहीं , मिलेगा भी नहीं और मिल भी जाये तो नहीं रहना मुझे। नेता लोग होते हैं जो खुद स्वर्ग की सुविधाएं पाना चाहते हैं और जनता को नर्क के सिवा कुछ नहीं देते। फिर से जन्म देना तो इंसान नहीं बनाना , इंसानों में इंसानियत बची ही नहीं। पंछी बना देना चाहे मगर पिंजरे में कैद नहीं होना , पेड़ पौधे में भी जीवन होता है कोई सुंगध बांटने वाला साफ हवा छायादार और फलदार पेड़ भी बना सकते हो। कोई रास्ता जिसे लोग कुचलकर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ते जाएं उसकी धूल बनकर भी रहना मंज़ूर है मगर पत्थर नहीं बन सकता तुम्हारी तरह संवेदनहीन नहीं बनना चाहता। अभी फैसला अटक गया है भगवान को मेरा लिखा पढ़ने में जाने कितना वक़्त लगेगा , मैं अभी भी कटघरे में खड़ा हूं और आरोप उस पर लगा है जो कहते है उस से बड़ी अदालत कोई नहीं है। इंसाफ तो करना ही होगा चाहे फैसला खुद भगवान के खिलाफ हो या फिर मेरे। बहुत गहरी ख़ामोशी छाई हुई है। 
 

 

जून 06, 2017

POST : 658 आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           आपके बिना साजन ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       मैं ऐसा सोचती थी या समझती थी कह नहीं सकती , मगर मानती ज़रूर थी साजन तुम बिन नहीं जी सकूंगी। जब भी कोई बात होती और मुझे या साजन को अलग होना होता तब यही कहते दोनों क्या करें मज़बूरी है दूर जाना है। दिल नहीं चाहता तब भी जाना ही होगा। अपने अपने मतलब की खातिर समझते थे यही प्यार है इक दूजे का साथ होना। उम्र बिता दी और सच कहूं इक बेगुनाह मुजरिम की तरह रही किसी ज़ालिम की कैद में। हर दिन एहसास करवाया जाता मुझ पर रोज़ उपकार किया जाता है , जबकि वास्तव में किसी की गुलामी खुद कबूल की थी जाने किस डर से। चार दिन पहले इक महिला ने लिखा अपनी फेसबुक पर कि महिला और परिंदे पिंजरे में रहते खुद को सुरक्षित समझते। मुझे हैरानी हुई पढ़कर भला कोई पंछी पिंजरे में खुश रह सकता है। कोई महिला दिल से किसी की गुलाम बन खुश हो जी सकती है। शायद उस को अपने पति के नहीं रहने का दुःख होगा , मगर मैंने कई महिलाओं को देखा उनको जीना आया ही तब जब किसी कारण उनके जीवन साथी नहीं रहे या अलग हो गए। घुट घुट कर जीने से अच्छा है आज़ाद हो खुद ज़िंदगी से लड़ना। अभी तक आप इसे किसी दुखियारी की व्यथा समझे तो आप नहीं समझे , ये किसी अबला नारी की बात नहीं है। आज देश भर में डॉक्टर्स हड़ताल पर हैं , आज मुझे समझना मैं रोगी होती तो मुझे इस से क्या होता , क्या मैं इलाज नहीं मिलने से मरती या इलाज ही से मौत आती। क्योंकि मौत आनी है आएगी इक दिन जान जानी है जाएगी इक दिन , ऐसी बातों से क्या घबराना।
 
         टीवी पर देखना आपको हाहाकार होने की खबरें देखने को मिलेंगी दिन भर। शाम तक अख़बार वाले बता देंगे कितने लोग मर गए आज बिना इलाज मिले। क्या इलाज होता तो नहीं मरते किसे खबर , अभी तक तो कोई ज़िंदा बचा नहीं दुनिया भर में। धनवान लोग कभी नहीं मरते अगर पैसे और इलाज की सुविधा से मौत से बचा जा सकता। आपको बता देना ज़रूरी है ये बात मैंने गांव के इक बनिये से सुनी थी जो किसी क़र्ज़ मांगने वाले को समझा रहा था अगर तुम सोचते हो पैसे मिल गए तो किसी अपने को बचा लोगे तो बताओ ये जो चौधरी हैं गांव के अपने दादा जी को मरने देते। लाख टके की बात थी मैंने गांठ बांध ली , जीना मरना किसी के बस में नहीं है। अब अगर किस्मत में लिखा है डॉक्टर के हाथ से मरना तो इलाज को पैसे भी मिल ही जायेंगे अन्यथा मौत तो कीमत मांगती नहीं। लेकिन आज इक बात का अध्यन किया जा सकता है , वो इसका कि आंकड़े देख तय किया जाये आज कितने लोग मौत की गोद में समाए और कितने पिछले दिन जब डॉक्टर्स काम पर थे। सोचो कहीं ये सच सामने आया कि आज पहले से कम की मौत हुई तब क्या होगा , डॉक्टर तक हैरान हो सकते हैं। जिनको बचना है ऊपर वाला बचा ही लेता है और जिनकी मौत का इल्ज़ाम  किसी रोग को देना उनको भेज देता हॉस्पिटल।

