फ़रवरी 27, 2013

POST : 305 लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लोग कितना मचाये हुए शोर हैं
एक बस हम खरे और सब चोर हैं ।

साथ दुनिया के चलते नहीं आप क्यों
लोग सब उस तरफ , आप इस ओर हैं ।

चल रही है हवा , उड़ रही ज़ुल्फ़ है
लो घटा छा गई ,  नाचते मोर हैं ।

हाथ जोड़े हुए मांगते वोट थे
मिल गई कुर्सियां और मुंहजोर हैं ।

क्या हुआ है नहीं कुछ बताते हमें 
नम हुए किसलिए आंख के कोर हैं ।

सब ये इलज़ाम हम पर लगाने लगे
दिल चुराया किसी का है , चितचोर हैं ।

टूट जाये अगर फिर न "तनहा" जुड़े
यूं नहीं खींचते , प्यार की डोर हैं । 
 

 

फ़रवरी 25, 2013

POST : 304 जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जनाज़े पे मेरे तुम्हें भी है आना
नहीं भूल जाना ये वादा निभाना ।

लगे प्यार करने यकीनन किसी को
कहां उनको आता था आंसू बहाना ।

तुम्हें राज़ की बात कहने लगे हैं
कहीं सुन न ले आज ज़ालिम ज़माना ।

बनाकर नई राह चलते रहे हैं
नहीं आबशारों का कोई ठिकाना ।

हमें देखना गांव अपना वही था
यहां सब नया है, नहीं कुछ पुराना ।

उन्हें घर बुलाते, थी हसरत हमारी
कसम दे गये, अब हमें मत बुलाना ।

मिले ज़िंदगी गर किसी रोज़ "तनहा"
मनाकर के लाना , हमें भी मिलाना ।
 
 

फ़रवरी 23, 2013

POST : 303 नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के बेहूदगी है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नाम पर तहज़ीब के ,   बेहूदगी है 
रौशनी समझे जिसे सब , तीरगी है ।

सांस लेना तक हुआ मुश्किल यहां पर
इस तरह जीना भी , कोई ज़िंदगी है ।

सब कहीं आते नज़र हमको वही हैं 
आग उनके इश्क की ऐसी लगी है ।

कह दिया कैसे नहीं कोई किसी का 
तोड़ दिल देती तुम्हारी दिल्लगी है ।

पौंछते हैं हाथ से आंसू किसी के 
और हो जाती हमारी  बंदगी है ।

सब हसीनों की अदाओं पर हैं मरते 
भा गई मुझको तुम्हारी सादगी है ।

मयकदा सारा हमें "तनहा" पिला दो
आज फिर से प्यास पीने की जगी है ।
 

 

फ़रवरी 20, 2013

POST : 302 हो गया क्यों किसी को प्यार है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हो गया क्यों किसी को प्यार है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हो गया क्यों किसी को प्यार है
बस इसी बात पर तकरार है ।

कौन आकर हमारे ख़्वाब में
खुद बुलाता हमें उस पार है ।

कुछ खबर तक नहीं हमको हुई
जुड़ गया दिल से दिल का तार है ।

धर्म के नाम पर दंगे हुए
जल गया आग में गुलज़ार है ।

रोग जाने उसे क्या हो गया
चारागर लग रहा बीमार है ।

हर कदम डगमगा कर रख रही
चल रही इस तरह सरकार है ।

शर्त रख दी थी "तनहा" प्यार में ,
कर दिया इसलिये इनकार है । 
 

 

POST : 301 ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना , सोचकर फिर बताना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

ज़रा सोचना सोचकर फिर बताना
हुआ है किसी का कभी भी ज़माना ।

इसी को तो कहते सभी लोग फैशन
यही कल नया था हुआ अब पुराना ।

उसी को पता है किया इश्क़ जिसने
कि होता है कैसा ये मौसम सुहाना ।

मेरी कब्र इक दिन बनेगी वहीं पर
मुझे घर जहां पर कभी था बनाना ।

सभी दोस्त आए बचाने हमें थे
लगाते रहे पर हमीं पर निशाना ।

उठा दर्द सीने में फिर से वही है
वही धुन हमें आज फिर तुम सुनाना ।

रहा सोचता रात भर आज "तनहा"
है रूठा हुआ कौन  किसने मनाना । 
 

 

फ़रवरी 18, 2013

POST : 300 बेबस जीवन ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

बेबस जीवन ( कविता ) लोक सेतिया

रातों को अक्सर
जाग जाता हूं
खिड़की से झांकती
रौशनी में
तलाश करता हूं
अपने अस्तित्व को ।

सोचता हूं
कब छटेगा
मेरे जीवन से अंधकार ।

होगी कब
मेरे लिये भी सुबह ।

उम्र सारी
बीत जाती है 
देखते हुए  सपने 
एक सुनहरे जीवन के ।

मैं भी चाहता हूं
पल दो पल को 
जीना ज़िंदगी को
ज़िंदगी की तरह ।

कोई कभी करता 
मुझ से भी जी भर के प्यार 
बन जाता कभी कोई
मेरा भी अपना ।

चाहता हूं अपने आप पर
खुद का अधिकार
और कब तक
जीना होगा मुझको
बन कर हर किसी का
सिर्फ कर्ज़दार
ज़िंदगी पर क्यों 
नहीं है मुझे ऐतबार । 
 

 

फ़रवरी 16, 2013

POST : 299 तीरगी कह गई राज़ की बात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तीरगी कह गई राज़ की बात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तीरगी कह गई राज़ की बात है
बेवफ़ा वो नहीं चांदनी रात है ।

