Thursday, 16 January 2020

जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 जुर्म ए बग़ावत सज़ा ए अदावत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   ये गुनाह तो मुझसे भी हुआ है शायद , उन्होंने संदेश भेजा कभी इन सभी का कोई वीडियो बड़े सरकार की तारीफ़ का भी देखा सुना है। कितनी ज़िंदगी बिता दी मैंने भी हर सरकार की आलोचना करते हुए , ये हसरत ही रही कोई तो सरकार नेता हो जिनकी जी भर तारीफ़ करने को मन करे। अख़बार वाले संपादक टीवी वाले एंकर अपने मतलब को साधने को कलाकारी दिखलाते हैं हर नेता को खुश करने को ऐसे सलीके से बात कहते हैं जिस से लगता है जनता की नागरिक की तरफ हैं होते सरकार की ओर हैं। उनकी सलाह और भी दोस्तों चाहने वालों की राय का आदर करते हुए आज ये जुर्म बेलज़्ज़त भी करने चला हूं। शायद जिन लोगों ने मुझे व्हाट्सएप्प फेसबुक पर ब्लॉक किया हुआ है उनके भगवान की आलोचना के अपराध के कारण उनको खबर मिल जाए और मुझे अनब्लॉक करने की अनुकंपा करें। 

          पहला अध्याय ( नेता जी पर आलेख लिखना है ) 50 अंक का अनिवार्य सवाल। 

  नेताजी अच्छे दिन लाने वाले थे देश को खूबसूरत सपने दिखलाने वाले थे। चाय की चौपाल पे चर्चा करवाने वाले थे। सेवक बनकर गरीबों के दुःख दर्द मिटाने वाले थे। घायल थी जनता मरहम लगाने वाले थे मगर नहीं था मालूम कैसे दिन दिखलाने वाले थे दर्द को दवा बताने वाले थे घायल को ज़ख्म पर नमक छिड़कने वाले थे उसको तड़पा कर अट्टहास लगाने वाले थे। इक नया इतिहास रचाने वाले थे शहंशाह की तरह हर घड़ी पोशाक लिबास बदलने का कीर्तिमान स्थापित करने वाले थे।  देश को नई दिशा दिखलाने वाले थे हर घड़ी झूमने गाने वाले थे। रोज़ कोई नया मजमा लगाने वाले थे देश की जमापूंजी ऐशो-आराम पे उड़ाने वाले थे। कुछ नहीं नया बनाने वाले थे जो भी स्थापित था एक एक कर गिराने-मिटाने वाले थे। हम सबको चार्वाक ऋषि की बात का अर्थ समझाने वाले थे क़र्ज़ लेकर घी पीओ की मिसाल बनाने वाले थे। अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचाने वाले थे , रिज़र्व बैंक से भी उलझने टकराने वाले थे। रिज़र्व बैंक का सुरक्षित धन हथियाने वाले थे अपने लिए उस को उड़ाने वाले थे। अंधे कुएं में गाड़ी चलाने का जादू दिखलाने वाले थे आग से आग बुझाने वाले थे जितना भी पानी था खुद पी जाने वाले थे। होश सबके उड़ाने वाले थे हर किसी को सज़ा देने को अपराधी बतलाने वाले थे अपनी अदालत लगाने वाले थे वकील गवाह न्यायधीश सब खुद बनकर फैसला सुनाने वाले थे। लोग ये ग़ज़ल दोहराने वाले थे , मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है क्या मेरे हक में फैसला देगा। आदमी आदमी को क्या देगा।

         दूसरा अध्याय ( उनकी अदालत का निर्णय ) 50 अंक का सवाल अनावश्यक है।

ऊंचे सिंहासन पर बैठे न्यायधीश बन जनता को कटघरे में खड़ा कर आरोप लगा अपनी बेगुनाही साबित करने को कह रहे हैं। लोग कह रहे हैं ये सच है हमें अपने किये का फल मिल रहा है ऐसे व्यक्ति की झूठी बातों पर भरोसा किया और उसकी सरकार बनवा दी। अब वही हम पर इल्ज़ाम लगाता है और अपने गुनाहों का दोष हम पर लगाता है। जितने अपराधी हैं राजनीति में उनको गले लगाता है अपने दल में शामिल करता है और जिनको देश विरोधी कहता था सहयोगी बनाता है। जनता को उल्लू बनाता है। चार सौ करोड़ विदेशी दौरों पर खर्च कर इतराता है खुद को विश्व का महान राजनेता बतलाता है इतने पैसे से देश की भलाई करता तो बहुत किया जा सकता था मगर उसकी जेब से क्या जाता है। दोस्तों संग जश्न हर दिन मनाता है। अपनी संस्था के लोग बड़े बड़े पदों पर बिठाता है अपनी मनमानी करने को उचित अनुचित का भेद मिटाता है। इक पुरानी कहावत सच दोहराता है , अगर संतान काबिल है तो जमा करने की ज़रूरत क्या है खुद अपने आप कमाई कर लेगी और नाकाबिल है तो जमा किया हुआ बर्बाद कर उड़ा देगी। यही कर दिखाता है ,रिज़र्व बैंक जब ये समझाता है ये सुरक्षित धन बुरे समय काम आता है। मुझ जैसा शासक हो बुरा समय खुद ही बुलाता है मेरा आदेश है मुझे चाहिए किसी का क्या जाता है। जिसकी लाठी उसकी भैंस फैसला सुनाता है। भैंस के सामने बांसुरी बजाता है। 

                  तीसरा अध्याय ( अंतिम उत्तीर्ण होने को ) खरैती पास कॉपी-पेस्ट 

इक स्कूल के शिक्षक को नेता जी की बचपन की कापी रद्दी से मिल गई है। अगर मैं शासक बन गया। शीर्षक पर लेख लिखवाया गया था। तब उस बच्चे ने जो लिखा था लिखावट जैसी भी रही लेख पढ़कर अध्यापक ने नंबर शून्य दिए थे। शासक बन गया तो करना कुछ भी किसलिए है बस अपना गुणगान करवाना है उस पर खज़ाना खर्च करवाना है। अपनी सभी इच्छाएं पूरी करनी है जो मेरी बात नहीं मानेगा उसकी ऐसी की तैसी करनी है जिस टीचर ने मुझे गलती करने की सज़ा दी या भले घर के किसी बड़े ने शरारत करने पर डांट लगाई सभी को खूब मज़ा चखाना है। इक इक का हिसाब चुकाना है। बदमाश कहते हैं बदमाश क्या गुंडा बनकर सबक सिखाना है। 

वैधानिक चेतावनी :- ये इक काल्पनिक कथा की रचना है और इसका किसी की ज़िंदगी से कोई वास्ता नहीं है। किसी घटना से समानता हो ऐसा केवल इत्तेफ़ाक़ से हो सकता है।


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