       साजन आपने बिना किसी का कुछ नहीं होगा मगर अगर आपके पास रोगी नहीं आएं उनकी भी हड़ताल हो जाये तब आपका जीना कठिन नहीं असंभव हो जायेगा। ये भला क्या बात हुई , इक कहावत है गिरी थी गधे के ऊपर से और लड़ पड़ी थी कुम्हार के साथ। आपको शिकायत सरकार से कि आपको किसी नियम कानून में अपना कारोबार करने को कानून बनाना चाहती है और आप सरकार का कुछ नहीं कर सकते तो रोगियों की जान आफत को लाना चाहते। आगे कुछ कहना  नहीं उचित आप खुद समझ लो , अपने पांव को काहे कुल्हाड़ी पे मारते हैं। रोगी नहीं अपने जीने की सोचो ज़रा। अंत में सभी को इक काम की बात कहनी है। मौत से डरने की ज़रूरत नहीं है , मौत बड़ी खूबसूरत होती है , ज़िंदगी कभी खूबसूरत नहीं होती। जीना है तो मौत का डर दिल से निकाल फिर देखो क्या है जीना।
 

                            मौत तो दरअसल एक सौगात है

                          हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया।


दिसंबर 23, 2016

POST : 580 विष्णुलोक का टीवी चैनेल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          विष्णुलोक का टीवी चैनेल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     अगर आपने अभी तक नहीं लगवाया तो जल्द लगवा लें । जी नहीं ये आपके डी टी एच के सेटटॉप बॉक्स की बात नहीं है । ये विष्णुलोक का टीवी चैनल है जो अभी अभी शुरू किया गया है , बल्कि ये कहना चाहिये कि भगवान को करना पड़ा है । भगवान हाइटेक तो पहले ही हो चुके हैं , हर मंदिर हर पूजा स्थल पर सीसीटीवी कैमरे पहले ही लगवा चुके हैं , मगर नये हालात को देखते हुए इक कदम और आगे बढ़ाया है ।

         नारद जी को आप पहचानते ही हैं , भगवान के विश्वस्त खबरी हैं और लोग चाहे उनको बदनाम करते हों इधर की उधर , उधर की इधर बात पहुंचाने का आरोप लगाकर , उनका काम ही मीडिया की तरह है । नारद जी आये हुए हैं भारतभूमि से विष्णुलोक टीवी का सीधा प्रसारण पहुंचाने को पूर्ण तथ्य सहित । इसको आप कोई धार्मिक चैनेल समझने की भूल नहीं करें । इस पर कोई धनलक्ष्मी यंत्र नहीं बेचा जायेगा न ही कोई भविष्यफल रोज़ का सप्ताह का वर्ष का राशियों के अनुसार बताया ही जायेगा । आपको कोई प्रवचन भी नहीं सुनाया जायेगा न ही किसी गुरु की दुकानदारी का हिस्सा विष्णुलोक का चैनेल बनेगा । फिर क्या करेगा ये नया चैनेल , आपने ठीक सवाल किया है । अभी तक बहुत चैनेल आपको बहुत कुछ दिखाने का काम करते आये हैं , ये चैनल भगवान बारे आपको नहीं आपके बारे भगवान को सही और सटीक जानकारी भेजने का काम करेगा । बिना कोई शुभ महूर्त निकले इसको शुरू किया गया है तो शुभः लाभ लिखने का प्रश्न ही नहीं उठता । कोई हवन नहीं कोई यज्ञ नहीं कोई लाल फीता नहीं काटा गया , सीधे काम शुरू । शास्त्रों में साफ़ लिखा है शुभ कार्य में विलंब नहीं करना चाहिए , पापकर्म करने से पहले विचार करना चाहिए , करें या नहीं करें ।

