सितंबर 17, 2013

POST : 363 निभा सको अगर करना मुहब्बत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 निभा सको अगर करना मुहब्बत ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

मैं नहीं जानता 
क्या तुम
कोई अप्सरा हो
स्वर्ग की
मेनका की तरह ।

मगर मुझे
मालूम है
मैं कोई विश्वामित्र
नहीं हूं
मैं कोई तपस्या
नहीं कर रहा था
किसी इंद्रलोक का
राज पाने के लिये ।

मैं तो इक इंसान हूं
धरती की दुनिया का
और तमाम उम्र
तरसता रहा मैं  
किसी के प्यार को
तुम मिल गई मुझे
यूं ही सरे राह चलते
और में आवाक
देखता रह गया तुम्हें ।

अपनी तकदीर पर
भरोसा नहीं मुझको
छलती रही है मुझे
बार बार उम्र भर
डरता रहा हूं मैं
खूबसूरत अपसराओं से ।

खुद को नहीं समझा
इस काबिल कभी मैंने
कि कोई अप्सरा
मुझसे करने लगे प्यार
टूटा हूं जाने कितनी बार
ज़माने की बेवफाई से ।

अब के टूटा तो
बिखर ही जाऊंगा
रेत के घर जैसा
इसलिये किसी भी
प्यार के बंधन में
बंधने से पहले
चाहता हूं पूछना
अपना सवाल ।

फिर तुम से इक बार
क्या वास्तव में
तुमको मुझसे
हो गया है सच्चा प्यार
मुझे नहीं रहा खुद पर
तुमको तो है न 
अपने पर ऐतबार ।

चाहो तो अभी आज 
मुझे बेशक
कर दो इनकार
निभा सको हमेशा
तभी करना
प्यार का इज़हार । 
 

 

सितंबर 11, 2013

POST : 362 धुंधली धुंधली यादें ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

        धुंधली धुंधली यादें ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

क्या क्या लिखा था
हर इक वर्क पर
कितने बरसों तक
रखी थी संभाल कर
अपनी निजि डायरी मैंने ।

कितनी कवितायें
कितनी ग़ज़ल
कितने नाम
कितनी तारीखें
कितनी प्यार की बातें ।

इक इक शब्द में
छुपी हुई थी कोई
जीवन की कहानी
जो जानता था मैं
और जानता नहीं था
कोई भी दूसरा ।

पढ़ भी लेता अगर
समझ नहीं पाता कभी
छुपे हैं उनमें मेरे
कैसे कैसे मधुर एहसास
कभी पढ़ ही कहां पाया
लिखा हुआ था सब
जिसके भी नाम
मेरा हर पैग़ाम ।

सब का सब
मिट गया
मिटा दिया
सभी कुछ
आंसुओं ने मेरे
बह कर
धुंधला धुंधला
अभी भी
नज़र आता है
लिखा हुआ
शब्द कोई कहीं कहीं
मेरी धुंधली
यादों की तरह ।
 

 

अगस्त 26, 2013

POST : 361 परीक्षा प्रेम की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 परीक्षा प्रेम की  ( कविता  )  डॉ लोक सेतिया 

उसने कहा है
मुझे लाना है
नदी के उस पार से
इक फूल उसकी पसंद का ।

मगर नहीं पार करना
तेज़ धार वाली गहरी नदी को
उस पर बने हुए पुल से
न ही लेना है सहारा
कश्ती वाले का ।

मालूम है उसे भी
नहीं आता है तैरना मुझको
अंजाम जानते हैं दोनों
डूबना ही है आखिर
डर नहीं इसका
कि नहीं बच सकूंगा मैं
दुःख तो इस बात का है
कि मर के भी मैं
पूरी नहीं कर सकूंगा
अपने प्यार की
छोटी सी अभिलाषा ।

परीक्षा में प्यार की
उतीर्ण नहीं हो सकता
मगर दूंगा अवश्य
अपने प्यार की
परीक्षा मैं आज । 
 

 

अगस्त 23, 2013

POST : 360 सबक ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

     सबक ( कविता ) - डॉ लोक सेतिया 

जीवन का तुम्हारे
कुछ बुरा वक़्त हूं
आया हूं मगर
नहीं रहूंगा हमेशा
चला जाऊंगा मैं जब
लौट आयेगा अच्छा वक़्त ।

मुझे देख कर तुम
घबराना मत कभी
सीखना सबक मुझसे
आ जायेगा तुमको
पहचानना अपने पराये को ।

भूल मत जाना मुझे
मेरे जाने के बाद भी
याद रखना हमेशा
निभाया साथ किसने
छोड़ गया कौन इस हाल में ।

खोना मत कभी उनको
हैं जो आज तुम्हारे साथ
गये चले जो छोड़कर
मत करना उनका इंतज़ार
कभी आयें जो वापस
फिर नहीं करना ऐतबार । 
 

 

अगस्त 20, 2013

POST : 359 हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हक़ नहीं खैरात देने लगे
इक नई सौगात देने लगे ।

इश्क़ करना आपको आ गया
अब वही जज़्बात देने लगे ।

रौशनी का नाम देकर हमें
फिर अंधेरी रात देने लगे ।

और भी ज़ालिम यहां पर हुए
आप सबको मात देने लगे ।

बादलों को तरसती रेत को
धूप की बरसात देने लगे ।

तोड़कर कसमें सभी प्यार की
एक झूठी बात देने लगे ।

जानते सब लोग "तनहा" यहां
किलिये ये दात देने लगे । 
 

 

अगस्त 12, 2013

POST : 358 चाहत प्यार की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

       चाहत प्यार की  ( कविता  )  डॉ लोक सेतिया 

दूर दूर तक फैली है
नफरत की रेत यहां 
सब भटक रहे हैं
इक जलते हुए रेगिस्तान में
प्यार के अमृत कलश की
है सभी को तलाश ।

मिलती है हर किसी को
हर दिन हर पल नफरत
मिलता है इस जहां में
केवल तिरिस्कार ही तिरिस्कार
भाग जाना चाहता है हर कोई
इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में ।

मगर नहीं मालूम किसी को भी
ऐसे किसी जहान का पता
मिल जाये जहां पर सभी को
कोई एक तो अपना उसका
जिससे कर सके प्यार और स्नेह की
पल दो पल को ही सही  कुछ बातें ।

भर चुका है सभी का मन
झूठे दिखावे की रिश्ते नातों की बातों से
जी रहे हैं घुट घुट कर लोग
अपनी अपनी इस पराई दुनिया में
बिना किसी का सच्चा प्यार पाये ।

