हमें रोज़ जीना , हमें रोज़ मरना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
हमें रोज़ जीना , हमें रोज़ मरनासियासत करेगी उसे जो भी करना ।
कई लोग डर - डर के ज़िंदा हैं रहते
हमें पर नहीं हुक्मरानों से डरना ।
हैं जो लोग झूठे नहीं सच समझते
कहोगे अगर सच है उनको अखरना ।
किनारे भी खुद पास आने लगेंगे
अगर सीख लोगे भंवर में उतरना।
कई लोग डर - डर के ज़िंदा हैं रहते
हमें पर नहीं हुक्मरानों से डरना ।
हैं जो लोग झूठे नहीं सच समझते
कहोगे अगर सच है उनको अखरना ।
किनारे भी खुद पास आने लगेंगे
अगर सीख लोगे भंवर में उतरना।
कभी प्यास सत्ता की बुझती नहीं है
हमारे लहू से उन्हें जाम भरना ।
लुभाने लगी सबको उनकी अदाएं
उन्हें खूब आता है सजना संवरना ।
बड़ी बेरहम राजधानी है ' तनहा '
अमीरों की नगरी में मत तुम ठहरना ।
लुभाने लगी सबको उनकी अदाएं
उन्हें खूब आता है सजना संवरना ।
बड़ी बेरहम राजधानी है ' तनहा '
अमीरों की नगरी में मत तुम ठहरना ।

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