                टीवी कैमरा नज़र नहीं आता , नारद जी टीवी स्क्रीन पर दिखाई देते हैं । अभिवादन नमस्कार सभी एक सौ पचीस करोड़ भारतवासियों का भी और छतीस करोड़ देवी देवताओं का भी , नारद जी बोलते हैं अपनी जानी पहचानी मुस्कुराहट के साथ । आज विष्णु जी टीवी चैनल से बेतार द्वारा , इंटरनेट कहते जिसको , जुड़ चुके हैं और मैं नारदमुनि उनको यहां का हाल चाल बताता हूं , दिखलाता हूं । कैमरा भीड़ ही भीड़ दिखाता है तो भगवन पूछते हैं ये कैसी भीड़ है , क्या यहां कोई मंदिर है जहां प्रसाद बंट रहा है । जी नहीं प्रभु ये देश की जनता है जो बैंकों के सामने खड़ी है कतार में अपने खुद के जमा किये पैसे निकलवाने की जद्दोजहद में अपनी जान जोखिम में डालती । प्रभु हैरान होकर पूछते भला ऐसा क्यों । नारद जी बताते हैं भगवन आपने खुद भी देखा अपने मंदिरों का हाल , लोग जाकर माथा टेकते और दानपेटी में पैसे डालते हैं । कोई नहीं पूछता ये कैसा धन है मेहनत से कमाया हुआ अथवा चोरी लूट से जमा किया हुआ । गंगा नदी में गंदा नाला भी मिलता है तब भी गंगा पवित्र ही रहती है , उसी तरह राजनीतिक दलों को मिला चंदा और आपके नाम से चढ़ाया सारा धन भी पावन ही नहीं बताया जाता , ऐसा भी घोषित किया जाता है कि जितना दो और अधिक बढ़कर मिलना है । लोग दल को चंदा और भगवान के दर पे चढ़ावा इसी उद्देश्य से देते हैं । इन दोनों को दिया धन वापस कोई नहीं मांग सकता , कोई भूखा कभी मज़बूर होकर दानपेटी से पैसे निकाल ले तो पापी अधर्मी कहलाता है । अब उस धन दौलत पर संचालकों का अधिकार है वो जैसे भी चाहते उपयोग करते हैं ।

               नारद जी बोले प्रभु अभी समाचार देख लो चुप चाप  , उसके बाद चर्चा को बहुत समय होगा । हमने कोई विज्ञापन तो दिखाने नहीं हैं । असली काम की बात करनी है और आपको असलियत दिखानी है । प्रभु हुआ ये कि इक दल को पूर्ण बहुमत से जनता ने जिताया ताकि देश की जनता को उस द्वारा दिखाये अच्छे दिन हासिल हो सकें । मगर क्या यही वो अच्छे दिन हैं कोई नहीं जानता , लोग तो बदहाल हैं । आप ही बताओ आम आदमी क्या करे , आपके पंडित जी के बताये उपाय करता रहे आपका नाम जपता रहे या कोई नौकरी काम धंधा करे अपना पेट पालने को । भूखे भजन न होय गोपाला । अब सरकार कहती है सहयोग करो मगर कब तक , तब तक क्या भूखे मरें , सरकार तब तक देती जनता को सभी खुद तो बात थी  । देना नहीं जानती देश की सरकार भी आपकी ही तरह , माफ़ करना प्रभु यहां जितना बेईमानी का काला धन है सब से अधिक आप ही के नाम जमा है तमाम धर्मों के नाम पर या इन्हीं दलों के पास । खुद को छोड़ सभी की तलाशी ली जबकि चोरी की माला पहनी अपनी गले में हुई है । प्रभु जो आपने अभी सोचा , मुझे पता चला , धर्म की बात पूछते हो आप । 
 