दम घुटता है
सांसें टूटती हैं
धुंधली नज़रों को नहीं आता
कुछ भी नज़र कहीं पर भी
यूं ही ढोये जा रहे हम सब
बोझ अपने अपने जीवन का
बस इक प्यार की चाहत में
तमाम उम्र । 
 

 

अगस्त 06, 2013

POST : 357 अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब लगे बोलने पामाल लोग 
देख हैरान सब वाचाल लोग ।
 
कौन कैसे करे इस पर यकीन 
पा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग ।

ज़ुल्म सहते रहे अब तक गरीब 
पांव उनके थे हम फुटबाल लोग ।

मुश्किलों में फंसी सरकार अब है
जब समझने लगे हर चाल लोग ।

कब अधिकार मिलते मांगने से
छीन लेंगे मगर बदहाल लोग ।

मछलियां तो नहीं इंसान हम हैं  
रोज़ फिर हैं बिछाते जाल लोग । 

कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग । 
 
पामाल =  दबे कुचले  
 
वाचाल = बड़बोले 



अगस्त 05, 2013

POST : 356 जाना था कहाँ आ गये कहाँ ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 जाना था कहाँ आ गये कहाँ  ( कविता  ) डॉ लोक सेतिया

ढूंढते पहचान अपनी
दुनिया की निगाह में , 

खो गई मंज़िल कहीं 
जाने कब किस राह में , 

सच भुला बैठे सभी हैं
झूठ की इक चाह में ।

आप ले आये हो ये
सब सीपियां किनारों से , 

खोजने थे कुछ मोती
जा के नीचे थाह में ,  

बस ज़रा सा अंतर है 
वाह में और आह में ।

लोग सब जाने लगे
क्यों उसी पनाह में ,

क्यों मज़ा आने लगा
फिर फिर उसी गुनाह में 

मयकदे जा पहुंचे लोग 
जाना था इबादतगाह में । 
 

 

जुलाई 30, 2013

POST : 355 आँगन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

   आंगन ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझे
बंद है हर रास्ता मेरे लिये
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे ।

खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये
मेरे लिये है खुला आसमान
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया
जितनी नज़र आती है
ऊंची ऊंची दीवारों में से
दिखाई देते आकाश से ।

खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां
हवा के लिये रौशनी के लिये
सभी कमरों के मुझ में ही आकर
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत ।

रात के अंधेरे में तपती लू में
आंधी में तूफान में
बंद हो जाती है हर इक खिड़की
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा ।

सब सहना होता है मुझको अकेले में
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप
मैं आंगन हूं इस घर का
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी । 
 
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जुलाई 27, 2013

POST : 354 अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

      अभ्यस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

परेशान थी उसकी नज़रें
व्याकुल थी देखने को
मेरी टूटती हुई सांसें ।

मैं समझ रहा था
बेचैनी उसकी
देख रहा था
उसकी बढ़ती हुई घबराहट ।

वक़्त गुज़रता जा रहा था
और उसके साथ साथ
बदल रहा था हर पल
उसके चेहरे का रंग ।

मुझे दिया था भर कर
अपने हाथों से उसने
जब विष का भरा प्याला
और पी लिया था
चुपचाप मैंने सारा ज़हर ।

उसके साथ साथ मैं भी
कर रहा था इंतज़ार मौत का
पूछा था सवाल उसने
न जाने किस से
मुझसे अथवा खुद अपने आप से
नहीं क्यों हो रहा है
उसके दिये ज़हर का
कोई भी असर मुझपर ।

समझ गया था मैं लेकिन
किस तरह समझाता उसे
उम्र भर करता रहा हूं
प्रतिदिन विषपान मैं
दुनिया वालों की
सभी अपनों बेगानों की
बातों का जिन में भरा होता था 
नफरत के ज़हर का ।

अभ्यस्त हो चुका हूं
विषपान का कब से
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर
नहीं करता है कुछ भी असर ।  
 

 
 
 

जुलाई 14, 2013

POST : 353 कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता  )   डॉ लोक सेतिया

रात कविता सुन रहा था मैं
घर में बैठा
टीवी पर बन दर्शक ।

सुना रहा था कोई कवि
कविता व्यंग्यात्मक
देश की दशा पर
बात आई थी
देश में नारी की अस्मत लुटने की ।

और टीवी कार्यक्रम में
शामिल सुनने देखने वाले
कह रहे थे
वाह वाह क्या बात है ।

कोई झूमता नज़र आ रहा था
जब कह रहा था कवि
बेबसी  भूख विषमता की बात ।

मेरे भीतर का कवि रो रहा था
देख कर ऐसी संवेदनहीनता
अपने सभ्य समाज की ।

और सोच रहा हूं
क्या इसलिये लिखते हैं
हम कविता  ग़ज़ल
लोगों का मनोरंजन कर
वाह वाह सुनने के लिये ।

या चाहते हैं जगाना संवेदना
सभी सुनने वालों
कविता पढ़ने वालों में
समाज में बढ़ रहे
अन्याय अत्याचार आडंबर के लिये ।

भला कैसे कोई हंस सकता है
नाच सकता है
गा सकता है मस्ती में
किसी के दुःख दर्द की बात सुन ।

कविता में गीत में ग़ज़ल में
क्यों असफल होती लग रही है
आज के दौर की ये नयी कविता
सुनने वाले , पढ़ने वाले में
मानवीय संवेदना के भाव
जागृत करने के
अपने वास्तविक कार्य में । 
 

 

जुलाई 10, 2013

POST : 352 तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता )  डॉ लोक सेतिया

छल कपट झूठ धोखा
सब किया तुमने क्योंकि
नहीं जीत सकते थे कभी भी
तुम मुझसे
इमानदारी से जंग लड़कर ।

इस तरह
तुमने जंग लड़ने से पहले ही
स्वीकार कर ली थी
अपनी पराजय ।

मैं नहीं कर सका तुम्हारी तरह
छल कपट कभी किसी से
मुझे मंज़ूर था हारना भी
सही मायने में
इमानदारी और उसूल से
लड़ कर सच्चाई की जंग ।

हार कर भी नहीं हारा मैं
क्योंकि जनता हूं
मुश्किल नहीं होता
तुम्हारी तरह जीतना
आसान नहीं होता हार कर भी
हारना नहीं अपना ईमान । 
 

 

जुलाई 09, 2013

POST : 351 झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया

     झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल )

                          डॉ  लोक सेतिया

कुझ वी भांवें होर बंदे सौ वार बणना
झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ।