लब रहे चुप मगर बात होती रही
इस तरह भी हुई इक मुलाकात है ।

झूठ भाता नहीं , प्यार सच से हुआ
मुझ में शायद छुपा एक सुकरात है ।

आज ख़त में उसे लिख दिया बस यही
आंसुओं की यहां आज बरसात है ।

हर जुमेरात करनी मुलाकात थी
आ भी जाओ कि आई जुमेरात है ।

भूल जाना नहीं डालियो तुम मुझे
कह रहा शाख से टूटता पात है ।

तुम मिले क्या मुझे , मिल गई ज़िंदगी
दिल में "तनहा" यही आज जज़्बात है ।
 

 

POST : 298 दर्द का नाता ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

  दर्द का नाता ( कविता ) लोक सेतिया

सुन कर कहानी एक अजनबी की
अथवा पढ़कर किसी लेखक की
कोई कहानी
एक काल्पनिक पात्र के दुःख में
छलक आते हैं
हमारी भी पलकों पर आंसू।

क्योंकि याद आ जाती है सुनकर हमें
अपने जीवन के
उन दुखों परेशानियों की
जो हम नहीं कह पाये कभी किसी से
न ही किसी ने समझा
जिसको बिन बताये ही।

छिपा कर रखते हैं हम
अपने जिन ज़ख्मों को
उभर आती है इक टीस सी उनकी
देख कर दूसरों के ज़ख्मों को।

सुन कर किसी की दास्तां को
दर्द की तड़प बना देती है
हर किसी को हमारा अपना
सबसे करीबी होता है नाता 
इंसान से इंसान के दर्द का।

फ़रवरी 12, 2013

POST : 297 कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

कुछ भी कहते नहीं नसीबों को
चूम लेते हैं खुद सलीबों को ।

तोड़ सब सरहदें ज़माने की
दफ़न कर दो कहीं ज़रीबों को ।

दर्द औरों के देख रोते हैं
लोग समझे कहां अदीबों को ।

आज इंसानियत कहां ज़िंदा
सब सताते यहां गरीबों को ।

इश्क की बात को छुपा लेते
क्यों बताते रहे रकीबों को ।

लूट कर जो अमीर बन बैठे
आज देखा है बदनसीबों को ।

क्यों किनारे मिलें उन्हें "तनहा"
जो डुबोते रहे हबीबों को । 
 

 

फ़रवरी 08, 2013

POST : 296 अपने आप से साक्षात्कार ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अपने आप से साक्षात्कार ( कविता )  डॉ लोक सेतिया 

हम क्या हैं
कौन हैं
कैसे हैं 
कभी किसी पल
मिलना खुद को ।

हमको मिली थी
एक विरासत
प्रेम चंद
टैगोर
निराला
कबीर
और अनगिनत
अदीबों
शायरों
कवियों
समाज सुधारकों की ।

हमें भी पहुंचाना था
उनका वही सन्देश
जन जन
तक जीवन भर
मगर हम सब
उलझ कर रह गये 
सिर्फ अपने आप तक हमेशा ।

मानवता
सदभाव
जन कल्याण
समाज की
कुरीतियों का विरोध
सब महान
आदर्शों को छोड़ कर
हम करने लगे
आपस में टकराव ।

इक दूजे को
नीचा दिखाने के लिये 
कितना गिरते गये हम
और भी छोटे हो गये
बड़ा कहलाने की
झूठी चाहत में ।

खो बैठे बड़प्पन भी अपना
अनजाने में कैसे
क्या लिखा
क्यों लिखा
किसलिये लिखा
नहीं सोचते अब हम सब
कितनी पुस्तकें
कितने पुरस्कार
कितना नाम
कैसी शोहरत
भटक गया लेखन हमारा
भुला दिया कैसे हमने 
मकसद तक अपना ।

आईना बनना था 
हमको तो
सारे ही समाज का 
और देख नहीं पाये
हम खुद अपना चेहरा तक
कब तक अपने आप से
चुराते रहेंगे  हम नज़रें
करनी होगी हम सब को
खुद से इक मुलाकात । 
 

 

फ़रवरी 03, 2013

POST : 295 सब पराये हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

सब पराये हैं ज़िंदगी ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

देख आये हैं ज़िंदगी
सब पराये हैं ज़िंदगी ।

किसी ने पुकारा नहीं
बिन बुलाये हैं ज़िंदगी ।

खिज़ा के मौसम में हम
फूल लाये  हैं ज़िंदगी ।

अपने क्या बेगाने तक
आज़माये हैं ज़िंदगी ।

दर्द वाले नग्में हमने
गुनगुनाये हैं ज़िंदगी ।
 

 
 

POST : 294 आंखें ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

आंखें ( नज़्म ) डॉ  लोक सेतिया

बादलों सी बरसती  हैं आंखें 
बेसबब छलकती हैं आंखें ।

गांव का घर छूट गया जो
देखने को तरसती हैं आंखें ।

जुबां से नहीं जब कहा जाता
बात तब भी करती हैं आंखें ।

मौसम पहाड़ों का होता जैसे
ऐसे कभी बदलती हैं आंखें ।

नज़र के सामने आ जाये जब
बिन काजल संवरती हैं आंखें ।

गज़ब ढाती हैं हम पर जब 
और भी तब चमकती हैं आंखें । 
 

 

फ़रवरी 02, 2013

POST : 293 प्यास प्यार की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

प्यास प्यार की ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कहलाते हैं बागबां भी 
होता है सभी कुछ  उनके पास 
फिर भी खिल नहीं पाते 
बहार के मौसम में भी
उनके आंगन के कुछ पौधे ।

वे समझ पाते नहीं 
अधखिली कलिओं के दर्द को  ।

नहीं जान पाते 
क्यों मुरझाये से रहते  हैं
बहार के मौसम में भी 
उनके लगाये पौधे
उनके प्यार के बिना ।