  देखो प्रधानमंत्री जी कैसे उपहास करते हैं विपक्ष का मज़ाक नहीं है ये जीत का अहंकार है जिस ने उनको मर्यादा तक को भुलवा दिया है । हार जीत होती रही है , जीत कर  विनम्र होना साहस का कार्य और अहंकारी होना कमज़ोरी होती है । मगर इस नेता को लगा कि किसी मंदिर में करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी दान में देकर उसने भगवान को खुश कर लिया है , जबकि वो लकड़ी भी जनता के धन की थी उसकी अपनी कमाई की नहीं ।  आप जानते हैं जो नेता मेरे गरीब भाईयो की रट लगाता है उसको देश की आधी आबादी जो गरीब ही नहीं दलित और शोषित भी है से कोई सरोकार नहीं है । प्रभु को समझ नहीं आ रहा ये कैसी सरकार है जिसको इतना भी पता नहीं है कि किसान खेत में हल चलाये बीज बोये फसल की रखवाली करे या फिर बैंक की कतार में खड़ा रहे । नारद जी बता रहे हैं सरकार का विभाग मानता है वही फसल बिजवाता है और उसी के आंकड़ों से देश की जनता का पेट भरता है । सत्ता मिलते ही सभी नेता खुद को भगवान समझने लगते हैं और जनता को सोचते हैं जुमलों से बहला सकते हैं ।

                नारद जी ने अलग अलग क्षेत्रों की तमाम तस्वीरें प्रभु को दिखाकर बताया ये असली भारत की तस्वीर है । नंगे बदन बच्चे महिलाएं , भूख और बिमारी से हारे हुए निराश लोग जो जीते हैं मगर ज़िंदा लगते नहीं , उनको घर की छत तो क्या पीने को पानी भी साफ नहीं मिलता । शिक्षा की दशा इस कदर खराब है कि शिक्षा का अधिकार उपहास बनकर रह गया है । देश की आधी आबादी साठ करोड़ लोग किसी भी दल के किसी भी नेता के लिये मात्र वोट हैं जिनकी ज़रूरत पांच साल बाद पड़ती है । उन बदनसीब लोगों का दर्द उनको भला कैसे समझ आयेगा जो शहंशाहों की तरह रहते हैं । चलो आपको ये भी दिखला देते हैं । कैमरा लुटियन ज़ोन को दिखाता है जिस को देख आंखे चुंधिया जाती हैं । ये राष्ट्रपति भवन है जो शायद सौ एकड़ से अधिक जगह पर बना है गरीब देश के राष्ट्रपति का निवास । जब यहां सैंकड़ों कमरों में राजसी शानो-शौकत से रहने वाला कोई गरीबी की बात करता है तो समझ नहीं आता उस पर क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की जाये , हंसा जाये कि रोया जाये । इस इक महल की देख रेख पर हर महीने करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं , अर्थात लाखों रूपये हर दिन । इसी देश की इक तिहाई आबादी की आय प्रतिदिन पचास रूपये भी नहीं है । इसका मतलब ये है कि एक आदमी के रहन सहन पर जितना धन खर्च होता है उसी से कितने लाख भूखे अपना पेट भर सकते हैं । दूसरे शब्दों में ये कुछ लोग खुद पर जितना धन जनता के पैसे का खर्च करते हैं वही अगर गरीब लोगों को दिया जाता तो आज देश में गरीबी का नामो-निशान नहीं होता । गरीबों का हितैषी होने का दावा करने वाले दरअसल उनकी गरीबी की वजह खुद हैं । इस लुटियन ज़ोन में ढाई ढाई एकड़ में इक इक बंगला बना है , जब किसी गरीब को घर देने की बात की जाती है तो पचास गज़ ज़मीन भी ज़्यादा लगती है । संविधान में सभी को समानता का अधिकार क्या इसी को कहते हैं ।

