Saturday, 18 January 2020

विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया

  विचारहीन शिक्षित लोग ( आंखों वाले अंधे ) डॉ लोक सेतिया 

             बस इसी इक बात से समझ लो सच क्या है , आप भगवान का गुणगान अल्लाह की इबादत वाहेगुरु या जीसस की महानता को भले किसी भी कथा कहानी आरती अदि से कहते हैं कोई आपसे सवाल नहीं करेगा कि जो अपने कहा लिखा दावा किया मुमकिन है भी या केवल कपोल कल्पना है विश्वास दिलाने को। मगर जैसे ही आप किसी बात को लेकर सवाल खड़े करते हैं कि ये सही नहीं हो सकता है या फिर जो भी कथा कहानी में बताया उचित नहीं कहला सकता आप कटघरे में खड़े कर दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों ने भगवान अल्लाह जीसस वाहेगुरु को जानने समझने की बात नहीं की केवल आंखें बंद कर अंधविश्वास किया है। अन्यथा ऊपर वाले को जो सबसे शक्तिशाली है ऐसे लोगों के सहारे की बचाव को ज़रूरत नहीं हो सकती है। 

     कुछ ऐसा ही इस समय किसी नेता या दल की सरकार के समर्थक कर रहे हैं। उनकी किसी बात की भी आलोचना को सहन नहीं करते और विरोध करने वाले को कटघरे में खड़े करने लगते हैं। उनको देश की गरीबी भूख बेरोज़गारी और अर्थव्यवस्था की बदहाली से सामाजिक सदभाव की चिंता नहीं है चिंता है किसी नेता की खुद को सबसे महान कहलाने की चाह की। हज़ार झूठ ऐसे लोगों को सच लगते हैं और देश के संविधान की भावना या जनता के जनमत की उपेक्षा को अनदेखा करना उनको आपत्तिजनक नहीं लगता है। आप इनकी तुलना उस व्यक्ति से कर सकते हैं जो उसी शाख को काट रहा होता है जिस पर बैठा हुआ है।  मगर ये उच्च शिक्षा हासिल कर विलासितापूर्ण जीवन जीते लोग सोशल मीडिया और एकतरफा शोर से इकतरफ़ा जानकारी लिए गांधी नहरू को दोष देते हैं। उनको लगता है जो लोग आजकल सत्ता पर हैं वही देशभक्त हैं और उनसे पहले सभी देश को लूटते रहे। उनको विश्वास ही नहीं है कि जिस नेहरू को लेकर अपशब्द उपयोग करते हैं उन्होंने अपनी जवानी के 3259 दिन नौ बार विदेशी शासकों के ख़िलाफ़ आंदोलन करते हुए जेल में बिताये हैं इतना ही नहीं ये भी नहीं मानते कि उनके पिता एक धनवान वकील थे जो अपने बेटे को विलायत में पढ़ाई करवा रहे थे जिनको ये तथाकथित आधुनिक पढ़े लिखे सड़क छाप कोई गरीब का बेटा समझते हैं। खुद ये लोग देश समाज की खातिर कुछ करने की बात पर जवाब देते हैं इस के लिए तमाम अन्य लोग हैं। मगर जिनको ये देशभक्त मानते हैं उनके संगठन के लोग आज़ादी से पहले विदेशी शासकों के लिए सूचना देने का काम किया करते थे। इतिहास में दर्ज है उनके माफ़ीनामे भी और ये भी कि उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई भी योगदान नहीं था।

   इक बात और है जो ये आज के शासक नेहरू और पटेल को लेकर कहते हैं उनको शायद पता नहीं है कि उन्हीं पटेल जी ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था और उस संगठन को लेकर क्या कहा था। सबसे अजीब बात ये है कि इनको ये भी नहीं मालूम कि नेहरू जी अटल जी के बारे क्या राय रखते थे और लोहिया से लेकर तमाम विपक्षी दल के लोग क्या कहते थे। कैसे नेहरू विपक्षी नेताओं का आदर ही नहीं देते थे बल्कि उनको संसद में देखने को कोशिश करने की खातिर अपने विरुद्ध चुनाव हारने के बाद अपने दल के किसी सांसद से जगह खाली करवाते थे। नेहरू जी के निधन पर अटल जी का संसद में भाषण इन को समझ नहीं आएगा क्योंकि इनको मानवीय संवेदनाओं से मतलब नहीं है। क्या आपको पता है अटल बिहारी बाजपेयी ने खुद स्वीकार किया था कि युवा अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी हकूमत को सूचना दी थी उन देशभक्त आज़ादी के आंदोलन करने वालों के बारे में। क्योंकि तब उनको ये समझ नहीं थी कि सरकार के विरुद्ध आंदोलन करना अपराध नहीं देशभक्ति था।