सभी कहलाते हैं
अपने मगर
नहीं होता उनको
कोई सरोकार
हमारी ख़ुशी से
हमारी पीड़ा से ।

दुनिया में मिल जाते हैं
दोस्त बहुत
मिलता नहीं वही एक
जो बांट सके हमारे दर्द भी
और खुशियां भी
समझ सके
हर परेशानी हमारी 
बन कर किरण आशा की 
दूर कर सके अंधियारा
जीवन से हमारे ।

घबराता है जब भी मन
तनहाइयों से
सोचते हैं तब
काश होता अपना भी कोई ।

भागते जा रहे हैं
मृगतृष्णा के पीछे हम सभी
उन सपनों के लिये
जो नहीं हो पाते कभी भी पूरे ।

उलझे हैं सब
अपनी उलझनों में
नहीं फुर्सत किसी को 
किसी के लिये भी
करना चाहते हैं हम 
अपने दिल की किसी से बातें
मगर मिलता नहीं कोई 
हमें समझने वाला ।

सामने आता है
हम सब को नज़र 
प्यार का एक
बहता हुआ दरिया 
फिर भी नहीं मिलता 
कभी चाहने पर किसी को
दो बूंद भी  पानी
बस इतनी सी ही है 
अपनी तो कहानी । 
 

   

जनवरी 27, 2013

POST : 292 सच जो कहने लगा हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सच जो कहने लगा हूं मैं
सबको लगता बुरा हूं मैं ।

अब है जंज़ीर पैरों में
पर कभी खुद चला हूं मैं ।

बंद था घर का दरवाज़ा
जब कभी घर गया हूं मैं ।

अब सुनाओ मुझे लोरी
रात भर का जगा हूं मैं ।

अब नहीं लौटना मुझको
छोड़ कर सब चला हूं मैं ।

आप मत उससे मिलवाना
ज़िंदगी से डरा हूं मैं ।

सोच कर मैं ये हैरां हूं
कैसे "तनहा" जिया हूं मैं । 
 

 

जनवरी 25, 2013

POST : 291 किसे आज जीना , किसे रोज़ मरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

किसे आज जीना , किसे रोज़ मरना   ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

किसे आज  जीना , किसे रोज़ मरना 
यही काम आता सियासत को करना ।

नहीं आप को गर है बेमौत मरना 
पड़ेगा सभी हुक्मरानों से डरना ।
 
अगर झूठ उनके बुरे लग रहे हैं 
न बोलो कभी सच है उनको अखरना ।

किनारे उन्हीं के हैं पतवार जिन की  
उसी को डुबोते , जिसे पार करना ।
 
भला प्यास सत्ता की बुझती कभी है   
बहाकर लहू जाम उनको है भरना ।

लुभाती सभी को हैं उनकी अदाएं 
बहुत खूब उनका है सजना संवरना ।

बड़ी बेरहम अब सियासत है ' तनहा '
न उनकी गली से कभी तुम गुज़रना ।  
 

 
 


 

जनवरी 24, 2013

POST : 290 दोस्त अपने हमें बुला न सके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दोस्त अपने हमें बुला न सके
हम भी गैरों के पास जा न सके ।

प्यार तो प्यार है इबादत है
पर सभी ये सबक पढ़ा न सके ।

जो कभी साथ साथ गाये थे
हम ख़ुशी के वो गीत गा न सके ।

आप करते गये सितम पे सितम
हम लबों तक भी बात ला न सके ।

कह रहा है हमें ज़माना भी
सीख जीने की तुम अदा न सके ।

मत कभी रूठ कर चले जाना
हम  किसी को कभी मना न सके ।

तुम हमें दे गये कसम "तनहा"
अश्क हम चाह कर बहा न सके ।
 

 

POST : 289 दोस्ती इस तरह निभाते हैं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

दोस्ती इस तरह निभाते हैं( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया

दोस्ती इस तरह निभाते हैं
रूठ जाते कभी मनाते हैं ।

रोज़  घर पर हमें बुलाते हैं
दर से अपने कभी उठाते हैं ।

वो कहानी हुई पुरानी अब
इक नई दास्तां सुनाते हैं ।

रात आते नज़र सितारे भी
और जुगनू भी टिमटिमाते हैं ।

लोग मिलते नहीं कभी खुद से
आज तुम से तुम्हें मिलाते हैं ।

मंज़िलें पास पास लगती हैं
बोझ मिलकर अगर उठाते हैं ।

जब भी "तनहा" उदास होते हैं
दीप आशा के कुछ जलाते हैं । 
 

 

जनवरी 23, 2013

POST : 288 फूलों के जिसे पैगाम दिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

फूलों के जिसे पैगाम दिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

फूलों के जिसे पैग़ाम दिये
उसने हमें ज़हर के जाम दिये ।

मेरे अपनों ने ज़ख़्म मुझे 
हर सुबह दिए हर  शाम दिये ।

सूली पे चढ़ा कर खुद हमको
हम पर ही सभी इल्ज़ाम दिये ।

कल तक था हमारा दोस्त वही
ग़म सब जिसने ईनाम दिये ।

पागल समझा , दीवाना कहा
दुनिया ने यही कुछ नाम दिये ।

हर दर्द दिया यारों ने हमें
कुछ ख़ास दिये , कुछ आम दिये ।

हीरे थे कई , मोती थे कई
" तनहा " ने  सभी बेदाम दिये ।
 

 

जनवरी 20, 2013

POST : 287 खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खूबसूरत अदाओं पे आता है प्यार
महकी महकी फिज़ाओं पे आता है प्यार ।