                जो लोग अनपढ़ हैं अपने अधिकार की बात नहीं जानते उनको क्या कहें जब जो शिक्षित हैं सुविधा संपन्न हैं वो भी किसी दल किसी नेता की जय-जयकार किया करते हैं अपना स्वाभिमान भुला कर । गुलामी तमाम लोगों की मानसिकता बन गई है , हर किसी को भगवान बताने में कोई संकोच नहीं करता । कोई पूछे उनसे आप जिनको भगवान मानते हैं उन्होंने देश को दिया क्या है । हर दिन इनकी सभाओं को आयोजित करने पर ही कितना धन बर्बाद किया जाता है , कोई हिसाब नहीं बताता कैसे । सब से ज़रूरी बात , इस देश को माना जाता है धार्मिक लोग हैं , जबकि यहां अधर्म ही अधर्म दिखाई देता है । मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाकर माथा टेकने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता , धार्मिक होते जो लोग वो अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाते हैं समाज को देश को लूट नहीं सकते । इस देश में न्याय की निष्पक्षता की कर्तव्य निभाने की आशा तक करना खुद को धोखे में रखना है । झूठ यहां का भगवान है और लूट यहां की नीति , धर्म की तो परिभाषा तक कोई नहीं जनता यहां । प्रभु ठीक से देख लो और समझ लो आप अगर भगवान हैं तो किन लोगों के भगवान हैं । इधर तो भगवान भी सभी लोग बदलते रहते हैं , सभी ने अपने अपने खुदा तराश लिये हैं जो उनको पाक साफ़ हैं का प्रमाणपत्र ही नहीं देते , मरने के स्वर्ग का आरक्षण भी देने की बात करते है ।  ऊपरवाले का ये टीवी चैनल भारतवर्ष में सभी को बिना किसी शुल्क कोई रिचार्ज बगैर उपलब्ध है मगर ध्यान रहे आपको भगवान नहीं दिखाई देंगें बल्कि भगवान आपको हर घड़ी पल पल देख रहे होंगे उनसे छुपना छुपाना मुमकिन नहीं होगा । ईश्वर ऑनलाइन लाइव प्रसारण का आनंद उठाते हैं अपनी दुनिया का किसी से जानकारी लेने की आवश्यकता नहीं आजकल उनको ।  
 
 
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फ़रवरी 08, 2015

POST : 476 लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया

       लेखक से बोले भगवान ( कटाक्ष ) डा लोक सेतिया

        आज फिर वही बात , जब मैंने हाथ ऊपर उठाया मंदिर का घंटा बजाने को तो पता चला घंटा उतरा हुआ है। मन ही मन मुस्कुराते हुए भगवान से कहना चाहा " ऐसा लगता है तुम्हारे इस मंदिर के मालिक फिर आये हुए हैं "। जब भी वह महात्मा जी यहां पर आते हैं सभी घंटे उतार लिये जाते हैं , ताकि उनकी पूजा पाठ में बाधा न हो। ऐसे में उन दिनों मंदिर आने वाले भक्तों को बिना घंटा बजाये ही प्रार्थना करनी होती है। कई बार सोचा उन महात्मा जी से पूछा जाये कि क्या बिना घंटा बजाये भी प्रार्थना की जा सकती है मंदिरों में , और अगर की जा सकती है तब ये घंटे घड़ियाल क्यों लगाये जाते हैं। पूछना तो ये सवाल भी चाहता हूं कि अगर और भक्तों के घंटा बजाने से आपकी पूजा में बाधा पड़ती है तो क्या जब आप इससे भी अधिक शोर हवन आदि करते समय लाऊड स्पीकर का उपयोग कर करते हैं तब आस-पास रहने वालों को भी परेशानी होती है , ये क्यों नहीं सोचते। अगर बाकी लोग बिना शोर किये प्रार्थना कर सकते हैं तो आप भी बिना शोर किये पूजा-पाठ क्यों नहीं कर सकते। बार बार मेरे मन में ये प्रश्न आता है कि किसलिये महात्मा जी के आने पर सब उनकी मर्ज़ी से होने लगता है , क्या मंदिर का मालिक ईश्वर है अथवा वह महात्मा जी हैं। ये उन महात्मा जी से नहीं पूछ सकता वर्ना उनसे भी अधिक वो लोग बुरा मान जाएंगे जो उनको गुरु जी मानते हैं। इसलिये अक्सर भगवान से पूछता हूं और वो बेबस नज़र आता है , कुछ कह नहीं सकता। जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि भगवान ऐसे मंदिरों में कैद है , छटपटा रहा है।

