Tuesday, 1 September 2020

मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           मैं गोरा तू काला ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

      रंग गोरा होना चाहिए फिर चाहे नज़र नहीं लग जाये उस से बचने को कालिख का टीका लगवाना पड़ जाये। ये सिर्फ महिलाओं की चिंता नहीं है पुरुष भी सब से आकर्षक दिखाई देने को क्या नहीं करते हैं। ये जो गोरा और काला होने का सवाल है ये शक़्ल सूरत पर नहीं हर जगह मुंह उठाये खड़ा रहता है। अगर ऐसा नहीं होता तो काला धन बिना बात बदनाम नहीं होता उसको किसी और बैंक ने जारी नहीं किया हुआ है। विदेशी बैंक में जमा होने से बदरंग नहीं हो गया जो फिर लौट कर राजनीतिक दल को मिलते ही खुशरंग हो जाता है। काले गोरे का भेद भाव आखिर कब तक ये समस्या उनकी खड़ी की हुई है जिनको अपने चेहरे के दाग़ छुपाने को बाकी सभी पर कालिख पोतनी पड़ती है। उनका ढंग यही है खुद को ऊंचा साबित करने को औरों को बदनाम कर कर छोटा साबित कर दो। सभी को देश के दुश्मन कहने से आपकी देशभक्ति का सबूत मिल जाता है। किसी कवि की हास्य कविता सुनकर समझ कर कोई विश्व का सबसे बड़ा निंदक बन गया है उसने निंदा करने को छोड़ कोई और काम नहीं किया है और उस से तमाम लोगों की निंदा सुनकर देशवासी उस के अनुयाई बन गए हैं। पहले जो सरकार की आलोचना करते थे उसकी कमियां निकालते थे आजकल सरकार को तमाम गलतियों नाकामियों और अनुचित बातों को छुपाने से लेकर अच्छा बताकर गुणगान करने का काम करने लगे हैं। खुद उनकी इस बात को लेकर निंदा हो रही है मगर उनको अपनी निंदा की चिंता नहीं है ये निंदा भी उनको भाने लगी है पैसा विज्ञापन टीआरपी लुभाने लगी है। उनके मनोरंजन से दुनिया उकताने लगी है भोर होते ही उबासी आने लगी है उनकी नग्नता देख कर देखने वालों को शर्म आने लगी है। कोई महिला दिलकश अदाएं दिखलाने लगी है ज़ुल्फ़ों को लहराने लगी है मस्ती ही मस्ती छाने लगी है झूठ को सच बनाकर सुंदरी इतराने लगी है। 

       काले और गोरे रंग की जोड़ी दुनिया की सबसे अच्छी जोड़ी है। बिना एक के दूजे की पहचान नहीं बचती है काली साड़ी गोरी पर क्या जचती है माना हम भी काले हैं लेकिन हम दिलवाले हैं ये कहते सभी मतवाले हैं गोरी हम तेरे रखवाले हैं। ख़िज़ाब बालों पर लगाते थे काला बनाते थे आजकल जितने गुलाब वाले हैं लगते जैसे हैं सब कमाल रंगने का है भीतर से काले थे काले हैं। आपने देखा है बड़े लोगों को पहन कर काला लिबास नज़र आते हैं अपने बेडौल जिस्म को रंग काले से छिपाते हैं काले रंग को नाहक बदनाम किया है सच कहो कोई सफेद काम किया है। निंदा करने का मज़ा क्या है या इलाही ये माजरा क्या है। उसने सबसे बड़ा निंदक होने का ख़िताब पाया है महिलाओं को कितना देखो भाया है। ख़िज़ाब अपने बालों पर नहीं लगाया है दुश्मनों को कालिख़ लगाने का हुनर आज़माया है उसकी सजधज बड़ी निराली है अच्छी लगती है उसकी गाली है। हर कोई बनकर खड़ा सवाली है सबकी झोली भरनी थी किया था वादा अभी तक मगर खाली खाली है। कौन असली है कौन जाली है बात सच्ची है पर निराली है दाल में काला नहीं है उसकी पूरी की पूरी दाल ही काली है।

  सात रंग की जो कहानी थी वो कहानी बहुत पुरानी थी उसने लिखी ऐसी कहानी है जिस में प्यास ही प्यास है नहीं चुल्लू भर भी पानी है। याद आने लगी सबको अपनी नानी है कौन राजा है कौन राजा जानी है कहते हैं देश की जनता बड़ी भोली है मगर फिर भी बड़ी स्यानी है। बस  वही इक देने वाला है बाक़ी लोग तो भिखारी हैं चतुर सुजान है कोई हम क्या हैं निरे अनाड़ी हैं। अपना था जो भी लुटवा बैठे हैं रहबर कैसा बना बैठे हैं रंग इतने बदलते बदलते अपने चेहरे भुला बैठे हैं। अब कोई रास्ता नहीं मिलता है भटकने लगे हैं ऐसे जंगल में सभी ये वीराना कभी गुलशन था फूल सतरंगे खिलते थे कभी। अब  सभी इक उसी के रंग में रंगे हैं ये हम्माम हैं सभी नंगे हैं जो ख़राब हैं बस वही चंगे हैं।


     


3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब

Dr. Lok Setia said...

धन्यवाद मित्र आपका कॉमेंट आपके उत्साह वर्धन करते हैं ।।

Sanjaytanha said...

Bahut bdhiya...Kaale gore se to america tk jujh rha h...