उनका दामन हवाओं में उड़ने लगा है
हमको ऐसी हवाओं पे आता है प्यार ।

रात भर हम नहीं सो सके डर के मारे
उनको काली घटाओं पे आता है प्यार ।

वक़्त आने पे सब छोड़ जाते हैं साथ
यूं तो सारे खुदाओं पे आता है प्यार ।

उनको सिजदा करो, सर झुका के हज़ूर
ऐसे उनको दुआओं पे आता है प्यार ।

देख लो ये कहां पर है लाई हयात
अब हमें इन कज़ाओं पे आता है प्यार ।
 

 

POST : 286 अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं (ग़ज़ल ) 

                              डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब हर किसी को अपना बताने लगे हैं
लेकिन हमीं से नज़रें चुराने लगे हैं ।

अंदाज़ उनकी हर बात का अब नया है
लेकिन हमें मतलब समझ आने लगे हैं ।

जब से कहानी अपनी सुनाई किसी को
सारे ज़माने वाले सताने लगे हैं ।

हमने नहीं जाना अब किसी और घर में
बस आपके घर आए थे , जाने लगे हैं ।

बेदाग़ कोई आता नज़र अब नहीं है
सब आईना औरों को दिखाने लगे हैं ।

लिखवा लिया हमने बेवफा नाम ,जब से
"तनहा" हमें आकर आज़माने लगे है । 
 

 

POST : 285 आज सोचा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 आज सोचा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

न सोचा कभी
न समझा
न कभी जाना
है बाकी रहा
अब तक
खुद को ही
मुझे पाना ।

किसलिये जीता रहा
मैं किसलिये मरता रहा
खो गया जीवन कहीं
क्या उम्र भर करता रहा
डर है भला कैसा मुझे
किस बात से डरता रहा
दुनिया में अपना कौन है
तलाश क्या करता रहा  ।

खुद को नहीं समझा कभी
क्यों काम ये करता रहा
खड़ा रहा नदी किनारे
गागर को नहीं भरता रहा
जीने से करना प्यार था
पर नहीं करता रहा ।

अब तो सोच ले ज़रा
हर पल ही तू मरता रहा
दिया किसे दुनिया ने क्या
दुनिया की बातें दे भुला
चलना है खुद के साथ चल
बस साथ अब अपना निभा
खुद से कर कुछ प्यार अब
सब दर्द दिल के मिटा ।

ऐसे है जीना अब तुझे
रहे तेरा दामन भरा
कहता यही है वक़्त भी
न लौट कर फिर आयेगा
पाना हो जो पा ले अभी
सब कुछ तुझे मिल जाएगा । 
 

 

जनवरी 18, 2013

POST : 284 बात पूछो न हम अदीबों की ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बात पूछो न हम अदीबों की ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बात पूछो न हम अदीबों की
खाक उड़ जाएगी उमीदों की ।

क्यों सज़ा बेगुनाह पाते हैं
आह निकली कई सलीबों की ।

दौलतों से ख़ुशी नहीं मिलती 
बात झूठी नहीं फकीरों की ।
 
घर बनाएं कहीं पहाड़ों पर  
छांव मिलती जहां चिनारों की ।

याद अब तक बहुत सताती है
दिलरुबा की हसीं अदाओं की ।

बात मेरी कभी सुनो मुझ से
फिर सज़ा दो मुझे गुनाहों की ।

तुम जिसे ढूंढते रहे "तनहा" 
उड़ गई राख तक वफ़ाओं की । 
 

 

जनवरी 15, 2013

POST : 283 लब पे आई तो मुहब्बत आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

लब पे आई तो मुहब्बत आई
भूल कर भी न शिकायत आई ।

बात कुछ ऐसी चली महफ़िल में
फिर हमें याद वो मूरत आई ।

हम से बिछुड़ी जो अभी शाम ढले
रात भर याद वो सूरत आई ।

कश्ती लहरों के हवाले कर दी
बेबसी में जो ये नौबत आई ।

आसमां रंग बदल कर बोला
लो ज़मीं वालो कयामत आई । 
 
चाल कोई न कभी हम चलते 
काम लेकिन न शराफ़त आई । 
 
बन गए चोर सिपाही ' तनहा ' 
क्या ग़ज़ब की है सियासत आई ।  
 
 
 
 

 

जनवरी 13, 2013

POST : 282 आज खारों की बात याद आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

आज खारों की बात याद आई
जब बहारों की बात याद आई ।

प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक
ये किनारों की बात याद आई ।

आज जाने कहां वो खो गए हैं
जिन नज़ारों की बात याद आई ।

साथ मिलके दुआ थे मांगते हम
उन मज़ारों की बात याद आई ।

कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत
ग़म के मारों की बात याद आई ।

जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें
चांद तारों की बात याद आई ।

दूर रह कर भी पास पास होंगे
हमको यारों की बात याद आई ।

आज देखा वतन का हाल "तनहा"
उनके नारों की बात याद आई । 
 

 

POST : 281 किसी मेहरबां की इनायत के लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

किसी मेहरबां की इनायत के लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

किसी मेहरबां की इनायत के लिये 
हमें अब है जीना मुहब्बत के लिये ।

दिखाओ खुदा का हमें कोई निशां
चलें साथ मिलके इबादत के लिये ।

सुनाओ हमें आज अपना हाले-दिल
तेरे पास आए हैं उल्फत के लिये ।

नहीं मिल सका आज उनसे कुछ हमें
तराशे थे बुत जो अकीदत के लिये ।

नहीं पास कोई न कोई दूर है
यहां सब खड़े हैं तिजारत के लिये ।

किसी को नहीं पार करते नाखुदा
कहां आ गए लोग राहत के लिये ।

यहां क्या मिला है किसे कर के वफ़ा
कहां आ गए आप चाहत के लिये ।

नहीं काम कोई भी "तनहा" का यहां
जहां ये बना है सियासत के लिये ।   
 

 