                                 नहरू का पहला चुनाव अभियान

       जब उन्हें पता चला कि उनके बाद समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण पंजाब का दौरा करने वाले हैं , तो उन्होंने श्रोताओं से कहा , मैं आपको सलाह दूंगा कि आप जाकर उन्हें सुने। कई चीज़ों में मैं शायद उनसे सहमत न हूंगा। लेकिन वह एक शानदार व्यक्ति हैं। आज कोई कल्पना कर सकता है आज के सत्ताधारी नेता से ऐसी सलाह जनता को देने की बात संभव है।

       कितने लोग जेपी के आंदोलन के बारे जानते हैं शायद ये आधुनिक सोशल मीडिया से शिक्षित लोग तो नहीं। लोकतंत्र में विरोध करना नागरिक का अधिकार है ये बात अभी कल ही दिल्ली की तीस हज़ारी अदालत की इक न्यायधीश ने कही है पुलिस के तौर तरीके पर कटाक्ष करते हुए। जीपी ने भी 25 जून 1975 को भाषण में यही बात कही थी जिस सभा में उस दिन मैं भी शामिल था सुनने वालों में। अपनी क्लिनिक बंद कर रामलीला मैदान आया हुआ था। उन्होंने कहा था पुलिस जनता की सुरक्षा को है और सुरक्षबलों को संविधान की भावना का आदर करना है और शांतिपूर्वक धरना प्रदर्शन करने पर कोई लाठीचार्ज या गोली चलाने का आदेश नहीं मानना चाहिए। जो बात उस समय इंदिरा सरकार के वक़्त कही थी जो लोग उस आंदोलन में शामिल थे और बाद में सत्ता पर रहे आपात्काल के बाद अब खुद उनकी तरह नहीं उनसे भी अधिक निरंकुश लग रहे हैं।  

  लोग आज गुमराह हैं किसी के नफरत के प्रचार से सोशल मीडिया की बातों से। समय के साथ बहुत चीज़ें बदल जाती हैं सालों बाद आपको भविष्य की तरफ कदम बढ़ाना चाहिए न कि इतिहास की बीती बातों को लेकर बहस में उलझना चाहिए। कश्मीर को लेकर तब क्या क्यों किया ये चर्चा करना उसी तरह बेकार है जैसे अयोध्या में संविधान कानून को दरकिनार कर राम मंदिर बनवाने के नाम पर ढांचा गिराना ताकि अपनी राजनीति को सत्ता पाने की सीढ़ी बनाया जा सके। अभी आपको समझ नहीं आया उन लोगों को धर्म नहीं अपनी राजनीति से मकसद है। क्या आज सत्ताधारी नेताओं को देश की जनता से अपने कार्यों की बात करनी चाहिए या फिर वास्तविक समस्याओं को भूलकर अन्य विषयों में उलझाने का काम करना चाहिए। अच्छे दिन नहीं हैं गरीबी भूख और बेरोज़गारी की हालत और बिगड़ी है देश में आपसी भाईचारा और सदभावना को खतरा लगने लगा है। 1964 और 2014 के बीच पचास साल बहुत पानी गंगा जमुना में बहा है मगर कुछ लोगों को पचास साल पहले देश के सत्ताधारी नेता को दोष देने से फुर्सत नहीं है जबकि उनको विचार करना चाहिए कि इस नेता ने पांच साल से अधिक समय में देश को क्या दिया है , क्या नेहरू जी के शासन के 17 साल का तीसरा भाग क्या दसवां हिस्सा भी देश को आगे बढ़ाया है। जी नहीं मोदी जी की तुलना नेहरू जी से कभी नहीं की जा सकती क्योंकि अपने निधन के पचास साल बाद भी नहरू जी जो हैं शायद कोई और नहीं रह सकेगा।

                       

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