दुश्मनी करना बड़ा सौखा कम है लोको
पर बड़ा औखा है हुंदा दिलदार बणना ।

राह मेरी रोक लैणा मैं भुल न जावां
मैं नहीं भुल के कदीं वी सरकार बणना ।

लोक तैनूं जाणदे हन सौ झूठ बोलें
सिख नहीं सकिया किसे दा तूं यार बणना ।

हर किसे दे नाल करदा हैं बेवफाई
कम अदीबां दा नहीं इक हथियार बणना ।

नावं चंगा रख के कीते कम सब निगोड़े
सोच लै हुण छड वी दे दुहरी धार बणना ।

शौक माड़ा हर किसे दे दिल नूं दुखाणा
आखदे ने लोक मंदा हुशियार बणना । 
 

 
 


 

POST : 350 मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी ( एक पंजाबी कविता ) डॉ लोक सेतिया

         मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी            

                   इक पंजाबी कविता - डॉ लोक सेतिया

मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी
तैनू सी भैन बणाया मैं तू मेरी ही सौतण बण बैठी ।

खसमां नूं अपणे खाण दी गंदी हे आदत वी तेरी
छडिया ना इक वी घर जिसने इनी डायन बण बैठी ।

भौरा वी अपणे कीते ते आई न तैनू शरम कदे
तेरा हथ पकड़िया जिस जिस ने सभ दे सर चढ़ बैठी ।

जाणदी एं की करदी हें अपणे आप नू वेखा है कदी
माड़े माड़े करमां नाल वेख आपणी झोली भर बैठी ।

धुप विच जिस रुख ने तैनू ठंडी ठंडी छां सी दित्ती
अपणे हथां नाल अज कटदी हैं उसदी तू जड़ बैठी ।

न कदे किसे दी होई तू छड आई एं सारियां नूं
किचड़ मिट्टी विच जा बैठी मिट्टी दे ढेले घढ़ बैठी ।  
 
 
 ਜਿੰਦਗੀ ਜਾਲੀ Punjabi kavita - ਮੇਰੇ ਜਜ਼ਬਾਤ

जुलाई 07, 2013

POST : 349 जीना सीखना है मैंने ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 जीना सीखना है मैंने ( कविता )   डॉ लोक सेतिया

मुझे याद है बचपन में
जब भी कोई कहता था
सब है ईश्वर
और भाग्य के हाथ में
मेरे मन में
उठा करते थे बहुत सवाल
जो पूछता था मैं
उन सभी से
जिनका काम था
फैलाना अंधविश्वास ।

लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ
मैं भी बन ही गया
उसी भीड़ का ही हिस्सा
और अपनी हर मुश्किल
हल करने के लिये
करने लगा
भरोसा भाग्य का
और देवी देवताओं का ।

खुद पर नहीं रह गया
मुझको यकीन
करने लगा जाने क्या क्या
ईश्वर को प्रसन्न करने को
अपना भाग्य बदलने को ।

मुश्किलें ही मुश्किलें
मिलीं हैं उम्र भर मुझे
ज़िंदगी कभी आसान हो न सकी
मेरे ऐसे हर दिन किये
ऐसे सभी प्रयासों से ।

दुआ मेरी आज तक
नहीं ला सकी कुछ भी असर
हुआ नहीं आज तक
किसी समस्या का कभी
समाधान भाग्य भरोसे
न ही ईश्वर को
प्रसन्न करने को की बातों से ।

आज सोचता हूं फिर से वही
बचपन की पुरानी बात
किसलिये वो सभी हैं परेशान
जो करते हैं तेरी पूजा अर्चना
हरदम रहते हैं डरे डरे
तुझसे हे ईश्वर
करते हैं विश्वास
कि सब अच्छा करते हो तुम
जबकि कुछ भी
नहीं अच्छा होता आजकल ।

सीखा नहीं अभी तक
जीने का सलीका हमने
समझना होगा आखिर इक दिन
सब करना होगा अपने आप
जूझना होगा मुश्किलों से
समस्याओं से  परेशानियों से
और लेना होगा ज़िंदगी का मज़ा ।

खुद पर
अपने आत्मविश्वास पर
कर भरोसा
भाग्य और ईश्वर के भरोसे कब तक
पाते रहेंगे
बिना किये जुर्मों की
हम सज़ा । 
 

 

जुलाई 04, 2013

POST : 348 कलम के कातिल ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कलम के कातिल ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

आपके हाथ में रहती थी मैं
लिखा निडरता से हमेशा ही सत्य
नेताओं का भ्रष्टाचार
प्रशासन का अत्याचार
समाज का दोहरा चरित्र
सराहा आपने
अन्य सभी ने मेरी बातों को
प्रोत्साहित किया मुझे
आपने अपने अंदर दी जगह मुझे
मैं समझने लगी खुद को हिस्सा आपका
मेरी आवाज़ को अपनी आवाज़ बनाकर
मेरी पहचान करवाई दुनिया से
मेरे सच कहने के कायल हो
मुझे चाहने लगे लोग
जो कल तक अनजान थे मुझसे ।

आपका दावा रहा है सदा ही
निष्पक्षता का
विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का
मैंने आपकी हर बात पर
कर लिया यकीन
और कर बैठी कितनी बड़ी भूल
आपके कड़वे सच को लिखकर
आपसे भी बेबाक सच कहने की
मगर आप नहीं कर सके स्वीकार
जीत गया आपका झूठ
मेरा सच
सच होते हुए भी गया था हार ।

आपने तोड़ डाला मुझे
सच लिखने वाली कलम को
और दिया फैंक चुपके से अपने कूड़ेदान में
आपने क़त्ल कर दिया मुझे
सच लिखने के अपराध में
मैं अभी भी हर दिन
सिसकती रहती हूं
आपके आस पास
मुझे नहीं दुःख
अपना दम घुटने का
यही रहा है हर कलम का नसीब
ग़म है इसका
कि मुझे किया क़त्ल आपने
जिसको समझा था
मैंने अपना रक्षक
सोचती थी मैं उन हाथों में हूं
जो स्वयं मिट कर भी
नहीं मिटने देंगे मुझे
मगर अब
आप ही मेरे कातिल
क़त्ल के गवाह भी
और आप ही करते हैं
हर दिन मेरा फैसला
देते हैं बार बार
सच लिखने की सज़ा
मैं करती हूं फरियाद
अपने ही कातिल से
रहम की मांगती हूं भीख
मैं इक कलम हूं
सच लिखने वाले
बेबस किसी लेखक की । 
 

 

जून 26, 2013

POST : 347 नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

तुन्हें अच्छा लगता था
कोई और
जिसके प्यार में
तुमने छोड़ दिया
मुझे ही नहीं
सारी ही दुनिया को भी ।

बेरुखी से तुम्हारी
तड़पता रहा मैं
रात दिन बहाता रहा अश्क
तुम्हारे प्यार में मैं बरसों ।