POST : 280 वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

वो भी जीता रहा ज़िंदगी के बिना
हम भी जलते रहे रौशनी के बिना ।

उनसे हम बात करते भला और क्या
कुछ भी आता नहीं आशिकी के बिना ।

बात महफ़िल में होने लगी होश की
कुछ न आया मज़ा बेखुदी के बिना ।

जब कभी हम मिलें , उस हसीं रात में
आ भी जाना वहां , तुम घड़ी के बिना ।

एक दिन  सामने   दे दिखाई खुदा
यूं ही "तनहा" मगर बंदगी के बिना ।
 

 

जनवरी 10, 2013

POST : 279 रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रुलाता सब ज़माना है , हमें रोना नहीं आता
हमें अश्कों से अपने दर्द सब धोना नहीं आता ।

सिखा जाना कभी आकर दिलों को जीतते कैसे
हमें सब और है आता , यही टोना नहीं आता ।

बढ़ाते जा रहे हैं सब कतारें खुद गुनाहों की
न बांधो पाप की गठड़ी अगर ढोना नहीं आता ।

यहां पर आंधियां चलती बहुत ज़ालिम ज़माने की
तुम्हें लेकिन संभल कर खुद खड़े होना नहीं आता ।

सभी कांटे हमें देना , उन्हीं को फूल दे देना
ख़ुशी का बीज जीवन में , जिन्हें बोना नहीं आता ।

हमेशा मांगते रहते , मगर कैसे मिले कुछ भी
जिन्हें पाना तो आता है , मगर खोना नहीं आता ।

चले आये हैं महफ़िल में , बिताने रात इक अपनी
अकेले रात भर "तनहा" हमें सोना नहीं आता । 
 

 

जनवरी 09, 2013

POST : 278 क्या बताएं हम खुदा क्या है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

क्या बताएं हम खुदा क्या है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

क्या बताएं हम ख़ुदा क्या है
मिल न पाये गर खता क्या है ।

सुन लिया सारे ज़माने ने
अब छुपाने को बचा क्या है ।

है बहुत मुश्किल समझ पाना
हुस्न वालों की हया क्या है ।

सब लुटाया प्यार में लोगो
हम से अब पूछो वफ़ा क्या है ।

मर्ज़ बढ़ता जा रहा हर दिन
चारागर इसकी दवा क्या है ।

लग रहा सब कुछ यहां बदला
कुछ हुआ तो है , हुआ क्या है ।

साथ जीना साथ मर जाना
और "तनहा" इल्तिजा क्या है ।
 

 

जनवरी 08, 2013

POST : 277 इन अंधेरों को मिटाता कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इन अंधेरों को मिटाता कोई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

अब अंधेरों को मिटाता कोई 
इन चिरागों को जलाता कोई ।

राह से भटके मुसाफिर ठहरे
रास्ता किसको बताता कोई ।

कारवां कोई नज़र आ जाता
हमको मंज़िल से मिलाता कोई ।

शब गुज़र जाती जिसे सुन कर के
इक कहानी तो सुनाता कोई ।

की खता हमने , कभी तुमने की
अब गिले शिकवे भुलाता कोई ।

क्यों झुका आंखें वहां जाते हम
दाग़ अपने जो मिटाता कोई ।

मौत से "तनहा" कहां डरते हैं
ज़हर आकर खुद पिलाता कोई । 
 

 

POST : 276 खो गया जब कभी किनारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 खो गया जब कभी किनारा है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खो गया जब कभी किनारा है
नाखुदा को नहीं पुकारा है ।

इस जहां में सभी अकेले हैं
ज़िंदगी ने सभी को मारा है ।

फिर सुनाओ हमें ग़ज़ल अपनी
आपने कल जिसे संवारा है ।

कल तलक तो बड़ी मुहब्बत थी
आज क्यों कर लिया किनारा है ।

मुश्किलों से कभी न घबराना
कर रही हर सुबह इशारा है ।

उनसे कैसे ये हम कहें जाकर
बिन तुम्हारे नहीं गुज़ारा है ।

डर नहीं अब रकीब का "तनहा"
प्यार का जब मिला सहारा है । 
 

 

जनवरी 07, 2013

POST : 275 तुम सिखाते रहे दोस्ती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तुम सिखाते रहे दोस्ती ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

तुम सिखाते रहे दोस्ती
लोग बनते गए अजनबी ।

आज हमसे मिले आप जब
मिल गई तब हमें ज़िंदगी ।

आपने क्या ये जादू किया
लूट दिल ले गई सादगी ।

हाल ऐसा हमारा हुआ
दूर होकर हुए पास भी ।

हम मिलेंगे कभी तो कहीं
देखनी बस है दुनिया वही ।

तुम न होना कभी अब जुदा
हमसे वादा करो तुम यही ।

आ भी जाओ खुला दर मेरा
इक यही बात "तनहा" कही ।
 

 

जनवरी 06, 2013

POST : 274 सब के वादों का न एतबार करो (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब के वादों का न एतबार करो (ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सब के वादों का न एतबार करो
उनके आने का न इंतज़ार करो ।

कुछ नहीं मिलता यहां वफ़ा करके
तुम खता ऐसी न बार बार करो ।

उसने पूछा था बड़ी अदा से कभी
कह दिया हमने , हमें न प्यार करो ।

धड़कनों पर ही न इख्तियार रहे
इतना तो दिल को न बेकरार करो ।

भर के बाहों में उसे था चूम लिया
यूं तो ख़्वाबों को न गुनाहगार करो ।

बेवफा अहले जहां हुआ "तनहा"
तुम वफाएं अब न बार बार करो । 
 

 

POST : 273 हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हद से अब तो गुज़र गये हैं लोग
जाने क्यूँ सच से डर गये  हैं लोग ।