               कुछ दिन पहले की बात है। मैं जब मंदिर गया तो देखा भगवान जिस शोकेस में कांच के दरवाज़े के पीछे चुपचाप बैठे रहते हैं उसका दरवाज़ा खुला हुआ था। मुझे लगा शायद आज मेरी आवाज़ भगवान सुन सके , कांच की दीवार के रहते हो सकता है मेरी आवाज़ उस तक नहीं पहुंच पाती हो। मैं अपनी आंखें बंद कर प्रार्थना कर रहा था कि अचानक आवाज़ सुनाई दी " हे लेखक तुम सब की व्यथा लिखते रहते हो , कभी तो मेरे हाल पर भी कुछ लिखो " मैंने चौंक कर आंखें खोली तो आस-पास कोई दिखाई नहीं दिया। तभी उस शोकेस से भगवान जी बोले , " लेखक कोई नहीं है और यहां पर , ये मैं बोल रहा हूं तुम सभी का भगवान"। मैंने कहा प्रभु आपको क्या परेशानी है , कितना बड़ा मंदिर है यह आपके लिये , कितने सुंदर गहने - कपड़े आपने पहने हुए हैं , रोज़ लोग आते हैं आपकी अर्चना करने , सुबह शाम पुजारी जी आपका भोग लगाते हैं घंटी बजा बजा कर। किस बात की कमी है आपको , कितने विशाल मंदिर बने हुए हैं हर शहर में आपके। जानते हो भगवान आपके इस मंदिर को भी और बड़ा बनाने का प्रयास किया जा रहा है , कुछ दिन पहले मंदिर में सड़क किनारे वाले फुटपाथ की पांच फुट जगह शामिल कर ली है इसको और सुंदर बनाया जा रहा है। क्या जानते हो भगवान आपकी इस सम्पति का मूल्य अब करोड़ों रूपये है बाज़ार भाव से , और तेरे करोड़ों भक्त बेघर हैं। साफ कहूं भगवान , जैसा कि तुम सभी एक हो ईश्वर अल्ला वाहेगुरु यीशू मसीह , तुम से बड़ा जमाखोर साहूकार दुनिया में दूसरा कौन हो सकता है। अकेले तेरे लिए इतना अधिक है जो और भी बढ़ता ही जाता है। अब तो ये बंद कर दो और कुछ गरीबों के लिये छोड़ दो। अगर हो सके तो इसमें से आधा ही बांट दो गरीबों में तो दुनिया में कोई बेघर , भूखा नहीं रहे।

       प्रभु कहने लगे " लेखक क्यों मज़ाक कर रहे हो , मेरे जले पर नमक छिड़कने जैसी बातें न करो तुम। मुझे तो इन लोगों ने तालों में बंद कर रखा है। तुमने देखा है मेरे प्रमुख मंदिर का जेल की सलाखों जैसा दरवाज़ा , जिस पर पुजारी जी ताला लगाये रखते हैं। क्या जुर्म किया है मैंने , जो मुझे कैद कर रखते हैं। इस शोकेस में मुझे कितनी घुटन होती है तुम क्या जानो , हाथ पैर फैलाने को जगह नहीं। ये कांच के दरवाज़े न मेरी आवाज़ बाहर जाने देते न मेरे भक्तों की फरियाद मुझे सुनाई पड़ती है। सच कहूं हम सभी देवी देवता पिंजरे में बंद पंछी की तरह छटपटाते रहते हैं "।

                  तभी किसी के क़दमों की आहट सुनाई दी और भगवान जी चुप हो गये अचानक। मुझे उनकी हालत सर्कस में बंद शेर जैसी लगने लगी , जो रिंगमास्टर के कोड़े से डर कर तमाशा दिखाता है , ताकि लोग तालियां बजायें , पैसे दें और सर्कस मालिकों का कारोबार चलता रहे। पुजारी जी आ गये थे , उन्होंने शोकेस का दरवाज़ा बंद कर ताला जड़ दिया था। मैंने पूछा पुजारी जी क्यों भगवान को तालों में बंद रखते हो , खुला रहने दिया करो , कहीं भाग तो नहीं जायेगा भगवान। पुजारी जी मुझे शक भरी नज़रों से देखने लगे और कहने लगे आप यहां माथा टेकने को आते हो या कोई और ईरादा है जो दरवाज़ा खुला छोड़ने की बात करते हो। आप जानते हो कितने कीमती गहने पहने हुए हैं इन मूर्तियों ने , कोई चुरा न ले तभी ये ताला लगाते हैं। जब तक मैं वहां से बाहर नहीं चला गया पुजारी जी की नज़रें मुझे देखती ही रहीं। तब से मैं जब भी कभी मंदिर जाता हूं तब भगवान को तालों में बंद देख कर सोचता हूं कि सर्वशक्तिमान ईश्वर भी अपने अनुयाईयों के आगे बेबस हैं। जब वो खुद ही अपनी कोई सहायता नहीं कर सकते तब मैं इक अदना सा लेखक उनकी क्या सहायता कर सकता हूं। इन तमाम बड़े बड़े साधु , महात्माओं की बात न मान कौन इक लेखक की बात मानेगा और यकीन करेगा कि उनका भगवान भी बेबस है , परेशान है।