कर दिया हालात ने
जुदा हम दोनों को
मगर दिल से नहीं हुए कभी
हम इक दूजे से जुदा उम्र भर ।

अब नहीं हो तुम
अपनी दुनिया में
अब नहीं हो तुम
किसी दूजे की दुनिया में
छोड़ कर चले गये
इस जहां को तुम
अलविदा कहे बिना किसी से
मगर फिर भी रहते हो
मेरे दिल की
दुनिया में  सदा तुम ।

तुम्हें भी कुछ नहीं मिल सका
कभी किसी से
उम्र भर दुनिया में
मैं भी नहीं बसा सका
बिना तुम्हारे
अपने ख्वाबों की
कहीं कोई दुनिया ।

आज
अकेला बैठा सोचता हूं
हम दोनों फिर से
मिलें शायद एक बार
अगले किसी जन्म में
और बसायें
अपना प्यार का कोई जहां
जिसमें दूजा कोई भी नहीं हो
मेरे और तुम्हारे सिवा मेरे दोस्त । 
 

 

जून 24, 2013

POST : 346 बिना मंजिल का सफ़र है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बिना मंज़िल का सफर है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

दौड़ रहे हैं
सभी दौड़ रहे हैं
क्यों  किसलिये
नहीं जानते
कहां जा रहे हैं
क्यों जा रहे हैं
फुर्सत नहीं है 
किसी को सोचने की
बस हर किसी को
यही  डर है
कहीं पीछे न रह जायें हम
सभी को सब से
आगे निकलना है ।

कौन सी मंज़िल है
कौन सा रास्ता
किसका साथ है
छूट गया क्या क्या कैसे
नहीं जानता कोई भी
अपना अंजाम
बस भाग रहे हैं
तेज़ और तेज़
वक़्त से आगे
निकलना है सभी को
जीवन भर
भागते जाना है
बेमकसद
इस अंधी दौड़ में
छूट गया जीवन भी
हासिल कर लिया बहुत
बहुत अभी करना है
अंत में मिलनी है
हर किसी को
दो गज़ ज़मीन
भागते भागते
निकल जानी है
किसी दिन जान ।

विकास के नाम पर
विनाश की ओर जा रहे
मानवता के मूल्यों को
लोग सब बिसरा रहे
भौतिकता में
उलझे हैं हम
सुबह से शाम तक
रात को सुबह बताते
दिन को रात बता रहे
जानते हैं
समझते हैं
सही नहीं दिशा हमारी
मगर नासमझने को
समझदारी मानते
जो नहीं आया
खुद को भी अभी तक समझ
वही सबक लोग सब
औरों को समझा रहे ।

चल रहे हैं लोग
ऐसी राह पर
जिस पर नहीं है
कोई भी मंज़िल कहीं
ख़त्म हो सकती नहीं
ज़िंदगी की दूरियां
चाहते हैं सभी खोजना
अपनी अपनी ज़िंदगी
हो रहे हर पल
मगर हैं दूर सभी लोग 
अपनी ज़िंदगी से । 
 

 

जून 20, 2013

POST : 345 सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे
नहीं पर शिकायत कभी कर सकेंगे ।

तेरा शहर गलियां तेरी छोड़ देंगे
नहीं अब कभी आपसे हम मिलेंगे ।

कहें और क्या हम यही बस है कहना
तुम्हें खुश रखे हम खुदा से कहेंगे ।

मिली ज़िंदगी मांगते मौत रहते
हैं ज़िन्दा नहीं हम , न हम मर सकेंगे ।

न कोई भी मंज़िल न कोई ठिकाना
चले रास्ते जिस तरफ चल पड़ेंगे ।

मेरे दिल के टुकड़े हज़ारों ही होंगे
किसी दिन तेरा तीर खाकर मरेंगे ।

बुझानी हमें प्यास "तनहा" सभी की
सभी जाम खाली हुए हम भरेंगे । 
 

 

जून 07, 2013

POST : 344 खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता  तेरे  गुनाह , डरना
सितमगर सितम की इन्तिहा न  करना ।

कई लोग फिसले , फिसलते गये हैं
वहीं पर खड़े हो , संभलकर उतरना ।

किये दफ़्न तुमने , जिस्म तो हमारे
बहेगा हमेशा प्यार का ये झरना ।

परिंदे यही फरियाद कर रहे हैं
किसी के परों को मत कभी कतरना ।

नहीं दूर अपनी मौत जानते हैं
किया पर नहीं मंजूर रोज़ मरना ।

बिना नीवं देखो बन गई इमारत
किसी दिन पड़ेगा टूटकर बिखरना ।

सुबह शाम "तनहा" देखकर के सूरज
हैं कहते, सिखा दो डूबकर उभरना । 
 

 

जून 06, 2013

POST : 343 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

सभी धर्मों के ईश्वर
वहीं पर थे
सभी के सामने
लगी हुई थी
भक्तों की लंबी लंबी कतारें ।

सभी बढ़ा कर हाथ
दे रहे थे अपने भक्तों को आशीष
खुश हो रहे थे
पा कर ढेर सारा चढ़ावा ।

किसी को नहीं था मतलब
कौन है अच्छा और कौन बुरा
कोई नहीं दे रहा था
जैसे जिसके कर्म हों
उसको वैसा फल ।

देख कर चुप नहीं रह पाया
आखिर को वो था इक पत्रकार
छोड़ सभी को पीछे
चला आया था वो सबसे आगे
बढ़ा दिया अपना कैमरा
सामने उन सभी भगवानों के ।

और माइक पकड़
पूछने लगा उन सब से
अपने सवाल
ये क्या देख रहा हूं मैं
क्या कर रहे हैं सभी आप
सोचते नहीं -देखते नहीं ।

किसने किये कितने पुण्य
नहीं किसी को भी कह रहे
करते रहे कितने पाप।

मुस्कुराने लगे
सभी के सभी ईश्वर
सुन उसकी बात ।

फिर समझाया उसको
किस युग की करते तुम बात
कलयुग में नहीं
लागू हो सकते नियम
सत्य युग वाले ।

इस युग में खुली छूट है
लूट ले छीन ले
जैसे भी कमा ले
बस हर बार हमें याद रख
सर झुका चढ़ा चढ़ावा
खुश कर हमें ।

और फलने फूलने का
हमसे आशीष पा ले
पत्रकार हो  इतना नहीं जानते ।

कलयुग कैसे कलयुग रहेगा
अगर पाप ही नहीं रहेगा
पापियों के लिये ही है ये युग
इसमें पाप हमेशा ही बढ़ेगा । 
 
 विकट बाढ़ की करुण कहानी नदियों का संन्‍यास लिखा है - अदम गोंडवी | जखीरा,  साहित्य संग्रह