हमने ये भी तमाशा देखा है
पी के अमृत भी मर गये  हैं लोग ।

शहर लगता है आज वीराना
कौन जाने किधर गये  हैं लोग ।

फूल गुलशन में अब नहीं खिलते
ज़ुल्म कुछ ऐसा कर गये  हैं लोग ।

ये मरुस्थल की मृगतृष्णा है
पानी पीने जिधर गये हैं लोग । 
 

 

जनवरी 05, 2013

POST : 272 अपराधी महिला जगत के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

 अपराधी महिला जगत के ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

आप
हां आप भी
शामिल हैं
महिलाओं के विरुद्ध
बढ़ रहे अपराधों में
किसी न किसी तरह ।

आप जो
अपने
कारोबार के लिये 
प्रसाधनों के
प्रचार के लिये 
प्रदर्शित करते है
औरत को
बना कर
उपभोग की एक वस्तु ।
     
आपकी
ये विकृत मानसिकता
जाने कितने और लोगों को
करती है प्रभावित
एक बीमार सोच से ।

जब भी ऐसे लोग करते हैं
व्यभिचार
किसी बेबस अबला से
होते हैं आप भी
उसके ज़िम्मेदार ।

आपके टी वी सीरियल
फ़िल्में आपकी
जब समझते हैं 
औरतों के बदन को
मनोरंजन का माध्यम
पैसा बनाने
कामयाबी
हासिल करने के लिये 
लेते हैं सहारा बेहूदगी का
क्योंकि नहीं होती
आपके पास
अच्छी कहानी
और रचनात्मक सोच
समझ बैठे हैं फिल्म बनाने
सीरियल बनाने को
सिर्फ मुनाफा कमाने का कारोबार ।

क्या परोस रहें हैं 
अपने समाज को
नहीं आपको ज़रा भी सरोकार ।

आप हों अभिनेत्री
चाहे कोई माडल
कर रही हैं क्या आप भी
सोचा क्या कभी
थोड़ा सा धन कमाने को 
आप अपने को दिखा  रही हैं 
अर्धनग्न 
सभ्यता की सीमा को
पार करते हुए
आपको अपनी वेशभूषा
पसंद से
पहनने का पूरा हक है
मगर पर्दे पर
आप अकेली नहीं होती
आपके साथ सारी नारी जाति
का भी होता है सम्मान
जो बन सकता है अपमान
जब हर कोई देखता है
बुरी नज़र से
आपके नंगे बदन को
आपका धन या
अधिक धन
पाने का स्वार्थ
बन जाता है 
नारी जगत के लिए शर्म ।

ऐसे दृश्य कर सकते हैं 
लोगों की
मानसिकता को विकृत
समाज की
हर महिला के लिये ।

हद हो चुकी है
समाज के पतन की
चिंतन करें अब
कौन कौन है गुनहगार । 
 

 

जनवरी 04, 2013

POST : 271 खुद को कितना तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुद को कितना तबाह कर बैठे ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खुद को कितना तबाह कर बैठे
हम ये कैसा गुनाह कर बैठे ।

कर रही ज़िंदगी यही शिकवा
क्यों उसे हम फनाह कर बैठे ।

देखकर आपके सितम हम पर
आज दुश्मन भी आह कर बैठे ।

उनके आने से जम गई महफ़िल
उस तरफ सब निगाह कर बैठे ।

ग़ज़ल हमने उन्हें सुनाई थी
लोग सारे ही वाह कर बैठे ।

दे रहा हर किसी को धोखा जो
तुम उसी की हो चाह कर बैठे ।

राह चलता रहा वही "तनहा"
लोग सब और राह कर बैठे । 
 

          

दिसंबर 30, 2012

POST : 270 और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

और कुछ भी नहीं बंदगी हमारी
बस सलामत रहे दोस्ती हमारी ।

ग़म किसी के सभी हो गए हमारे
और उसकी ख़ुशी अब ख़ुशी हमारी ।

अब नहीं मांगना और कुछ खुदा से
झूमने लग गई ज़िंदगी हमारी ।

क्या पिलाया हमें आपकी नज़र ने
ख़त्म होती नहीं बेखुदी हमारी ।

याद रखनी हमें आज की घड़ी है
जब मुलाक़ात हुई आपकी हमारी ।

आपके बिन नहीं एक पल भी रहना
अब यही बन गई बेबसी हमारी ।

जाम किसने दिया भर के आज "तनहा"
और भी बढ़ गई तिश्नगी हमारी । 
 

 

POST : 269 नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

      नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं ( ग़ज़ल ) 

                          डॉ लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कभी रौशन नज़ारों की बात करते हैं
जो टूट जाते उन सितारों की बात करते हैं ।

हैं कर रही बरबादियां हर तरफ रक्स लेकिन
चलो खिज़ाओं से बहारों की बात करते हैं ।

वो लोग सच को झूठ साबित किया करें बेशक
जो रोज़ आ के हमसे नारों की बात करते हैं ।

वो जानते हैं हुस्न वालों की हर हकीकत को
उन्हीं के कुछ टूटे करारों की बात करते हैं ।

गुलों से करते थे कभी गुफ्तगू बहारों की
जो बागबां खुद आज खारों की बात करते हैं ।

हुआ हमारे साथ क्या है ,किसे बतायें अब
सभी तो नज़रों के इशारों की बात करते हैं ।

जिसे नहीं आया अभी तक ज़मीं पे चलना ही
वही ज़माने के सहारों की बात करते हैं ।

जो नाखुदा कश्ती को मझधार में डुबोते हैं
उन्हीं से "तनहा" क्यों किनारों की बात करते हैं ।
 

 

POST : 268 प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        प्यार की बात मुझसे वो करने लगा ( ग़ज़ल ) 

                          डॉ लोक सेतिया "तनहा"

