Friday, 21 August 2020

क्या इसी को जीना कहते हैं ( चिंतन मनन ) डॉ लोक सेतिया

  क्या इसी को जीना कहते हैं ( चिंतन मनन ) डॉ लोक सेतिया 

     जीने की हसरत ही दिल में रह जाती है दुनिया ने पहले से तय किया हुआ है आपको कब कब क्या क्या कैसे कैसे करना है। जन्म लेने से पहले और मरने के बाद तक भी उनके नियम पालन करने होते हैं अन्यथा जीते जी ज़िंदगी और मौत के बाद आपकी मिट्टी तक को बख़्शते नहीं लोग। क्या नहीं करना क्यों नहीं करना जैसे सवाल हैं मगर सवाल करने का अधिकार नहीं है क्योंकि सवाल हैं जवाब हैं ही नहीं। जैसे कोई सरकार नियम बनाती है लेकिन क्यों बनाये खुद उसको नहीं पता होता बस उसको शासन चलाना है तो नियम बनाना कानून लागू करना उसका हक है। ठीक इसी तरह लोग दोस्त माता पिता नाते रिश्तेदार पत्नी पति बच्चे सभी आपको नसीहत देते हैं ऐसे अच्छा है ऐसे अच्छा नहीं है। सोना जागना उठना बैठना चलना फिरना खाना पीना और कब कब क्या करना सब उनकी सुविधा है आपकी मर्ज़ी या ज़रूरत कोई मायने नहीं रखती। पल पल रात दिन बंधन ही बंधन हैं आपको ज़िंदा रहना है जीना नहीं है। और तो और धर्म वालों ने आपको बंदी बना लिया है भगवान से आदमी का रिश्ता क्या है ये भी भगवान इंसान की आपस की बात नहीं उनकी इच्छा से है भगवान के पास पूजा अर्चना बंदगी से दुआ और शिकायत हर बात में बीच में खड़े हैं कुछ लोग आपको भयभीत करते हुए अपने ही विधाता अपने ख़ुदा ईश्वर से। भगवान ने उन्हीं को ऐसा करने का आदेश क्यों दिया जब खुद वो हर किसी को आदेश दे सकता है उसकी मर्ज़ी बिना पत्ता भी नहीं हिलता तो उसे किसी सहायक की ज़रूरत क्या थी। 

   भैतिक वस्तुओं में ऐशो आराम में सुख सुविधा के साधन में वास्तविक ख़ुशी मिलती नहीं चैन नहीं मिलता चाहे जितना जोड़ते जाओ और जिस में शांति मिले उस मार्ग पर आपको कोई नहीं जाने देता है। दुनिया के रास्ते से अलग कोई राह चलने लगे तो हंगामा खड़ा कर देते हैं आपको हज़ार इल्ज़ाम सहने पड़ते हैं नास्तिक पागल दीवाना घोषित किया जाता है। आपकी दशा ऐसी है जैसे आप घोड़े पर सवार हैं फिर भी आपके सर पर भारी बोझ की गठड़ी रहती है मूर्खताओं को समझदारी का नाम देती है ये दुनिया। इधर सोशल मीडिया पर हर कोई उपदेशक बनकर दोस्ती रिश्ते और जाने क्या क्या संदेश भेजकर आपको रोज़ इक दुविधा में डालने की बात करता है। कभी खुद को कटघरे में खड़ा पाते हैं कभी सब ज़माने वाले आपको मुजरिम नज़र आते हैं। आओ मिलकर समझते हैं समझाते हैं अपने सर से बोझ की गठड़ी हटाते हैं। ज़िंदगी का गीत अपने खुद के स्वर में गाते हैं छोड़ सब पुरानी कहानियों को नई कथा बनाते हैं। दुनिया में हम सभी आते हैं जीवन बिताते हैं चले जाते हैं शायद जीना चाहते हैं जी नहीं पाते हैं।

   जन्म कोई माता पिता की मर्ज़ी से नहीं होता है ईश्वर है कुदरत है या जो भी चलन है कहीं कोई और है जो निर्णय करता है। आपको लगता है किसी परिवार में जन्म खुशनसीबी या बदनसीबी होता है तो सही नहीं है क्योंकि जो उसकी मर्ज़ी है वही सबसे अच्छा है। विधाता ने जन्म देते समय कोई भी विधि अपने विधान की बताई नहीं है आपको क्या करना है कैसे करना है सब खुद जन्म लेने वाले पर छोड़ा है। हर किसी को सोचने समझने और अच्छाई बुराई समझने को दिल दिमाग़ और सब करने को तन बदन मन और विवेक एक समान दिया है। क्यों कोई माता पिता संतान को अपनी सोच अपनी मर्ज़ी खुदगर्ज़ी से बनाना चाहता है। और बड़े होकर किसलिए संतान अपने माता पिता से गिला शिकवा रखती है जो चाहते बच्चे उनको नहीं मिला। उनको जो उचित लगा उन्होंने किया आपको जो उचित लगता है करना चाहिए कोई किसी पर एहसान नहीं करता है कोई बोझ नहीं कोई वरदान नहीं है इक सामाजिक तानाबाना है जिसको और अच्छा बनाना है ख़ुशी से मन से मज़बूरी से कदापि नहीं। हर कोई क्यों किसी को बदलना चाहता है जो जैसा है उसे खुद निर्णय करने दो उसको खुद को अच्छा इंसान अच्छा पिता माता या संतान अथवा पति या पत्नी किस तरह बनना है।

    कुदरत ने किसी को शासक नहीं बनाया न किसी को गुलाम और कोई भी बड़ा छोटा नहीं है हर कोई अपनी तरह से समझदार है काबिल है। नासमझ वो हैं जिनको बाकी लोग पसंद नहीं आते खराब लगते हैं क्योंकि हम सभी को जिस किसी ने बनाया है जैसा बनाया ठीक बनाया है। वास्तव में दुनिया को बर्बाद उन्हीं लोगों ने किया है जो चाहते हैं दुनिया जैसी उनको अच्छी लगती है वैसी बन जाये। कुदरत और ईश्वर ने दुनिया को रंगीन बनाया है कोई क्यों उसको अपनी मर्ज़ी के किसी रंग में रंगना चाहता है। हम क्या हवा पानी मिट्टी पेड़ पौधों को बदलना चाहते हैं पक्षी जानवर सभी अपनी अपनी तरह के हैं कोई किसी को बदलने की कोशिश नहीं करता है। आदमी खुद को सबसे समझदार मानता है और चाहता है हर चीज़ को बदलना लेकिन बदलने का ढंग निर्माण का हो सकता है विनाश का नहीं होना चाहिए। खुद को सबसे अच्छा महान ताकतवर या रईस बनाने की कोशिश ने दुनिया को अशांत और असुरक्षित बनाने का काम किया है। जब आप मौत का सामान इकट्ठा करते हैं तब जीने की बात कैसे हो सकती है।

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