Tuesday, 30 March 2021

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

       अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया " तनहा " 

अजनबी लोगों में मुझको मेहरबां की तलाश है 
प्यार की दौलत हो जिस में उस जहां की तलाश है। 
 
छोड़ गलियां गांव की जो आ गया शहर भूल से 
खो गया है भीड़ में उस बदगुमां की तलाश है। 
 
दोस्तों को नाम लेकर कब बुलाते हैं दोस्त भी 
आईने जैसे किसी इक हमज़ुबां की तलाश है। 
 
कुछ मुसाफ़िर हैं जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं 
और ऐसे लोग भी जिनको मकां की तलाश है। 
 
मौसमों से मिट गए हैं काफ़िलों के निशान तक 
पर सभी को आज तक उस कारवां की तलाश है। 
 
पूछती सब से सड़क की लाश बस ये सवाल है 
क़त्ल होना था हुआ क्योंकर निशां की तलाश है। 
 
गुफ़्तगू आवाम से करनी है "तनहा" निज़ाम ने 
दाद दे  हर बात पर उस बेज़ुबां की तलाश है।
 
 
 
 
 

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