प्यार की बात मुझसे वो करने लगा
दिल मेरा क्यों न जाने था डरने लगा ।

मिल के हमने बनाया था इक आशियां
है वही तिनका तिनका बिखरने लगा ।

दीनो-दुनिया को भूला वही प्यार में
जब किसी का मुकद्दर संवरने लगा ।

दर्दमंदों की सुन कर के चीखो पुकार
है फ़रिश्ता ज़मीं पे उतरने लगा ।

जो कफ़स छोड़ उड़ने को बेताब था
पर सय्याद उसी के कतरने लगा ।

था जो अपना वो बेगाना लगने लगा
जब मुखौटा था उसका उतरने लगा ।

उम्र भर साथ देने की खाई कसम
खुद ही "तनहा" मगर अब मुकरने लगा ।  
 

 

दिसंबर 29, 2012

POST : 267 बहाने अश्क जब बिसमिल आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहाने अश्क जब बिसमिल आये 
सभी कहने लगे पागल आये ।

हुई इंसाफ की बातें लेकिन
ले के खाली सभी आंचल आये ।

सभी के दर्द को अपना समझो
तुम्हारी आंख में भर जल आये ।

किसी की मौत का पसरा मातम
वहां सब लोग खुद चल चल आये ।

भला होती यहां बारिश कैसे
थे खुद प्यासे जो भी बादल आये ।

कहां सरकार के बहते आंसू
निभाने रस्म बस दो पल आये ।

संभल के पांव को रखना "तनहा"
कहीं सत्ता की जब दलदल आये । 
 

 

दिसंबर 28, 2012

POST : 266 हमको जीने के सब अधिकार दे दो ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

        हमको जीने के सब अधिकार दे दो ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको जीने के सब अधिकार दे दो
मरने की फिर सज़ा सौ बार दे दो ।

अब तक सारे ज़माने ने रुलाया
तुम हंसने के लिए दिन चार दे दो ।

पल भर जो दूर हमसे रह न पाता
पहले-सा आज इक दिलदार दे दो ।

बुझ जाये प्यास सारी आज अपनी
छलका कर जाम बस इक बार दे दो ।

पर्दों में छिप रहे हो किसलिये तुम
आकर खुद सामने दीदार दे दो ।

दुनिया ने दूर हमको कर दिया था
रहना फिर साथ है इकरार दे दो ।

दिल देने आज "तनहा" आ गया है
ले लो दिल और दिल उपहार दे दो । 
 

 

POST : 265 हमको मिली सौगात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 हमको मिली सौगात है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

हमको मिली सौगात है
अश्कों की जो बरसात है ।

होती कभी थी चांदनी
अब तो अंधेरी रात है ।

जब बोलती है खामोशी
होती तभी कुछ बात है ।

पीता रहे दिन भर ज़हर
इंसान क्या सुकरात है ।

होने लगी बदनाम अब
इंसानियत की जात है ।

रोते सभी लगती अगर
तकदीर की इक लात है ।

"तनहा" कभी जब खेलता
देता सभी को मात है ।
 

 

दिसंबर 27, 2012

POST : 264 जब हुई दर्द से जान पहचान है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 जब हुई दर्द से जान पहचान है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जब हुई दर्द से जान पहचान है
ज़िंदगी तब हुई कुछ तो आसान है ।

क़त्ल होने लगे धर्म के नाम पर
मुस्कुराने लगा देख हैवान है ।

कुछ हमारा नहीं पास बाकी रहा
दिल भी है आपका आपकी जान है ।

चार दिन ही रहेगी ये सारी चमक
लग रही जो सभी को बड़ी शान है ।

लोग अब ज़हर को कह रहे हैं दवा
मौत का ज़िंदगी आप सामान है ।

उम्र भर कारवां जो बनाता रहा
रह गया खुद अकेला वो इंसान है ।

हम हुए आपके, आके "तनहा" कहें
बस अधूरा यही एक अरमान है ।
 

  

दिसंबर 23, 2012

POST : 263 अलविदा पुरातन स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

अलविदा पुरातन , स्वागतम नव वर्ष ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया

अलविदा पुरातन वर्ष
ले जाओ साथ अपने
बीते वर्ष की सभी
कड़वी यादों को
छोड़ जाना पास हमारे
मधुर स्मृतियों के अनुभव ।

करना है अंत
तुम्हारे साथ
कटुता का देश समाज से
और करने हैं समाप्त 
सभी गिले शिकवे
अपनों बेगानों से
अपने संग ले जाना
स्वार्थ की प्रवृति को
तोड़ जाना जाति धर्म
ऊँच नीच की सब दीवारें ।
 
इंसानों को बांटने वाली
सकुंचित सोच को मिटाते जाना 
ताकि फिर कभी लौट कर
वापस न आ सकें ये कुरीतियां
तुम्हारी तरह
जाते हुए वर्ष
अलविदा ।

स्वागतम नूतन वर्ष 
आना और अपने साथ लाना
समाज के उत्थान को
जन जन के कल्याण को
स्वदेश के स्वाभिमान को
आकर सिखलाना सबक हमें
प्यार का भाईचारे का
सत्य की डगर पर चलकर
सब साथ दें हर बेसहारे का
जान लें भेद हम लोग
खरे और खोटे का
नव वर्ष
मिटा देना आकर
अंतर
तुम बड़े और छोटे का ।
 

  

दिसंबर 22, 2012

POST : 262 रुक नहीं सकता जिसे बहना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

रुक नहीं सकता जिसे बहना है
एक दरिया का यही कहना है ।

मान बैठे लोग क्यों कमज़ोरी
लाज औरत का रहा गहना है ।

क्या यही दस्तूर दुनिया का है
पास होना दूर कुछ रहना है ।

बांट कर खुशियां ज़माने भर को
ग़म को अपने आप ही सहना है ।

बिन मुखौटे अब नहीं रह सकते
कल उतारा आज फिर पहना है ।

साथ दोनों रात दिन रहते हैं
क्या गरीबी भूख की बहना है ।

ज़िंदगी "तनहा" बुलाता तुझको
आज इक दीवार को ढहना है । 
 

 

