Thursday, 17 October 2019

महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया

     महत्वहीनता की बात ( चिंतन-मनन ) डॉ लोक सेतिया 

  शुरुआत भले कहीं से करें अब मुझे महसूस होने लगा है तमाम चीज़ें अपनी उपयोगिकता खो चुकी हैं। कल शाम पढ़ा अख़बार में इक तथाकथित सन्यासी स्वामी जी अपने अनुयाईओं को किसी दल को समर्थन देने की बात समझाते हुए कह रहे थे जाति वर्ग से ऊपर उठकर विचार करो। जबकि वही हमेशा उसी जाति वर्ग की रहनुमाई की बात शान से किया करते थे और कुछ लोग आपसी विवाद सुलझाने को उन्हीं को बुलाया करते थे। विषय उनकी बात या किसी एक घटना को लेकर नहीं है बस मिसाल देने को अभी की बात ध्यान आई है। वास्तव में बहुत कुछ अपना महत्व खो चुका है और धर्म सामजिक संस्थाएं आदर्श नैतिक मूल्य से लेकर देश समाज की ज्ञान की बात इसी गति को पा चुके हैं। मुमकिन है ऐसा मुझे अपनी निराशा के कारण लगता हो। 

  आप फेसबुक पर पढ़ रहे हैं ये बात या व्हाट्सएप्प पर पढ़ते हैं कभी अख़बार मैगज़ीन में पढ़ते थे किताब में पढ़ते थे ध्यान से। अब गंभीर चिंतन नहीं करते लोग सरसरी नज़र डालते हैं जो पोस्ट चार लाइनों की होती हैं पढ़ते हैं विस्तार से लिखी पोस्ट को पढ़ना मुसीबत लगता है क्योंकि पढ़ना अब समझने का मकसद से नहीं बस समय बिताने मनोरंजन को करते हैं। मुझे लगता है पढ़ने का मकसद ही खो गया है। आडंबर बनकर रह गई हैं तमाम संस्थाएं भी चुनाव सरकार सरकारी विभाग संस्थाएं संविधान न्याय देशभक्ति समाजसेवा सभी लगता है मकसद कुछ था और बन कुछ और ही गए हैं। 

     धर्म कितने हैं कोई भी वास्तविक मानवता इंसानियत की बात वास्तव में नहीं सिखलाता है। इक होड़ सी लगी है खुद को अच्छा किसी को खराब साबित करने में , कितनी खेदजनक दशा है ये तो धर्म के खिलाफ है। अपने चोला पहन लिया है उपदेशक संत साधु सन्यासी या कोई धर्मगुरु होने का मगर सब को दुनिया छोड़ने की बात लोभ लालच मोह माया त्याग की बात बताने वाले संचय करने में लगे हैं। पढ़ लिख कर या फिर किसी भी तरह बड़े पद पर बैठकर कर्तव्य की बात भूलकर अधिकार और अहंकार की सोच से खुद को जाने क्या समझने लगे हैं जबकि वास्तव में सब की हैसियत समंदर में बूंद की भी नहीं है और ये बात नेताओं अधिकारियों से लेकर लिखने वाले साहित्यकारों से धनवान लोगों ही नहीं कलाजगत की बड़ी हस्तिओं खेल टीवी अख़बार सभी आदर्शवादी बातें करने वालों पर लागू होती है। हर ज़र्रा खुद को आफ़ताब समझता है।  आधुनिकता ने हमको जितना दिया है उस से अधिक मूलयवान था जो छीन लिया है। हमने जो जो भी जिस जिस मकसद को लेकर बनाया था वही अपने ही मकसद के विपरीत आचरण करता लगता है। जिनका उपयोग करना था हम उन्हीं के हाथ का खिलौना बन गए हैं। आदमी आदमी नहीं सामान बन गया है।

         
    बात कभी सीधी तरह समझ नहीं आती , जब कोई सीमा लांघ जाता है तब सोचते हैं ये कोई सही राह दिखाने वाला नहीं है अपने मकसद को सच को झूठ और झूठ को सच बताता है। आखिर कब तक कोई गुरुआई की आड़ लेकर कमाई की मलाई खा सकता है। देर से ही सही सन्यासी की बात कुछ लोगों को बेहद अनुचित लगी है। कभी कभी कायर लोग भी अपने अस्तित्व की खातिर ख़ामोशी तोड़ने लगते हैं और खलनायक को नायक मानने से इनकार कर देते हैं। ऐसा पहले किया होता तो अपने अस्तित्व पर सवाल खड़ा नहीं होता। मगर चालाक लोग अभी भी कुछ न कुछ तरीका अपनाकर उनको मनवा लेंगे ऐसा कुछ समय का गुबार थोड़ी देर में गुज़र जाता है। जब तक अपने अंदर की ताकत को जगाते नहीं और विवेक से काम लेकर अच्छे बुरे को समझ कर हिम्मत नहीं करते सच्चाई का साथ और झूठ का विरोध करने को तब तक बात बनेगी कैसे। अपने जिस के हज़ार ज़ुल्म ख़ामोशी से सहे आज दर्द से कराह उठे जब सूली पर चढ़ाने की नौबत सामने है। खुद हम बुराई को बढ़ने देते हैं जब पहाड़ बनकर खड़ा होता है कोई तब होश आता है। मगर जब चिड़िया खेत चुग गई तो हाथ मलने पछताने से फायदा क्या। सबसे महत्वपूर्ण बात है हम आदर्श को लेकर नहीं अवसर के कारण खड़े होते हैं जबकि सच और झूठ की लड़ाई हर रोज़ लड़नी होती है। इंसाफ की डगर पर चलना है तो मुश्किलें रोज़ आएंगी और सामना करना होगा। अन्यथा आपको विभाजित करने को उनके पास कई चालें हैं आपको हर चाल को समझना भी होगा और टकराना भी होगा समझदारी से। दीवार से सर टकराने से कुछ नहीं हासिल होता आपको ज़ुल्म की दीवार भले फौलाद की हो उस में छेद दरार कमज़ोर जगह देख उस पर वार करना होगा। ये महत्वपूर्ण बात ध्यान रहे।

              

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