जून 03, 2013

POST : 342 बेहयाई हुनर हो गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

बेहयाई हुनर  हो गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '


बेहयाई ,  हुनर हो गई 
हर किसी को खबर हो गई । 

सर झुकाए हुए सब खड़े 
बेकसी इस कदर हो गई ।

इश्क़ के राज़ मत पूछना 
आशिक़ी दर - बदर हो गई । 
 
फिर अचानक मुलाकात इक 
कल  उसी मोड़ पर हो गई ।

आज नीची किसी की नज़र
क्यों हमें देख कर हो गई ।

हम अकेले खड़े थे मगर 
शायरी हमसफ़र हो गई ।  
 
उम्र ' तनहा ' बिता कर चले  
जुस्तजू  , बेअसर हो गई । 
 

 

जून 01, 2013

POST : 341 कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं
तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं ।

छोड़कर ईमान को लोग नेता बन गये
दो टके के लोग तक बन गये सरदार हैं ।

देखकर तूफ़ान को, छोड़ दी पतवार तक
डूबने के बन गये अब सभी आसार हैं ।

फेर ली उसने नज़र, देखकर आता हमें
इस कदर रूठे हुए आजकल दिलदार हैं ।

पास पहली बार आये हमारे मेहरबां
और फिर कहने लगे फासले दरकार हैं ।

हम समझते हैं अदाएं हसीनों की सभी
आपके इनकार में भी छुपे इकरार हैं ।

गैर जब अपने बने, तब यही ' तनहा ' कहा
ज़िंदगी तुझसे हुए आज हम दो चार हैं । 
 

 

मई 27, 2013

POST : 340 उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उड़ानें ख़्वाब में भरते , कटे जबसे हैं पर उनके
अभी तक हौसला बाकी , नहीं झुकते हैं सर उनके ।

यही बस गुफ़्तगू करनी , अमीरों से गरीबों ने
उन्हें भी रौशनी मिलती , अंधेरों में हैं घर उनके ।

उन्हें सूली पे चढ़ने का , तो कोई ग़म नहीं था पर
यही अफ़सोस था दिल में , अभी बाकी समर उनके ।

कहां पूछा किसी ने आज तक साकी से पीने को
रहे सबको पिलाते पर , रहे सूखे अधर उनके ।

हुई जब शाम रुक जाते , सुबह होते ही चल देते
ज़रा कुछ देर बस ठहरे , नहीं रुकते सफ़र उनके ।

दिये कुछ आंकड़े सरकार ने , क्या क्या किया हमने
बढ़ी गिनती गरीबों की , मिटा डाले सिफ़र उनके ।

हमारे ज़ख्म सारे वक़्त ने ऐसे भरे "तनहा"
चलाये तीर जितने सब हुए अब बेअसर उनके । 
 

 

मई 26, 2013

POST : 339 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

 तन्हा राह का तन्हा मुसाफिर ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया 

जुड़ा था सभी कुछ
मेरे ही नाम के साथ लेकिन
ज़माने में नहीं था
कुछ भी कहीं पर भी मेरा
बहुत रिश्ते-नाते थे
मेरे नाम से वाबस्ता
मगर उनमें कोई भी
नहीं था मेरा अपना ।

रहने को इक घर
मिलता रहा उम्र भर मुझे
मैं रहता रहा वहां
मगर परायों की तरह
कहने को जानते थे
मुझे शहर के तमाम लोग
लेकिन नहीं किसी ने
पहचाना कभी मुझे ।

जो दोस्त बनाये
हुए न कभी मेरे अपने
दुश्मन भी मुझसे
दुश्मनी निभा नहीं पाये
साथ हमसफ़र चल नहीं सके
मंज़िल तलक
रहबर भी राह मुझको
दिखला नहीं सके ।

इख़्तियार मेरा खुद पर भी कहां था
अपने खिलाफ़ खुद हमेशा खड़ा रहा
अकेला था नहीं था
साया तक भी मेरा साथ
बस अपने आप से ही
बेगाना बन गया मैं ।  
 

 

मई 22, 2013

POST : 338 भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    भुला नफरत सभी की हम मुहब्बत याद रखते हैं ( ग़ज़ल ) 

                    डॉ लोक सेतिया "तनहा"

भुला नफरत सभी की , हम मुहब्बत याद रखते हैं
सितम जितने हुए भूले इनायत याद रखते हैं ।

तुन्हें भेजे हज़ारों खत , मुहब्बत के कभी हमने
नहीं कुछ भेज पाये हम वही खत याद रखते हैं ।

हमेशा पास रखते हैं , तेरी तस्वीर को लेकिन
ज़माने से छिपाने की हिदायत याद रखते हैं ।

मुहब्बत में कभी कोई , शरारत की नहीं हमने
सताया ख्वाब में आकर शिकायत याद रखते हैं ।

बनेंगे एक दिन मोती , हमारी आंख के आंसू
तेरा दामन इन्हें पौंछे ये हसरत याद रखते हैं ।

किसी को बेवफ़ा कहना , हमें अच्छा नहीं लगता
निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं ।

तुम्हारी पास आने , दूर जाने की अदा "तनहा"
वो सारी शोखियां सारी नज़ाकत याद रखते हैं ।  
 

 

मई 04, 2013

POST : 337 बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    बहुत ढूंढा जमाने में नहीं तुम सा मिला कोई ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहुत ढूंढा ज़माने में , नहीं तुम सा मिला कोई
तुम्हारे बिन नहीं सुनता , हमारी इल्तिजा कोई ।

इबादत छोड़ मत देना ,परेशां हाल हो कर तुम
यही रखना भरोसा बस , कहीं होगा ख़ुदा कोई ।

हुई वीरान जब महफ़िल , करोगे याद सब उस दिन
वही महफ़िल जमाता था ,कहां उठकर गया कोई ।

किया करते सभी से बेवफ़ाई जो हमेशा हैं
शिकायत क्यों उन्हीं को है नहीं उनका हुआ कोई ।

कभी कह हम नहीं पाये , कभी वो सुन नहीं पाये
शुरू कुछ बात जब करते , तभी बस आ गया कोई ।

छिपा कर इस जहां से तुम  इन्हें पलकों पे रख लेना
तुम्हारे अश्क मोती हैं ,  नहीं ये जानता कोई ।

खताएं भी हुई होंगी , कई हमसे यहां "तनहा"
सभी इंसान दुनिया में , नहीं है देवता कोई ।
 

 

अप्रैल 29, 2013

POST : 336 आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

आखिरी तम्मना ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

रात ख़्वाब में मुझसे खुदा ने कहा
तुम्हारे लिये है किसी ने मांगी दुआ
क्या चाहते हो मांगना सोचकर तुम
आज होगी पूरी हर इक इल्तजा ।