POST : 261 उसको न करना परेशान ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" ( REPEAT : 539 )

 उसको न करना परेशान ज़िंदगी ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

उसको न करना परेशान ज़िंदगी
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी ।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी ।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब वहां
जायें किधर लोग नादान ज़िंदगी ।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी ।

होती रही बात ईमान की मगर
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी ।

सब ज़हर पीने लगे जान बूझ कर
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी ।

शिकवा गिला और "तनहा" न कर अभी
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी ।
 

 

दिसंबर 21, 2012

POST : 260 गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

गए भूल हम ज़िन्दगानी की बातें
सुनाते रहे बस कहानी की बातें ।

तराशा जिन्हें हाथ से खुद हमीं ने
हमें पूछते अब निशानी की बातें ।

गये डूब जब लोग गहराईयों में
तभी जान पाये रवानी की बातें ।

रही याद उनको मुहब्बत हमारी
नहीं भूल पाये जवानी की बातें ।

हमें याद सावन की आने लगी है
चलीं आज ज़ुल्फों के पानी की बातें ।

गये भूल देखो सभी लोग उसको
कभी लोग करते थे नानी की बातें ।

किसी से भी "तनहा" कभी तुम न करना
कहीं भूल से बदगुमानी की बातें । 
 

 

POST: 259 शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

         शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है ( ग़ज़ल ) 

                         डॉ लोक सेतिया "तनहा"

शिकवा नहीं है न कोई शिकायत है
उनसे मिला दर्द लगता इनायत है ।

जीने ही देते न मरने ही देते हैं
ये इश्क वालों की कैसी रिवायत है ।

करना अगर प्यार ,कर के निभाना तुम
देता सभी को वो , इतनी हिदायत है ।

बस आखिरी जाम भर कर अभी पी लें
उसने हमें आज दे दी रियायत है ।

जिनको हमेशा ही तुम लूटते रहते
उनसे ही जाकर के मांगी हिमायत है ।

आगाज़ देखा न अंजाम को जाना
"तनहा" यही तो सभी की हिकायत है । 
 

 

दिसंबर 19, 2012

POST : 258 जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर
हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर ।

यही काम करता रहा है ज़माना
किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर ।

गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से 
नये फूल आने लगे फिर वहीं पर ।

वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है
बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर ।

किसी ने लगाया है काला जो टीका
लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर ।

भरोसे का मतलब नहीं जानते जो
सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर ।

रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा"
मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर । 
 

 

दिसंबर 14, 2012

POST : 257 दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को चुन लिया ज़िंदगी के लिये 
और क्या चाहिये शायरी के लिये ।

उसके आंसू बहे , ज़ख्म जिसको मिले
कौन रोता भला अब किसी के लिये ।

जी न पाये मगर लोग जीते रहे
सोचते बस रहे ख़ुदकुशी के लिये ।

शहर में आ गये गांव को छोड़ कर
अब नहीं रास्ता वापसी के लिये ।

इस ज़माने से मांगी कभी जब ख़ुशी
ग़म हज़ारों दिये इक ख़ुशी के लिये ।

तब बताना हमें तुम इबादत है क्या
मिल गया जब खुदा बंदगी के लिये ।

आप अपने लिए जो न "तनहा" किया
आज वो कर दिया अजनबी के लिये । 
 

    

दिसंबर 06, 2012

POST : 256 सिलसिला हादिसा हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

  सिलसिला हादिसा हो गया ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

सिलसिला हादिसा हो गया
झूठ सच से बड़ा हो गया ।

कश्तियां डूबने लग गई
नाखुदाओ ये क्या हो गया ।

सच था पूछा , बताया उसे
किसलिये फिर खफ़ा हो गया ।

साथ रहने की खा कर कसम
यार फिर से जुदा हो गया ।

राज़ खुलने लगे जब कई
ज़ख्म फिर इक नया हो गया ।

हाल अपना   , बतायें किसे
जो हुआ , बस हुआ , हो गया ।

देख हैरान ' तनहा ' हुआ
एक पत्थर खुदा हो गया ।
 

 

POST : 255 दर्द को गुज़रे ज़माने हैं बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

 दर्द को गुज़रे ज़माने हैं बहुत ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

दर्द को गुज़रे ज़माने हैं बहुत
बेमुरव्वत दोस्ताने हैं बहुत ।

हो गये दो जिस्म यूं तो एक जां
फासले अब भी मिटाने हैं बहुत ।

दब गये ज़ख्मों की सौगातों से हम
और भी अहसां उठाने हैं बहुत ।

मिल न पाए ज़िंदगी के काफ़िये
शेर लिख - लिख कर मिटाने हैं बहुत ।

हादिसे हैं फिर वही चारों तरफ 
हां , मगर किस्से पुराने हैं बहुत । 
 
हम खिज़ाओं का गिला करते नहीं 
फूल गुलशन में खिलाने हैं बहुत । 
 
कह रहे , हमको बुलाओ तो सही 
पर , न आने को बहाने हैं बहुत । 
 
ज़िंदगी ठहरी नहीं अपनी कहीं 
बेठिकानों के , ठिकाने हैं बहुत । 
 
वक़्त की रफ़्तार से "तनहा" चलो 
फिर , सभी मौसम सुहाने हैं बहुत। 

अब आप मेरी यही ग़ज़ल मेरे यूट्यूब चैनल अंदाज़-ए -ग़ज़ल पर भी सुनकर आनंद ले सकते हैं।