Thursday, 15 October 2020

खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया

     खुद को आईने में देखना ( आत्म-अवलोकन ) डॉ लोक सेतिया 

  लोग अपनी पुस्तक के पहले पन्ने पर अपने बारे में लेखन और किताब की बात कहते हैं। मुझे लिखते हुए चालीस साल और अख़बार मैगज़ीन में रचनाएं छपते तीस साल से अधिक समय हो चुका है। ब्लॉग पर ये 1390 वीं पोस्ट है दस साल से नियमित लिख रहा हूं और 199600 संख्या आज तक सभी पोस्ट की पढ़ने वालों की है। किताब छपवाने की हसरत है और काफी रचनाओं का चयन ग़ज़ल , कविता-नज़्म , व्यंग्य , कहानी , हास-परिहास की रचनाओं पांच हिस्सों में किया गया है जो इसी ब्लॉग पर लेबल से समझ सकते हैं। डायरी पर रचनाओं की फ़ाइल में दो पन्नों पर अपने लेखन को लेकर लिखा हुआ है जिसे किसी लेखक दोस्त की कैसे होते हैं साहित्यकार नाम की किताब में और कुछ अन्य साहित्य संबंधी मैगज़ीन में भी छापा गया है। शायद समय है कि ब्लॉग के पाठक वर्ग को भी अपना परिचय लेखक के बारे दिया जाना उचित है। 
 
     मेरा जन्म ऐसे परिवार में हुआ जिस में साहित्य या शिक्षा का कोई महत्व नहीं था। गांव के थोड़े पढ़े लिखे और किसान खेतीबाड़ी ठेकेदारी करने वाले बड़े बज़ुर्ग धार्मिक माहौल माता जी सादगी की मिसाल और भजन गाने में रूचि का तथा दादाजी का भगवद कथा अदि सुनने का असर शायद मुझे इस तरफ लाने की शुरुआत थी। पढ़ाई विज्ञान की फिर डॉक्टर बनने की शिक्षा का साहित्य से कोई तालमेल नहीं था। सच कहना है तो मुझे संगीत और गाने का बहुत चाव था जिसे परिवार में खासकर पिता जी पसंद नहीं करते थे उनको ये गाना बजाना मिरासी लोगों की बात लगती थी। 
 
   लिखना डायरी से शुरू किया अपने मन की बात किसी से कहना नहीं आता था खुद अपनी बात अपने साथ करना आदत बन गया। जैसे कोई डरकर चोरी छुपे इक अपराध करता है मैंने अपना लेखन इसी ढंग से किया है मुझे हतोत्साहित करने वाले तमाम लोग थे बढ़ावा देने पीठ थपथपाने वाला कोई भी नहीं। इसलिए मुझे सभी पढ़ने वालों से ये कहना ज़रूरी लगता है कि पढ़ते हुए इस अंतर को अवश्य ध्यान रखना। आपको शायद ये फर्क इस तरह समझ आ सकता है। जैसे कोई इक पौधा किसी रेगिस्तान में उग जाता है जिसे राह चलते कदम कुचलते रहते हैं आंधी तूफान झेलता है कोई जानवर उखाड़ता है खाता है मिटाता है मगर फिर बार बार वो पौधा पनपने लगता है। कुछ लोग जिनको साहित्यिक माहौल और मार्गदर्शन मिलता है बढ़ावा देते हैं जिनको उनके आस पास के लोग , वे ऐसे पौधे होते हैं जिनको कोई माली सींचता है खाद पानी देता है उसकी सुरक्षा को बाड़ लगाता है ऊंचा फलदार पेड़ बन जाते हैं। मेरा बौनापन और उनका ऊंचा कद दोनों को मिले माहौल से है इसलिए मेरी तुलना उनसे नहीं करना। 
 
    मैंने साहित्य पढ़ा भी बहुत कम है कुछ किताबें गिनती की और नियमित कई साल तक हिंदी के अख़बार के संपादकीय पन्ने और कुछ मैगज़ीन पढ़ने से समझा है अधिकांश खुद ज़िंदगी की किताब से पढ़ा समझा है। केवल ग़ज़ल के बारे खतोकिताबत से इसलाह मिली है कोई दो साल तक आर पी महरिष जी से। ग़ज़ल से इश्क़ है व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और आडंबर की बातों से चिंतन मनन के कारण लिखने पड़े हैं। कहानियां ज़िंदगी की सच्चाई है और कविताएं मन की गहराई की भावना को अभिव्यक्त करने का माध्यम। लिखना मेरे लिए ज़िंदा रहने को सांस लेने जैसा है बिना लिखे जीना संभव ही नहीं है। लिखना मेरा जूनून है मेरी ज़रूरत भी है और मैंने इसको ईबादत की तरह समझा है।

1 comment:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर आत्मावलोकन।