मुझसे ताउम्र तुम्हें शिकायत रही
आप खुद से रहते हो हमेशा ही खफ़ा
इबादत सीखी न आया माला जपना
फिर भी कर लो जो भी आरज़ू करनी ।

कहा मैंने पूछा है तो बस यही है कहना
ऐसी दुनिया में मुझे नहीं अब और रहना
जन्नत चाहिये न कोई दोज़ख ही मुझे
बात  है इक ज़रूरी पूरी उसको करना ।

बाद मरने के मुझे इक ऐसा जहां मिले
छोटा और बड़ा नहीं कोई भी जहां  हो
है कहां ऐसी जगह मुझको वो दिखा दो 
कोई परस्तार हो , न जहां कोई खुदा हो ।              ( परस्तार :::: उपासक ) 
 

 

अप्रैल 27, 2013

POST : 335 बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बड़ा ही मुख़्तसर उसका फ़साना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"  

बड़ा ही मुख्तसर उसका फसाना है
बना सच का सदा दुश्मन ज़माना है ।

इधर सब दर्द हैं उस पार सब खुशियां
चला जाये जिसे उस पार जाना है ।

कंटीली राह पर चलना यहां पड़ता
यही सबको मुहब्बत ने बताना है ।

गुज़ारी ज़िंदगी आया कहां जीना
नया क्या है वही किस्सा पुराना है ।

जिसे जब जब परख देखा वही दुश्मन
नहीं अब दोस्तों को आज़माना है ।

हमें सारी उम्र इक काम करना है
अंधेरों को उजालों से मिलाना है ।

ये सारा शहर बदला लग रहा "तनहा"
अभी वैसा तुम्हारा आशियाना है । 
 

 

अप्रैल 25, 2013

POST : 334 नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना ( ग़ज़ल ) 

                     डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नहीं मालूम जिसको खुद पता अपना
बना आये उसी को तुम खुदा अपना ।

बड़ी बेदर्द दुनिया में हो आये तुम
बनाना खुद पड़ेगा रास्ता अपना ।

न करना आरज़ू अपना बनाने की
यहां कोई किसी का कब हुआ अपना ।

तड़पना उम्र भर होगा मुहब्बत में
बहुत प्यारा नसीबा लिख दिया अपना ।

हमारा वक़्त कुछ अच्छा नहीं यारो
चले जाओ सभी दामन छुड़ा अपना ।

नहीं आता किसी के वार से बचना
ज़माने को लिया दुश्मन बना अपना ।

बतायें शर्त से होता है क्या  "तनहा"
लगाई शर्त इक दिन सब बिका अपना । 
 

 

अप्रैल 24, 2013

POST : 333 आज हर झूठ को हरा डाला ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज हर झूठ को हरा डाला
आईना सच का जब दिखा डाला ।

बन गये कुछ , लगे उछलने हैं
आपने आस्मां बता डाला ।

आपके सामने बसाया था
घर हमारा तभी जला डाला ।

धर्म वालो कहो किया क्या है
हर किसी को ज़हर पिला डाला ।

जिसपे दीवार को चुना इक दिन
आज पत्थर वही हटा डाला ।

मुस्कुराये लगे हमें कहने
आपके प्यार ने मिटा डाला ।

आज देखा उदास "तनहा" को
रुख से परदा तभी हटा डाला । 
 

 

अप्रैल 23, 2013

POST : 332 मिल के आये अभी ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 मिल के आये अभी ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मिल के आये अभी ज़िंदगी से
की मुलाक़ात इक अजनबी से ।

मांगते सब ख़ुशी की दुआएं
दूर जब हो गये हर ख़ुशी से ।

काश होते सभी लोग ऐसे 
लुत्फ़ लेते वो आवारगी से ।

बात हर इक छुपा कर रखो तुम
कह न देना नशे में किसी से ।

खूबसूरत जहां  कह रहा था
देखना सब मुझे  दूर ही से ।

दर्द कितना,मिले ज़ख्म कितने
मिल गई  दौलतें   दोस्ती से ।

क़त्ल कर लें तुझे आज "तनहा"
पूछते थे यही खुद मुझी से । 
 

 

अप्रैल 20, 2013

POST : 331 सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सभी को हुस्न से होती मुहब्बत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सभी को , हुस्न से होती मुहब्बत है
हसीं कितनी हसीनों की शिकायत है ।

भला दुनिया उन्हें कब याद रखती है
कहानी बन चुकी जिनकी हक़ीकत है ।

है गुज़री इस तरह कुछ ज़िंदगी अपनी
हमें जीना भी लगता इक मुसीबत है ।

उन्हें आया नहीं बस दोस्ती करना
किसी से भी नहीं बेशक अदावत है ।

वो आकर खुद तुम्हारा हाल पूछें जब
सुनाना तुम तुम्हारी क्या हिकायत है ।

हमें लगती है बेमतलब हमेशा से
नहीं सीखी कभी हमने सियासत है ।

वहीं दावत ,जहां मातम यहां "तनहा"
हमारे शहर की अपनी रिवायत है । 
 

 

अप्रैल 19, 2013

POST : 330 आबरू तार तार खबरों में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आबरू तार तार खबरों में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आबरू तार तार ख़बरों में
आदमी शर्मसार ख़बरों में ।

शहर बिकने चला खरीदोगे
लो पढ़ो इश्तिहार ख़बरों में ।

नींद क्या चैन तक गवा बैठे
लोग सब बेकरार ख़बरों में ।

देख सरकार सो गई शायद
मच रही लूट मार ख़बरों में ।

आमने सामने नहीं लड़ते
कर रहे आर पार ख़बरों में ।

झूठ को सच बना दिया ऐसे
दोहरा बार बार ख़बरों में ।

नासमझ कौन रह गया "तनहा"
सब लगें होशियार ख़बरों में । 
 
 Kolkata Doctor Rape-Murder Case: "Horrifying Reminder Of Humanity's Lowest  Points" | HerZindagi

अप्रैल 16, 2013

POST : 329 करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

करें प्यार सब लोग खुद ज़िंदगी से
हुए आप अपने से क्यों अजनबी से ।

कभी गुफ़्तगू आप अपने से करना
मिले एक दिन आदमी आदमी से ।

खरीदो कि बेचो , है बाज़ार दिल का
मगर सब से मिलना यहां, बेदिली से ।

हमें और पीछे धकेले गये सब
शुरूआत फिर फिर हुई आखिरी से ।

बताओ तुम्हें और क्या चाहिए अब
यही , लोग कहने लगे बेरुखी से ।

कहीं और जाकर ठिकाना बना लो
यही , रौशनी ने कहा तीरगी से ।

पड़े जाम खाली सभी आज "तनहा"
बुझाओ अभी प्यास को तशनगी से । 
 

 

अप्रैल 13, 2013

POST : 328 नासमझ कौन है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

नासमझ कौन है ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

और कितना
और क्या क्या
और कौन कौन
और कब तक
मुझे समझाते रहेंगे
और कितने लोग ।

क्यों आखिर क्यों
आप समझते हैं
समझता नहीं मैं कुछ भी
और सब कुछ समझते हैं
सिर्फ आप
हमेशा आप ।

चलो माना
हां मान लिया मैंने
समझदार होंगे सभी लोग ।

लेकिन क्या
आपको है अधिकार
किसी को
नासमझ कहने का ।

खुद को समझदार कहने वालो
शायद पहले
समझ लो इक बात ।

किसी और को
नासमझ समझना
समझदारी नहीं हो सकता ।  
 



अप्रैल 10, 2013

POST : 327 फूल जैसे लोग इस ज़माने में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

फूल जैसे लोग इस ज़माने में
सुन रखे होंगे किसी फ़साने में ।
  
ज़िंदगी मंज़ूर फैसला तेरा
उम्र बीतेगी उन्हें भुलाने में ।

हर किसी को तो बता नहीं सकते
दर्द बढ़ जाता उसे सुनाने में ।

छेड़ कर बुझती हुई चिंगारी इक 
खुद लगा ली आग आशियाने में ।

कोशिशें उसने हज़ार कर देखीं
लुत्फ़ आया और रूठ जाने में ।

तोड़ डाली खेल खेल में दुनिया
फिर ज़माना लग गया बसाने में ।

आप कितना दूर - दूर रहते हैं
मिट गये हम दूरियां मिटाने में ।

छोड़नी दुनिया हमें पड़ी "तनहा"
अहमियत अपनी उन्हें बताने में ।  
 

 



अप्रैल 08, 2013

POST : 326 सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं ( ग़ज़ल ) 

                          डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सुन ज़माने बात दिल की खुद बताना चाहता हूं
पौंछकर आंसू सभी , अब मुस्कुराना चाहता हूं ।

ज़िंदगी भर आपने समझा मुझे अपना नहीं पर
गैर होकर आपको अपना बनाना चाहता हूं ।

दोस्तों की बेवफ़ाई भूल कर फिर आ गया हूं
बेरहम दुनिया को फिर से आज़माना चाहता हूं ।

किस तरफ जाना तुझे ,अब रास्ते तक पूछते हैं
बस यही कहता हूं उनको इक ठिकाना चाहता हूं ।

आप मत देना सहारा ,जब कभी गिरने लगूं मैं
टूट जाऊं ,बोझ खुद इतना उठाना चाहता हूं ।

आपसे कैसा छिपाना ,जानता सारा ज़माना
सोचता हूं आज लेकिन क्यों दिखाना चाहता हूं ।

नाचते सब लोग "तनहा" तान मेरी पर यहां हैं
आज कठपुतली बना तुमको नचाना चाहता हूं । 
 


 

अप्रैल 07, 2013

POST : 325 सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

सभी का जिसका कोई नहीं था ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

पार्क में सैर करते करते
हुई थी उससे जान पहचान
मिल जाता था अक्सर सुबह शाम
उसके होटों पे खिली रहती थी
बहुत ही प्यारी सी इक मुस्कान ।

बातें बहुत अच्छी सुनाता था हमेशा
अपने सभी हैं चाहते उसको
हमें बस यही था बताता हमेशा
साथ साथ चलते राह लगती थी प्यारी
रहता भी वो मुस्कुराता हमेशा ।

घर का कभी कभी दोस्तों का
कभी ज़िक्र नातों रिश्तों का
जब भी करता बहुत खुश होता
मुहब्बत के भी था किस्से सुनाता
खूबसूरत दुनिया से वो था आता ।

सुना जब नहीं अब रहा बीच अपने
करने थे पूरे उसे ख्वाब कितने
पूछ कर किसी से उसका ठिकाना
गए जब वहां तभी सबने जाना
नहीं कोई उसका सारी दुनिया में
बातें सब उसकी थी कुछ झूठे सपने ।

हमें नज़र आएंगे जब जब भी मेले
नहीं साथ होगा कोई बस हम अकेले
हम भी उसकी बातें दोहराया करेंगे
कहानी उसी की सुनाया करेंगे ।   

  ( शीर्षक : : अनदेखे सुहाने स्वप्न  )

 


 

अप्रैल 04, 2013

POST : 324 मुस्कुराने से लोग जलते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुस्कुराने से लोग जलते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुस्कुराने से लोग जलते हैं
फूल- कलियां तभी मसलते हैं ।

बंद कर सामने का दरवाज़ा
छिप के पीछे से खुद निकलते हैं ।

दर्द  अपने नहीं , पराये हैं
दर्द औरों के दिल में पलते हैं ।

दूर सब राजनीति से रहना
राह चिकनी, सभी फिसलते हैं ।

वक़्त को जो नहीं समझ पाते
उम्र भर लोग हाथ मलते हैं ।

एक दिन चढ़ पहाड़ पर देखा
वो भी नीचे की ओर ढलते हैं ।

खोखले हो चुके बहुत "तनहा"
लोग सिक्कों से अब उछलते हैं । 
 
 

अप्रैल 01, 2013

POST : 323 लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते ( ग़ज़ल ) 

                      डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लोग जब मुहब्बत पर ऐतबार कर लेते
साथ जीने मरने का तब करार कर लेते ।

इश्क में किसी को अपना कभी बना लेते 
इस तरह खिज़ाओं को खुद बहार कर लेते ।

नाख़ुदा नहीं होते हर किसी की किस्मत में
हौसला किया होता, आप पार कर लेते ।

लौटकर भी आना है ,आपको यहां वापस
आप कह गए होते , इंतज़ार कर लेते ।

प्यार के बिना लगती ज़िंदगी नहीं प्यारी
इश्क जब है हो जाता ,जां निसार लेते ।

हम भला कहें कैसे ,हम हुए तेरे आशिक 
नाम मजनुओं में कैसे शुमार कर लेते ।

एक बार ख़त लिखकर , इक जुर्म किया "तनहा"
गर जवाब मिल जाता , बार बार कर लेते । 
 

 

मार्च 31, 2013

POST : 322 खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

      खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

खुदा बेशक नहीं सबको जहां की हर ख़ुशी देता
हो जीना मौत से बदतर , न इतनी बेबसी देता ।

मुहब्बत दे नहीं सकते अगर , नफरत नहीं करना
यही मांगा सभी से था , नहीं कोई यही देता ।

नहीं कोई भी मज़हब था , मगर करता इबादत था
बनाकर कश्तियां बच्चों को हर दिन कागज़ी देता ।

कहीं दिन तक अंधेरे और रातें तक कहीं रौशन
शिकायत बस यही करनी , सभी को रौशनी देता ।

हसीनों पर नहीं मरते , मुहब्बत वतन से करते
लुटा जां देश पर आते , वो ऐसी आशिकी देता ।

हमें इक बूंद मिल जाती , हमारी प्यास बुझ जाती
थी शीशे में बची जितनी , पिला हमको वही देता ।

कभी कांटा चुभे ऐसा , छलकने अश्क लग जाएं
चले आना यहां "तनहा" है फूलों सी नमी देता । 
 

 

मार्च 28, 2013

POST : 321 मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

       मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

मुहब्बत कर के टूटा है सभी का दिल
कहां संभला ,संभाले से किसी का दिल ।

भुला बैठा , तुम्हारी बेवफ़ाई जो
हुआ बर्बाद फिर फिर बस उसी का दिल ।

तुम्हें दिल दे दिया हमने , तुम्हारा है
नहीं समझो उसे तुम अजनबी का दिल ।

मनाया लाख इस दिल को नहीं माना
लगा लगने पराया सा कभी का दिल ।

हुए थे पार कितने तीर उस दिल से
मिला इक दिन मुहब्बत की परी का दिल ।

बहाये अश्क दोनों ने बहुत मिलकर 
मिला जब ज़िंदगी से ज़िंदगी का दिल ।

किसी की इक झलक आई नज़र "तनहा"
बड़ा बेचैन रहता है तभी का दिल । 
 

 

मार्च 27, 2013

POST : 320 ऐसी होली फिर से आये ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

ऐसी होली फिर से आये ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

एक घर है बहुत प्यारा हमारा
कोई अकेला नहीं न है बेसहारा
खुला है आंगन  दिल भी खुले हैं
और ऊपर बना हुआ इक चौबारा ।

मिल जुल खेलते सारे हैं होली
है मीठी कितनी लगती घर की बोली
पड़ा झूला भी अंगने के पेड़ पर इक
भैया भाभी सभी की भाती ठिठोली ।

गांव सारा लगे अपना सभी को
चाचा चाची मौसी नानी सहेली
सभी को आज जा कर मिलना
मनानी है सभी के संग ये होली ।

सभी अपने लोग, घर सब अपने
खिलाते हैं खुद बना घर की मिठाई
गिला शिकवा था गर भुलाकर
लगे फिर से गले बन भाई भाई ।

प्यार से रंग उसको भी लगाया
हमारा रंग खूब उसको था भाया
शरमा गई सुन प्यार की बात
सर हां में लेकिन उसने झुकाया ।

नहीं झूठ ,न छल कपट किसी में
जो कहता कोई सब मान लेते
मिलजुल कर बना लेते सभी काम
हो जाता जो मिलकर के ठान लेते ।

कभी फिर से वही पहले सी होली
आ जाये कभी यही सपना है देखा
हटी हो आंगन की सभी दिवारें
मिटे हर मन में खिंची हुई रेखा । 
 

 

मार्च 24, 2013

POST : 319 रोज़ इक ख्वाब मुझको आता है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रोज़ इक ख्वाब मुझको आता है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रोज़ इक ख़्वाब मुझको आता है
जो लिखूं मिट वो खुद ही जाता है ।

कौन जाने कि उसपे क्या गुज़री 
दोस्त दुश्मन को जब बताता है ।

आ गया फिर वही महीना जब  
दिल किसी का किसी पे आता है ।

बस यही हर गरीब कर सकता
अश्क पीता है , ज़हर खाता है ।

सिर्फ मतलब के रह गये रिश्ते 
क्या किसी का किसी से नाता है ।

एक दुनिया नयी बसानी है  
ख़्वाब झूठे हमें दिखाता है ।

बात तनहा अजीब कहता है 
मौत को ज़िंदगी बताता है । 
 

 

मार्च 22, 2013

POST : 318 हमें खुद से शिकायत क्या करें हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमें खुद से शिकायत क्या करें हम ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमें खुद से शिकायत क्या करें हम
है चुप रहने की आदत क्या करें हम ।

बड़े मगरूर देखे हुस्न वाले
किसी से फिर मुहब्बत क्या करें हम ।

लिखे हर दिन नहीं भेजे किसी को
जला डाले सभी ख़त क्या करें हम ।

हमारा जुर्म बोला सच हमेशा
मिली ज़िल्लत ही ज़िल्लत क्या करें हम ।

बहुत तनहाईयां लाती है दौलत
ज़माने भर की दौलत क्या करें हम ।

बड़ा है शहर लेकिन लोग छोटे
हमें लगती है आफ़त क्या करें हम ।

ये दिल उनको नहीं देना था "तनहा"
लगी भोली वो सूरत क्या करें हम । 
 

 

मार्च 21, 2013

POST : 317 होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

होगा संभव पांचवें युग में ( हास्य व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

मिल कर सभी देवता गये प्रभु के पास
सोच सोच कर जब हुए देवगण उदास ।

कैसे खुश हों उनकी पत्नियां समझ नहीं आता
सफल कभी न हो पाए किए कई प्रयास ।

जाकर किया प्रभु से अपना वही सवाल
बतलाओ प्रभु हो जाये ये हमसे कमाल ।

सब है देव पत्नियों को मिलता नहीं खुश कोई
पूरी कर पाते नहीं   देव तक उनकी आस ।

विनती सुन देवों की प्रभु को समझ न आया
कोई भी हल समस्या का जाता नहीं बताया ।

सुनो देवो बात मेरी  सारे दे कर ध्यान
बदल नहीं सकता विधि का कभी विधान ।

जो खुश पत्नी को कर सकता होगा कोई महान
सच मानो नहीं कर पाया ये मैं खुद भगवान ।

असम्भव कार्य है करना मत कभी भी प्रयास
जो कोई कर दिखाये बन जाऊं मैं उसका दास ।

खुद ईश्वर में जो नारी खोज ले अवगुण सभी
कहलाया करती है औरत पत्नी बस तभी ।

मैं ईश्वर सब कर सकता कहता है ज़माना
असम्भव कहते किसको ये भी था समझाना ।

पत्नी नाम सवाल का नहीं जिसका कोई जवाब
भूल जाओ उसको खुश करने का मत देखो ख्वाब ।

पत्नी को खुश करने वाला हुआ न कोई होगा
चार युगों में सम्भव नहीं  पांचवां वो युग होगा ।